* निर्भय देवयांश
बॉलीवुड में प्रलोभन मिले तो एक जन्म क्या कई जन्मों तक इंतजार किया जा सकता है। जिस प्रकार की किंवदंती बना दी गई है कि इस इंड्रस्टी से संबद्ध लोग जीते जी तो ऐश-मौज भोगते ही हैं। मरने के बाद भी उनका दिलों में बसना जारी रहता है। उनके चाहने वाले सदा जीवित रहते हैं। निर्माता-निर्देशकों के लिए यह प्रलोभन ज्यादा कारगर होता है और वे हसीनाओं को यानी नयी- नवेली लड़कियों को सबसे पहले अपने कब्जे में लेते हैं। इसके पीछे कितने कारण होते होंगे, गिनती मुश्किल है और यदि आपकी गिनती में रुचि है तो आप भी कम ऐय्याश नहीं होंगे? वर्ना भूखे-प्यासों के बीच कला के नाम पर आवारगी तो उसे ही अच्छी लगेगी जिसने मनुष्यता से नाता तोड़ लिया है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता की पंक्तियाँ हैं--"यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाश पड़ी हो और दूसरे कमरे में तुम प्रार्थना कर रहे हो, तो मुझे तुमसे कुछ नहीं कहना।" जबकि अवस्था इससे भी खराब है लेकिन कला तो आखिर कला है और यही 'कला तो सिर्फ कला के लिए है।'
'सौतन' फिल्म के निर्देशक सावन कुमार टाक ने दशकों पहले टीवी पर एक बातचीत में पत्रकार से दिलेरी से अधिक बेशर्मी से कहा था--अभिनेत्री रास्ते की पत्थर की तरह है। हम उसे तराश कर अलग ढंग से उसकी प्रतिमा बनाते हैं। फिर उसकी पूजा होने लगती है। यानी उसे पर्दे के माध्यम से दर्शकों का समूह देते हैं। ये दर्शक अभिनेत्री के दीवाने होते हैं और फिर क्या चाहिए! यदि इतना कुछ करने में अभिनेत्री के प्रति निर्माता-निर्देशक के दिल में अभिनेत्री पर दिल आ जाए तो? सम्बंध आगे बढ़ने लगे तो? फिर दो दिलों के मिलन को दुनिया अनैतिक कहे तो कहे, हम तो मजा करेंगे? तर्क गलत-सही हो सकता है, लेकिन इतना कुछ दावा अभिनेत्री पर इसलिए किया जा रहा है या जाता है कि करोड़ों रुपये दांव पर लगा रहे हैं, इसलिए थोड़ी सी छूट ले ली तो हाय-तौबा क्यों?
सुशांत सिंह राजपूत के मामले में जो कि प्रेमी-प्रेमिका के बीच की लड़ाई थी, में महेश भट्ट रिया चक्रवर्ती को नाता तोड़ कर बाहर निकल जाने की सलाह देते हैं। जिस दिन संबंध टूट जाता है और रिया सुशांत को छोड़कर चली जाती है। यानी 8 जून 2020 को। उस दिन व्हाट्सएप पर महेश भट्ट और रिया दोनों बतकही का जश्न मनाते हैं। माई एंजेल टू माई गॉडफादर तक की धड़कन में रिंगिंग होती है। जगत को बताने के लिए कुछ भी बचा नहीं रह जाता है कि ये बगुला भगत भीतर-भीतर क्या गुल खिलाते होंगे?
पाकिस्तानी अभिनेत्री मीरा भी महेश भट्ट की चपेट में आयी थी। झाँसे में बहुत समय तक रही। फिर एक फिल्म मिली 2005 में 'नजर'। अमीषा पटेल के भाई अस्मित पटेल के साथ। अस्मित बिग बॉस में भी चर्चित हुए थे। लेकिन फिल्म 'नजर' को न जाने किसकी बुरी नजर लग गई। एक-दो फिल्म और मीरा को मिल तो गयी लेकिन चली नहीं। जैसे रिया को लेकर महेश भट्ट की फिल्म जलेबी पूरी तरह से जलेबी बनकर रह गयी। चासनी अधिक होने से जलेबी का स्वाद बिगड़ गया। महेश भट्ट ने मीरा को अस्मित से शादी करने की सलाह भी दी। बात बनी नहीं। शादी के बाद संभव है कि मीरा को भारतीय नागरिकता मिल जाती?
2006 के आसपास ही जाने-माने निर्माता निर्देशक बिग ब्रो इकबाल दुर्रानी के साथ किसी फिल्म के प्रोजेक्ट को लेकर मीरा कोलकाता आयी थी। भाईजान देर शाम को बाद आने वाले थे। ग्रैंड ओबेरॉय होटल में मीरा ठहरी थी। मुझे बिग ब्रो ने कहा था कि अखबार से छुट्टी ले लो और मेरे आने तक मीरा के साथ रहो। मैंने वैसा ही किया। इस दौरान बातचीत में मीरा ने बॉलीवुड के अपने अनुभवों के बारे में विस्तार से बताया। ऐसी-ऐसी बातें जो लिखने में भी आपत्तिजनक है। मैंने पूछा-फिर टिकोगी कैसे? नहीं, नहीं मैं पाकिस्तान लौट जाऊँगी, मीरा ने कहा। यही सब करने के लिए मैं थोड़े न बॉलीवुड में आयी हूँ। पाकिस्तान में जी-खा लूँगी। जितना काम मिल जाए, वहाँ की फिल्मों में कर लूँगी?
यही महेश भट्ट पॉर्न स्टार सन्नी लियोनी को भी हिंदी फिल्म में लाकर तहलका मचा चुके हैं। 'जिस्म' नाम की फ़िल्म का क्या हाल हुआ, जनता-जनार्दन को पता है। जिस्म को भी किसी की नजर लग गयी। अभी सड़क 2 को भी दर्शक की नजर लगी है। डिस्लाइकर की संख्या बढ़ रही है। आगे के दिनों में यह संख्या बढ़ती ही जाएगी। प्रेमचंद इस बॉलीवुड को बरहना-रक्स करार दे चुके हैं यानी नंगे नाच में जीने-मरने वाले लोग।
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