Sunday, 21 June 2020

"मांस के दरिया" में सराबोर संपादकों को प्रेमचंद की कहानियां 'कूड़ा' न लगेंगी तो क्या राजेंद्र यादव और कमलेश्वर की कहानियां 'कूड़ा' लगेंगी?

* निर्भय देवयांश 
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यह आपका चित्त तय कर रहा है कि आका का बनाया खाका ध्वस्त न हो। दूसरे-तीसरे का नामोनिशान मिट जाए, धूल में मिल जाए, परवाह किसे है? यह जो आपके पास चित्त निर्मित हुआ है उसमें भूख की वह बजबजाती शाम की खूँखार आवाज नहीं है, जो जीने के लिए अपराध करता है ताकि रात को अच्छी नींद आ सके। सजा जो भी व्यवस्था तय करेगी सुबह झेल लेंगे? यहां तो खानदानी विरासत ऐसी है कि सपने पैदा होकर तो देखें, उनकी पूर्ति कोख में ही न कर दिये तो ऐसी पूँजी और पूँजीपति होने का क्या मतलब है? हंस के वर्तमान संपादक संजय सहाय को प्रेमचंद को कूड़ा बताकर आखिर अपने आका राजेंद्र यादव को प्रगतिशील भी तो बनाए रखना है! लेकिन पर्दे तो वे खुद ही उठाकर गये हैं। भेद खोलकर भी। 

  फिर देखना होगा आका राजेंद्र यादव के उन विचारों को जो हंस पत्रिका के शुरुआती वर्षों में क्या राय अपने या दूसरों के लिए रखते थे। राजेंद्र यादव अपनी पुस्तक कांटे की बात-4 के शीर्षक  'एक साप्ताहिक की मौत'-पेज नंबर 24 पर लिखते हैं-जैसा कि मैंने कहा, यह दो मानसिकताओं का अंतर है। किसी भी जगह बैठा व्यक्ति यहां इतना आत्मकेंद्रित और आत्मग्रस्त हो जाता है कि उसके लिए दूसरा व्यक्ति होता ही नहीं। बाकी सब भीड़ और निराकार जनता में बदल जाते हैं। वह व्यक्ति समाजवाद का नाम सुनते ही बौखला उठता है, क्योंकि अपने वहां 'अपने द्वीप' को वैसा ही बनाए रखने का वायदा नहीं है। अजीब अंतर्विरोध है कि जो व्यक्तिवाद के घोषित-अघोषित हिमायती हैं उनके लिए दूसरे के व्यक्तिवाद का स्वीकार ही मौत की सजा पाना है। यह कैसा व्यक्तिवाद या व्यक्तित्व की चेतना है जो दूसरे व्यक्ति को खाकर ही अपने को जीवित रखती है? जो शीशमहल में बंद होकर अपनी ही परछाइयों को निहारने में ही स्वतंत्रता महसूस करती है? मेरे ख्याल से तो सच्चा व्यक्तिवादी वही है जो दूसरे व्यक्ति को भी ईमानदारी से स्वीकृति, सम्मान और मान्यता दे। वह व्यक्तिवादी झूठा, नकली, और ढोंगी है जिसे समाजवाद में तो अपने व्यक्तित्व को कुचलने का भूत दिखे, लेकिन दूसरे के व्यक्तित्व को बर्दाश्त करना अपने अहंकार का अपमान लगे।

 लगता है राजेंद्र यादव की इस बात से कि प्रेमचंद की पत्रिका हंस जो उनके द्वारा हायर की गयी है। कभी उनकी अनुपस्थिति में कोई ऐसा आदमी आएगा जो इतना कुंठित होगा, इतना अंहकारी होगा, इतना व्यक्तिवादी होगा, शीशमहल में रहने वाला होगा कि उनके किये धरे की मिट्टी पलीद कर देगा। वह काम तो हो गया यादव जी। राजेंद्र यादव आपकी जो आशंका थी अब सौ फीसदी सच निकली। यदि ऐसा नहीं होता तो ये शीशमहल में रहने वाले  व्यक्तिवादी संपादक तुलना कर बताते कि प्रेमचंद की ही नहीं, बल्कि राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, कमलेश्वर और खुद उनकी रचना कितनी कूड़ा हो गयी है कितनी अभी रचना में बची है?

 प्रेमचंद के पुत्र श्रीपत राय कहानी पत्रिका के अप्रैल 1961 के अपने संपादकीय में लिखते हैं---आज के बाजार युग में 'गुण न हिरानो', गुण ग्राहक हिरानो है' की सबसे विकराल समस्या है। आज की आपाधापी में किसे अवकाश है कि गुणों का सूक्ष्म परीक्षण करे। उसे ढूंढ़कर निकाले? आज तो विज्ञापन का युग है- घटिया से घटिया सामग्री का अहर्निश विज्ञापन कीजिए और तब उसे घटिया मानने कहने या मानने का विवेक ही नहीं बचा रहता। अवगुण का पोषण एक संक्रामक रोग है, गुण के लिए संयम शील विवेक की अपेक्षा होती है। वह विवेक किसी भी काल में बहुत ही थोड़े लोगों में होता है। और आज तो विज्ञापन के सर्वव्यापी साधनों ने उसका समूल विनाश कर दिया है। 

प्रेमचंद 10 जून 1936 को पिछले दस साल का हिसाब पेश करते हैं। जिस साहित्य में जीवन खफा दिया, उससे कभी कोई लाभ नहीं हुआ। " मैं कसम खा सकता हूँ कि दस साल में अपनी रचनाओं से मैंने बीस पैसे भी नहीं पाए। इधर-उधर नौकरी-चाकरी करके गुजर किया है। अगर बोरिया-बिस्तर समेटकर जाऊं तो कहाँ? लिखने में ही क्या रखा है? 

  हिंदी साहित्य के शीशमहल में रहने वाले मांस के दरिया में सराबोर संपादकों को फिल्मी दुनिया की हसीनाएं अच्छी लगती हैं, जिनके पास कोई कूड़ा नहीं है। एक बदबूदार जिस्म है और उसमें कूड़ा रहित मजा है! ओह प्रेमचंद जी, जो कूड़ा होते जा रहे हैं।
 

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