Saturday, 5 September 2020

तिलस्मी शहर उर्फ मायानगरी


* निर्भय देवयांश
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एक शहर 
जिसका नाम मुंबई है 
कला के शहर के रूप में 
पहचान रखता है हिंदुस्तान में

यहां छोटे-से-छोटे और बड़े-से-बड़े कलाकार की 
मोटी कमाई का कोई हिसाब-किताब नहीं 
कलाकारों का अंबार है 
अंगुली पर गिनी नहीं जा सकती इनकी संख्या 
साथ-साथ कलकुलेटर रखना पड़ता है 
पैसा जोड़ने के लिए और संबंध तोड़ने के लिए 
अभी तक किसी फिल्मी पत्रिका ने 
यह हिसाब कर नहीं बताया है 
कि कलाकारों की संख्या कितनी है
सब कुछ अनुमान पर चल रहा है

कला की दुनिया के पारखी कलाविदों,
समीक्षकों और आलोचकों की बातों को मानें 
तो मुंबई हिंदुस्तान में ऐसा पहला शहर है 
जो रोज-रोज कला को परिभाषित करता है 
यह शहर पल-पल दुनिया के उन शहरों को 
मात दे रहा है जिनकी कभी तूती बोलती थी
यह कोई भी हो सकता है
जिसे मुंबई रोज दिन पटकनी देता है 
पेरिस, मास्को, लंदन, न्यूयॉर्क जैसे शहरों को भी
कला की परिभाषा मुंबई से सीखनी होगी

फिलहाल कला समीक्षकों का मानना है
कि फिल्म में औरतों के शरीर पर कपड़ा जितना कम हो 
फिल्में हिट होंगी
बशर्ते कि हीरोइन कपड़ा उतारने के लिए राजी हो
यदि राजी भी न हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता 
निर्माता प्रलोभन देकर कुछ भी करा लेते हैं हँसी-खुशी 
लेकिन एक कवि ने कभी हँसी में 
यह कहकर सभी को भौचक्का कर दिया था
कि मुंबई में कला के नाम पर 
कलाकारों का शोषण हो रहा है
बस इतनी सी बात के लिए 
कवि की बड़ी फजीहत हुई थी
उसके लिखे गाने को 
निर्माता-निर्देशकों ने लेने से इनकार कर दिया था
रातोंरात उसे भागना पड़ा था 
मुंबई छोड़कर 
यह कवि भी कुछ-कुछ प्रेमचंद और बच्चन की 
तरह रहा होगा
फिल्म समीक्षकों ने नसीहत देते हुए 
तब कला प्रेमी को कहा था 
चले जाओ हिमालय पर 
वहां पर मन्दिरों की भीड़ है
किसी मंदिर में बैठकर
भगवान की भक्ति में लीन हो जाना

इस कवि के मुंबई से निकलते ही 
तथाकथित कलाविदों ने तीन ऐसी फिल्में बनाईं
जिन्हें लेकर कवि को हिमालय जाना पड़ा था
पहली फिल्म में हीरोइन थोड़ी नंगी हुई
दूसरी फिल्म में आधी नंगी 
और तीसरी फिल्म में तो 
हीरोइन के तन पर वस्त्र था ही नहीं
वह पूरी तरह नंगी थी
जैसे कि उसके कपड़े दुर्योधन के कहने पर 
दुःशासन ने उतार लिए हों 
यह सब कुछ दिन के उजाले में होता है
जहां पर मर्दों की भीड़ रहती है
और-तो-और अपने ही नंगापन पर 
हीरोइन बत्तीसी दिखाती है
ठहाका मार-मारकर हँसती है
जब तक नंगापन के लिए उसका नाम 
देश-दुनिया में मशहूर न हो जाते 
सचमुच 
मुंबई के कलाविद
आधुनिक युग को आदिम युग में ले जाने के लिए 
रात-दिन कड़ी मेहनत कर रहे हैं
ऐसे कलाकार बधाई के पात्र हैं

सिनेमाघरों में प्रदर्शित होते ही
तीनों फिल्में हिट साबित हुईं
इन हिरोइनों की मांग हर फिल्म में होने लगी
आज कोई स्टार है तो कोई सुपरस्टार

एक कला समीक्षक ने कहा 
भगोड़ा कवि भी हो जाता आधा नंगा 
फिर उसे भी किल्लत नहीं रहती पैसे की
आज हिमालय पर रहने के बजाय
जुहू बीच, पाली हिल और बांद्रा के 
आलीशान बंगलों में रहता
और साथ में होती
हाड़-मांस की बनी औरतें
जिनके स्पर्श से केवल सुख मिलता
दुःख पता भी नहीं चलता
जिस्म और धड़कन को।

नोट:::मुंबई यानी मायानगरी यानी बॉलीवुड को दिल-दिमाग से टूटने पर छोड़ देने के बाद (प्रवास काल 1989-1996) तब की लिखी मेरी यह कविता है। लगभग 25 साल पहले की। *संगीन के साये में लोकतंत्र* कविता-संग्रह में प्रकाशित, 2003।

जिस बरहना यानी नग्नता की बात प्रेमचंद मुंबई प्रवास के अपने 10 माह के अनुभवों को 1934-1935 में लिख रहे थे। मैं भी अपने टूटन में उन्हें नब्बे के दशक में उकेर रहा था। प्रेमचंद और बच्चन भी असफल कवि-गीतकार की पंक्तियों में उतरते हैं। मिसाल बनते हैं। यह कला का नंगा सच जिसे प्रेमचंद बरहना रक्स कहते हैं--नंगे नाच करने वाले लोग! कला किन लोगों के हाथ में है यानी जो नंगई परोस रहे हैं। कुछ फिल्में जो लीक से हटकर बनती हैं, शायद इसीलिए असफल हो जाती हैं, क्योंकि उनमें नंगई में कंजूसी की गयी? हालात सदा बदतर ही होते जा रहे हैं। हमारी नियति है कि बदतर हालात से निकलने के उपाय प्रायः कम होते जा रहे हैं। हम कुछ अधिक तमाशबीन हो गए हैं। आगे कुछ और हो जाएंगे।
                                   
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Sunday, 30 August 2020

बेचारा राज्य उर्फ बिहार


* निर्भय देवयांश
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  बेचारा राज्य 
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 हिंदुस्तान में बिहार बेचारा राज्य है
दिल्ली वाले, मुंबई वाले कभी इस पर बैठकर
बातचीत नहीं करते कि 
बिहार को किस परिस्थितियों ने 
बेचारा, लाचार, असहाय 
निष्प्राण राज्य की संज्ञा दिला दी

आज तो हालत और भी खराब है
दूसरे राज्य के लोगों के कानों तक 
जैसे ही किसी बिहारी की आवाज सुनायी पड़ी 
लोग भागने लगते हैं
अफरा-तफरी मच जाती है
ऐसा कुछ होने लगता है
ये लोग इतने परेशान हो जाते हैं 
कि जैसे बिहारी कोई अछूत है
और उसके स्पर्श मात्र से 
उनकी बिसात मिट जाएगी 

यह बात कुछ हद तक सही है
हिंसा की खेती करता है बिहार 
और फसल पहुंचती है 
दिल्ली दरबार में।

*संगीन के साये में लोकतंत्र* कविता-संग्रह से 

नोट::1990 के दशक में 1989 से 1996 तक मुंबई यानी बॉलीवुड की स्याह दुनिया में दर-दर ठोकर खाने के बाद लगभग 25 साल पहले यह कविता लिखी थी। मुंबई के बाद महीनों तक दिल्ली में भी भटकता रहा था। बिहारी को लेकर जो कटु अनुभव दिखे, तभी यह महसूस हुआ था कि आखिर कोई राज्य और उसके निवासी इतने लाचार और बेचारे कैसे हो सकते हैं? सुशांत सिंह राजपूत हत्याकांड के बाद या विभिन्न राज्यों में हो रहे बिहारियों पर अत्याचार के बाद ये सवाल सुरसा मुँह की तरह हमारे सामने खड़े हैं? 


Thursday, 27 August 2020

ए फॉर अमर सिंह मने हर हाल में अमीर बनो, बी फॉर बॉलीवुड मने हत्या-बलात्कार को भी बेच डालो बनाम बॉलीवुड को हर ऐब पसंद है...


* निर्भय देवयांश 
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 अमर सिंह को दुबई के एक फिल्मी महोत्सव में जब शाहरुख खान ने गुंडा कहा था तो अमर सिंह का पलटवार भी कम जोरदार नहीं था। बकौल शाहरुख--अगर आप अमिताभ बच्चन के दोस्त नहीं होते तो आपको यहाँ से निकाल बाहर किया जाता। बदले में अमर सिंह ने कहा था-बिल्कुल ठीक, अगर बिग बी मेरे दोस्त नहीं होते तो तुम्हें अभी दिखा देते कि गुंडई किसे कहते हैं।

दरअसल अमर सिंह को शाहरुख खान द्वारा यह एहसास कराया जा रहा था कि आप इस महफिल के लायक नहीं हैं। बाद में अमर सिंह ने बॉलीवुड की महफिल में जो जगह बनायी और फिर अमिताभ से अनबन के बाद जो लात मारी, उसके दर्जनों उदाहरण सर्वविदित हैं। मसलन, जब बॉलीवुड का सुपरस्टार कहे कि अगर मुफलिसी के दिनों में अमर सिंह नहीं मिले होते तो मैं मुंबई की सड़कों पर टैक्सी चला रहा होता। मसलन, अमिताभ टू संजय दत्त टू सलमान सभी को मुलायम सिंह के गांव सैफई खींच लाए और रात भर नचाए---जोरा-जोरी चने के खेत में...। जब ये लोग आ गए तो फिर शाहरुख न आए, कोई फर्क पड़ता है क्या? अमर सिंह ने बता दिया कि शाहरुख तुम्हारे बिना भी महफिल सजायी जा सकती है। सजती है और सजती रहेगी। अगर किसी के दोस्त बड़े अंबानी थे तो छोटे अंबानी अमर सिंह के प्यारे थे। सहारा का भी उन्हें जो सहारा मिला, भला और किसे मिला! 

बॉलीवुड के लोगों को जब यह पता चल गया कि सुपरस्टार को अमर सिंह चाहिए होता है फिर उनकी क्या बिसात है? अमिताभ के घर रहते हुए उनसे कौन नहीं मिलने आए, देवानंद से लेकर अक्षय कुमार तक। यह दीगर बात है कि मिलने के लिए अमर सिंह को गेट पर जाना पड़ा। अमिताभ ने किसी को भी अपने अन्तरमहल के बैठकखाने में जगह नहीं दी। यह टीस अमर सिंह को सदा सालती रही कि जिस आदमी को एक बार फिर से दौड़ने लायक बना दिया, एकदम से खड़ा कर दिया। उस आदमी के घर में उसकी औकात महज गेस्टहाउस तक सीमित रही। यह दुःख बड़ा दुःख था, जिसे अमर सिंह भूल नहीं पाए। टीवी और अखबार में बार-बार व्यक्त करते रहे। 

अमर सिंह कोलकाता के ही थे। लहक से जुड़े कहानीकार विमलेश्वर द्विवेदी, शायर कवि रामगोपाल पारीख, प्रभाकर चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार हरेराम कात्यायन उनके घर-परिवार को करीब से जानते रहे हैं। अमर सिंह के छोटे भाई अरविंद सिंह तो 1970-80 के दशक में इन सभी के मित्र मंडली के अंग थे। इसलिए जब अमर सिंह प्रायः आए दिन किसी न किसी वजह से खबर बनाते तो इन्हें आश्चर्य नहीं होता। कारण कि उगते सूर्य का अमर सिंह के लिए काफी महत्व था। उनका संकल्प ही था कि चमकदार बनना है। फिर सिस्टम में ऐसे लोगों के लिए सरकार बनाना और गिराना बहुत छोटी बात हो जाती है। 

2004 से मेरा भी कोलकाता में रिपोर्टिंग के सिलसिले में अमर सिंह से मिलना-जुलना हुआ। पहली बार मुझे ताज होटल में मिलवाया गया। बस यूँ ही चला गया। बॉलीवुड के बारे में मुझे कुछ भी जानना नहीं था। राय-रत्ती से अधिक खुद ही जानता था।सात साल समय बर्बाद कर भीतरी नंगई देख चुका था। फिर बचा क्या रह गया...खैर। 

अमर सिंह से मुझे भारतीय लोकतंत्र, भारतीय पूंजीवाद, भारतीय अमीरवाद और काफी हद तक भारतीय दलालवाद समझना था। ये सभी सवाल मेरे अपने मन की जिज्ञासा थी। अखबार में इसकी कोई उपयोगिता नहीं थी, क्योंकि अमर सिंह समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद थे, और तब जागरण के मालिकों में एक मालिक नरेंद्र मोहन भी सपा से ही सांसद थे। यह खबर लगनी न थी। सिंगल या डबल लग जाए तो लग जाए। मेरा पहला ही सवाल था कि आपको दलाल कहलाने में इतनी खुशी क्यों मिलती है? अमर सिंह का जवाब था--दलाल नहीं, मैं कोई वेश्याओं का दलाल तो हूँ नहीं। मुझे इसलिए खुशी मिलती है कि लोग मुझे उद्योगपतियों का दलाल कहते हैं। यह सच है तो मैं इसे सहज स्वीकार कर लेता हूँ कि कम से कम मैं जिस महफिल में उठता-बैठता हूँ, वे सब देश के बड़े से बड़े उद्योगपति हैं। यहाँ से सत्ता भी बहुत बौनी नजर आती है। 

फिर अमर सिंह जो शुरू हुए कि लगभग दो घण्टे तक भारतीय सिस्टम की हर एक गुत्थी खोलकर रख दिए। पहली गुत्थी थी---हर हाल में अमीर बनो। मैंने पूछना चाहा कि यह हर हाल क्या होता है---अमर सिंह का जवाब था, जिन्हें अमीर बनना होता है, उन्हें हर हाल का भी पता होता है। एक लिहाज से ठीक ही है। पहले कांग्रेसी फिर समाजवादी! अमरवाणी जारी रहती है---जब आप अमीर हो गए तो सिस्टम के करीबी हिस्सा हो गए। मतलब कि मंच शेयर करने लगे। शेयरिंग की हिस्सेदारी के भागीदार। फिर आप जो चाहते हैं, सबकी पूर्ति होने लगती है। जो सपने देखे हैं उनकी पूर्ति करते जाएं। इस राह में चलते हुए आलोचना की चिंता कभी न करें। जैसे हाथी के चलने पर भौंकने वाले कुत्ते की कोई औकात होती भी है क्या? उद्योगपतियों के दलाल होने की सीढ़ी थी अमर सिंह का खुद उद्योगपति हो जाना। 

अमर सिंह के बाद का विकासवाद उनके बताए रास्ते से आगे बढ़ता गया। बहुत दूर तक। 'हर हाल में' का सिद्धांत कितने लोगों के जीवन में सफल होता है, सफल होने वाले ही बता पाएंगे। जैसे कि अमर सिंह खुलकर सबकुछ बताते थे। शेर-शायरी से पत्रकारों को हँसाते और विपक्षी नेताओं को जवाब व्यंग्य के लहजे में दे जाते। सुपरस्टार को फिर से खड़ा कर देने का गुमान भी अमर सिंह के पास था। अभिनेत्रियों के साथ मधुर संबंध भी उनके नाम दर्ज हैं। बॉलीवुड पर तंज कसते हुए अमर सिंह कहते थे कि इन्हें सबको दिखाने का शौक है और मुझे इन्हें नचाने का शौक। जब तक रहे नचाते ही तो रहे! 

बॉलीवुड का स्वार्थी और भाई-भतीजावादी चेहरा अमर सिंह बहुत  जल्द देख लिए थे। उनकी रुचि हर हाल में अमीर बनो का सिद्धांत बॉलीवुड का अंतिम निष्कर्ष है। जब मिल बैठेंगे दो दीवाने की तरह। बलात्कार बेच दो, हिंसा बेच दो, हत्या बेच दो, दंगा-फसाद बेच दो। प्रेमचंद के लिए यही 'बरहना-रक्स' है यानी नंगे नाच को कला बताने वाले लोग। प्रेमचंद नंगे नाच के हिस्सेदार न हुए। वाकई, बॉलीवुड को हर ऐब पसंद है। 

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Monday, 24 August 2020

बेरोजगारी की मार से त्रस्त हैं पत्रकार...



* लोकनाथ तिवारी
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की रे किछू काजेर संधान पेली, छ मास धोरे घोरे बंदी होये पोड़े आची। (क्या रे कोई काम काज खोजा, छह महीने से घर में कैद होकर रह गया हूं)। कोलकाता के मेरे एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र ने जब व्हाट्सअप पर सुबह-सुबह ये मैसेज भेजा तो कुछ समय के लिए मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। लॉकडाउन के पहले चरण में ही नौकरी गंवा चुके पत्रकार के सामने दो जून की रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है। घर में बूढ़े मां-बाप हैं। अपना मकान है इसलिए बीपीएल श्रेणी में नहीं है, अतः फ्री राशन का भी हकदार नहीं है। मेरे मन में तरह-तरह के बुरे विचार आने लगे। अप्रैल में मैंने बड़ी मजबूती से उसे दिलासा दी थी कि कुछ न कुछ व्यवस्था जरूर होगी, लेकिन अब क्या कहता, क्या जवाब देता। मार्च से ही वेतन नहीं मिलने के कारण अगस्त के प्रथम सप्ताह में मैंने स्वतः ऑफिस जाना बंद कर दिया था। अब उसके मैसेज से मन विचलित हो रहा था। 
आधे घंटे तक संकटमोचन का स्मरण करने के बाद भी मैसेज भेजने का साहस नहीं जुटा पाया। कहीं वह अधिक हताश न हो जाये, इसलिए मैंने उसे फोन लगाया और हाय-हैलो के बाद अपनी स्थिति बतायी कि मैं भी बेरोजगार हो गया हूं। एक तो पांच महीने का वेतन नहीं मिला दूजे अब नौकरी भी नहीं रही। घर बैठ गया हूं। मेरी स्थिति जानकर वह और दुखी हो गया लेकिन उसे संतोष भी हुआ कि वह अकेला इस स्थिति में नहीं है। फिर बातों ही बातों में उसने बताया कि राहुल, प्रभात, संतोष, राजीव, ईश्वर सहित दर्जनों साथियों का यही हाल है। हम तो सब्जी भी नहीं बेच सकते, ट्यूशन पढ़ा सकते थे, लेकिन कोरोनाकाल में वह भी बंद है. 
लॉकडाउन ने हमारी रोजी-रोटी ही नहीं छिना बल्कि भविष्य को भी अंधकारमय बना दिया है। ऐसे समय में जब पश्चिम बंगाल में अगले साल 2021 में चुनाव होनेवाला है। बंगाल में मीडिया में हाहाकार मचा हुआ है। सैकड़ों पत्रकार बेरोजगार हो गये हैं। दर्जन भर अखबार बंद हो गये हैं, जो छप रहे हैं, वहां भी छंटनी जारी है। पत्रकारों यह हाल केवल बंगाल में ही नहीं है। देश भर से इसी तरह की खबरें मिल रही हैं। कई पत्रकार तो आत्महत्या भी कर चुके हैं। बेरोजगारी का ये दर्दनाक आलम केवल पत्रकारिता की ही नहीं है। क्षेत्रों में भी स्थिति कमोबेश वही है। 
CMIE की अपनी ताज़ा रिपोर्ट में आगाह किया है कि जुलाई महीने में 50 लाख नौकरियां चली गईं। पिछले साल के औसत के मुकाबले इस साल अब तक 1 करोड़ 90 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। साफ है कि कोरोनावायरस संकट का असर अर्थव्यवस्था पर गहराता जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार फरवरी 2020 में ही बेरोजगारी दर बढ़कर 4 महीने के उच्च स्तर 7।78% पर पहुंच गयी थी। 
पिछले साल एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि साल 2019 में भारत में बेरोजगारी दर 45 सालों में अधिकतम स्तर पर थी। अर्थव्यवस्था में मंदी आ रही थी। सबसे अधिक रोजगार देने वाला क्षेत्र कृषि इस स्थिति में नहीं है कि इतने लोगों को खपा पाए। इसके बाद कोरोनावायरस की महामारी आ गई। इससे भारत में एक और बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई है। यानी पलायन की ऐसी स्थिति जो कभी नहीं देखी गई। यह पलायन शहरी क्षेत्रों में आर्थिक रूप से सक्रिय लोगों का था। ये लोग पहले से दयनीय ग्रामीण क्षेत्रों में लौटने लगे। अनुमान के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों के 10 करोड़ लोग ऐसे हैं जो लॉकडाउन के कारण बेरोजगार हो गए। दूसरी तरफ ऐसे पर्याप्त उपाय नहीं हैं जो उनकी उत्पादकता को ग्रामीण क्षेत्रों में बरकरार रख पाएं। इसने भारत को अभूतपूर्व बेरोजगारी के संकट में धकेल दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि 41 साल में पहली बार अर्थव्यवस्था सिकुड़ेगी। इसका सीधा का मतलब है कि पहली बार कोई विकास दर्ज नहीं होगा। इसलिए भीषण बेरोजगारी जारी रहेगी, नतीजतन गरीबी का स्तर बढ़ेगा।
इसी बीच अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने जीवनयापन को हुए नुकसान का आकलन किया है। यह अनुमान बताता है कि विश्व का आधा श्रम बल जो असंगठित क्षेत्र का कामगार भी है, तत्काल प्रभाव से अपनी रोजीरोटी से हाथ धो बैठेगा। इसका मतलब है कि 1।6 बिलियन असंगठित कामगार बेरोजगार हो जाएंगे। यह आंकड़ा विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत की आधी से ज्यादा आबादी के बराबर है। मार्च में करीब 2 बिलियन असंगठित क्षेत्र के कामगार अपनी 60 प्रतिशत आय खो चुके थे। इन कामगारों की आय इतनी ज्यादा नहीं है कि वे अधिक समय तक बिना रोजगार के जीवन की मूलभूत जरूरतें पूरी कर पाएं। अप्रैल में उनका रोजगार पूरी तरह खत्म हो गया और उनकी आय शून्य हो गई।
13 मई 2020 को यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट (यूएनसीटीएडी) द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, यह स्थिति 4-6 करोड़ लोगों को भीषण गरीबी के दलदल में धकेल देगी। रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक गरीबी रेखा से नीचे विश्व की वह आबादी आती है जो प्रतिदिन 143.41 (1.90 अमेरिकी डॉलर) रुपए से कम पर जिंदगी गुजारती है। 2020 तक वैश्विक गरीब 8।2 प्रतिशत बढ़कर 66.5 करोड़ हो जाएंगे। 2019 में ऐसे लोग 8।2 प्रतिशत यानी 63.2 करोड़ थे। दुनियाभर के 36 अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सहयोग से तैयार की गई यह रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक गरीबों में यह अप्रत्याशित वृद्धि 1998 से नहीं देखी गई है। उल्लेखनीय है कि 1998 में दुनिया 1997 में आए एशिया के वित्तीय संकट के झटके से जूझ रही थी। 
यह विडंबना ही है कि कोरोना काल में पिछले 5 महीनों में लगभग 2 करोड़ लोगों ने नौकरियां गंवाईं। फिर भी सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा नहीं है। झूठी और भ्रामक खबरों के जरिये जनमानस को भटकाया जा रहा है। नफ़रत फैलायी जा रही है।

                              ***

महेश भट्ट ने पाकिस्तानी अभिनेत्री 'मीरा' को भी अपनी चपेट में लिया था और दिया सिर्फ एक फ्लॉप फिल्म 'नजर', फिर कहर...


* निर्भय देवयांश 
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बॉलीवुड में प्रलोभन मिले तो एक जन्म क्या कई जन्मों तक इंतजार किया जा सकता है। जिस प्रकार की किंवदंती बना दी गई है कि इस इंड्रस्टी से संबद्ध लोग जीते जी तो ऐश-मौज भोगते ही हैं। मरने के बाद भी उनका दिलों में बसना जारी रहता है। उनके चाहने वाले सदा जीवित रहते हैं। निर्माता-निर्देशकों के लिए यह प्रलोभन ज्यादा कारगर होता है और वे हसीनाओं को यानी नयी- नवेली लड़कियों को सबसे पहले अपने कब्जे में लेते हैं। इसके पीछे कितने कारण होते होंगे, गिनती मुश्किल है और यदि आपकी गिनती में रुचि है तो आप भी कम ऐय्याश नहीं होंगे? वर्ना भूखे-प्यासों के बीच कला के नाम पर आवारगी तो उसे ही अच्छी लगेगी जिसने मनुष्यता से नाता तोड़ लिया है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता की पंक्तियाँ हैं--"यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाश पड़ी हो और दूसरे कमरे में तुम प्रार्थना कर रहे हो, तो मुझे तुमसे कुछ नहीं कहना।" जबकि अवस्था इससे भी खराब है लेकिन कला तो आखिर कला है और यही 'कला तो सिर्फ कला के लिए है।'

 'सौतन' फिल्म के निर्देशक सावन कुमार टाक ने दशकों पहले टीवी पर एक बातचीत में पत्रकार से दिलेरी से अधिक बेशर्मी से कहा था--अभिनेत्री रास्ते की पत्थर की तरह है। हम उसे तराश कर अलग ढंग से उसकी प्रतिमा बनाते हैं। फिर उसकी पूजा होने लगती है। यानी उसे पर्दे के माध्यम से दर्शकों का समूह देते हैं। ये दर्शक अभिनेत्री के दीवाने होते हैं और फिर क्या चाहिए! यदि इतना कुछ करने में अभिनेत्री के प्रति निर्माता-निर्देशक के दिल में अभिनेत्री पर दिल आ जाए तो? सम्बंध आगे बढ़ने लगे तो? फिर दो दिलों के मिलन को दुनिया अनैतिक कहे तो कहे, हम तो मजा करेंगे? तर्क गलत-सही हो सकता है, लेकिन इतना कुछ दावा अभिनेत्री पर इसलिए किया जा रहा है या जाता है कि करोड़ों रुपये दांव पर लगा रहे हैं, इसलिए थोड़ी सी छूट ले ली तो हाय-तौबा क्यों? 

 सुशांत सिंह राजपूत के मामले में जो कि प्रेमी-प्रेमिका के बीच की लड़ाई थी, में महेश भट्ट रिया चक्रवर्ती को नाता तोड़ कर बाहर निकल जाने की सलाह देते हैं। जिस दिन संबंध टूट जाता है और रिया सुशांत को छोड़कर चली जाती है। यानी 8 जून 2020 को। उस दिन व्हाट्सएप पर महेश भट्ट और रिया दोनों बतकही का जश्न मनाते हैं। माई एंजेल टू माई गॉडफादर तक की धड़कन में रिंगिंग होती है। जगत को बताने के लिए कुछ भी बचा नहीं रह जाता है कि ये बगुला भगत भीतर-भीतर क्या गुल खिलाते होंगे? 

पाकिस्तानी अभिनेत्री मीरा भी महेश भट्ट की चपेट में आयी थी। झाँसे में बहुत समय तक रही। फिर एक फिल्म मिली 2005 में 'नजर'। अमीषा पटेल के भाई अस्मित पटेल के साथ। अस्मित बिग बॉस में भी चर्चित हुए थे। लेकिन फिल्म 'नजर' को न जाने किसकी बुरी नजर लग गई। एक-दो फिल्म और मीरा को मिल तो गयी लेकिन चली नहीं। जैसे रिया को लेकर महेश भट्ट की फिल्म जलेबी पूरी तरह से जलेबी बनकर रह गयी। चासनी अधिक होने से जलेबी का स्वाद बिगड़ गया। महेश भट्ट ने मीरा को अस्मित से शादी करने की सलाह भी दी। बात बनी नहीं। शादी के बाद संभव है कि मीरा को भारतीय नागरिकता मिल जाती? 

2006 के आसपास ही जाने-माने निर्माता निर्देशक बिग ब्रो इकबाल दुर्रानी के साथ किसी फिल्म के प्रोजेक्ट को लेकर मीरा कोलकाता आयी थी। भाईजान देर शाम को बाद आने वाले थे। ग्रैंड ओबेरॉय होटल में मीरा ठहरी थी। मुझे बिग ब्रो ने कहा था कि अखबार से छुट्टी ले लो और मेरे आने तक मीरा के साथ रहो। मैंने वैसा ही किया। इस दौरान बातचीत में मीरा ने बॉलीवुड के अपने अनुभवों के बारे में विस्तार से बताया। ऐसी-ऐसी बातें जो लिखने में भी आपत्तिजनक है। मैंने पूछा-फिर टिकोगी कैसे? नहीं, नहीं मैं पाकिस्तान लौट जाऊँगी, मीरा ने कहा। यही सब करने के लिए मैं थोड़े न बॉलीवुड में आयी हूँ। पाकिस्तान में जी-खा लूँगी। जितना काम मिल जाए, वहाँ की फिल्मों में कर लूँगी? 

यही महेश भट्ट पॉर्न स्टार सन्नी लियोनी को भी हिंदी फिल्म में लाकर तहलका मचा चुके हैं। 'जिस्म' नाम की फ़िल्म का क्या हाल हुआ, जनता-जनार्दन को पता है। जिस्म को भी किसी की नजर लग गयी। अभी सड़क 2 को भी दर्शक की नजर लगी है। डिस्लाइकर की संख्या बढ़ रही है। आगे के दिनों में यह संख्या बढ़ती ही जाएगी। प्रेमचंद इस बॉलीवुड को बरहना-रक्स करार दे चुके हैं यानी नंगे नाच में जीने-मरने वाले लोग। 

                                  ***

Sunday, 23 August 2020

'बॉलीवुड में ईमानदारी जमींदोज है, बेईमानी पनाहगार है', कभी शशि कपूर ने मुझसे बातचीत में कहा था...


* निर्भय देवयांश
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बॉलीवुड में ईमानदारी से रहने पर सुशांत सिंह राजपूत की तरह शिकार हो जाना मामूली से मामूली बातों में से एक है। जो गैंग और माफिया है वह पता ही नहीं चलने देता है कि शिकार को कहाँ लपेटे में लेना है और कहाँ निपटा देना है। कायदे से आर्थिक नुकसान तो अंकिता लोखंडे को पहुंचाना था सुशांत के जीवन में, क्योंकि वह सात साल लिव इन रिलेशनशिप में रही थी। यहाँ पर सतर्कता दोनों तरफ से बनी रही तो घटना नहीं घटी। रिया चक्रवर्ती महज एक साल में ही इतनी उग्र क्यों हो गयी? अब जबकि राज खुल रहा है कि वह महेश भट्ट के करीब बहुत पहले से थी और सुशांत को छोड़कर जाने के बाद सबसे पहले बातचीत महेश भट्ट से ही करती है। दोनों तय कर चुके थे कि सुशांत के साथ किस प्रकार का व्यवहार करना है। व्हाट्सएप की बातचीत में दोनों एक दूसरे के लिए हमदर्दी व्यक्त करते हैं और भविष्य के खतरे से बच लिए जाने पर एक दूसरे को बधाई भी देते हैं। सुशांत सिंह की ईमानदारी उसकी जान लेकर जमींदोज कर दी गयी। रिया ने आर्थिक फायदा अपने पूरे परिवार के लिए उठाया। इसमें सुशांत के हित की चिंता थोड़ी भी रहती तो महेश भट्ट कहीं से भी बीच में एंजेल की भूमिका में नहीं होते?

 रिलेशनशिप तो महेश भट्ट और परवीन बॉबी की भी थी लेकिन क्या हाल हुआ परवीन बॉबी का। घर में ही मरी पायी गईं। परवीन को मेंटल बनाने तक उनका शोषण किया गया। ईमानदारी यहाँ भी जमींदोज की गयी। महेश भट्ट की सुख-समृद्धि रिया चक्रवर्ती तक कायम रही। वायरल तस्वीरों को देखने से तो यही प्रतीत होता है।

शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा पाँच दशक से अधिक बॉलीवुड से जुड़े रहने के बाद भी उन सच्चाई को नहीं बोल रहे हैं, जो हकीकत हैं। आन, बान, शान और महान की फर्जी तुकबंदी में एक अलग घटाटोप तैयार कर दे रहे हैं ताकि लोग रहस्यमयी फिल्मी दुनिया में अपने-अपने ढंग से मछली पकड़ते रहें और विचरण करते रहें। शॉटगन के सच बोलने के अपने खतरे हैं और इसका प्रभाव उनके कलाकार बच्चों पर सीधा पड़ेगा। इस नाते वह प्रखर भूमिका में तो हैं लेकिन पहचान में भी आ जा रहे हैं। पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट से आए शॉटगन के हाथ में एक बड़ा डिप्लोमा था, जो अनेक के लिए संभव नहीं है। पुणे इंस्टीट्यूट में ही उनकी दोस्ती सुभाष घई और जावेद अख्तर आदि से हुई थी। 'कालीचरण', 'विश्वनाथ' आदि फिल्में शॉटगन के लिए ही लिखी गयी थीं। यह भी बहुतों के लिए संभव नहीं है। किस समीकरण में कौन फिट हो जाए उसके लिए गैंग और माफिया की अहम भूमिका होती है। शत्रुघ्न सिन्हा सीधे तौर पर नाम लेकर गैंगबाजों और बॉलीवुड माफिया के खिलाफ बोलने में कंजूसी बरत रहे हैं। खैर। अब आते हैं शशि कपूर के कहे पर। 

शशि कपूर अंतिम समय में टूट से गए थे। टूटन की शुरुआत फिल्म 'अजूबा' के निर्माण के समय ही हो गयी थी। अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर को लेकर बनी इस फिल्म ने कोई धमाल नहीं किया। कमाल किया होता तो लागत की राशि से अधिक की कमाई होती। उनकी अपनी पूँजी निकल गयी थी। तबियत खराब पहले से थी ही। कोलकाता में एक मुलाकात के दौरान, 2008 के आसपास मुझसे बातचीत में शशि कपूर ने कहा था--बॉलीवुड में ईमानदारी की बात न कीजिए। यह मेरी ईमानदारी ही थी कि जो जमा पूंजी थी सब 'अजूबा' के निर्माण पर लगा दिए लेकिन जो हुआ कि पूछिए मत। अब मुझसे बॉलीवुड के बारे में कुछ मत पूछिए। लेकिन बेईमानों के लिए पनाहगार होना? यानी सबकुछ अपने आप ही समझिए। व्हीलचेयर पर बैठे शशि कपूर से फिर कुछ पूछने की मेरी इच्छा न हुई। मैं बॉलीवुड में बिताए समय और पाए कटु अनुभव से बहुत कुछ बिना बताए भी समझ लेता हूँ। उनकी आँखें तनी हुई थीं। एकदम सूखी। आए भी थे किताब लोकार्पण के लिए। फिर भी मुझे लगा कि पत्रकार के नाते कुछ फिल्मी बात करूँ। कोशिश बहुत सफल नहीं हुई। मैंने दैनिक जागरण में उनसे बातचीत की हेडिंग बनायी---अजूबा ने मुझे बर्बाद कर दिया। यह हेडिंग शशि कपूर को अच्छी लगी थी। दूसरे दिन की मुलाकात में कहा--बिना लाग-लपेट के लिख दिए। मैंने कहा--बात बनाने का कोई स्कोप नहीं था। जो था सिर्फ दुःख, दर्द। 

 लेकिन बेईमानी और बेईमानों को समझने के मतलब तो हैं ही। और वह यह कि शशि कपूर को कुछ लोगों ने अजूबा फिल्म बनाने से मना किया था। ऐसा इसलिए कि चमत्कार की फिल्म को दर्शक पचा नहीं पाते हैं। सेट निर्माण पर बेहिसाब खर्च किए गए। दोस्त अमिताभ और भतीजा ऋषि कपूर के कैरियर की भी चिंता थी। तो शशि कपूर ने अपनी चिंता क्यों छोड़ दी? जब शशि कपूर ने  'उत्सव' बनायी थी उस समय भी तो वैसी कमाई नहीं हुई थी, जैसी उम्मीद थी। फिर गलती पर गलती। शशि कपूर ने कहा--बॉलीवुड की आंतरिक गति को समझना आसान नहीं है। हाँ, शिकार होना आसान है, जबकि वह बॉलीवुड के बड़े खानदान से जुड़े थे। फिर भी शिकार हो गए। शशि कपूर की सुपुत्री संजना कपूर भी एक बार कोलकाता में मिली थीं। नाटक के सिलसिले में आई थीं। संजना कपूर ने बॉलीवुड को लेकर चर्चा से इनकार कर दिया। बस इतना ही कहा--पिताजी के साथ अच्छा नहीं हुआ।

                                      ***

'बॉलीवुड में ईमानदारी जमींदोज है, बेईमानी पनाहगार है', कभी शशि कपूर ने मुझसे बातचीत में कहा था...


* निर्भय देवयांश
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बॉलीवुड में ईमानदारी से रहने पर सुशांत सिंह राजपूत की तरह शिकार हो जाना मामूली से मामूली बातों में से एक है। जो गैंग और माफिया है वह पता ही नहीं चलने देता है कि शिकार को कहाँ लपेटे में लेना है और कहाँ निपटा देना है। कायदे से आर्थिक नुकसान तो अंकिता लोखंडे को पहुंचाना था सुशांत के जीवन में, क्योंकि वह सात साल लिव इन रिलेशनशिप में रही थी। यहाँ पर सतर्कता दोनों तरफ से बनी रही तो घटना नहीं घटी। रिया चक्रवर्ती महज एक साल में ही इतनी उग्र क्यों हो गयी? अब जबकि राज खुल रहा है कि वह महेश भट्ट के करीब बहुत पहले से थी और सुशांत को छोड़कर जाने के बाद सबसे पहले बातचीत महेश भट्ट से ही करती है। दोनों तय कर चुके थे कि सुशांत के साथ किस प्रकार का व्यवहार करना है। व्हाट्सएप की बातचीत में दोनों एक दूसरे के लिए हमदर्दी व्यक्त करते हैं और भविष्य के खतरे से बच जाने पर एक दूसरे को बधाई भी देते हैं। सुशांत सिंह की ईमानदारी उसकी जान लेकर जमींदोज कर दी गयी। रिया ने आर्थिक फायदा अपने पूरे परिवार के लिए उठाया। इसमें सुशांत के हित की चिंता थोड़ी भी रहती तो महेश भट्ट कहीं से भी बीच में एंजेल की भूमिका में नहीं होते?

 रिलेशनशिप तो महेश भट्ट और परवीन बॉबी की भी थी लेकिन क्या हाल हुआ परवीन बॉबी का। घर में ही मरी पायी गईं। परवीन को मेंटल बनाने तक उनका शोषण किया गया। ईमानदारी यहाँ भी जमींदोज की गयी। महेश भट्ट की सुख-समृद्धि रिया चक्रवर्ती तक कायम रही। वायरल तस्वीरों को देखने से तो यही प्रतीत होता है।

शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा पाँच दशक से अधिक बॉलीवुड से जुड़े रहने के बाद भी उन सच्चाई को नहीं बोल रहे हैं, जो हकीकत हैं। आन, बान, शान और महान की फर्जी तुकबंदी में एक अलग घटाटोप तैयार कर दे रहे हैं ताकि लोग रहस्यमयी फिल्मी दुनिया में अपने-अपने ढंग से मछली पकड़ते रहें और विचरण करते रहें। शॉटगन के सच बोलने के अपने खतरे हैं और इसका प्रभाव उनके कलाकार बच्चों पर सीधा पड़ेगा। इस नाते वह प्रखर भूमिका में तो हैं लेकिन पहचान में भी आ जा रहे हैं। पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट से आए शॉटगन के हाथ में एक बड़ा डिप्लोमा था, जो अनेक के लिए संभव नहीं है। पुणे इंस्टीट्यूट में ही उनकी दोस्ती सुभाष घई और जावेद अख्तर आदि से हुई थी। 'कालीचरण', 'विश्वनाथ' आदि फिल्में शॉटगन के लिए ही लिखी गयी थीं। यह भी बहुतों के लिए संभव नहीं है। किस समीकरण में कौन फिट हो जाए उसके लिए गैंग और माफिया की अहम भूमिका होती है। शत्रुघ्न सिन्हा सीधे तौर पर नाम लेकर गैंगबाजों और बॉलीवुड माफिया के खिलाफ बोलने में कंजूसी बरत रहे हैं। खैर। अब आते हैं शशि कपूर के कहे पर। 

शशि कपूर अंतिम समय में टूट से गए थे। टूटन की शुरुआत फिल्म 'अजूबा' के निर्माण के समय ही हो गयी थी। अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर को लेकर बनी इस फिल्म ने कोई धमाल नहीं किया। कमाल किया होता तो लागत की राशि से अधिक की कमाई होती। उनकी अपनी पूँजी निकल गयी थी। तबियत खराब पहले से थी ही। कोलकाता में एक मुलाकात के दौरान, 2007 के आसपास मुझसे बातचीत में शशि कपूर ने कहा था--बॉलीवुड में ईमानदारी की बात न कीजिए। यह मेरी ईमानदारी ही थी कि जो जमा पूंजी थी सब 'अजूबा' के निर्माण पर लगा दिए लेकिन जो हुआ कि पूछिए मत। अब मुझसे बॉलीवुड के बारे में कुछ मत पूछिए। लेकिन बेईमानों के लिए पनाहगार होना? यानी सबकुछ अपने आप ही समझिए। व्हीलचेयर पर बैठे शशि कपूर से फिर कुछ पूछने की मेरी इच्छा न हुई। मैं बॉलीवुड में बिताए समय और पाए कटु अनुभव से बहुत कुछ बिना बताए भी समझ लेता हूँ। उनकी आँखें तनी हुई थीं। एकदम सूखी। आए भी थे किताब लोकार्पण के लिए। फिर भी मुझे लगा कि पत्रकार के नाते कुछ फिल्मी बात करूँ। कोशिश बहुत सफल नहीं हुई। मैंने दैनिक जागरण में उनसे बातचीत की हेडिंग बनायी---'अजूबा ने मुझे बर्बाद कर दिया'। यह हेडिंग शशि कपूर को अच्छी लगी थी। दूसरे दिन की मुलाकात में कहा--बिना लाग-लपेट के लिख दिए। मैंने कहा--बात बनाने का कोई स्कोप नहीं था। जो था सिर्फ दुःख, दर्द। दर्द को छुपाकर हँसे। 

 लेकिन बेईमानी और बेईमानों को समझने के मतलब तो हैं ही। और वह यह कि शशि कपूर को कुछ लोगों ने 'अजूबा' फिल्म बनाने से मना किया था। ऐसा इसलिए कि चमत्कार की फिल्म को हिंदी दर्शक पचा नहीं पाते हैं। सेट निर्माण पर बेहिसाब खर्च किए गए। दोस्त अमिताभ और भतीजा ऋषि कपूर के कैरियर की भी चिंता थी। तो शशि कपूर ने अपनी चिंता क्यों छोड़ दी? जब शशि कपूर ने  'उत्सव' बनायी थी उस समय भी तो वैसी कमाई नहीं हुई थी, जैसी उम्मीद थी। फिर गलती पर गलती। शशि कपूर ने कहा--बॉलीवुड की आंतरिक गति को समझना आसान नहीं है। हाँ, शिकार होना आसान है, जबकि वह बॉलीवुड के बड़े खानदान से जुड़े थे। फिर भी शिकार हो गए। शशि कपूर की सुपुत्री संजना कपूर भी एक बार कोलकाता में मिली थीं। नाटक के सिलसिले में आई थीं। संजना कपूर ने बॉलीवुड को लेकर चर्चा से इनकार कर दिया। बस इतना ही कहा--पिताजी के साथ अच्छा नहीं हुआ।

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