* निर्भय देवयांश
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एक शहर
जिसका नाम मुंबई है
कला के शहर के रूप में
पहचान रखता है हिंदुस्तान में
यहां छोटे-से-छोटे और बड़े-से-बड़े कलाकार की
मोटी कमाई का कोई हिसाब-किताब नहीं
कलाकारों का अंबार है
अंगुली पर गिनी नहीं जा सकती इनकी संख्या
साथ-साथ कलकुलेटर रखना पड़ता है
पैसा जोड़ने के लिए और संबंध तोड़ने के लिए
अभी तक किसी फिल्मी पत्रिका ने
यह हिसाब कर नहीं बताया है
कि कलाकारों की संख्या कितनी है
सब कुछ अनुमान पर चल रहा है
कला की दुनिया के पारखी कलाविदों,
समीक्षकों और आलोचकों की बातों को मानें
तो मुंबई हिंदुस्तान में ऐसा पहला शहर है
जो रोज-रोज कला को परिभाषित करता है
यह शहर पल-पल दुनिया के उन शहरों को
मात दे रहा है जिनकी कभी तूती बोलती थी
यह कोई भी हो सकता है
जिसे मुंबई रोज दिन पटकनी देता है
पेरिस, मास्को, लंदन, न्यूयॉर्क जैसे शहरों को भी
कला की परिभाषा मुंबई से सीखनी होगी
फिलहाल कला समीक्षकों का मानना है
कि फिल्म में औरतों के शरीर पर कपड़ा जितना कम हो
फिल्में हिट होंगी
बशर्ते कि हीरोइन कपड़ा उतारने के लिए राजी हो
यदि राजी भी न हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता
निर्माता प्रलोभन देकर कुछ भी करा लेते हैं हँसी-खुशी
लेकिन एक कवि ने कभी हँसी में
यह कहकर सभी को भौचक्का कर दिया था
कि मुंबई में कला के नाम पर
कलाकारों का शोषण हो रहा है
बस इतनी सी बात के लिए
कवि की बड़ी फजीहत हुई थी
उसके लिखे गाने को
निर्माता-निर्देशकों ने लेने से इनकार कर दिया था
रातोंरात उसे भागना पड़ा था
मुंबई छोड़कर
यह कवि भी कुछ-कुछ प्रेमचंद और बच्चन की
तरह रहा होगा
फिल्म समीक्षकों ने नसीहत देते हुए
तब कला प्रेमी को कहा था
चले जाओ हिमालय पर
वहां पर मन्दिरों की भीड़ है
किसी मंदिर में बैठकर
भगवान की भक्ति में लीन हो जाना
इस कवि के मुंबई से निकलते ही
तथाकथित कलाविदों ने तीन ऐसी फिल्में बनाईं
जिन्हें लेकर कवि को हिमालय जाना पड़ा था
पहली फिल्म में हीरोइन थोड़ी नंगी हुई
दूसरी फिल्म में आधी नंगी
और तीसरी फिल्म में तो
हीरोइन के तन पर वस्त्र था ही नहीं
वह पूरी तरह नंगी थी
जैसे कि उसके कपड़े दुर्योधन के कहने पर
दुःशासन ने उतार लिए हों
यह सब कुछ दिन के उजाले में होता है
जहां पर मर्दों की भीड़ रहती है
और-तो-और अपने ही नंगापन पर
हीरोइन बत्तीसी दिखाती है
ठहाका मार-मारकर हँसती है
जब तक नंगापन के लिए उसका नाम
देश-दुनिया में मशहूर न हो जाते
सचमुच
मुंबई के कलाविद
आधुनिक युग को आदिम युग में ले जाने के लिए
रात-दिन कड़ी मेहनत कर रहे हैं
ऐसे कलाकार बधाई के पात्र हैं
सिनेमाघरों में प्रदर्शित होते ही
तीनों फिल्में हिट साबित हुईं
इन हिरोइनों की मांग हर फिल्म में होने लगी
आज कोई स्टार है तो कोई सुपरस्टार
एक कला समीक्षक ने कहा
भगोड़ा कवि भी हो जाता आधा नंगा
फिर उसे भी किल्लत नहीं रहती पैसे की
आज हिमालय पर रहने के बजाय
जुहू बीच, पाली हिल और बांद्रा के
आलीशान बंगलों में रहता
और साथ में होती
हाड़-मांस की बनी औरतें
जिनके स्पर्श से केवल सुख मिलता
दुःख पता भी नहीं चलता
जिस्म और धड़कन को।
नोट:::मुंबई यानी मायानगरी यानी बॉलीवुड को दिल-दिमाग से टूटने पर छोड़ देने के बाद (प्रवास काल 1989-1996) तब की लिखी मेरी यह कविता है। लगभग 25 साल पहले की। *संगीन के साये में लोकतंत्र* कविता-संग्रह में प्रकाशित, 2003।
जिस बरहना यानी नग्नता की बात प्रेमचंद मुंबई प्रवास के अपने 10 माह के अनुभवों को 1934-1935 में लिख रहे थे। मैं भी अपने टूटन में उन्हें नब्बे के दशक में उकेर रहा था। प्रेमचंद और बच्चन भी असफल कवि-गीतकार की पंक्तियों में उतरते हैं। मिसाल बनते हैं। यह कला का नंगा सच जिसे प्रेमचंद बरहना रक्स कहते हैं--नंगे नाच करने वाले लोग! कला किन लोगों के हाथ में है यानी जो नंगई परोस रहे हैं। कुछ फिल्में जो लीक से हटकर बनती हैं, शायद इसीलिए असफल हो जाती हैं, क्योंकि उनमें नंगई में कंजूसी की गयी? हालात सदा बदतर ही होते जा रहे हैं। हमारी नियति है कि बदतर हालात से निकलने के उपाय प्रायः कम होते जा रहे हैं। हम कुछ अधिक तमाशबीन हो गए हैं। आगे कुछ और हो जाएंगे।
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