* निर्भय देवयांश
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बॉलीवुड में ईमानदारी से रहने पर सुशांत सिंह राजपूत की तरह शिकार हो जाना मामूली से मामूली बातों में से एक है। जो गैंग और माफिया है वह पता ही नहीं चलने देता है कि शिकार को कहाँ लपेटे में लेना है और कहाँ निपटा देना है। कायदे से आर्थिक नुकसान तो अंकिता लोखंडे को पहुंचाना था सुशांत के जीवन में, क्योंकि वह सात साल लिव इन रिलेशनशिप में रही थी। यहाँ पर सतर्कता दोनों तरफ से बनी रही तो घटना नहीं घटी। रिया चक्रवर्ती महज एक साल में ही इतनी उग्र क्यों हो गयी? अब जबकि राज खुल रहा है कि वह महेश भट्ट के करीब बहुत पहले से थी और सुशांत को छोड़कर जाने के बाद सबसे पहले बातचीत महेश भट्ट से ही करती है। दोनों तय कर चुके थे कि सुशांत के साथ किस प्रकार का व्यवहार करना है। व्हाट्सएप की बातचीत में दोनों एक दूसरे के लिए हमदर्दी व्यक्त करते हैं और भविष्य के खतरे से बच जाने पर एक दूसरे को बधाई भी देते हैं। सुशांत सिंह की ईमानदारी उसकी जान लेकर जमींदोज कर दी गयी। रिया ने आर्थिक फायदा अपने पूरे परिवार के लिए उठाया। इसमें सुशांत के हित की चिंता थोड़ी भी रहती तो महेश भट्ट कहीं से भी बीच में एंजेल की भूमिका में नहीं होते?
रिलेशनशिप तो महेश भट्ट और परवीन बॉबी की भी थी लेकिन क्या हाल हुआ परवीन बॉबी का। घर में ही मरी पायी गईं। परवीन को मेंटल बनाने तक उनका शोषण किया गया। ईमानदारी यहाँ भी जमींदोज की गयी। महेश भट्ट की सुख-समृद्धि रिया चक्रवर्ती तक कायम रही। वायरल तस्वीरों को देखने से तो यही प्रतीत होता है।
शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा पाँच दशक से अधिक बॉलीवुड से जुड़े रहने के बाद भी उन सच्चाई को नहीं बोल रहे हैं, जो हकीकत हैं। आन, बान, शान और महान की फर्जी तुकबंदी में एक अलग घटाटोप तैयार कर दे रहे हैं ताकि लोग रहस्यमयी फिल्मी दुनिया में अपने-अपने ढंग से मछली पकड़ते रहें और विचरण करते रहें। शॉटगन के सच बोलने के अपने खतरे हैं और इसका प्रभाव उनके कलाकार बच्चों पर सीधा पड़ेगा। इस नाते वह प्रखर भूमिका में तो हैं लेकिन पहचान में भी आ जा रहे हैं। पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट से आए शॉटगन के हाथ में एक बड़ा डिप्लोमा था, जो अनेक के लिए संभव नहीं है। पुणे इंस्टीट्यूट में ही उनकी दोस्ती सुभाष घई और जावेद अख्तर आदि से हुई थी। 'कालीचरण', 'विश्वनाथ' आदि फिल्में शॉटगन के लिए ही लिखी गयी थीं। यह भी बहुतों के लिए संभव नहीं है। किस समीकरण में कौन फिट हो जाए उसके लिए गैंग और माफिया की अहम भूमिका होती है। शत्रुघ्न सिन्हा सीधे तौर पर नाम लेकर गैंगबाजों और बॉलीवुड माफिया के खिलाफ बोलने में कंजूसी बरत रहे हैं। खैर। अब आते हैं शशि कपूर के कहे पर।
शशि कपूर अंतिम समय में टूट से गए थे। टूटन की शुरुआत फिल्म 'अजूबा' के निर्माण के समय ही हो गयी थी। अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर को लेकर बनी इस फिल्म ने कोई धमाल नहीं किया। कमाल किया होता तो लागत की राशि से अधिक की कमाई होती। उनकी अपनी पूँजी निकल गयी थी। तबियत खराब पहले से थी ही। कोलकाता में एक मुलाकात के दौरान, 2007 के आसपास मुझसे बातचीत में शशि कपूर ने कहा था--बॉलीवुड में ईमानदारी की बात न कीजिए। यह मेरी ईमानदारी ही थी कि जो जमा पूंजी थी सब 'अजूबा' के निर्माण पर लगा दिए लेकिन जो हुआ कि पूछिए मत। अब मुझसे बॉलीवुड के बारे में कुछ मत पूछिए। लेकिन बेईमानों के लिए पनाहगार होना? यानी सबकुछ अपने आप ही समझिए। व्हीलचेयर पर बैठे शशि कपूर से फिर कुछ पूछने की मेरी इच्छा न हुई। मैं बॉलीवुड में बिताए समय और पाए कटु अनुभव से बहुत कुछ बिना बताए भी समझ लेता हूँ। उनकी आँखें तनी हुई थीं। एकदम सूखी। आए भी थे किताब लोकार्पण के लिए। फिर भी मुझे लगा कि पत्रकार के नाते कुछ फिल्मी बात करूँ। कोशिश बहुत सफल नहीं हुई। मैंने दैनिक जागरण में उनसे बातचीत की हेडिंग बनायी---'अजूबा ने मुझे बर्बाद कर दिया'। यह हेडिंग शशि कपूर को अच्छी लगी थी। दूसरे दिन की मुलाकात में कहा--बिना लाग-लपेट के लिख दिए। मैंने कहा--बात बनाने का कोई स्कोप नहीं था। जो था सिर्फ दुःख, दर्द। दर्द को छुपाकर हँसे।
लेकिन बेईमानी और बेईमानों को समझने के मतलब तो हैं ही। और वह यह कि शशि कपूर को कुछ लोगों ने 'अजूबा' फिल्म बनाने से मना किया था। ऐसा इसलिए कि चमत्कार की फिल्म को हिंदी दर्शक पचा नहीं पाते हैं। सेट निर्माण पर बेहिसाब खर्च किए गए। दोस्त अमिताभ और भतीजा ऋषि कपूर के कैरियर की भी चिंता थी। तो शशि कपूर ने अपनी चिंता क्यों छोड़ दी? जब शशि कपूर ने 'उत्सव' बनायी थी उस समय भी तो वैसी कमाई नहीं हुई थी, जैसी उम्मीद थी। फिर गलती पर गलती। शशि कपूर ने कहा--बॉलीवुड की आंतरिक गति को समझना आसान नहीं है। हाँ, शिकार होना आसान है, जबकि वह बॉलीवुड के बड़े खानदान से जुड़े थे। फिर भी शिकार हो गए। शशि कपूर की सुपुत्री संजना कपूर भी एक बार कोलकाता में मिली थीं। नाटक के सिलसिले में आई थीं। संजना कपूर ने बॉलीवुड को लेकर चर्चा से इनकार कर दिया। बस इतना ही कहा--पिताजी के साथ अच्छा नहीं हुआ।
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