Wednesday, 3 June 2020

महावीर प्रसाद द्विवेदी के शब्द 'डाकेजनी, चोरी-शहजोरी' और प्रेमचंद के शब्द ' साहित्यिक गुंडापन ' बनाम देशी-विदेशी साहित्य से चोरी-चमारी के उस्तादपन के मायने-मतलब!


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* निर्भय देवयांश
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कीचड़-कीचड़ का खेल भी आखिरकार खेल ही है। जो कहते हैं कि यह बे-रस है, शायद झूठ बोल रहे होते हैं। मजा उन्हें भी खेलने वाले से कम नहीं आता है। यानी दूर से ही देखने-सुनने वाले भी खेल के समान अधिकारी हो जाते हैं, क्योंकि समय काल में उनकी भूमिका की तलाश की जाएगी तो सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा कि तब वे कहाँ मशगूल थे!
 मैथलीशरण गुप्त उर्फ दद्दा की महफ़िल के बारे में मशहूर है कि पर-निंदा से बातचीत शुरू होती थी और पर-निंदा पर ही बातचीत खत्म होती थी। एक बार महफ़िल में शामिल युवा अशोक वाजपेयी ने दद्दा से पूछा था-पर-निंदा बहुत अधिक है, कुछ और काम की बात करते हैं- तो दद्दा ने कहा कि इसमें बड़ा मजा है,  डूब कर रस लो। एक बार कवि-लेखक, कवि बच्चनजी के प्यारे शिष्य अजित कुमार बता रहे थे कि दिल्ली में इधर-उधर जो बैठकी लगती है उसमें लहक की खूब लानत-मलानत होती है। अजित कुमार के न रहने से दिल्ली की भीतरिया बैठकी की खबर पहले की तुलना में अब मुझ तक कम पहुँच पाती है! 
 महावीर प्रसाद द्विवेदी के कहे शब्द डाकेजनी, चोरी-शहजोरी और प्रेमचंद के कहे शब्द साहित्यिक गुंडापन से ऐसा महसूस होता है कि पाठक की कोई हैसियत नहीं होती है? किसी रचना को पढ़ने के बाद यदि पाठक के पास अपनी कोई प्रतिक्रिया पैदा होती है तो वह कहाँ व्यक्त करे?करेगा? यदि पाठक सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं पढ़ता है और और उसमें सामाजिक उद्देश्य ढूंढ़ता है तब! क्योंकि आप अपना समय जाया करते हैं, जो कि एक मूल्य है, वे अपने इस अधिकार को क्या ठकुरसुहाती में, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला, की तरह फूँक देंगे ? बंगाली समाज में हर पाठक को जन्मजात बहस-मुहावसा का अधिकार है,(संभव है बंगाल में यह अंग्रेजी मानस से पहुंचा हो और धीरे-धीरे यह अधिकार मजबूत होता गया है )! हिंदी साहित्य और समाज में सवाल पूछने और करने को राजा और प्रजा के अधिकार और गुलामीपन के नजरिये से देखा जाता है। 
 प्रेमचंद से जुड़े पहले एक उदाहरण को लेते हैं। अवध उपाध्याय ने प्रेमचंद की कई रचनाओं पर चोरी और नकल के आरोप लगाए। प्रेमाश्रम को तोल्स्तोय की रचना रिजेक्शन से प्रभावित, रंगभूमि को थैकरे की वैनिटी फेयर से। लेकिन यहाँ बात कायाकल्प की हो रही है। अवध उपाध्याय ने 'कायाकल्प' को 'हॉलकेन' के उपन्यास ' इंटर्नल सिटी' से प्रभावित बताया। अब कुपित प्रेमचंद की आंशिक स्वीकारोक्ति देखिए- अक्टूबर 1927 को दुलारेलाल भार्गव को लिखे पत्र में विस्तार के साथ अपने पक्ष को प्रस्तुत करते हैं: "हमारे मित्र अवध उपाध्याय तो 'कायाकल्प' को 'इंटर्नल सिटी' पर आधारित बता रहे हैं। मि. शिलीमुख ने उनको बहुत अच्छा जवाब दे दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि 'विश्वास' कहानी पर इंटर्नल सिटी की छाया जरूर है लेकिन उपन्यास पर नहीं। मैं अपने सभी मित्रों से कह चुका हूँ कि 'विश्वास' केवल हॉलकेन के 'इंटर्नल सिटी' के उस अंश की छाया है, जो वह पुस्तक पढ़ने के बाद मेरे हृदय पर अंकित हो गया। मैंने पहले 'चाँद' में यह कहानी लिखी थी। वहाँ से ' प्रेम प्रमोद ' में आई। मैंने प्रकाशक को अपने पत्र में स्पष्ट लिख दिया था कि यह कहानी 'इंटर्नल सिटी, की विकृत छाया है। अपने प्रायः सभी मित्रों से कह चुका हूं। छिपाने की जरूरत न थी, और न है।"
  इस स्वीकारोक्ति के बाद प्रेमचंद ने 'साहित्यिक गुंडापन' का प्रयोग किसके लिए किया? अवध उपाध्याय या किशन सिंह या कोई और, जब कह रहे हैं कि प्रेमचंद की रचनाओं पर विदेशी साहित्य की छाया है! क्या इतना भर कहने के लिए उन्हें 'साहित्यिक गुंडा या गुंडापन' कह देंगे प्रेमचंद जी! आखिर कितना समय लगाकर अवध उपाध्याय ने आपकी रचनाओं को और विदेशी रचनाओं को पढ़कर तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर प्रभावित होने की बात कही होगी ? प्रेमचंद जी, आपने किस आधार पर, कि सीधे' साहित्यिक गुंडापन' करार दे दिया ? यह सवाल आज भी मरा नहीं है और सवाल उठाने वाले को 'साहित्यिक गुंडापन' कह दिया जाता है। फिर तो पाठक किसी लेखक की कोई रचना ही न पढ़े, जब उसे गुंडा ही कहलाना पड़े! अगर अवध उपाध्याय सवाल-दर-सवाल, आरोप-दर-आरोप नहीं लगाते रहते? लगातार नहीं लिखते रहते तो क्या प्रेमचंद स्वीकार करते कि 'विश्वास' छाया ही सही, है तो विदेशी साहित्य से प्रभावित? लेकिन सवाल तो रह ही गया यह जो ' साहित्यिक गुंडापन' वाला! जो है?
 अब महावीर प्रसाद द्विवेदी के शब्द डाकेजनी, चोरी-शहजोरी पर। आचार्य जी इन शब्दों के इस्तेमाल किनके लिए कर रहे थे? जब बंग महिला उर्फ राजेंद्रबाला घोष ने उस समय के कथाकारों पर यह आरोप मढ़ा था जिनमें महावीर प्रसाद द्विवेदी के भी नाम शामिल थे! फिर सरस्वती के संपादक के नाते उन्होंने क्या अपना पक्ष रखा? क्या रामविलास शर्मा ने 'महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण' किताब में बंग महिला के आरोप को लेकर कोई जिक्र किया? क्यों नहीं किया? आखिर ऐसे ही कैसे कोई बात खत्म हो सकती है, जब मामला डाकेजनी और चोरी-शहजोरी का ठहरता हो? क्या दूसरे के लिए 'साहित्यिक गुंडापन' और डाकेजनी और चोरी-शहजोरी शब्द प्रयोग करना आसान है और अपने लिए चौखटे अलग? यदि कोई चोर दरवाजा है तो सबकी आवाजाही पर पाबंदी जरूरी है। यह चोर दरवाजा हिंदी साहित्य में विशाल से विशालतम होता जा रहा है। प्रेमचंद की तरह स्वीकारोक्ति का स्वागत होना चाहिए, ताकि कोई डाकेजनी आसानी से न कर सके। डाकेजनी के उस्ताद बढ़ते ही जा रहे हैं। पाठक की चौकसी और पहरेदारी जरूरी है।
  

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