Monday, 1 June 2020

बंग महिला उर्फ राजेंद्रबाला घोष की जंग से महावीर प्रसाद द्विवेदी और रामचंद्र शुक्ल हुए तंग-तंग

* निर्भय देवयांश 

ईमानदारी साहित्य की कसौटी है। यह कहने में किसी को गुरेज नहीं है। जब कसौटी पर खड़े उतरने की बारी आती है तो कहा जाता है-ईमानदारी साहित्य की कसौटी होनी चाहिए। अभी तक जो कसौटी थी उसे अब होनी चाहिए की जगह शिफ्ट कर दी जाती है। बंग महिला उर्फ राजेंद्रबाला घोष (1882-1949) ने जब हिंदी साहित्य के कथा लेखन में चोरी, नकल की बात उठायी थी, तो चोरबाज, नकलबाज लेखक उनके चरित्र-हनन पर उतर आए। क्या इस चोरबाजारी से अपने हिंदी नवजागरण के आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी परिचित नहीं थे? क्या यह संभव था? क्या यह संभव हो सकता था?
 महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सितंबर 1908 की सरस्वती में ' हिंदी साहित्य में डाकेजनी ' शीर्षक टिप्पणी लिखी। इसमें उन्होंने बताया कि कुछ लेखकों ने तो बंगला और मराठी के लेखों की नकल करके उन्हें अपने नाम से छपाने का पेशा कर लिया है। इसके अलावा ऐसे लोग भी थे जो हिंदी का माल इधर से उधर कर रहे थे। द्विवेदी जी आगे कहते हैं-सरस्वती को कुछ लोग तो प्रकाश्यभाव से लूट रहे हैं। कोई लेख उड़ाए लिये जा रहे हैं, कोई कविता, कोई चित्र। और यदि कुछ लिखो तो त्योरियां चढ़ाते हैं। चोरी और शहजोरी! इनका मतलब है कि यदि हम चोरी करते पकड़े जाएँ तो मालिक-माल हमारे कान में जो चाहे कह दे, औरों के सामने कुछ न कहे। और क्या! उदारता सिखलाना चोरों के सिवा और किसे शोभा दे सकता है? दिसंबर 1908 की सरस्वती में वात्सरिक विज्ञप्ति शीर्षक टिप्पणी में सरस्वती सम्बंधी अन्य चर्चा करते हुए उन्होंने वही चोरी वाला प्रसंग फिर उठाया और लिखा-"किसी का माल दिन दहाड़े सब लोगों के देखते ही ले भागना, और किसी का लेख उठाकर उसी के शब्दों में अपने नाम से प्रकाशित करना, दोनों एक ही तरह के जुर्म हैं। जो लोग ऐसा काम करते हैं वे शायद बदनामी को भी नामवरी ही समझते हैं; क्योंकि उसमें भी तो नाम होता है।" 
पुस्तक, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण, पेज 368, रामविलास शर्मा।
 द्विवेदी जी को शंका-आशंका थी वह तो सच साबित हुई कि बदनामी में भी नामवरी ही समझते हैं। यानी बदनाम लोग भी नामवर हो सकते हैं। भविष्य में हिंदी साहित्य में यह भी साबित हो ही गया है। 
 अब देखना जरूरी हो जाता है कि क्या यही बात जो द्विवेदी जी कह रहे थे। उनके शब्दों पर गौर करते चलें-'डाकेजनी', 'चोरी और शहजोरी'। द्विवेदी जी गुरु-घंटाल शब्द का प्रयोग करते हैं-इस वाक्य को देखें-हिंदी के गुरु- घंटाल ऐसा करना अपने विरद के विरुद्ध समझते हैं। द्विवेदी जी गुरु-घंटालों से इतने परेशान हैं लेकिन इनमें से कितने को सरस्वती में छापने से प्रतिबंधित किया? क्या ऐसे लेखकों को चोर, नकलबाज साबित कर पाठक वर्ग के सामने पेश कर सके। द्विवेदी जी पर संदेह है कि उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? इतना सब कुछ कहने के लिए द्विवेदी जी के चरित्र हनन किये गये? जिस तरह से बंग महिला के लिए मुहिम चलाई गयी कि उनकी बात न सुनी जाए, उन्हें इग्नोर किया जाए!
 बंग महिला उर्फ राजेंद्रबाला घोष जब यही बात जोर देकर कह रही थीं कि हिंदी लेखक धांधली कर रहे हैं। नाम भी सार्वजनिक किये गये जिनमें महावीर प्रसाद द्विवेदी के भी नाम शामिल हैं, बाकी श्यामसुंदर दास, गदाधर सिंह, राधाकृष्ण दास, किशोरीलाल गोस्वामी, पंडित विश्वनाथ शास्त्री, बालमुकुंद गुप्त, माधव प्रसाद मिश्र,  पार्वतीनन्दन उर्फ गिरिजाकुमार घोष। बंग महिला के सवाल- दर - सवाल पर गौर करते चलिए-देवरानी-जेठानी, सास-पतोहू, बड़ा भाई, डबल-बीवी, जासूस, देवी चौधरानी, अनारकली, मधुमालती, इला, प्रमिला जैसे उपन्यास कहाँ से और किस प्रकार उठाए गये हैं---इसके प्रामाणिक स्रोत प्रस्तुत किये गये। सवाल नहीं बनता है और यदि बनता है तो आपको या हम सबको नहीं पूछना चाहिए कि रामचंद्र शुक्ल ने अपने हिंदी साहित्य का इतिहास में इस चौर्य-घटना पर चुप्पी क्यों साध ली? क्या इसलिए कि इसमें श्यामसुंदर दास या महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम शामिल थे? हिंदी साहित्य में स्त्री - विमर्श का उदाहरण इससे बड़ा शुरुआती दशक में और क्या हो सकता था कि जोखिम उठाकर बंग महिला उन हस्तियों के नाम को उजागर कर रही हैं जो हिंदी के कर्णधार घोषित हो चुके थे? राजेंद्रबाला उर्फ बंग महिला जी इन्हें धांधलीबाज न कहें-हिंदी पाठक फिर से न कहीं आपके चरित्र-हनन पर उतर जाएंगे। ये सब हिंदी के दिग्गज साहित्यकार हैं? रामविलास शर्मा चुप रहें तो रहें लेकिन प्रेमचंद ने तो जैनेंद्र को लिखे पत्र में कहा-मैं नग्न यथार्थवाद का प्रेमी भी नहीं हूं। 17 नवम्बर, 1930। यह हिंदी साहित्य है चोरी और सीनाजोरी की गलबहियां मजबूत हैं। 


3 comments:

  1. डाकेजनी और चोरी-शहजोरी से हिंदी साहित्य का भला नहीं होगा- महावीर प्रसाद द्विवेदी। लेकिन मौके पर आपने बंग महिला का साथ नहीं दिया। यह दाग भी आपने दामन पर चस्पां है।

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  2. Since early childhood we have been taught not to cheat.If we do not have the potential of writing something creative then we cannot call ourselves poet or writers by copying someone else's writings.But unfortunately hindi literature is suffering from such problems through the very beginning.

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