Friday, 5 June 2020

पैदाइश के तरीके बदलेंगे तभी धरती बचेगी-आसमां बचेगा, वर्ना वीरान और बंजर में मनुष्य की हड्डियाँ मिलेंगी!

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* निर्भय देवयांश 
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मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए जितने भी साधन थे, लगभग आजमा लिए गए हैं। विज्ञान द्वारा दिए साधनों में मनुष्य जरूरत से अधिक अराजक होता गया है। अराजक मनुष्य क्या यह स्वीकार करेगा कि ---हाँ, ऐसा ही हुआ है! नहीं स्वीकार करेगा यानी अभी अराजकता की पूर्ति नहीं हुई है। आखिर यह मनुष्य है और मनुष्य की अराजकतावादी सोच, जिसकी अंत तभी होती है जब दुनिया का अंत हो जाए। 
 पहाड़ पर अब पेड़-पौधे कम, ईंट-रोड़े के टुकड़े अधिक पाए जा रहे हैं। जंगलों में कुछ लोगों की सुविधा के लिए रैन बसेरा बनाए गए हैं। उसमें आराम की इतनी सुविधाएं है कि कल्पित स्वर्ग की सहज अनुभूति होती है। समुद्र में मछलियां कम, मशीनें अधिक तैरती नजर आती हैं। पाताल में पानी नहीं है। नीचे उतरता जा रहा है। सिंचाई के अभाव में आत्महत्या कर रहे किसानों की वेदना अप्रासंगिक हो गयी है। कितनी मौतों पर कोई कितनी बार  रोए आखिर! कब तक रोए आखिर! रोने की भी सीमा है, क्योंकि शरीर में मौजूद लगभग 70 प्रतिशत शरीर के भीतरी हिस्सों को गीला रखने में चला जाता है। 24 घन्टे की ड्यूटी है। अंगों को आराम करने के लिए समय निर्धारित है लेकिन मन-मस्तिष्क ने अपनी चाहत बढ़ा ली है। इन चाहतों की पूर्ति के लिए मनुष्य मरा-मरा फिर रहा है लेकिन चाहत तो चाहत है। एक पूर्ति हुई नहीं कि दूसरी, तीसरी, चौथी पैदा होती रहती है। चाहतों की आपूर्ति ने अपनी कोख से अपराध को जन्म दिया। अपराध के कई भाई-बहनें हैं। हर मनुष्य पैदा होते इन अपराधों की चपेट में होता है। कहीं इसका विकास ज्यादा, कहीं कम होता है। चाहत की बढ़ती आदतों में दुनिया छलनी छलनी होती गयी। प्रकृति के पास अपनी किस्मत पर रोने के अलावा उपाय भी क्या है?
 पर्यावरण के संसाधन के इस संकेत को वह मनुष्य भी नहीं समझ पाया कि उसका जन्म अनचाहा तो नहीं? माँ के पास दुलार का अभाव था, पिता के पास प्यार का। फिर वही माता-पिता बच्चे पर बच्चे पैदा करते गए? इन पैदा करने के कारोबार में पता ही कभी नहीं चल पाया कि कौन किस पर एहसान कर रहा है? यह तो तब संभव होता कि माँ दुलार से भरी होती, पिता का दिल प्यार में छलक रहा होता? मतलब कि माता- पिता को भी प्यार-दुलार का अभ्यास नहीं है! तो फिर बार-बार की पैदाइश? कहीं एक-दूसरे से दुश्मनी तो नहीं ली जा रही है और दुनिया यहाँ तक खींच कर चली आई! 
 पैदाइश की दुश्मनी इतनी बढ़ गयी है कि कोई भी पीछे रहने को तैयार नहीं है। सुनते हैं कि दुनिया में कुछ ऐसे देश हैं जो पहले प्यार-दुलार पैदा कर रहे हैं। फिर वे मनुष्य को पैदा करने के बारे में सोचते हैं। जहाँ प्यार-दुलार में कमी रही वहाँ पैदाइश की तरफ ध्यान ही नहीं गया। अपने जन्म के अपराध और प्रायश्चित के लिए भी समझ विकसित करनी पड़ती है। फिर उसके लिए समय कहाँ से लाएंगे? जब तय है कि जन्म के साथ मरण साथ पैदा होता है तो जिस प्रकृति और पर्यावरण को हम पैदा ही नहीं किए उन्हें नष्ट, विनष्ट करने का अधिकार भी किसी को कैसे मिल सकता है? और भी तो जीव-जंतु हैं, वे तो अपनी सीमाओं से बाहर हजारों साल में गए नहीं, फिर यह मनुष्य, अराजक मनुष्य के मजा को प्रकृति कब तक सहेगी?


वीरान और बंजर होती धरती पर 
मनुष्य के पैरों के बचे निशान होंगे
ठूंठ पेड़ जब आपस में बात करेंगे 
मनुष्य जाति ने हमारी हरियाली छीन ली
बंजर इस जमीन पर चलने के लिए बचा कौन
धरती के भीतर आग ही आग है
आसमां में अंगारे हैं जो बरसते हैं
चारों तरफ बिखरी मनुष्य की हड्डियाँ
जिससे सूअर स्वार्थ की गंध आ रही हैं

एक सूअर ने दूसरे से कहा
अच्छा हुआ सूअर रह गए
नहीं तो आज 
हमारी हड्डियाँ बिखरी होतीं 
इस वीरान दुनिया में....
     
           फकीर

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