Monday, 22 June 2020

* मुझसे ज्यादा कोई भी 'उपन्यास सम्राट' की उपाधि से घृणा न करता होगा ::: प्रेमचंद *

* निर्भय देवयांश 
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प्रेमचंद को कब नहीं गाली पड़ी है। दुनिया में जितनी अच्छी चीजें होती हैं, उन्हें गाली पड़ती हैं। न पड़े तो समझना चाहिए इनकी कोई हस्ती ही नहीं हैं ! 
 राजेंद्र यादव की इतनी बौद्धिक औकात होती तो शायद हंस नाम से अलग कोई पत्रिका निकालते ? हिम्मत नहीं दिखाई इसलिए कि उन्हें पता था कि यहाँ दाल न गलेगी। भीड़ न जुटेगी। कहीं के नहीं रह जाएंगे तो वैशाखी का सहारा कुछ ऐसा चाहिए कि खुद न सही लेकिन प्रतिबद्धता दिखती रहनी चाहिए। राजेंद्र यादव के लिए प्रेमचंद मोहरे बन गये। एकमात्र यह नाम है जो मुझे जीवन नैया पार करा सकेगा! और लगभग 27-28 साल तक राजेंद्र यादव एक-दूसरे के पर्याय बन कर रहे। दलित विमर्श प्रेमचंद के हंस में भी कम नहीं था और स्त्री विमर्श भी कम नहीं ? फिर इन विमर्शों के नाम पर आखिर कैसा विमर्श चला? 
 
 कांटे की बात 4- आगे रास्ता बंद में राजेंद्र यादव पत्रिका चलाने की असमर्थता बार - बार व्यक्त करते हैं। तो क्या प्रेमचंद नहीं करते हैं? करते हैं। खूब करते हैं। 

प्रेमचंद ने 1930 में, 'हंस' शुरू किया और 1932 में 'जागरण'। इससे पहले वह सरस्वती प्रेस स्थापित कर चुके थे। हंस के साथ-साथ किताबों का प्रकाशन होता था। अतः किताबों की बिक्री से हंस का खाली पेट भरता रहता था। लेकिन जागरण तो अकेले जान था। उसे दंगल में अपने जौहर दिखाने थे। पैदा होने के एक बरस बाद ही वह लड़खड़ाने लगे। 16 अगस्त 1933 को जैनेंद्र को लिखा-" मैं जागरण पर करीब तीन हजार का घाटा उठा चुका हूं। इसी पत्र में जैनेन्द्र की मिन्नत सी करते हुए कहते हैं कि किस भी तरह बिरला से जागरण के लिए विज्ञापन जुटाइए। तुम मि. बिरला से मिलो और उनको हम लोगों के काम के महत्व को समझाओ और बतलाओ कि हम कैसी - कैसी परेशानियां उठाते हैं। वह एक बड़े विज्ञापनदाता हैं। "
      इसी पत्र में आगे संघर्ष के प्रति अपनी भीष्म निष्ठा व्यक्त करते हैं: "भाई! यह संसार रामभरोसे बैठने वालों के लिए नहीं है। यहां तो अंत समय तक खटना और लड़ना है। उनसे कुछ मदद पा सकते हो। यहाँ झेंपु बौर मेरे जैसे शर्मीले आदमियों का गुजारा नहीं। उनके लिए तो कोई स्थान ही नहीं। तुम अपने में यह ऐब न आने दो। है भी नहीं। मैं तो दो कौड़ी दाम का नहीं हूं। "

आश्चर्य देखिए कि कांटे की बात -4, आगे रास्ता बंद है 'प्रभा खेतान को जन्म दिन पर समर्पित है। जबकि प्रेमचंद को बिरला जी के यहाँ से विज्ञापन का कोई आश्वासन नहीं मिला। हंस के असली मालिक संपादक अपने को दो कौड़ी के दाम का आदमी कहते हैं। हंस को हायर करने वाले संपादक महफिलों से घिरे रहते हैं। किताबें प्रभा खेतान को समर्पित की जा रही हैं। और कितने तमाशा मशहूर हैं। स्वस्थ व्यक्ति के न जाने कितने बीमार विचार हैं। 

  प्रेमचंद जो विज्ञापन के लिए तरस रहे थे। गुहार लगा रहे थे। लेकिन उनके साहित्य को कूड़ा कहने वाले संपादक को विज्ञापन के लाले नहीं हैं। विभिन्न राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों के विज्ञापन मिल रहे हैं। खूब मिल रहे हैं। ऐसे में विज्ञापन के लिए रिरियाने वाले प्रेमचंद हंस के लिए धन जुटाते कि कोई अमर कृति लिखते? सो, कूड़ा लिखते रहे। जिन्हें सुविधा मिली, विज्ञापन मिले , उन्हें 'सारा आकाश' ही मिल गया!

   प्रेमचंद ने माणिकलाल जोशी को लिखे पत्र में कहा- " मि.किशन सिंह की कदाचित यह धारणा है कि मैंने ही स्वयं 'उपन्यास सम्राट' की उपाधि हथिया ली है। मुझसे ज्यादा कोई भी इस उपाधि से घृणा न करता होगा और मैंने कभी किसी को प्रेरित नहीं किया कि वह मुझको इस नाम से पुकारे और मैं खुद नहीं जानता कैसे यह उपाधि मेरे नाम के साथ जुड़ गयी और क्यों इसे बार-बार इतना दुहराया जाता है।

 प्रेमचंद ने विनम्रता से कहा-" मि.किशन सिंह की राय बिल्कुल सही हो सकती है कि मेरी ज्यादातर कहानियां बहुत पिटी पिटायी हैं और उनमें कोई सौंदर्य नहीं। मैं विनयपूर्वक इतना ही कह सकता हूँ कि मैंने वही किया है, जो कि अपनी प्रतिभा को देखते हुए अच्छे से अच्छा कर सकता था और इससे बड़ी चीज के लिए मेरा दावा नहीं है।"

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3 comments:

  1. प्रभा खेतान यदि जीवित होतीं तो पूरा हंस उन्हें मिल जाता आखिर वे उनकी ही प्रोडक्ट थीं। मैत्रेयी पुष्पा तो जगजाहिर हैं ही।

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  2. जी आप सही कह रहे हैं। फिर कोई दूसरा संपादक नहीं होता, प्रभा खेतान को छोड़कर।

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