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* निर्भय देवयांश
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राममनोहर लोहिया कभी भी अपने को नेहरू से कमतर समझते होंगे? उनकी कई पुस्तकों को पढ़ने के बाद भी नहीं लगा। कुछ कहानी संग्रहों, कुछ निबंधों के लेखक प्रेमकुमार मणि को ऐसा लगता होगा या इसी तरह की कुछ बातें। जैसे उनकी नजर में निराला को टैगोर से कमतर होना अखरता था। निराला जी ने कहा है-टैगोर की तरह मुझे भी परिवेश मिलता तो उनसे बड़ा कवि होता! हिंदी में जिस कद के कवि निराला हैं, वह कद इतना भी छोटा तो नहीं! और टैगोर से बेहतर कवि होने का मतलब? पैमाना यदि नोबेल पुरस्कार है तो...।
'लोहिया के विचार' पुस्तक में लोहियाजी कहते हैं- किसी भी देशभक्त के लिए भारतमाता की नाक, छाती यहां तक कि सिर का एक बाल भी उतना ही पवित्र है, जितनी कि सम्पूर्ण भारतमाता। छाती से हट कर नाक पर बैठने की बात तथा भारतमाता के एक भाग को बंजर, पथरीला तथा बेकार कहने की बात तो केवल कम्युनिस्ट तथा कांग्रेसी ही कर सकते हैं। पेज न 318, 1933। 1933 में लिखा यह लेख का संघ और भाजपा के विचार से दीनदयाल उपाध्याय के बहाने जोड़ना कहाँ तक उचित है? अगर लोहियाजी की भारतमाता से संघ और भाजपा की भारतमाता का जुड़ाव किसी मोड़ पर हो रहा है तो उसके लिए लोहिया जी कटघरे में कैसे आ गये?
इसी पुस्तक के पेज न 12 पर भारतमाता से लोहियाजी की मांग थी---" हे भारतमाता! हमें शिव का मस्तिष्क दो, कृष्ण का हृदय दी तथा राम का कर्म और वचन दो। हमें असीम मस्तिष्क और उन्मुक्त हृदय के साथ-साथ जीवन की मर्यादा से रचो।" भाजपा की स्थापना से ही ये मुद्दे साथ रहे हैं तो उसके लिए भी लोहियाजी दोषी हो गये?
जातिवादी समीकरणों में पली-बढ़ी मानसिकता की तथाकथित क्रांति सोच जो न करा दे! कभी सत्ता के गलियारे में आने-जाने वाले लोग दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद को लेकर उपहास करते हैं लेकिन लोहियाजी के समाजवाद के अनुसार -जब समानता और बराबरी की संपन्नता नहीं आएगी तो क्या एकात्म मानववाद के लिए भी कोई जगह है?
दिल्ली दरबार के अगुआ पुरषोत्तम अग्रवाल को भी खुमारी चढ़ी है यह पूछने की---"हू इज भारतमाता" किताब लिखकर। थर्ड रेट अंग्रेजी लेखक रामचन्द्र गुहा ने उन्हें यह नाम रखने का सुझाव दिया था। अग्रवालजी के अनुसार यह नेहरू की भारतमाता हैं जो अवाम है। क्या लोहियाजी जी अपनी भारतमाता में कहीं यह कहते हैं कि अवाम नहीं है?
मैंने प्रेमकुमार मणि की पोस्ट पर वरिष्ठ लेखक गोपेश्वर सिंह और वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश से सवाल किया कि लोहियाजी की भारतमाता और भाजपा की भारत माता में क्या कोई फर्क है? दोनों जवाब देने की जगह खामोश रहे। पोस्ट लगाने वाले प्रेमकुमार मणि ने अभी पिछले दिनों रामचंद्र शुक्ल को लेकर एक पोस्ट लिखी थी। उस पर रामविलास शर्मा की पुस्तक 'रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना' के हवाले से मैंने लिखा था कि चंद्रशेखर आजाद ,शुक्ल जी के घर आया-जाया करते थे और आजाद के लिए उनका संबोधन होता था-बेटे।
प्रेमकुमार मणि की पोस्ट से चिंता जाहिर होती है कि भाजपा और संघ बारी- बारी से सभी विभूतियों को अपने खेमे में शामिल करने पर तुले हैं। गाँधीजी, पटेल के बाद अब लोहियाजी पर नजर है। और लोहियाजी को प्रेमकुमार मणि संघ के खेमे में जाने से रोकेंगे! लेकिन लोहियाजी तो भाजपा के जन्म के पहले ही राष्ट्रवादी होकर भारतमाता की एक बाल की चिंता में डूबे थे, उन्हें प्रेमकुमार मणि कैसे रोकेंगे? यह तो जनता तय करेगी कि उसे लोहियाजी की भारत माता चाहिए कि नेहरूजी की। बीच में ऐसे लोग आते-जाते रहते हैं जिनकी अपनी चिंता अधिक होती है कि कैसे कुछ नाम हो, जीवन तमाम हो।
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प्रेमकुमार मणि की पूरी टिप्पणी फेसबुक की पोस्ट से साभार...
लोहिया की ' जान ' खतरे में
प्रेमकुमार मणि
अभी एक उड़ती खबर देखी कि ' राममनोहर लोहिया और दीनदयाल उपध्याय ' विषय पर कोई वेबिनार ( सेमिनार का ऑनलाइन रूप ) हो रहा है ;और कोई श्री चतुर्वेदी जी, जो आकाशवाणी में सलाहकार हैं ,उसके विशिष्ट वक्ता होंगे . चौंकने के बजाय मैं सोचने लगा . एक घटना का स्मरण भी हुआ . इसी वर्ष 29 फ़रवरी को जब मैं दिल्ली स्थित एक सरकारी अतिथिशाला में था ,तब मेरे एक पुराने मित्र और भाजपा के बुजुर्ग नेता मुझ से मिलने आये . वह लम्बे अरसे तक विधायक भी रह चुके हैं और आरएसएस से जुड़े हैं . वह भी उसी अतिथिशाला में निवास कर रहे थे . उन ने बतलाया वह अरुणाचल प्रदेश से लौट रहे हैं . तिब्बत की आज़ादी के सवाल पर किसी कार्यक्रम में भाग लेने गए हुए थे . अपने अनुभव बता रहे थे . लौटती में अनेक भाजपा और संघ के नेताओं से उनकी मुलाकात हुई ,इसकी भी संक्षेप में जानकारी दी . उनकी बातों से मैं जान सका कि आरएसएस तिब्बत की आज़ादी के सवाल को उठाना चाहता है और उसे बल देना चाहता है . लेकिन उस से बड़ी बात उन से यह जानने को मिली कि संघ आगामी 23 मार्च से एक हप्ते तक देश भर में लोहिया जी का जन्मदिन मनाने जा रहा है . उन्होंने बिहार में अपने बूते मनाये जा रहे आयोजनों की कुछ रुपरेखा भी बतलायी थी .
जाहिर है , उसके बाद कोरोना महामारी का आतंक ऐसा छाया कि ऐसे सभी आयोजन पार्श्व में चले गए . लेकिन मेरे मन में तभी यह बात गूँजी कि संघ लोहिया का इस्तेमाल क्यों कर रहा है ? अभी इस खबर को देख कर महसूस हुआ ,कोई गहरी चाल है .
राममनोहर लोहिया ( 1910 -1967 ) और दीनदयाल उपाध्याय ( 1916 - 1968 ) में कुछ समानताएं अवश्य थीं . दोनों राजनीतिक पार्टी से जुड़े राजनेता थे ;लेकिन दोनों के संबंध विचारों से अधिक थे . दोनों चिंतनप्रिय थे . सोचते थे , सोचना चाहते थे . लकीर के फ़क़ीर दोनों नहीं थे .
लेकिन दोनों के विचार दो ध्रुवों पर थे . एक सोशलिस्ट थे ,और दूसरे हिन्दू राष्ट्रवादी . एक का मानस सोशलिस्ट इंटरनेशनल से जुड़ा था ,तो दूसरे का नागपुरिया संघ से . लोहिया दुनिया के मानव समाज की बात करते थे . अमीर और गरीब , काले और गोरे , पश्चिम और पूरब , मर्द और औरत की विषमताओं को वह खत्म देखना चाहते थे . वह किसी भी तरह के वर्चस्ववाद के खिलाफ थे . वहीँ दीनदयाल जी अपने हिन्दू घेरे तक सीमित थे . हिन्दू घेरे में भी कई लोगों ने काम करने की कोशिश की है . ब्राह्मण और शूद्र या स्त्री -पुरुष की समानता के प्रयास अनेक लोगों ने किये . मेरी जानकारी में इस दिशा में भी दीनदयाल जी ने कुछ खास नहीं किया है .
दीनदयाल जी के जीवन संघर्ष के बारे में मैंने कुछ पढ़ा है . जब मैं हाई स्कूल में था , तब जाड़ों की एक सुबह मैंने सुना कि जनसंघ के अध्यक्ष दीनदयाल उपाध्याय की ट्रेन में हत्या हो गयी . यह 1968 का साल था .उन दिनों न ही जनसंघ और न ही दीनदयाल जी को मैं जानता था . नाम तक नहीं सुना था .इस घटना के बाद में उन के बारे में कुछ पढ़ा . उन के प्रति मेरी जो इज्जत बनी वह है और रहेगी . उनका जीवन संघर्ष मुझे भावुक करता है . वह मामूली सहायक स्टेशन मास्टर (रेल ) के बेटे थे . बचपन में ही माता -पिता गुजर गए . नाना ने पालने के लिए रखा ,लेकिन उनका दुर्भाग्य कि वह भी जल्दी ही गुजर गए . बावजूद इसके उन्होंने शानदार रिकॉर्ड ( गोल्ड मैडल ) के साथ परीक्षाएं पास की . भावुक ऐसे कि बहन की मौत से दुखी हो कर एमए की परीक्षा छोड़ दी . प्रोविंशियल सिविल सर्विस ( पीसीएस ) में चुने गए ,लेकिन नौकरी नहीं की . राजनीति में आये . अक्टूबर 1951 में जब जनसंघ स्थापित हुआ तब उसके महामंत्री बनाये गए . 1967 के कालीकट अधिवेशन में वह अपनी पार्टी के अध्यक्ष चुने गए ,लेकिन मात्र चौवालीस रोज बाद मुगलसराय रेलवे स्टेशन ,जो अब शायद उन्ही के नाम पर हो गया है , के खम्बा नंबर 1276 के नजदीक उनकी लाश मिली . उनकी हत्या एक राजनीतिक साजिश थी . और इस के बारे में बहुत लोग जानते हैं कि किसने और क्यों उनकी हत्या की या करवाई थी . संघ - जनसंघ की हिंसक राजनीति का यह अंदरूनी हाल था .
मेरे अनुसार (,जिसके गलत होने से मैं इंकार नहीं करता ) दीनदयाल जी पर बंगाल और नागपुर के हिंदुत्व का नहीं , बनारस के उस ज्ञान -केंद्रित हिंदुत्व का प्रभाव था ,जिसे मदनमोहन मालवीय ने विकसित किया था . इस पर अन्यत्र मैंने लिखा भी है . दीनदयाल जी के एकात्म -मानववाद में भी अनुशीलन समिति और नागपुर संघ का प्रभाव परिलक्षित नहीं होता , मालवीय जी का प्रभाव परिलक्षित होता है . एकात्म- मानववाद लाठी -पैने और सैन्यीकरण से नहीं , ज्ञान-शक्ति से ही उद्भूत हो सकता है . इसलिए अपने एक लेख 'हिंदुत्व के तीन रंग ' में मैंने दीनदयाल जी के महत्व को रेखांकित किया है . लेकिन मेरा यह भी कहना है कि वह जनसंघ और भाजपा के लिए महत्वपूर्ण चिंतक होंगे या हो सकते हैं ,किन्तु विचारकों के अखिल भारतीय व्योम में उनका कोई स्थान नहीं है , न होने लायक उनकी वैचारिक योग्यता है . हाँ , वह अटल बिहारी या मौजूदा मोदी की तरह गोल -दिमाग नहीं थे . संभव है ,वह कुछ वर्ष और जी जाते तो संघ के लोग उन्हें किनारे कर देते ,या वह स्वयं ही किनारे हो जाते . लेकिन इस किन्तु -परन्तु का आज कोई मतलब नहीं है .
मेरी चिंता लोहिया को लेकर है . लोहिया को संघ हजम क्यों करना चाहता है ? क्या वह संघ के लिए किसी काम के हैं ? या संघ के पास व्यक्तित्व और विचारों दारिद्र्य है और वह बाहर से इनका आयात करना चाहता है ? यह सही है कि लोहिया से कुछ गलतियां हुई थी . नेहरू विरोध में वह लगभग उन्मादी हो चुके थे . उनके जीवन काल में ही , ( संभवतः 1965 ) मशहूर लेखक और दिनमान के तत्कालीन सम्पादक अज्ञेय जी ने एक सम्पादकीय लेख में लोहिया के इस भाव की तीखी आलोचना की थी . यह सही है कि जनसंघ से लोहिया की नजदीकियां दीनदयाल जी के कार्यकाल में ही हुई थी ,क्योंकि वही चुनाव की घडी थी . लेकिन लोहिया चुनावी राजनीति तक ही सीमित नहीं थे . वह उर्वर दिमाग राजनेता थे ,जिन्होंने भारत की कुलीन और बहस -मुहाबसावादी समाजवादी राजनीति को सीधे आम आदमी और वंचित तबकों से जोड़ने की कोशिश की थी . जहाँ तक उनके नेहरू -विरोध की बात है ,तो इस प्रसंग में उनकी तुलना मैं हमेशा हिंदी कवि निराला से करता हूँ . निराला विलक्षण थे ,लेकिन उनमें रवीन्द्रनाथ टैगोर को लेकर एक 'भयंकर ' कुन्ठा थी . इस ने उन्हें विक्षिप्त कर दिया था . लोहिया को कुछ वैसी ही कुन्ठा नेहरू को लेकर थी . यह मनोवैज्ञानिक अध्ययन का विषय है कि निराला की रवीन्द्रनाथ और लोहिया की जवाहरलाल की कुन्ठा में उन दोनों के प्रति कितना उत्कट प्रेम था .
इसलिए लोहिया के मामूली विचलन या फिसलन को उन्हें संघ परिवार द्वारा अपने नजदीक होने की सूचना देना भ्रामक है . लोहिया का इस तरह इस्तेमाल वह शायद इसलिए करने की हिमाकत कर रहा है ,क्योंकि समाजवादी बिखर गए हैं और उन्होंने सोचना बंद कर दिया है . सत्ता और पद ही उनके लिए सब कुछ हो गया है . लोहिया के विशेष अवसर के सिद्धांत को समाजवादियों ने मंडलवाद की गठरी में बाँध कर रख दिया और जातिवाद का एक नया ककहरा विकसित किया . संघ ने इस गठरी को थाम लिया है . राजनीति में उस ने जातिवाद का पिछड़ावादी वायदा पूरा कर दिया . राष्ट्रपति दलित ,प्रधानमंत्री अतिपिछड़ा आदि . संघ और उस की द्विजवादी राजनीति ने अपना जातिवादी पाठ तैयार कर लिया है और संभवतः वह इसे ही लोहियावाद समझ रहा है . शायद इसी वैचारिक पृष्ठभूमि पर संघ लोहिया को इस्तेमाल करना चाहता है .
यह पोस्ट उन समाजवादियों के नाम करना चाहूंगा ,जो लोहिया को बिलकुल भूल नहीं गए हैं . मैं लोहियावादी नहीं हूँ ,लेकिन उन्हें संघ अपने कैंप में घसीट ले जाय ,इस पर चुप भी नहीं रहूँगा . वह हमारे सम्मानित वैचारिक पुरखे हैं और रहेंगे . मुझे आज भी थोड़ी उम्मीद है कि समाजवादी एक बार फिर जगेंगे . यह ठीक है कि वह जुए का दांव हार गए हैं . उनकी संख्या और ताकत भी कम है ,लेकिन अंततः न्याय का संघर्ष उन्हें ही करना है . महाभारत उनका इंतज़ार कर रहा है .
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