Thursday, 4 June 2020

अमेरिका::: जार्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद प्रदर्शन के दौरान मार्टिन लूथर किंग जूनियर की प्रतिमा का सम्मान, गाँधी का अपमान! यह कैसा विधान ?









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* निर्भय देवयांश 
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चीखने-चिल्लाने से न किसी देश में कितना मजबूत लोकतंत्र है,  यह साबित होता और न यह कि वाकई कोई एक देश ही लोकतंत्र का खेवनहार है ? ऐसा है क्या अमेरिका या इंगलिस्तान! जब एक श्वेत अधिकारी द्वारा अश्वेत जार्ज फ्लॉयड की अमानवीय हत्या कर दी जाती है, बीस डॉलर की नकली करेंसी को चलाने के आरोप में। ... तो उसके न्याय की मांग के लिए पूरे अमेरिका और आंशिक दुनिया में हो रहे उग्र प्रदर्शन से वाशिंगटन डीसी में भारतीय दूतावास के सामने अवस्थित गाँधी जी की प्रतिमा को तोड़कर अपमान करने के अवैधानिक काम को कैसे न्यायसंगत ठहराया जाएगा ? जब गाँधी का अपमान कर न्याय मिल गया तो मार्टिन लूथर किंग जूनियर की प्रतिमा के सामने एकजुटता का प्रदर्शन कहीं ढकोसला तो नहीं है अमेरिकियो! मार्टिन के लिए सम्मान और गाँधी की प्रतिमा के अपमान को लेकर आपस में मिलजुल कर कुछ तो तर्क संग्रह किये ही होगे, तो वे सारे तर्क भी दुनिया को दिखाओ। 
 आखिर क्या कारण रहा होगा कि गाँधी जी की प्रतिमा ही निशाने पर रही होगी? अमेरिका में प्रतिमाओं की कमी भी तो नहीं है! अगर मन- मस्तिष्क में बदला लेने की भावना लहरा रही है तो फिर यह विवेक कहाँ से 'करने में- सोचने में' तैनात है कि एक के लिए अपमान और दूसरे के लिए सम्मान? लगभग 250 साल के लोकतंत्र के मजे में रह रहे अमेरिकनों को कभी ढंग से यह पड़ताल करने की जरूरत क्यों महसूस नहीं हुई कि श्वेत-अश्वेत की खाई इतनी चौड़ी क्यों होती गयी है ? दुनिया को अपनी ताकत से रौंदने से बेहतर यह होता कि कभी अपने घर को करीब से देखो। देखा करो। बर्तनों की आपसी टकराहट नहीं है श्वेत-अश्वेत की लड़ाई? बल्कि व्यापक मसला है। 
 मानवीय विधान में इतनी असंगतियों के रहते वर्चस्व कभी न कभी जवाब दे ही जाता है। दे ही जाएगा। वर्चस्व का यही चरित्र होता है। अभी तो अमेरिकनों-- प्रतिमाओं के सम्मान-असम्मान को लेकर जारी भेदभाव को श्वेत-अश्वेत की समस्या समझ कर दूर करना होगा। 

1 comment:

  1. It's very sad to see the breaking of Mahatma Gandhi's statue .If peole in America support Martin Luther Junior then they must also show respect and courtsey to Gandhi because he was also an ardent supporter of non-voilence.

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