निर्भय देवयांश
प्रेमचंद ने अपने को कभी बड़ा लेखक नहीं माना। 17 दिसम्बर 1935 को बनारसीदास चतुर्वेदी को लिखे पत्र में प्रेमचंद ने कहा- " मैं हिंदी का अकेला कहानी लेखक नहीं हूँ। कम से कम आधे दर्जन लोग और हैं जो मुझसे अच्छा लिखते हैं और मेरा कोई इजारा नहीं है।"
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प्रेमचंद को गाँधीवादी बतानेवाले को भी यह विचार करना चाहिए कि प्रेमचंद साफ स्वीकार करते हैं कि मैं किसी पार्टी में नहीं हूं। उल्लेखनीय है कि गाँधीजी ने जब चौरी- चौरा कांड के बाद आंदोलन वापस ले लिया। प्रेमचंद ने इसे उचित नहीं माना, उन्हें निराशा हुई। कांग्रेस में रणनीति के सवाल पर विभाजन हुआ। परिवर्तन वादियों ने "स्वराज पार्टी" बनाई। गाँधी जी ने अपने कैडर को रचनात्मक कार्यों में लगाया। प्रेमचंद एक बरगी राजनीति से निराशमना होकर तटस्थ हो गये। 17 फरवरी 1923 को निगम को लिखा - " आपने मुझसे पूछा मैं किस पार्टी में हूँ। मैं किसी पार्टी में नहीं हूं। इसलिए कि दोनों में से कोई पार्टी कुछ असली काम नहीं कर रही है। मैं तो उस आने वाली पार्टी का मेंबर हूँ। जो कोतहुन्नास (छोटे लोगों) की सियासी तालीम को अपना दस्तूर-उल-अमल (कार्य प्रणाली) बनाये।"
जब राजेंद्र यादव यह गिनकर नहीं बता पाये कि प्रेमचंद की कितनी कहानियां कूड़ा हैं तो यह काम वर्तमान में हंस के संपादक को लाइव की नीच ट्रैजेडी में एक असंभावित नीचता का प्रदर्शन करते हुए यह हिसाब क्यों देना पड़ा? क्या यह राजेंद्र यादव की पूर्व तैयारी थी? यदि नहीं तो संजय सहाय को उन कहानियों के नाम लेकर बताना चाहिए कि यह 270 कूड़ा हैं और बाकी लगभग 25-30 कहानी हैं। उसी हिसाब से उपन्यासों के बारे में पाठकों को बता देना चाहिए कि कूड़ा कितना है और पठनीय कितना?
यह प्रेमचंद की गलती नहीं है कि वे साहियकारों को संस्कृति और सभ्यता का अलम्बरदार मानते थे। उन्हें साहित्यकारों की अशिष्टता और अभद्रता से घृणा थी। उग्र जी का उन्होंने इसी पहलू से विरोध किया--" उग्र जी से मेरी मुलाकात कभी न हुई और ईश्वर करे कि न हो जो आदमी माँ-बहन की गाली देता है, उसे मैं इंसान ही नहीं समझता।" (बनारसीदास चतुर्वेदी को पत्र 26 जनवरी, 1935)।
बढ़िया है।
ReplyDeleteहंस को अपने हाथ में लेने के बाद से ही साजिशन यह सब चलने लगा। राजेंद्र यादव ने कहानी और विमर्श की जो परिभाएँ गढ़ीं क्या वे अकाट्य हैं? क्या उनके हिसाब से लिखा जाएगा? यह सब राजेंद्र यादव के दिमाग की उपज है जिसे संजय सहाय जैसे लोग रट्टूू तोते की तरह दोहरा रहे हैं। थू है ऐसी नीचता पर।
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