Wednesday, 24 June 2020

रघु ठाकुर की इस बात में दम है कि अरुन्धति रॉय गाँधी को विश्व पटल पर बदनाम कर रही हैं। नतीजा गाँधी जी की प्रतिमाएं अपमानित की जा रही हैं?


 * निर्भय देवयांश 
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बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका अरुन्धति रॉय खुद को स्वघोषित एक बड़ी लेखिका मानती हैं। यही बुकर पुरस्कार पाने के बाद भी अरविंद अडिगा कहाँ खो गये हैं, किसी को ज्ञात नहीं है। किरण देसाई भी बुकर विजेता हैं और उनका भी अता-पता पाठकों को नहीं है। अरविंद अडिगा और किरण देसाई सामाजिक कार्यकर्ता नहीं हैं इसलिए उनकी अन्य गतिविधियों से लोग अपरिचित हैं।

अरुन्धति रॉय के लिए सामाजिकता एक अहम मुद्दा है। उनकी सामाजिकता में पंचगढ़ी में अपने पति द्वारा अवैध रूप से बंगला बनाना आता है कि नहीं, यह बेहतर ढंग से वही बता सकती हैं। यह मानने वाले मान सकते हैं कि सामाजिकता कुछ मात्रा में अवैध काम करने की छूट देती है। सो उनके पति प्रदीप कृष्णन ने अपनी पत्नी की सामाजिकता को आधार बनाकर अवैध ढंग से कोई एक बंगला बना लिया? जिसे अदालत ने अवैध घोषित कर दिया है!
  लेकिन यहाँ मामला दूसरा है। उनकी अभी एक किताब आयी है-' एक था डॉक्टर एक था संत'। निश्चित ही डॉक्टर ऊपर हैं शीर्षक में तो उनकी स्थापनाओं को लेकर लेखिका अधिक गम्भीर हैं और गाँधी चूँकि नीचे हैं इसलिए उनकी गलतियां अधिक निशाने पर रहेंगी? यह लेखिका की अपनी पसंद है कि शीर्षक में किसे ऊपर, किसे नीचे या किसे अधिक महत्व और किसे खरी खोटी सुनानी है। 
  लगभग 180 पेज की किताब में 40 पेज में संदर्भित किताबों की सूचि है। एक उपन्यासकार के लिए यह कठिन काम रहा होगा। उपन्यास में कल्पना की उड़ान अधिक होती है लेकिन ऐतिहासिक पुस्तकों में शोधकर्ताओं को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। अरुन्धति रॉय ने अपनी चर्चित और विवादित पुस्तक 'एक था डॉक्टर एक था संत, में यह काम किया है। 

 लेकिन दिक्कत यह है कि अरुन्धति रॉय पर जो आरोप लगाये जा रहे हैं वे काफी संगीन हैं। मशहूर समाजवादी लोहियावादी नेता रघु ठाकुर का सीधा आरोप है कि विश्व पटल पर अरुन्धति गाँधी को नस्लवादी बता रही हैं। जिसके चलते विभिन्न देशों के मुख्य शहरों में स्थापित गाँधी की प्रतिमाएं अपमानित की जा रही हैं। ये घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। अभी अमेरिका में चल रहे अश्वेत आंदोलन के दौरान भी भारतीय दूतावास के सामने स्थापित गाँधी की प्रतिमा अपमानित की गयी। इसके पहले घाना विश्विद्यालय में इसी तरह की घटना घटी थी। 

  रघु ठाकुर ने अरुन्धति रॉय की पुस्तक के जवाब में एक पुस्तक तैयार की है। उन्होंने सिलसिलेवार ढंग से अरुन्धति रॉय द्वारा उठाये गये सवालों का जवाब दिया है। रघु ठाकुर की पुस्तक कभी भी बाजार में आ सकती है। उसकी तैयारी पूरी हो गयी है और प्रकाशन की अंतिम प्रक्रिया में है। 

यह सही है कि बुकर पुरस्कार विजेता होने के नाते दुनिया के बड़े लेखकों के साथ अरुन्धति को मंच शेयर करने का मौका बार-बार मिलता है। कभी नोम चोमस्की के साथ तो कभी दार्शनिक लेखक स्लावोय जिजेक के साथ मंच शेयर करती हैं। ये सभी लेखक अपने अपने देश की समस्याओं और शासकों के तानाशाही रवैये से दर्शकों को अवगत कराते हैं। खूब तालियाँ बजती हैं। यह कहने में संकोच तो किसी को नहीं है कि हिंदी की अपेक्षा अंग्रेजी पाठकों की तालियों की गूंज बहुत कुछ कहती है। 

 अब जो अहम मुद्दा है वह यह है कि गाँधी  वाकई नस्लवादी थे, क्या उनकी उसमें पूरी आस्था थी? इस पर माथापच्ची जारी है। इसी को आधार बनाकर अपनी विवादित पुस्तक में अरुन्धति यह साबित करना चाहती हैं कि बाबा साहेब लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करने के लिए गाँधी की कई जगह आलोचना करते हैं। इसके साक्ष्य भी उपलब्ध हैं। 

 लेकिन जो असहमति संवाद के माध्यम से दूर हो सकती है। उसके लिए गाँधी की प्रतिमा अपमानित करने से आखिर किस प्रकार का समाधान निकलेगा? 

 'एक था डॉक्टर एक था संत' पुस्तक के पेज नंबर 32 पर अरुन्धति लिखती हैं---"लोकतंत्र ने जाति-उन्मूलन नहीं किया है। इसने जाति का आधुनिकीकरण करके इसकी जड़ों को और अधिक मजबूत किया है। इसलिए यही समय है कि आंबेडकर को पढ़ने का। " अरुन्धति की यह बात सही है कि लोकतंत्र को जन- जन तक पहुंचाने के लिए बाबा साहेब को ज्यादा से ज्यादा पढ़ा जाना चाहिए।

अरुन्धति आगे लिखती हैं---"  आंबेडकर बहुत लिखते थे, और बहुत सी पुस्तकों के लेखक हैं। यह दुर्भाग्य है कि जैसे गाँधी, नेहरू या विवेकानंद द्वारा लिखित पुस्तकें पुस्तकालयों और किताबों की दुकानों में अलमारियों में चमकती नजर आती हैं, आंबेडकर की पुस्तकें ढूंढ़े नहीं मिलतीं।' अरुन्धति रॉय की इस बात से बहुतों को असहमति होगी। दूसरे की बात तो छोड़ दीजिए मेरी छोटी, बहुत छोटी लाइब्रेरी में बाबा साहेब की पुस्तकें गाँधी, नेहरू, विवेकानंद से अधिक मिल जाएंगी।

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