Thursday, 27 August 2020

ए फॉर अमर सिंह मने हर हाल में अमीर बनो, बी फॉर बॉलीवुड मने हत्या-बलात्कार को भी बेच डालो बनाम बॉलीवुड को हर ऐब पसंद है...


* निर्भय देवयांश 
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 अमर सिंह को दुबई के एक फिल्मी महोत्सव में जब शाहरुख खान ने गुंडा कहा था तो अमर सिंह का पलटवार भी कम जोरदार नहीं था। बकौल शाहरुख--अगर आप अमिताभ बच्चन के दोस्त नहीं होते तो आपको यहाँ से निकाल बाहर किया जाता। बदले में अमर सिंह ने कहा था-बिल्कुल ठीक, अगर बिग बी मेरे दोस्त नहीं होते तो तुम्हें अभी दिखा देते कि गुंडई किसे कहते हैं।

दरअसल अमर सिंह को शाहरुख खान द्वारा यह एहसास कराया जा रहा था कि आप इस महफिल के लायक नहीं हैं। बाद में अमर सिंह ने बॉलीवुड की महफिल में जो जगह बनायी और फिर अमिताभ से अनबन के बाद जो लात मारी, उसके दर्जनों उदाहरण सर्वविदित हैं। मसलन, जब बॉलीवुड का सुपरस्टार कहे कि अगर मुफलिसी के दिनों में अमर सिंह नहीं मिले होते तो मैं मुंबई की सड़कों पर टैक्सी चला रहा होता। मसलन, अमिताभ टू संजय दत्त टू सलमान सभी को मुलायम सिंह के गांव सैफई खींच लाए और रात भर नचाए---जोरा-जोरी चने के खेत में...। जब ये लोग आ गए तो फिर शाहरुख न आए, कोई फर्क पड़ता है क्या? अमर सिंह ने बता दिया कि शाहरुख तुम्हारे बिना भी महफिल सजायी जा सकती है। सजती है और सजती रहेगी। अगर किसी के दोस्त बड़े अंबानी थे तो छोटे अंबानी अमर सिंह के प्यारे थे। सहारा का भी उन्हें जो सहारा मिला, भला और किसे मिला! 

बॉलीवुड के लोगों को जब यह पता चल गया कि सुपरस्टार को अमर सिंह चाहिए होता है फिर उनकी क्या बिसात है? अमिताभ के घर रहते हुए उनसे कौन नहीं मिलने आए, देवानंद से लेकर अक्षय कुमार तक। यह दीगर बात है कि मिलने के लिए अमर सिंह को गेट पर जाना पड़ा। अमिताभ ने किसी को भी अपने अन्तरमहल के बैठकखाने में जगह नहीं दी। यह टीस अमर सिंह को सदा सालती रही कि जिस आदमी को एक बार फिर से दौड़ने लायक बना दिया, एकदम से खड़ा कर दिया। उस आदमी के घर में उसकी औकात महज गेस्टहाउस तक सीमित रही। यह दुःख बड़ा दुःख था, जिसे अमर सिंह भूल नहीं पाए। टीवी और अखबार में बार-बार व्यक्त करते रहे। 

अमर सिंह कोलकाता के ही थे। लहक से जुड़े कहानीकार विमलेश्वर द्विवेदी, शायर कवि रामगोपाल पारीख, प्रभाकर चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार हरेराम कात्यायन उनके घर-परिवार को करीब से जानते रहे हैं। अमर सिंह के छोटे भाई अरविंद सिंह तो 1970-80 के दशक में इन सभी के मित्र मंडली के अंग थे। इसलिए जब अमर सिंह प्रायः आए दिन किसी न किसी वजह से खबर बनाते तो इन्हें आश्चर्य नहीं होता। कारण कि उगते सूर्य का अमर सिंह के लिए काफी महत्व था। उनका संकल्प ही था कि चमकदार बनना है। फिर सिस्टम में ऐसे लोगों के लिए सरकार बनाना और गिराना बहुत छोटी बात हो जाती है। 

2004 से मेरा भी कोलकाता में रिपोर्टिंग के सिलसिले में अमर सिंह से मिलना-जुलना हुआ। पहली बार मुझे ताज होटल में मिलवाया गया। बस यूँ ही चला गया। बॉलीवुड के बारे में मुझे कुछ भी जानना नहीं था। राय-रत्ती से अधिक खुद ही जानता था।सात साल समय बर्बाद कर भीतरी नंगई देख चुका था। फिर बचा क्या रह गया...खैर। 

अमर सिंह से मुझे भारतीय लोकतंत्र, भारतीय पूंजीवाद, भारतीय अमीरवाद और काफी हद तक भारतीय दलालवाद समझना था। ये सभी सवाल मेरे अपने मन की जिज्ञासा थी। अखबार में इसकी कोई उपयोगिता नहीं थी, क्योंकि अमर सिंह समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद थे, और तब जागरण के मालिकों में एक मालिक नरेंद्र मोहन भी सपा से ही सांसद थे। यह खबर लगनी न थी। सिंगल या डबल लग जाए तो लग जाए। मेरा पहला ही सवाल था कि आपको दलाल कहलाने में इतनी खुशी क्यों मिलती है? अमर सिंह का जवाब था--दलाल नहीं, मैं कोई वेश्याओं का दलाल तो हूँ नहीं। मुझे इसलिए खुशी मिलती है कि लोग मुझे उद्योगपतियों का दलाल कहते हैं। यह सच है तो मैं इसे सहज स्वीकार कर लेता हूँ कि कम से कम मैं जिस महफिल में उठता-बैठता हूँ, वे सब देश के बड़े से बड़े उद्योगपति हैं। यहाँ से सत्ता भी बहुत बौनी नजर आती है। 

फिर अमर सिंह जो शुरू हुए कि लगभग दो घण्टे तक भारतीय सिस्टम की हर एक गुत्थी खोलकर रख दिए। पहली गुत्थी थी---हर हाल में अमीर बनो। मैंने पूछना चाहा कि यह हर हाल क्या होता है---अमर सिंह का जवाब था, जिन्हें अमीर बनना होता है, उन्हें हर हाल का भी पता होता है। एक लिहाज से ठीक ही है। पहले कांग्रेसी फिर समाजवादी! अमरवाणी जारी रहती है---जब आप अमीर हो गए तो सिस्टम के करीबी हिस्सा हो गए। मतलब कि मंच शेयर करने लगे। शेयरिंग की हिस्सेदारी के भागीदार। फिर आप जो चाहते हैं, सबकी पूर्ति होने लगती है। जो सपने देखे हैं उनकी पूर्ति करते जाएं। इस राह में चलते हुए आलोचना की चिंता कभी न करें। जैसे हाथी के चलने पर भौंकने वाले कुत्ते की कोई औकात होती भी है क्या? उद्योगपतियों के दलाल होने की सीढ़ी थी अमर सिंह का खुद उद्योगपति हो जाना। 

अमर सिंह के बाद का विकासवाद उनके बताए रास्ते से आगे बढ़ता गया। बहुत दूर तक। 'हर हाल में' का सिद्धांत कितने लोगों के जीवन में सफल होता है, सफल होने वाले ही बता पाएंगे। जैसे कि अमर सिंह खुलकर सबकुछ बताते थे। शेर-शायरी से पत्रकारों को हँसाते और विपक्षी नेताओं को जवाब व्यंग्य के लहजे में दे जाते। सुपरस्टार को फिर से खड़ा कर देने का गुमान भी अमर सिंह के पास था। अभिनेत्रियों के साथ मधुर संबंध भी उनके नाम दर्ज हैं। बॉलीवुड पर तंज कसते हुए अमर सिंह कहते थे कि इन्हें सबको दिखाने का शौक है और मुझे इन्हें नचाने का शौक। जब तक रहे नचाते ही तो रहे! 

बॉलीवुड का स्वार्थी और भाई-भतीजावादी चेहरा अमर सिंह बहुत  जल्द देख लिए थे। उनकी रुचि हर हाल में अमीर बनो का सिद्धांत बॉलीवुड का अंतिम निष्कर्ष है। जब मिल बैठेंगे दो दीवाने की तरह। बलात्कार बेच दो, हिंसा बेच दो, हत्या बेच दो, दंगा-फसाद बेच दो। प्रेमचंद के लिए यही 'बरहना-रक्स' है यानी नंगे नाच को कला बताने वाले लोग। प्रेमचंद नंगे नाच के हिस्सेदार न हुए। वाकई, बॉलीवुड को हर ऐब पसंद है। 

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