(वरिष्ठ पत्रकार-लेखक )
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हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता में बंगाल की गौरवशाली परंपरा रही है। बीसवीं शताब्दी से बात शुरू करें तो जस्टिस शारदा चरण मित्र ने कलकत्ता से 1907 में ‘देवनागर‘ नामक मासिक पत्रिका निकाली थी जो बीच में कुछ व्यवधान के बावजूद उनके जीवन पर्यन्त यानी 1917 तक निकलती रही। 1923 में कलकत्ता से साप्ताहिक ‘मतवाला’ पत्रिका निकली। संपादक के रूप में महादेव सेठ का नाम छपता था किंतु संपादक मंडल में निराला, शिवपूजन सहाय और मुंशी नवजादिक लाल भी थे। ‘मतवाला’ के प्रकाशन का एक मकसद निराला की कविताओं को प्रकाशित करना भी था। 1928 में रामानंद चट्टोपाध्याय ने हिंदी मासिक 'विशाल भारत' का प्रकाशन प्रारंभ किया। बनारसी दास चतुर्वेदी उसके संस्थापक संपादक थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी के संपादन में 1942 ‘विश्वभारती पत्रिका’ शांतिनिकेतन से निकली। द्विवेदी जी उसे 1947 तक निकालते रहे। मोहन सिंह सेंगर ने कलकत्ता से जुलाई 1948 में ‘नया समाज’ निकाला। ‘नया समाज’ दस वर्षों तक निकलता रहा। 1949 के जनवरी महीने में भारतीय ज्ञानपीठ ने कलकत्ता से मासिक ‘ज्ञानोदय’ पत्रिका निकाली थी। ‘ज्ञानोदय’ फरवरी 1970 तक निकलती रही। प्रभाकर क्ष्रोत्रिय के संपादन में ‘वागर्थ’ पत्रिका 1995 में निकली थी। उसी कड़ी में लेखक-पत्रकार निर्भय देवयांश के संपादन में निकल रही साहित्य की वैचारिक पत्रिका ‘लहक’ को देखा जाना चाहिए। निर्भय देवयांश सितंबर 2013 से ही ‘लहक’ निकाल रहे हैं। ‘लहक’ का पिछला अंक संस्मरण और कथा समीक्षा के भगीरथ कांतिकुमार जैन और मधुरेश पर केंद्रित है। दोनों साहित्यकारों के योगदान को समेटने की यथा चेष्टा की गई है। ‘लहक’ पत्रिका का इस वर्ष का मान बहादुर सिंह सम्मान इन्हीं दो साहित्यकारों को दिया गया है। ‘लहक’ पत्रिका 2017 से ही यह सम्मान देती आ रही है। कांतिकुमार जैन और मधुरेश के पहले नीलकांत, विष्णुचंद्र शर्मा, महेंद्र भटनागर, धनंजय वर्मा और मलय को यह सम्मान दिया गया था।
‘लहक’ के माध्यम से निर्भय ने कई बहसें चलाई हैं। वे ‘लहक’ का हर अंक विशेषांक की तरह निकालते हैं। ध्यान देनेयोग्य है कि ‘लहक’ के पीछे कोई संस्था नहीं है। व्यक्तिगत उपक्रम से पत्रिका कठिन ही नहीं, लगभग असंभव है। इस असंभव को निर्भय ने संभव बनाया, यह उनकी संघर्ष निष्ठा का सबूत है। निर्भय में यह विवेक भी है कि जिस हिंदी समाज के लिए वह पत्रिका निकाल रहे हैं, उसके हित के लिए जो कुछ करणीय है, किया जाय। भारतीय भाषा परिषद के कर्मचारियों के पक्ष का सवाल हो या महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कोलकाता केंद्र की स्थापना, निर्भय की बड़ी भूमिका रही। निर्भय ने हिंदी विश्वविद्यालय के कोलकाता केंद्र की स्थापना के लिए न जाने कितनी बार कांग्रेस विधायक दल के तत्कालीन नेता मानस भुंइया के साथ बैठकें कीं। मानस दा ने हिंदी विश्वविद्यालय के कोलकाता केंद्र की स्थापना के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री को पत्र लिखा। निर्भय ने सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय और तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी से भी बातचीत की। महाश्वेता देवी ने भी प्रणव दा से बात की थी। महाश्वेता देवी ने प्रणव दा को पत्र भी लिखा जिसे लेकर पार्षद संतोष पाठक दिल्ली गए थे। प्रणव दा ने हमें दिल्ली बुलाया। उनके दिल्ली आवास पर मेरी और तत्कालीन कुलपति श्री विभूति नारायण राय की बैठक हुई। उसके ठीक बाद केंद्रीय बजट में प्रणव दा ने हिंदी विश्वविद्यालय के इलाहाबाद और कोलकाता केंद्रों की स्थापना के लिए दस-दस करोड़ रुपए देने की घोषणा की। तब निर्भय देवयांश कोलकाता में दैनिक जागरण के स्टार रिपोर्टर थे। निर्भय के साथ प्रणव दा से लेकर ममता बनर्जी की आत्मीयता का मैं स्वयं साक्षी रहा हूं। निर्भय जब जागरण में थे, तो एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि आम आदमी के सवालों को लेकर एक संगठन बनाकर वे अभियान पर निकलना चाहते हैं। मैंने उनसे कहा कि पहले अपने परिवार को देखिए। निर्भय ने जो कुछ कहा था, बाद में वही सब अरविंद केजरीवाल ने अमल कर दिखाया। मुझे लगता है कि हिंदी रचनात्मकता के लिए निर्भय का जो संघर्ष है, वह बेहद तात्पर्यपूर्ण है। यही बात उनके सृजन के लिए भी सही है। निर्भय देवयांश की एक रचनाकार के रूप में अलग पहचान है। आज से नहीं, बहुत पहसे से। मुझे याद है कि 2003 में कोलकाता पुस्तक मेले में निर्भय देवयांश के प्रथम काव्य संग्रह ‘संगीन के साये में लोकतंत्र’ का लोकार्पण करते हुए नामवर सिंह ने कहा था-निर्भय देवयांश की कविताएं तलवार की धार के सामने सुई की नोक की तरह हैं। जहां सुई काम आ जाती है, वहां तलवार नहीं काम आती। मुझे निर्भय की कविताओं में मार्मिकता से भरपूर विषयों की विपुल विविधता आकृष्ट करती रही है। उनकी कविता आम आदमी के लिए ही सदैव चिंतित दिखाई पड़ती है। 'आम आदमी का संविधान' शीर्षक कविता में निर्भय देवयांश कहते हैं-
विकास से कोसों दूर
रहनेवाले लोगों को पता नहीं है
संविधान की किस धारा में
उसे जीवन जीने का मौलिक अधिकार मिला है...।
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