Wednesday, 24 June 2020

रघु ठाकुर की इस बात में दम है कि अरुन्धति रॉय गाँधी को विश्व पटल पर बदनाम कर रही हैं। नतीजा गाँधी जी की प्रतिमाएं अपमानित की जा रही हैं?


 * निर्भय देवयांश 
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बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका अरुन्धति रॉय खुद को स्वघोषित एक बड़ी लेखिका मानती हैं। यही बुकर पुरस्कार पाने के बाद भी अरविंद अडिगा कहाँ खो गये हैं, किसी को ज्ञात नहीं है। किरण देसाई भी बुकर विजेता हैं और उनका भी अता-पता पाठकों को नहीं है। अरविंद अडिगा और किरण देसाई सामाजिक कार्यकर्ता नहीं हैं इसलिए उनकी अन्य गतिविधियों से लोग अपरिचित हैं।

अरुन्धति रॉय के लिए सामाजिकता एक अहम मुद्दा है। उनकी सामाजिकता में पंचगढ़ी में अपने पति द्वारा अवैध रूप से बंगला बनाना आता है कि नहीं, यह बेहतर ढंग से वही बता सकती हैं। यह मानने वाले मान सकते हैं कि सामाजिकता कुछ मात्रा में अवैध काम करने की छूट देती है। सो उनके पति प्रदीप कृष्णन ने अपनी पत्नी की सामाजिकता को आधार बनाकर अवैध ढंग से कोई एक बंगला बना लिया? जिसे अदालत ने अवैध घोषित कर दिया है!
  लेकिन यहाँ मामला दूसरा है। उनकी अभी एक किताब आयी है-' एक था डॉक्टर एक था संत'। निश्चित ही डॉक्टर ऊपर हैं शीर्षक में तो उनकी स्थापनाओं को लेकर लेखिका अधिक गम्भीर हैं और गाँधी चूँकि नीचे हैं इसलिए उनकी गलतियां अधिक निशाने पर रहेंगी? यह लेखिका की अपनी पसंद है कि शीर्षक में किसे ऊपर, किसे नीचे या किसे अधिक महत्व और किसे खरी खोटी सुनानी है। 
  लगभग 180 पेज की किताब में 40 पेज में संदर्भित किताबों की सूचि है। एक उपन्यासकार के लिए यह कठिन काम रहा होगा। उपन्यास में कल्पना की उड़ान अधिक होती है लेकिन ऐतिहासिक पुस्तकों में शोधकर्ताओं को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। अरुन्धति रॉय ने अपनी चर्चित और विवादित पुस्तक 'एक था डॉक्टर एक था संत, में यह काम किया है। 

 लेकिन दिक्कत यह है कि अरुन्धति रॉय पर जो आरोप लगाये जा रहे हैं वे काफी संगीन हैं। मशहूर समाजवादी लोहियावादी नेता रघु ठाकुर का सीधा आरोप है कि विश्व पटल पर अरुन्धति गाँधी को नस्लवादी बता रही हैं। जिसके चलते विभिन्न देशों के मुख्य शहरों में स्थापित गाँधी की प्रतिमाएं अपमानित की जा रही हैं। ये घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। अभी अमेरिका में चल रहे अश्वेत आंदोलन के दौरान भी भारतीय दूतावास के सामने स्थापित गाँधी की प्रतिमा अपमानित की गयी। इसके पहले घाना विश्विद्यालय में इसी तरह की घटना घटी थी। 

  रघु ठाकुर ने अरुन्धति रॉय की पुस्तक के जवाब में एक पुस्तक तैयार की है। उन्होंने सिलसिलेवार ढंग से अरुन्धति रॉय द्वारा उठाये गये सवालों का जवाब दिया है। रघु ठाकुर की पुस्तक कभी भी बाजार में आ सकती है। उसकी तैयारी पूरी हो गयी है और प्रकाशन की अंतिम प्रक्रिया में है। 

यह सही है कि बुकर पुरस्कार विजेता होने के नाते दुनिया के बड़े लेखकों के साथ अरुन्धति को मंच शेयर करने का मौका बार-बार मिलता है। कभी नोम चोमस्की के साथ तो कभी दार्शनिक लेखक स्लावोय जिजेक के साथ मंच शेयर करती हैं। ये सभी लेखक अपने अपने देश की समस्याओं और शासकों के तानाशाही रवैये से दर्शकों को अवगत कराते हैं। खूब तालियाँ बजती हैं। यह कहने में संकोच तो किसी को नहीं है कि हिंदी की अपेक्षा अंग्रेजी पाठकों की तालियों की गूंज बहुत कुछ कहती है। 

 अब जो अहम मुद्दा है वह यह है कि गाँधी  वाकई नस्लवादी थे, क्या उनकी उसमें पूरी आस्था थी? इस पर माथापच्ची जारी है। इसी को आधार बनाकर अपनी विवादित पुस्तक में अरुन्धति यह साबित करना चाहती हैं कि बाबा साहेब लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करने के लिए गाँधी की कई जगह आलोचना करते हैं। इसके साक्ष्य भी उपलब्ध हैं। 

 लेकिन जो असहमति संवाद के माध्यम से दूर हो सकती है। उसके लिए गाँधी की प्रतिमा अपमानित करने से आखिर किस प्रकार का समाधान निकलेगा? 

 'एक था डॉक्टर एक था संत' पुस्तक के पेज नंबर 32 पर अरुन्धति लिखती हैं---"लोकतंत्र ने जाति-उन्मूलन नहीं किया है। इसने जाति का आधुनिकीकरण करके इसकी जड़ों को और अधिक मजबूत किया है। इसलिए यही समय है कि आंबेडकर को पढ़ने का। " अरुन्धति की यह बात सही है कि लोकतंत्र को जन- जन तक पहुंचाने के लिए बाबा साहेब को ज्यादा से ज्यादा पढ़ा जाना चाहिए।

अरुन्धति आगे लिखती हैं---"  आंबेडकर बहुत लिखते थे, और बहुत सी पुस्तकों के लेखक हैं। यह दुर्भाग्य है कि जैसे गाँधी, नेहरू या विवेकानंद द्वारा लिखित पुस्तकें पुस्तकालयों और किताबों की दुकानों में अलमारियों में चमकती नजर आती हैं, आंबेडकर की पुस्तकें ढूंढ़े नहीं मिलतीं।' अरुन्धति रॉय की इस बात से बहुतों को असहमति होगी। दूसरे की बात तो छोड़ दीजिए मेरी छोटी, बहुत छोटी लाइब्रेरी में बाबा साहेब की पुस्तकें गाँधी, नेहरू, विवेकानंद से अधिक मिल जाएंगी।

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Tuesday, 23 June 2020

बॉलीवुड है या बेहया का जंगल!

   * निर्भय देवयांश
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जिस्म और जान के बीच मांस के दरिया में बसता है अनंत मजा।
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गरीबों के पास पेट है, अमीरों के पास अक्ल और शक्ल।
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आलोक नंदन बालाजी में भी कुछ माह रहे लेकिन एकता कपूर के  वर्चस्व को झेलने के पहले निकल गये।
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मुझसे पहले दिन (1989) पूछा गया कि तुम्हारे पास ऐसा क्या था कि तुम मुंबई बॉलीवुड में किस्मत आजमाने आए? तुम कहीं और क्यों नहीं गये? यह सब पूछताछ जुहू चौपाटी के यूनिटी कम्पाउंड के स्ट्रेला आंटी के घर पर हो रहा था। जहाँ प्रतिमाह 4000 रुपये के हिसाब से अपने लिए पेइंग गेस्ट के तौर पर एक बेड बुक किया था।
  देर शाम होते होते दारू की बोतल, अर्द्धनग्न लड़कियों की आवाजाही शुरू हो गयी थी। मुझसे पूछा गया कि दोनों में तुम्हें जो चाहिए उसके लिए दो तरह की राशि देनी होगी। एक रूम में जहाँ आठ दस लोग एक ही मिजाज के हों और एक पूरी तरह से अलग पृष्ठभूमि का तो माहौल का थोड़ा असहज होना स्वाभाविक है। चखने में चिकेन लेकिन पॉप यानी सफेद सूअर का मांस। ये तीनों सामग्री मेरे चित्त के खिलाफ थी। सीधे इनकार किया कि मेरी रुचि इन तीनों में से किसी में नहीं है। अधिकांश ने कहा-फिर तुम दो चार घन्टे चौपाटी पर घूम आओ, तब तक हमलोग मौज मस्ती करते हैं। मुझे प्रस्ताव अच्छा लगा। मैं निकल गया। घण्टों चौपाटी पर किलो दो किलोमीटर घूमता रहा। तरह तरह के  व्यंजन लोगों को खाते पीते देखता रहा। कभी सिटीजन होटल की पिछवाड़े की सीढ़ियों पर बैठ जाता। हालांकि वहाँ भी युगल प्रेमी जोड़ी गलबहियां में दुनिया को भूली बैठी थी। मैं लहरों को ही देखता, अपनी किस्मत को कोसता, कभी आसमान तो कभी शोरगुल को।
मैं जब लौटा अपने अड्डे पर तो मजमा लगा हुआ ही था। गुवाहाटी वाले मित्र आलोक माली Alok Mali और Subal Dutta ने कहा बैठ यार। कुछ देख , देखते हुए मजा ले। दूसरे मित्र बहुत अश्लील हो गये थे। पागलपन भरे इस माहौल को सहना या झेलना असह लग रहा था। आलोक ने कहा कि यह इस शहर का असली चेहरा है। तुम्हें खुद को इसमें ढालना होगा। मैं चुप सबकुछ सुन रहा था। बोलने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था।

दूसरे तीसरे दिन सड़कों के किनारे खड़ी वेश्याओं द्वारा इशारे से बुलाना और मना करने पर दो चार गाली खाना। यह प्रायः लोगों के साथ देखा और सुना गया। मैंने आलोक माली से कहा कि लगता है यहाँ सेक्स और शराब दिनचर्या है। 24 घन्टे आदमी जिनके लिए उपलब्ध है मौज मस्ती में रह सकता है।

स्ट्रेला आंटी के पड़ोसी बड़े- बड़े नाम वाले थे। इना-मीना-डिका, नाय-नामा-निका, और मेरा नाम छुन छुन, रात चाँदनी मैं और तू, हैलो मिस्टर हाउ ड्डू यू ड्डू गाने लिखने वाले गीतकार कमर जलालावादी और सरदार मल्लिक, मशहूर संगीतकार यानी अभी के जाने माने संगीतकार अन्नू मल्लिक के पिता जी। बताते चलें कि स्ट्रेला आंटी भी आई थी तो अभिनेत्री बनने लेकिन बन गयी कॉल गर्ल। मैं जब गया था तब उनकी उम्र 70 के आसपास रही होगी। उनके दो जीवन साथी थे। उनका बेटा सुकेश ने भी धंधेवाली पूजा से शादी की थी और उसकी छोटी बहन रिया हम मित्रों की रूम पार्टनर थी। रिया का रात भर जो ड्रामा चलत था, वह भी क्या बताने की चीज है! इन सब पर बारी-बारी से लिखूंगा। अभी तो महफ़िल में लोग आने शुरू हुए हैं।

... तो आलोक नंदन जब मनोज तिवारी के साथ 'ए भौजी के सिस्टर' साथ सेट पर खुद को एडजस्ट नहीं कर सके तो उनके सामने संकट पैदा हुआ कि अब क्या किया जाए। मैं 1989 में गया था। अमरनाथ लगभग 2000 में और आलोक उसके बाद। सभी के जाने में फासला लगभग एक दशक का था। आलोक नंदन निर्माता निर्देशक रंगीला फेम रामगोपाल वर्मा से जुड़े रवि प्रकाश और फिर एकता कपूर के बालाजी से जुड़े। मुझे इन दोनों के लिए मुंबई में शिफ्टिंग की जगह बनाने में इसलिए थोड़ी सुविधा हुई कि लगातार मेरे संपर्क बने हुए थे। लेकिन संघर्ष और धक्के तो इन्हें ही खाने थे। तब तक मैं पत्रकारिता का कोर्स कर पटना, फिर कोलकाता में प्रभात खबर 2002, फिर 2004 से 2011 तक दैनिक जागरण में काम कर रहा था। फिर प्रभात वार्ता और तुरंत बाद लहक की शुरुआत। जो यात्रा जारी है।

आलोक नंदन मुझसे अधिक खुले व्यक्तित्व के हैं। अमरनाथ तो आलोक से भी अधिक। जैसे सुबल और आलोक माली। आलोक रवि प्रकाश के माध्यम से रामगोपाल वर्मा के वर्किंग स्टाइल को बखूबी समझने लगे थे। बहुत भीतर तक जाकर। लेकिन दिक्कत होती है कि आप भीतर जाएंगे कैसे? ऑफिस के मुख्य दरवाजे से साहब के चैंबर तक इतने चमचे होते हैं कि आप किनसे- किनसे टकराएंगे? किनके-किनके सवालों के जवाब देंगे कि साहब से क्या काम है? काम की तलाश तो जिस शहर में लाखों की तादाद  में लोग प्रतिभाओं को जेब में लेकर घूम रहे हैं। वहाँ आपमें ऐसी क्या खासियत है कि कोई अलग चमक-दमक चेहरे देखकर पता चल सके?

आलोक कुछ महीने तक रवि प्रकाश के साथ एजेंसी में काम करने के बाद एकता कपूर की कम्पनी बालाजी में आए। दो तीन माह में एकता कपूर के खूंखार पुरुष रूप यानी वर्चस्ववादी महिला का रूप देख कर सोच में पड़ गये। भूतहा कहानी के अनुसंधान के लिए गये थे। कभी - कभी सलाह देने की जुर्रत करते तो कहा जाता-बस अपने काम से मतलब रखिए। Alok Nandan बेहतर ढंग से बता पाएंगे कि दरअसल इस ईगो में कितनी जिंदगियां पिसती हैं और जो बचती हैं फिर वे किसी काम की रहती हैं कि नहीं। आख़िर क्या कारण रहा होगा कि Amarnath Prasad को सिर्फ ब्लैक फ्राइडे में छोटी भूमिका मिली। दो तीन फिल्मों में भी छोटी भूमिका मिली लेकिन एडिटिंग में सब कट कर दिया गया? बॉलीवुड की इस बेहयाई पर क्या कहेंगे? जहाँ सेक्स और शराब नाश्ता और भोजन है, वहाँ उन लोगों के लिए जिनकी पैदाइश जानबूझकर गरीबी, निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुई है, उन्हें सपने भी अपनी औकात के हिसाब से देखना होगा। नहीं तो सुशांत सिंह राजपूत बॉलीवुड का आखिरी शिकार है, यह कोई भी कहने की अवस्था में है क्या। जिया खान को ही तो हमलोग अंतिम हादसा मानकर चल रहे थे?  नहीं! नहीं! नहीं! कोई नहीं बता कि अगला निशाना कौन है?

सुशांत सिंह राजपूत के लिए एकता कपूर मैडम थी। बेचारा खुलकर मैडम की तारीफ करता था लेकिन मैडम वाकई मैडम हो पाई? अब तो यह मैडम वेब सीरीज की ट्रिपल एक्स सेक्स तक पहुंच गई है। सेना भी उसकी चपेट में आ गई है। देश की वर्दी पर भी जब उस मैडम को दाग लगाने में हिचकी नहीं आई तो सुशांत सिंह राजपूत या आलोक नंदन की परवाह भला उसे क्योंकर हो। उसके पास डेली शॉप है। उसे कुछ बेचना है। फिर नैतिकता बॉलीवुड में रहकर अपनी हत्या करवाएगी! जब आदमी, स्टार, सुपरस्टार खुद को दारू में और फाँसी पर लटक कर जान दे रहे हैं, वहाँ का आदर्श सिर्फ और सिर्फ बेहयाई है। बेहयाई वाला बॉलीवुड। जो भी गंदगी दिखाता है, देखते ही हैं न लोग बाग! देखिए और उत्तर आधुनिकता की कला यानी बे-लिबास होती नंगी कला को उत्कर्ष मान लीजिए। आप सबका भला होगा। उनका तो भला हो ही रहा है आपके पैसे से।

***कृष्णा मिश्रा को भी जब बॉलीवुड में मन नहीं लगा तो घूमने चंबल पहुंच गये। सीमा परिहार, चंबल की मशहूर डाकू ने कहा - हीरोइन बना दो। बना दी गई। लेकिन बॉलीवुड ने उसके साथ जो सलूक किया , अरे जैसे वह करता हैं। मैं और कृष्णा जी वूनडेड के लिए कोलकाता में वितरक से मिल रहे थे। फ़िल्म रिलीज के लिए हाल ढूंढ रहे थे। अगली पोस्ट का लोकेशन है-चंबल। 

Monday, 22 June 2020

* मुझसे ज्यादा कोई भी 'उपन्यास सम्राट' की उपाधि से घृणा न करता होगा ::: प्रेमचंद *

* निर्भय देवयांश 
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प्रेमचंद को कब नहीं गाली पड़ी है। दुनिया में जितनी अच्छी चीजें होती हैं, उन्हें गाली पड़ती हैं। न पड़े तो समझना चाहिए इनकी कोई हस्ती ही नहीं हैं ! 
 राजेंद्र यादव की इतनी बौद्धिक औकात होती तो शायद हंस नाम से अलग कोई पत्रिका निकालते ? हिम्मत नहीं दिखाई इसलिए कि उन्हें पता था कि यहाँ दाल न गलेगी। भीड़ न जुटेगी। कहीं के नहीं रह जाएंगे तो वैशाखी का सहारा कुछ ऐसा चाहिए कि खुद न सही लेकिन प्रतिबद्धता दिखती रहनी चाहिए। राजेंद्र यादव के लिए प्रेमचंद मोहरे बन गये। एकमात्र यह नाम है जो मुझे जीवन नैया पार करा सकेगा! और लगभग 27-28 साल तक राजेंद्र यादव एक-दूसरे के पर्याय बन कर रहे। दलित विमर्श प्रेमचंद के हंस में भी कम नहीं था और स्त्री विमर्श भी कम नहीं ? फिर इन विमर्शों के नाम पर आखिर कैसा विमर्श चला? 
 
 कांटे की बात 4- आगे रास्ता बंद में राजेंद्र यादव पत्रिका चलाने की असमर्थता बार - बार व्यक्त करते हैं। तो क्या प्रेमचंद नहीं करते हैं? करते हैं। खूब करते हैं। 

प्रेमचंद ने 1930 में, 'हंस' शुरू किया और 1932 में 'जागरण'। इससे पहले वह सरस्वती प्रेस स्थापित कर चुके थे। हंस के साथ-साथ किताबों का प्रकाशन होता था। अतः किताबों की बिक्री से हंस का खाली पेट भरता रहता था। लेकिन जागरण तो अकेले जान था। उसे दंगल में अपने जौहर दिखाने थे। पैदा होने के एक बरस बाद ही वह लड़खड़ाने लगे। 16 अगस्त 1933 को जैनेंद्र को लिखा-" मैं जागरण पर करीब तीन हजार का घाटा उठा चुका हूं। इसी पत्र में जैनेन्द्र की मिन्नत सी करते हुए कहते हैं कि किस भी तरह बिरला से जागरण के लिए विज्ञापन जुटाइए। तुम मि. बिरला से मिलो और उनको हम लोगों के काम के महत्व को समझाओ और बतलाओ कि हम कैसी - कैसी परेशानियां उठाते हैं। वह एक बड़े विज्ञापनदाता हैं। "
      इसी पत्र में आगे संघर्ष के प्रति अपनी भीष्म निष्ठा व्यक्त करते हैं: "भाई! यह संसार रामभरोसे बैठने वालों के लिए नहीं है। यहां तो अंत समय तक खटना और लड़ना है। उनसे कुछ मदद पा सकते हो। यहाँ झेंपु बौर मेरे जैसे शर्मीले आदमियों का गुजारा नहीं। उनके लिए तो कोई स्थान ही नहीं। तुम अपने में यह ऐब न आने दो। है भी नहीं। मैं तो दो कौड़ी दाम का नहीं हूं। "

आश्चर्य देखिए कि कांटे की बात -4, आगे रास्ता बंद है 'प्रभा खेतान को जन्म दिन पर समर्पित है। जबकि प्रेमचंद को बिरला जी के यहाँ से विज्ञापन का कोई आश्वासन नहीं मिला। हंस के असली मालिक संपादक अपने को दो कौड़ी के दाम का आदमी कहते हैं। हंस को हायर करने वाले संपादक महफिलों से घिरे रहते हैं। किताबें प्रभा खेतान को समर्पित की जा रही हैं। और कितने तमाशा मशहूर हैं। स्वस्थ व्यक्ति के न जाने कितने बीमार विचार हैं। 

  प्रेमचंद जो विज्ञापन के लिए तरस रहे थे। गुहार लगा रहे थे। लेकिन उनके साहित्य को कूड़ा कहने वाले संपादक को विज्ञापन के लाले नहीं हैं। विभिन्न राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों के विज्ञापन मिल रहे हैं। खूब मिल रहे हैं। ऐसे में विज्ञापन के लिए रिरियाने वाले प्रेमचंद हंस के लिए धन जुटाते कि कोई अमर कृति लिखते? सो, कूड़ा लिखते रहे। जिन्हें सुविधा मिली, विज्ञापन मिले , उन्हें 'सारा आकाश' ही मिल गया!

   प्रेमचंद ने माणिकलाल जोशी को लिखे पत्र में कहा- " मि.किशन सिंह की कदाचित यह धारणा है कि मैंने ही स्वयं 'उपन्यास सम्राट' की उपाधि हथिया ली है। मुझसे ज्यादा कोई भी इस उपाधि से घृणा न करता होगा और मैंने कभी किसी को प्रेरित नहीं किया कि वह मुझको इस नाम से पुकारे और मैं खुद नहीं जानता कैसे यह उपाधि मेरे नाम के साथ जुड़ गयी और क्यों इसे बार-बार इतना दुहराया जाता है।

 प्रेमचंद ने विनम्रता से कहा-" मि.किशन सिंह की राय बिल्कुल सही हो सकती है कि मेरी ज्यादातर कहानियां बहुत पिटी पिटायी हैं और उनमें कोई सौंदर्य नहीं। मैं विनयपूर्वक इतना ही कह सकता हूँ कि मैंने वही किया है, जो कि अपनी प्रतिभा को देखते हुए अच्छे से अच्छा कर सकता था और इससे बड़ी चीज के लिए मेरा दावा नहीं है।"

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* निर्भय देवयांश का संघर्ष और सृजन *



* कृपाशंकर चौबे   
(वरिष्ठ पत्रकार-लेखक )
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हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता में बंगाल की गौरवशाली परंपरा रही है। बीसवीं शताब्दी से बात शुरू करें तो जस्टिस शारदा चरण मित्र ने कलकत्ता से 1907 में ‘देवनागर‘ नामक मासिक पत्रिका निकाली थी जो बीच में कुछ व्यवधान के बावजूद उनके जीवन पर्यन्त यानी 1917 तक निकलती रही। 1923 में कलकत्ता से साप्ताहिक ‘मतवाला’ पत्रिका निकली। संपादक के रूप में महादेव सेठ का नाम छपता था किंतु संपादक मंडल में निराला, शिवपूजन सहाय और मुंशी नवजादिक लाल भी थे। ‘मतवाला’ के प्रकाशन का एक मकसद निराला की कविताओं को प्रकाशित करना भी था। 1928 में रामानंद चट्टोपाध्याय ने हिंदी मासिक 'विशाल भारत' का प्रकाशन प्रारंभ किया। बनारसी दास चतुर्वेदी उसके संस्थापक संपादक थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी के संपादन में 1942 ‘विश्वभारती पत्रिका’ शांतिनिकेतन से निकली। द्विवेदी जी उसे 1947 तक निकालते रहे।  मोहन सिंह सेंगर ने कलकत्ता से जुलाई 1948 में ‘नया समाज’ निकाला। ‘नया समाज’ दस वर्षों तक निकलता रहा। 1949 के जनवरी महीने में भारतीय ज्ञानपीठ ने कलकत्ता से मासिक ‘ज्ञानोदय’ पत्रिका निकाली थी। ‘ज्ञानोदय’ फरवरी 1970 तक निकलती रही। प्रभाकर क्ष्रोत्रिय के संपादन में ‘वागर्थ’ पत्रिका 1995 में निकली थी। उसी कड़ी में लेखक-पत्रकार निर्भय देवयांश के संपादन में  निकल रही साहित्य की वैचारिक पत्रिका ‘लहक’ को देखा जाना चाहिए। निर्भय देवयांश सितंबर 2013 से ही ‘लहक’ निकाल रहे हैं। ‘लहक’ का पिछला अंक संस्मरण और कथा समीक्षा के भगीरथ कांतिकुमार जैन और मधुरेश पर केंद्रित है। दोनों साहित्यकारों के योगदान को समेटने की यथा चेष्टा की गई है। ‘लहक’ पत्रिका का इस वर्ष का मान बहादुर सिंह सम्मान इन्हीं दो साहित्यकारों को दिया गया है। ‘लहक’ पत्रिका 2017 से ही यह सम्मान देती आ रही है। कांतिकुमार जैन और मधुरेश के पहले नीलकांत, विष्णुचंद्र शर्मा, महेंद्र भटनागर, धनंजय वर्मा और मलय को यह सम्मान दिया गया था। 
‘लहक’ के माध्यम से निर्भय ने कई बहसें चलाई हैं। वे ‘लहक’ का हर अंक विशेषांक की तरह निकालते हैं। ध्यान देनेयोग्य है कि ‘लहक’ के पीछे कोई संस्था नहीं है। व्यक्तिगत उपक्रम से पत्रिका कठिन ही नहीं, लगभग असंभव है। इस असंभव को निर्भय ने संभव बनाया, यह उनकी संघर्ष निष्ठा का सबूत है। निर्भय में यह विवेक भी है कि जिस हिंदी समाज के लिए वह पत्रिका निकाल रहे हैं, उसके हित के लिए जो कुछ करणीय है, किया जाय। भारतीय भाषा परिषद के कर्मचारियों के पक्ष का सवाल हो या महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कोलकाता केंद्र की स्थापना, निर्भय की बड़ी भूमिका रही। निर्भय ने हिंदी विश्वविद्यालय के कोलकाता केंद्र की स्थापना के लिए न जाने कितनी बार कांग्रेस विधायक दल के तत्कालीन नेता मानस भुंइया के साथ बैठकें कीं। मानस दा ने हिंदी विश्वविद्यालय के कोलकाता केंद्र की स्थापना के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री को पत्र लिखा। निर्भय ने सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय और तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी से भी बातचीत की। महाश्वेता देवी ने भी प्रणव दा से बात की थी। महाश्वेता देवी ने प्रणव दा को पत्र भी लिखा जिसे लेकर पार्षद संतोष पाठक दिल्ली गए थे। प्रणव दा ने हमें दिल्ली बुलाया। उनके दिल्ली आवास पर मेरी और तत्कालीन कुलपति श्री विभूति नारायण राय की बैठक हुई। उसके ठीक बाद केंद्रीय बजट में प्रणव दा ने हिंदी विश्वविद्यालय के इलाहाबाद और कोलकाता केंद्रों की स्थापना के लिए दस-दस करोड़ रुपए देने की घोषणा की। तब निर्भय देवयांश कोलकाता में दैनिक जागरण के स्टार रिपोर्टर थे। निर्भय के साथ प्रणव दा से लेकर ममता बनर्जी की आत्मीयता का मैं स्वयं साक्षी रहा हूं। निर्भय जब जागरण में थे, तो एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि आम आदमी के सवालों को लेकर एक संगठन बनाकर वे अभियान पर निकलना चाहते हैं। मैंने उनसे कहा कि पहले अपने परिवार को देखिए। निर्भय ने जो कुछ कहा था, बाद में वही सब अरविंद केजरीवाल ने अमल कर दिखाया। मुझे लगता है कि हिंदी रचनात्मकता के लिए निर्भय का जो संघर्ष है, वह बेहद तात्पर्यपूर्ण है। यही बात उनके सृजन के लिए भी सही है। निर्भय देवयांश की एक रचनाकार के रूप में अलग पहचान है। आज से नहीं, बहुत पहसे से। मुझे याद है कि 2003 में कोलकाता पुस्तक मेले में निर्भय देवयांश के प्रथम काव्य संग्रह ‘संगीन के साये में लोकतंत्र’ का लोकार्पण करते हुए नामवर सिंह ने कहा था-निर्भय देवयांश की कविताएं तलवार की धार के सामने सुई की नोक की तरह हैं। जहां सुई काम आ जाती है, वहां तलवार नहीं काम आती। मुझे निर्भय की कविताओं में मार्मिकता से भरपूर विषयों की विपुल विविधता आकृष्ट करती रही है। उनकी कविता आम आदमी के लिए ही सदैव चिंतित दिखाई पड़ती है। 'आम आदमी का संविधान' शीर्षक कविता में निर्भय देवयांश कहते हैं-
विकास से कोसों दूर
रहनेवाले लोगों को पता नहीं है
संविधान की किस धारा में
उसे जीवन जीने का मौलिक अधिकार मिला है...।

Sunday, 21 June 2020

"मांस के दरिया" में सराबोर संपादकों को प्रेमचंद की कहानियां 'कूड़ा' न लगेंगी तो क्या राजेंद्र यादव और कमलेश्वर की कहानियां 'कूड़ा' लगेंगी?

* निर्भय देवयांश 
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यह आपका चित्त तय कर रहा है कि आका का बनाया खाका ध्वस्त न हो। दूसरे-तीसरे का नामोनिशान मिट जाए, धूल में मिल जाए, परवाह किसे है? यह जो आपके पास चित्त निर्मित हुआ है उसमें भूख की वह बजबजाती शाम की खूँखार आवाज नहीं है, जो जीने के लिए अपराध करता है ताकि रात को अच्छी नींद आ सके। सजा जो भी व्यवस्था तय करेगी सुबह झेल लेंगे? यहां तो खानदानी विरासत ऐसी है कि सपने पैदा होकर तो देखें, उनकी पूर्ति कोख में ही न कर दिये तो ऐसी पूँजी और पूँजीपति होने का क्या मतलब है? हंस के वर्तमान संपादक संजय सहाय को प्रेमचंद को कूड़ा बताकर आखिर अपने आका राजेंद्र यादव को प्रगतिशील भी तो बनाए रखना है! लेकिन पर्दे तो वे खुद ही उठाकर गये हैं। भेद खोलकर भी। 

  फिर देखना होगा आका राजेंद्र यादव के उन विचारों को जो हंस पत्रिका के शुरुआती वर्षों में क्या राय अपने या दूसरों के लिए रखते थे। राजेंद्र यादव अपनी पुस्तक कांटे की बात-4 के शीर्षक  'एक साप्ताहिक की मौत'-पेज नंबर 24 पर लिखते हैं-जैसा कि मैंने कहा, यह दो मानसिकताओं का अंतर है। किसी भी जगह बैठा व्यक्ति यहां इतना आत्मकेंद्रित और आत्मग्रस्त हो जाता है कि उसके लिए दूसरा व्यक्ति होता ही नहीं। बाकी सब भीड़ और निराकार जनता में बदल जाते हैं। वह व्यक्ति समाजवाद का नाम सुनते ही बौखला उठता है, क्योंकि अपने वहां 'अपने द्वीप' को वैसा ही बनाए रखने का वायदा नहीं है। अजीब अंतर्विरोध है कि जो व्यक्तिवाद के घोषित-अघोषित हिमायती हैं उनके लिए दूसरे के व्यक्तिवाद का स्वीकार ही मौत की सजा पाना है। यह कैसा व्यक्तिवाद या व्यक्तित्व की चेतना है जो दूसरे व्यक्ति को खाकर ही अपने को जीवित रखती है? जो शीशमहल में बंद होकर अपनी ही परछाइयों को निहारने में ही स्वतंत्रता महसूस करती है? मेरे ख्याल से तो सच्चा व्यक्तिवादी वही है जो दूसरे व्यक्ति को भी ईमानदारी से स्वीकृति, सम्मान और मान्यता दे। वह व्यक्तिवादी झूठा, नकली, और ढोंगी है जिसे समाजवाद में तो अपने व्यक्तित्व को कुचलने का भूत दिखे, लेकिन दूसरे के व्यक्तित्व को बर्दाश्त करना अपने अहंकार का अपमान लगे।

 लगता है राजेंद्र यादव की इस बात से कि प्रेमचंद की पत्रिका हंस जो उनके द्वारा हायर की गयी है। कभी उनकी अनुपस्थिति में कोई ऐसा आदमी आएगा जो इतना कुंठित होगा, इतना अंहकारी होगा, इतना व्यक्तिवादी होगा, शीशमहल में रहने वाला होगा कि उनके किये धरे की मिट्टी पलीद कर देगा। वह काम तो हो गया यादव जी। राजेंद्र यादव आपकी जो आशंका थी अब सौ फीसदी सच निकली। यदि ऐसा नहीं होता तो ये शीशमहल में रहने वाले  व्यक्तिवादी संपादक तुलना कर बताते कि प्रेमचंद की ही नहीं, बल्कि राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, कमलेश्वर और खुद उनकी रचना कितनी कूड़ा हो गयी है कितनी अभी रचना में बची है?

 प्रेमचंद के पुत्र श्रीपत राय कहानी पत्रिका के अप्रैल 1961 के अपने संपादकीय में लिखते हैं---आज के बाजार युग में 'गुण न हिरानो', गुण ग्राहक हिरानो है' की सबसे विकराल समस्या है। आज की आपाधापी में किसे अवकाश है कि गुणों का सूक्ष्म परीक्षण करे। उसे ढूंढ़कर निकाले? आज तो विज्ञापन का युग है- घटिया से घटिया सामग्री का अहर्निश विज्ञापन कीजिए और तब उसे घटिया मानने कहने या मानने का विवेक ही नहीं बचा रहता। अवगुण का पोषण एक संक्रामक रोग है, गुण के लिए संयम शील विवेक की अपेक्षा होती है। वह विवेक किसी भी काल में बहुत ही थोड़े लोगों में होता है। और आज तो विज्ञापन के सर्वव्यापी साधनों ने उसका समूल विनाश कर दिया है। 

प्रेमचंद 10 जून 1936 को पिछले दस साल का हिसाब पेश करते हैं। जिस साहित्य में जीवन खफा दिया, उससे कभी कोई लाभ नहीं हुआ। " मैं कसम खा सकता हूँ कि दस साल में अपनी रचनाओं से मैंने बीस पैसे भी नहीं पाए। इधर-उधर नौकरी-चाकरी करके गुजर किया है। अगर बोरिया-बिस्तर समेटकर जाऊं तो कहाँ? लिखने में ही क्या रखा है? 

  हिंदी साहित्य के शीशमहल में रहने वाले मांस के दरिया में सराबोर संपादकों को फिल्मी दुनिया की हसीनाएं अच्छी लगती हैं, जिनके पास कोई कूड़ा नहीं है। एक बदबूदार जिस्म है और उसमें कूड़ा रहित मजा है! ओह प्रेमचंद जी, जो कूड़ा होते जा रहे हैं।
 

Saturday, 20 June 2020

लाइव की नीचता! किंतु , यह ट्रेजेडी है नीच! संजय सहाय को यह बताना चाहिए कि राजेंद्र यादव ने प्रेमचंद की कितनी कहानियों को 'कहानी' और कितनी को 'कूड़ा' कहा है...विरासत की यह कुर्सी छिछली से भी छिछली निकली!

निर्भय देवयांश 

प्रेमचंद ने अपने को कभी बड़ा लेखक नहीं माना। 17 दिसम्बर 1935 को बनारसीदास चतुर्वेदी को लिखे पत्र में प्रेमचंद ने कहा- " मैं हिंदी का अकेला कहानी लेखक नहीं हूँ। कम से कम आधे दर्जन लोग और हैं जो मुझसे अच्छा लिखते हैं और मेरा कोई इजारा नहीं है।"
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प्रेमचंद को गाँधीवादी बतानेवाले को भी यह विचार करना चाहिए कि प्रेमचंद साफ स्वीकार करते हैं कि मैं किसी पार्टी में नहीं हूं। उल्लेखनीय है कि गाँधीजी ने जब चौरी- चौरा कांड के बाद आंदोलन वापस ले लिया। प्रेमचंद ने इसे उचित नहीं माना, उन्हें निराशा हुई। कांग्रेस में रणनीति के सवाल पर विभाजन हुआ। परिवर्तन वादियों ने "स्वराज पार्टी" बनाई। गाँधी जी ने अपने कैडर को रचनात्मक कार्यों में लगाया। प्रेमचंद एक बरगी राजनीति से निराशमना होकर तटस्थ हो गये। 17 फरवरी 1923 को निगम को लिखा - " आपने मुझसे पूछा मैं किस पार्टी में हूँ। मैं किसी पार्टी में नहीं हूं। इसलिए कि दोनों में से कोई पार्टी कुछ असली काम नहीं कर रही है। मैं तो उस आने वाली पार्टी का मेंबर हूँ। जो कोतहुन्नास (छोटे लोगों) की सियासी तालीम को अपना दस्तूर-उल-अमल (कार्य प्रणाली) बनाये।"

  जब राजेंद्र यादव यह गिनकर नहीं बता पाये कि प्रेमचंद की कितनी कहानियां कूड़ा हैं तो यह काम वर्तमान में हंस के संपादक को लाइव की नीच ट्रैजेडी में एक असंभावित नीचता का प्रदर्शन करते हुए यह हिसाब क्यों देना पड़ा? क्या यह राजेंद्र यादव की पूर्व तैयारी थी? यदि नहीं तो संजय सहाय को उन कहानियों के नाम लेकर बताना चाहिए कि यह 270 कूड़ा हैं और बाकी लगभग 25-30 कहानी हैं। उसी हिसाब से उपन्यासों के बारे में पाठकों को बता देना चाहिए कि कूड़ा कितना है और पठनीय कितना? 

 यह प्रेमचंद की गलती नहीं है कि वे साहियकारों को संस्कृति और सभ्यता का अलम्बरदार मानते थे। उन्हें साहित्यकारों की अशिष्टता और अभद्रता से घृणा थी। उग्र जी का उन्होंने इसी पहलू से विरोध किया--" उग्र जी से मेरी मुलाकात कभी न हुई और ईश्वर करे कि न हो जो आदमी माँ-बहन की गाली देता है, उसे मैं इंसान ही नहीं समझता।" (बनारसीदास चतुर्वेदी को पत्र 26 जनवरी, 1935)।

 

Friday, 5 June 2020

पैदाइश के तरीके बदलेंगे तभी धरती बचेगी-आसमां बचेगा, वर्ना वीरान और बंजर में मनुष्य की हड्डियाँ मिलेंगी!

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* निर्भय देवयांश 
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मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए जितने भी साधन थे, लगभग आजमा लिए गए हैं। विज्ञान द्वारा दिए साधनों में मनुष्य जरूरत से अधिक अराजक होता गया है। अराजक मनुष्य क्या यह स्वीकार करेगा कि ---हाँ, ऐसा ही हुआ है! नहीं स्वीकार करेगा यानी अभी अराजकता की पूर्ति नहीं हुई है। आखिर यह मनुष्य है और मनुष्य की अराजकतावादी सोच, जिसकी अंत तभी होती है जब दुनिया का अंत हो जाए। 
 पहाड़ पर अब पेड़-पौधे कम, ईंट-रोड़े के टुकड़े अधिक पाए जा रहे हैं। जंगलों में कुछ लोगों की सुविधा के लिए रैन बसेरा बनाए गए हैं। उसमें आराम की इतनी सुविधाएं है कि कल्पित स्वर्ग की सहज अनुभूति होती है। समुद्र में मछलियां कम, मशीनें अधिक तैरती नजर आती हैं। पाताल में पानी नहीं है। नीचे उतरता जा रहा है। सिंचाई के अभाव में आत्महत्या कर रहे किसानों की वेदना अप्रासंगिक हो गयी है। कितनी मौतों पर कोई कितनी बार  रोए आखिर! कब तक रोए आखिर! रोने की भी सीमा है, क्योंकि शरीर में मौजूद लगभग 70 प्रतिशत शरीर के भीतरी हिस्सों को गीला रखने में चला जाता है। 24 घन्टे की ड्यूटी है। अंगों को आराम करने के लिए समय निर्धारित है लेकिन मन-मस्तिष्क ने अपनी चाहत बढ़ा ली है। इन चाहतों की पूर्ति के लिए मनुष्य मरा-मरा फिर रहा है लेकिन चाहत तो चाहत है। एक पूर्ति हुई नहीं कि दूसरी, तीसरी, चौथी पैदा होती रहती है। चाहतों की आपूर्ति ने अपनी कोख से अपराध को जन्म दिया। अपराध के कई भाई-बहनें हैं। हर मनुष्य पैदा होते इन अपराधों की चपेट में होता है। कहीं इसका विकास ज्यादा, कहीं कम होता है। चाहत की बढ़ती आदतों में दुनिया छलनी छलनी होती गयी। प्रकृति के पास अपनी किस्मत पर रोने के अलावा उपाय भी क्या है?
 पर्यावरण के संसाधन के इस संकेत को वह मनुष्य भी नहीं समझ पाया कि उसका जन्म अनचाहा तो नहीं? माँ के पास दुलार का अभाव था, पिता के पास प्यार का। फिर वही माता-पिता बच्चे पर बच्चे पैदा करते गए? इन पैदा करने के कारोबार में पता ही कभी नहीं चल पाया कि कौन किस पर एहसान कर रहा है? यह तो तब संभव होता कि माँ दुलार से भरी होती, पिता का दिल प्यार में छलक रहा होता? मतलब कि माता- पिता को भी प्यार-दुलार का अभ्यास नहीं है! तो फिर बार-बार की पैदाइश? कहीं एक-दूसरे से दुश्मनी तो नहीं ली जा रही है और दुनिया यहाँ तक खींच कर चली आई! 
 पैदाइश की दुश्मनी इतनी बढ़ गयी है कि कोई भी पीछे रहने को तैयार नहीं है। सुनते हैं कि दुनिया में कुछ ऐसे देश हैं जो पहले प्यार-दुलार पैदा कर रहे हैं। फिर वे मनुष्य को पैदा करने के बारे में सोचते हैं। जहाँ प्यार-दुलार में कमी रही वहाँ पैदाइश की तरफ ध्यान ही नहीं गया। अपने जन्म के अपराध और प्रायश्चित के लिए भी समझ विकसित करनी पड़ती है। फिर उसके लिए समय कहाँ से लाएंगे? जब तय है कि जन्म के साथ मरण साथ पैदा होता है तो जिस प्रकृति और पर्यावरण को हम पैदा ही नहीं किए उन्हें नष्ट, विनष्ट करने का अधिकार भी किसी को कैसे मिल सकता है? और भी तो जीव-जंतु हैं, वे तो अपनी सीमाओं से बाहर हजारों साल में गए नहीं, फिर यह मनुष्य, अराजक मनुष्य के मजा को प्रकृति कब तक सहेगी?


वीरान और बंजर होती धरती पर 
मनुष्य के पैरों के बचे निशान होंगे
ठूंठ पेड़ जब आपस में बात करेंगे 
मनुष्य जाति ने हमारी हरियाली छीन ली
बंजर इस जमीन पर चलने के लिए बचा कौन
धरती के भीतर आग ही आग है
आसमां में अंगारे हैं जो बरसते हैं
चारों तरफ बिखरी मनुष्य की हड्डियाँ
जिससे सूअर स्वार्थ की गंध आ रही हैं

एक सूअर ने दूसरे से कहा
अच्छा हुआ सूअर रह गए
नहीं तो आज 
हमारी हड्डियाँ बिखरी होतीं 
इस वीरान दुनिया में....
     
           फकीर