* निर्भय देवयांश
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एक ही साथ कई प्रतिभाओं के धनी-गुणी भुवनेश्वर (1910-1957) के इस तर्क ---"विवेक और तर्क तीसरे श्रेणी के कलाकारों के चोर दरवाजे हैं", को मानना शायद बहुतों के लिए मुश्किल है। मेरे अपने लिए भी कम मुश्किल नहीं है। किसी भी चीज को परखने के लिए सर्वप्रथम यही दो तत्व सबसे पहले दौड़-दौड़ कर आते हैं। कम उम्र यानी आईए की डिग्री के बाद ही भुवनेश्वर अंग्रेजी साहित्य में दबदबा कायम कर चुके थे। हजारों किस्से हैं कि इलाहाबाद आते ही अपने करीबियों की महफ़िल में छा गये थे। प्रेमचंद की हंस पत्रिका में 1933-34 से ही छपने लगे थे। लेकिन भुवनेश्वर ने विवेक और तर्क को तीसरे श्रेणी के चोर दरवाजे आखिर क्यों कहा होगा? हिंदी के बौद्धिक जगत को इस पर विचार करना चाहिए था जो अफसोस कि नहीं हुआ और अंत में उनका निधन बहुत बुरी अवस्था में लखनऊ स्टेशन पर हो गया।
भुवनेश्वर की माँ का निधन कम उम्र में हुआ। अगर इसे भी आधार बनाकर चलेंगे तो भी इस बात से भी कौन इंकार कर सकता है कि वे खाते-पीते परिवार के थे। बौद्धिक जगत में ऐसा देखा गया है कि माँ की कमी को बेहतर आर्थिक माहौल सुख-सुविधा के आधार पर सोच की खुशनुमा दुनिया में ले जाने में सफल रहा है। देश- दुनिया में ऐसे सैकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं कि मां-बाप के बिना भी प्रतिभाएं निखरती हैं। आखिर सफरिंग से ही तो रचनात्मकता की राह खुलती है। जिस समय भुवनेश्वर हंस में छप रहे थे, तब संभव है कि कितने लोग छपने के लिए लालायित रहते होंगे? और प्रतिभा के पारखी प्रेमचंद तक उनकी पहुँच नहीं बन पाती होगी। अज्ञेय भी सीधे कहाँ पहुंचे थे? बांस-बल्ली और सीढ़ी जैनेंद्र बने थे!
एक विचारणीय सवाल है और वह यह कि अंग्रेजी साहित्य की जो तीव्र ऊर्जा होती है, क्या उसे हिंदी की लेखक बिरादरी उस आंच को पचाने की अवस्था में होती है? भगवतीचरण वर्मा, रामचंद्र शुक्ल, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, उदय प्रकाश सरीखे मस्तिष्क के लिए कमोबेश यह संभव है लेकिन भुवनेश्वर, राजकमल चौधरी आदि जैसे मस्तिष्क के लिए यह अंग्रेजी ऊर्जा तनाव पैदा करती है, कर सकती है, करती रही है। मैं खुद इसका भुक्तभोगी रहा हूँ और विदेशी किताबों को पढ़कर जरूरत से अधिक तनावग्रस्त रहा हूँ। उदाहरण के लिए, जिससे भुवनेश्वर खूब प्रभावित रहे हैं-जार्ज बर्नाड शॉ का यह कथन-"मैं मूर्ख हूँ या कुछ लोगों की तुलना में अधिक बुद्धिमान, यह तय है कि यह दुनिया मेरी नहीं है और मैं स्वर्गस्थ लोगों की संगत में ही सुख पाया है!" इस कथन से वर्षों तक मैं खुद डिस्टर्ब रहा तो भुवनेश्वर तो एकदम से शॉ, लॉरेंस, इब्सन आदि में डूबे हुए थे। ऊपर से फ्रायडीयन का जलवा था। बौद्धिक पूर्ति के साथ-साथ कुछ और सुख की भूख भी तो पीछा नहीं छोड़ रही होगी? जिसकी पूर्ति कभी आसानी से संभव नहीं रही है समाज में। खासकर अपनी इच्छा और मन-मुताबिक। निराला से लेकर उग्र तक इसके शिकार रहे हैं!
भुवनेश्वर की रचनाओं में जो मुख्य हैं- आजादी:एक पत्र, एक रात, जीवन की झलक, भेड़िये, मां-बेटे, मास्टरनी, डाकमुंशी, मौसी, लड़ाई, सूर्यपूजा, भविष्य के गर्भ में, हाय रे, मानव हृदय!। नाटकों में-श्यामा: एक वैवाहिक विडम्बना, पतित, प्रतिभा का विवाह, एकाकी के भाव, एक साम्यहीन साम्यवादी, तांबे के कीड़े, इतिहास के केंचुल, रौशनी और आग, फोटोग्राफर के सामने, मृत्यु, सवा आठ बजे, लॉटरी, कारवां संग्रह और न जाने कितने? कविताओं में नदी के दोनों पाट, बौछार पे बौछार, कहीं कभी, यदि ऐसा हो तो, आंखों की धुंध में आदि। ऊसर एक एकांकी है, जो निश्चय ही शॉ से प्रभावित है। इसमें पाश्चात्य सभ्यता से आक्रांत आडम्बरपूर्ण उच्च मध्यवर्ग के खोखले जीवन का चित्रण है जो अहंकार ग्रस्त और हृदयहीन है।
प्रेमचंद को अगर भुवनेश्वर में इतनी अद्भुत प्रतिभा नहीं दिखती तो क्या वे बनारसीदास चतुर्वेदी को 24 अगस्त 1933 को हिंदी साहित्य को लेकर लिखे पत्र में भुवनेश्वर को याद करते हुए यह कहते---"नाटक में सबसे नया आदमी इस लाइन में भुवनेश्वर है, जिसने हाल ही में अपने छोटे छोटे एकांकियों का संग्रह 'कारवाँ' के नाम से छपाया है। मेरे देखने में भुवनेश्वर सबसे अधिक प्रतिभा संपन्न है, अगर वह प्रतिभा को आलस्य, बेसिर पैर के सपने, सिगरेट पीने और इश्कबाजी में बर्बाद न कर दे। उसमें अभिव्यक्ति की अद्भुत शक्ति है, ऑस्कर वाइल्ड और शॉ का रंग लिए हुए।
सोचिए, सोचिएगा-प्रेमचंद इतना सब कुछ और किसके बारे में कहे होंगे? कहे हैं? इतनी चिंता कोई अपने किसी करीब के लिए ही तो करता है, करता होगा।
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