Tuesday, 23 June 2020

बॉलीवुड है या बेहया का जंगल!

   * निर्भय देवयांश
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जिस्म और जान के बीच मांस के दरिया में बसता है अनंत मजा।
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गरीबों के पास पेट है, अमीरों के पास अक्ल और शक्ल।
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आलोक नंदन बालाजी में भी कुछ माह रहे लेकिन एकता कपूर के  वर्चस्व को झेलने के पहले निकल गये।
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मुझसे पहले दिन (1989) पूछा गया कि तुम्हारे पास ऐसा क्या था कि तुम मुंबई बॉलीवुड में किस्मत आजमाने आए? तुम कहीं और क्यों नहीं गये? यह सब पूछताछ जुहू चौपाटी के यूनिटी कम्पाउंड के स्ट्रेला आंटी के घर पर हो रहा था। जहाँ प्रतिमाह 4000 रुपये के हिसाब से अपने लिए पेइंग गेस्ट के तौर पर एक बेड बुक किया था।
  देर शाम होते होते दारू की बोतल, अर्द्धनग्न लड़कियों की आवाजाही शुरू हो गयी थी। मुझसे पूछा गया कि दोनों में तुम्हें जो चाहिए उसके लिए दो तरह की राशि देनी होगी। एक रूम में जहाँ आठ दस लोग एक ही मिजाज के हों और एक पूरी तरह से अलग पृष्ठभूमि का तो माहौल का थोड़ा असहज होना स्वाभाविक है। चखने में चिकेन लेकिन पॉप यानी सफेद सूअर का मांस। ये तीनों सामग्री मेरे चित्त के खिलाफ थी। सीधे इनकार किया कि मेरी रुचि इन तीनों में से किसी में नहीं है। अधिकांश ने कहा-फिर तुम दो चार घन्टे चौपाटी पर घूम आओ, तब तक हमलोग मौज मस्ती करते हैं। मुझे प्रस्ताव अच्छा लगा। मैं निकल गया। घण्टों चौपाटी पर किलो दो किलोमीटर घूमता रहा। तरह तरह के  व्यंजन लोगों को खाते पीते देखता रहा। कभी सिटीजन होटल की पिछवाड़े की सीढ़ियों पर बैठ जाता। हालांकि वहाँ भी युगल प्रेमी जोड़ी गलबहियां में दुनिया को भूली बैठी थी। मैं लहरों को ही देखता, अपनी किस्मत को कोसता, कभी आसमान तो कभी शोरगुल को।
मैं जब लौटा अपने अड्डे पर तो मजमा लगा हुआ ही था। गुवाहाटी वाले मित्र आलोक माली Alok Mali और Subal Dutta ने कहा बैठ यार। कुछ देख , देखते हुए मजा ले। दूसरे मित्र बहुत अश्लील हो गये थे। पागलपन भरे इस माहौल को सहना या झेलना असह लग रहा था। आलोक ने कहा कि यह इस शहर का असली चेहरा है। तुम्हें खुद को इसमें ढालना होगा। मैं चुप सबकुछ सुन रहा था। बोलने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था।

दूसरे तीसरे दिन सड़कों के किनारे खड़ी वेश्याओं द्वारा इशारे से बुलाना और मना करने पर दो चार गाली खाना। यह प्रायः लोगों के साथ देखा और सुना गया। मैंने आलोक माली से कहा कि लगता है यहाँ सेक्स और शराब दिनचर्या है। 24 घन्टे आदमी जिनके लिए उपलब्ध है मौज मस्ती में रह सकता है।

स्ट्रेला आंटी के पड़ोसी बड़े- बड़े नाम वाले थे। इना-मीना-डिका, नाय-नामा-निका, और मेरा नाम छुन छुन, रात चाँदनी मैं और तू, हैलो मिस्टर हाउ ड्डू यू ड्डू गाने लिखने वाले गीतकार कमर जलालावादी और सरदार मल्लिक, मशहूर संगीतकार यानी अभी के जाने माने संगीतकार अन्नू मल्लिक के पिता जी। बताते चलें कि स्ट्रेला आंटी भी आई थी तो अभिनेत्री बनने लेकिन बन गयी कॉल गर्ल। मैं जब गया था तब उनकी उम्र 70 के आसपास रही होगी। उनके दो जीवन साथी थे। उनका बेटा सुकेश ने भी धंधेवाली पूजा से शादी की थी और उसकी छोटी बहन रिया हम मित्रों की रूम पार्टनर थी। रिया का रात भर जो ड्रामा चलत था, वह भी क्या बताने की चीज है! इन सब पर बारी-बारी से लिखूंगा। अभी तो महफ़िल में लोग आने शुरू हुए हैं।

... तो आलोक नंदन जब मनोज तिवारी के साथ 'ए भौजी के सिस्टर' साथ सेट पर खुद को एडजस्ट नहीं कर सके तो उनके सामने संकट पैदा हुआ कि अब क्या किया जाए। मैं 1989 में गया था। अमरनाथ लगभग 2000 में और आलोक उसके बाद। सभी के जाने में फासला लगभग एक दशक का था। आलोक नंदन निर्माता निर्देशक रंगीला फेम रामगोपाल वर्मा से जुड़े रवि प्रकाश और फिर एकता कपूर के बालाजी से जुड़े। मुझे इन दोनों के लिए मुंबई में शिफ्टिंग की जगह बनाने में इसलिए थोड़ी सुविधा हुई कि लगातार मेरे संपर्क बने हुए थे। लेकिन संघर्ष और धक्के तो इन्हें ही खाने थे। तब तक मैं पत्रकारिता का कोर्स कर पटना, फिर कोलकाता में प्रभात खबर 2002, फिर 2004 से 2011 तक दैनिक जागरण में काम कर रहा था। फिर प्रभात वार्ता और तुरंत बाद लहक की शुरुआत। जो यात्रा जारी है।

आलोक नंदन मुझसे अधिक खुले व्यक्तित्व के हैं। अमरनाथ तो आलोक से भी अधिक। जैसे सुबल और आलोक माली। आलोक रवि प्रकाश के माध्यम से रामगोपाल वर्मा के वर्किंग स्टाइल को बखूबी समझने लगे थे। बहुत भीतर तक जाकर। लेकिन दिक्कत होती है कि आप भीतर जाएंगे कैसे? ऑफिस के मुख्य दरवाजे से साहब के चैंबर तक इतने चमचे होते हैं कि आप किनसे- किनसे टकराएंगे? किनके-किनके सवालों के जवाब देंगे कि साहब से क्या काम है? काम की तलाश तो जिस शहर में लाखों की तादाद  में लोग प्रतिभाओं को जेब में लेकर घूम रहे हैं। वहाँ आपमें ऐसी क्या खासियत है कि कोई अलग चमक-दमक चेहरे देखकर पता चल सके?

आलोक कुछ महीने तक रवि प्रकाश के साथ एजेंसी में काम करने के बाद एकता कपूर की कम्पनी बालाजी में आए। दो तीन माह में एकता कपूर के खूंखार पुरुष रूप यानी वर्चस्ववादी महिला का रूप देख कर सोच में पड़ गये। भूतहा कहानी के अनुसंधान के लिए गये थे। कभी - कभी सलाह देने की जुर्रत करते तो कहा जाता-बस अपने काम से मतलब रखिए। Alok Nandan बेहतर ढंग से बता पाएंगे कि दरअसल इस ईगो में कितनी जिंदगियां पिसती हैं और जो बचती हैं फिर वे किसी काम की रहती हैं कि नहीं। आख़िर क्या कारण रहा होगा कि Amarnath Prasad को सिर्फ ब्लैक फ्राइडे में छोटी भूमिका मिली। दो तीन फिल्मों में भी छोटी भूमिका मिली लेकिन एडिटिंग में सब कट कर दिया गया? बॉलीवुड की इस बेहयाई पर क्या कहेंगे? जहाँ सेक्स और शराब नाश्ता और भोजन है, वहाँ उन लोगों के लिए जिनकी पैदाइश जानबूझकर गरीबी, निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुई है, उन्हें सपने भी अपनी औकात के हिसाब से देखना होगा। नहीं तो सुशांत सिंह राजपूत बॉलीवुड का आखिरी शिकार है, यह कोई भी कहने की अवस्था में है क्या। जिया खान को ही तो हमलोग अंतिम हादसा मानकर चल रहे थे?  नहीं! नहीं! नहीं! कोई नहीं बता कि अगला निशाना कौन है?

सुशांत सिंह राजपूत के लिए एकता कपूर मैडम थी। बेचारा खुलकर मैडम की तारीफ करता था लेकिन मैडम वाकई मैडम हो पाई? अब तो यह मैडम वेब सीरीज की ट्रिपल एक्स सेक्स तक पहुंच गई है। सेना भी उसकी चपेट में आ गई है। देश की वर्दी पर भी जब उस मैडम को दाग लगाने में हिचकी नहीं आई तो सुशांत सिंह राजपूत या आलोक नंदन की परवाह भला उसे क्योंकर हो। उसके पास डेली शॉप है। उसे कुछ बेचना है। फिर नैतिकता बॉलीवुड में रहकर अपनी हत्या करवाएगी! जब आदमी, स्टार, सुपरस्टार खुद को दारू में और फाँसी पर लटक कर जान दे रहे हैं, वहाँ का आदर्श सिर्फ और सिर्फ बेहयाई है। बेहयाई वाला बॉलीवुड। जो भी गंदगी दिखाता है, देखते ही हैं न लोग बाग! देखिए और उत्तर आधुनिकता की कला यानी बे-लिबास होती नंगी कला को उत्कर्ष मान लीजिए। आप सबका भला होगा। उनका तो भला हो ही रहा है आपके पैसे से।

***कृष्णा मिश्रा को भी जब बॉलीवुड में मन नहीं लगा तो घूमने चंबल पहुंच गये। सीमा परिहार, चंबल की मशहूर डाकू ने कहा - हीरोइन बना दो। बना दी गई। लेकिन बॉलीवुड ने उसके साथ जो सलूक किया , अरे जैसे वह करता हैं। मैं और कृष्णा जी वूनडेड के लिए कोलकाता में वितरक से मिल रहे थे। फ़िल्म रिलीज के लिए हाल ढूंढ रहे थे। अगली पोस्ट का लोकेशन है-चंबल। 

2 comments:

  1. बॉलीवुड का काला सच आपने दिखा दिया। इतनी चमक दमक के पीछे न जाने कितने सपने का कत्ल है। पीड़ा है, घुटन है, आँसू है और अवसाद है। अत्यंत मार्मिक।

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  2. बहुत खराब अवस्था है। 20 लाख स्ट्रगलर हैं और अधिकांश मानसिक हो चुके हैं। जिस समय मैं था 1989 से 1996 तक उस समय 5 से 7 लाख स्ट्रगलर थे। सभी आईने के सामने खुद को निहारते रहते थे। यह दृश्य देखकर भयावह लगता है।

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