Friday, 31 July 2020

वल्गैरिटी को मुंबई फिल्म उद्योग वाले एंटरटेनमेंट वैल्यू कहते हैं---बरहना (नग्न), नीम बरहना तस्वीरें, क़त्ल-ओ-खून और जब्र की वारदातें, मारपीट, गुस्सा और गजब नफसानियत (वासना) ही इस इंड्रस्टी के औजार हैं और इसी से वह इंसानियत का खून कर रही है:::प्रेमचंद


* निर्भय देवयांश 
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प्रेमचंद हिंदी फिल्म उद्योग (मुंबई) यानी बॉलीवुड की नंगई वर्ष 1934 में बता रहे हैं। जो दृश्य दिखा रहे हैं वे सारे भयानक और भयंकर हैं। क्या है उस फिल्म इंडस्ट्री में-नग्नता, वासना, हत्या, मारपीट, पैसा और पतनशीलता। यह इंडस्ट्री काम क्या कर रही है-इंसानियत का खून। इंड्रस्टी एक्सप्लाइट करना जानती है और यहाँ इंसान के मुक़्क़द्दस्तरीन(पवित्रतम) जज़्बात को एक्सप्लाइट कर रही है। 
  
वर्ष 1934 और 2020 के बीच 86 वर्ष गुजर गए। कुछ दशक पहले ही यानी लगभग दो दशक दादा साहेब फाल्के ने इस फिल्म उद्योग की स्थापना किसी उद्देश्य से की होगी-प्रेमचंद के भोगे यथार्थ के आधार पर धज्जियाँ उड़ जाती हैं। ...तो क्या नंगई और वासना ही इसके मूल में हैं ? लेकिन एक्सप्लाइटेशन इंसानों का क्यों? हम जिन्हें इंसान कह रहे हैं वे आमजन और भोली- भाली जनता है जो मन के उकता जाने पर चकाचौंध के वशीभूत होकर गाढ़ी मेहनत की कमाई को दूसरों की नग्नता और वासना को देखने पर बर्बाद कर देती है। एक तरफ कुछ घन्टे में आमजन समय से लेकर पैसे तक गंवा देते हैं तो दूसरी तरफ ये तमाशाई जो पवित्रतम की हत्या करते हैं वे इन हथियारों के जरिए मोटी कमाई कर लेते हैं। करोड़ों के बंगले में रहते हैं। नाम भी करीने से रखते हैं बंगले का-आशीर्वाद, प्रतीक्षा, मन्नत, जलसा, जनक, वाटिका, वसुधा आदि आदि। 

प्रेमचंद मुंबई बुलावे पर गए थे। 'सेवासदन' पर फिल्म बनाने का अजंता सिनेटोन, बम्बई से मुआबिदा हुआ। प्रेमचंद के लिए यह एक खुशखबरी थी। 14 फरवरी, 1934 को जैनेन्द्र कुमार को लिखे पत्र में कहते हैं- पहली जून 1934 को बम्बई पहुँचे। फिल्म बनकर तैयार हो गयी। प्रेमचंद इस जिंदगी से उकता जाते हैं। 2 जनवरी 1935 को जैनेन्द्र को लिखा-" भाई, मैं तो इस जिंदगी से उकता गया हूँ। यहाँ डाइरेक्टरों की ज़ेहनिय ही अनोखी है। अपने सिवा किसी की सुनते नहीं। 'बाजारे-हुस्न' की मिट्टी पलीद कर दी। 

निराश प्रेमचंद उकताकर, कुढ़कर, कुछ न कर पाने में स्वयं को असमर्थ पाकर, फिल्मी दुनिया के रंग-ढंग से ऊबकर नये अनुभव प्राप्त करके दस महीने बाद आखिरकार बनारस लौट आये। प्रेमचंद को पहला अनुभव यह हुआ कि सिनेमा एक उद्योग है। *साहित्य, संस्कृति, कला और नैतिकता से इसका कोई लेना-देना नहीं है*। सिर्फ मुनाफा कमाने की धुन में सभी मशगूल हैं। पैसा-पैसा और सिर्फ पैसा चाहिए। वहाँ के हर आदमी को पैसे कमाने के ओछे और नीच हथकण्डे अपनाए जाने में किसी को कोई शर्म मालूम नहीं होती। 

1 अक्टूबर 1934 को बनारसीदास चतुर्वेदी को लिखे पत्र में प्रेमचंद कहते हैं-" सब रुपये कमाने की धुन में हैं। फिल्में कितनी भी गंदी और भ्रष्ट हों। सब इस काम को सोलहों आना व्यवसाय की दृष्टि से देखते हैं, और जनरुचि को पीछे छोड़ते हैं। *किसी का कोई आदर्श, कोई सिद्धांत नहीं*। शिक्षित रुचि की कोई परवाह नहीं करता। *वही औरतों को उठाया जाना, बलात्कार, हत्या, नकली और हास्यजनक लड़ाइयां सभी फिल्मों में आ जाती हैं*। जो लोग बड़े सफल समझे जाते हैं, वे भी इसके सिवा और कुछ नहीं करते कि अंग्रेजी फिल्मों के सीन नकल कर लें और अंट-शंट कथा गढ़कर उन सभी सीनों को उसमें खींच लाएं।"

निगम जी को 13 नवम्बर, 1934 को लिखे पत्र में प्रेमचंद कहते हैं-" मगर जिस हाथों में फिल्म की किस्मत है। वह बदकिस्मती से इसे इंडस्ट्री समझ बैठे हैं। इंड्रस्टी को रुचि और इस्लाह से क्या निस्बत? वह एक्सप्लाइट करना जानती है और यहाँ इंसान के मुक़्क़द्दसतरीन (पवित्रतम) जज़्बात को एक्सप्लाइट कर रही है। बरहना (नग्न) और नीम बरहना तस्वीरें, कत्ल-ओ-खून और जब्र की वारदातें, मारपीट, गुस्सा, और गज़ब और नफसानियत(वासना) ही इस इंड्रस्टी के औजार हैं और इसी से वह इंसानियत का खून कर रही है। 

जिस बम्बई की नंगई दस माह में देखकर प्रेमचंद बनारस लौट गए, उस नंगई को सुशांत सिहं राजपूत क्यों नहीं लगभग 15 साल में देख पाया? परवीन बॉबी हो या फिर जिया खान और दिव्या भारती? मैं खुद आत्महत्या के पूर्व नंगई देखकर ही मुंबई छोड़कर वापस पटना लौट गया था। मेरे दिमाग में प्रेमचंद चिल्ला रहे थे-भागो नंगों के बीच से यदि तुम्हें नंगई पसंद नहीं है।

  प्रेमचंद 28 नवंबर 1934 को जैनेन्द्र को लिखे पत्र में कहते हैं-" वल्गैरिटी को यह लोग एंटरटेनमेंट वैल्यू कहते हैं। अद्भुत ही में  इनका विश्वास है। राजा-रानी, उनके मंत्रियों के षड्यंत्र, नकली लड़ाई, बोसेबाजी, यही इनके मुख्य साधन हैं। मैंने सामाजिक कहानियाँ लिखी हैं, जिन्हें शिक्षित समाज भी देखना चाहे लेकिन फ़िल्म करते इन लोगों को संदेह होता है कि चले या न चले। "

दरअसल प्रेमचंद पतनशील संस्कृति से तंग आकर बनारस लौटे थे। देखिए, इंद्रनाथ मदान को 26 दिसंबर 1934 को लिखे पत्र में लिखते हैं---" सिनेमा में साहित्यिक व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं है। मैं इस लाइन में यह सोचकर आया था कि इसमें आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सकने का कुछ मौका था लेकिन अब मैं देखता हूँ कि धोखे में था और मैं  वापस साहित्य को लौटा जा रहा हूँ। सच तो यह है कि मैंने लिखना कभी बंद नहीं किया, उसको मैं अपने जीवन का लक्ष्य समझता हूं। सिनेमा मेरे लिए वैसी ही चीज है, जैसी कि वकालत होती, अंतर इतना है कि यह अधिक स्वस्थ होती है।" 

कला के नाम पर और उसे मूल्य बताकर जो कुछ भी बॉलीवुड कर रहा है। अपने इन पत्रों में और वह भी 86 वर्ष पूर्व जिस तरह प्रेमचंद खोल रहे हैं। वह खतरे की घण्टी है। नंगई समाज में व्याप्त हो वह प्रेमचंद जैसे साहित्यकार कभी नहीं चाहेंगे। निगम जी को 19 मार्च 1935 को लिखे पत्र में प्रेमचंद कहते हैं--" सिनेमा में किसी इस्लाह की तवक्को करना बेकार है। यह सनत भी उसी तरह सरमायदारों के हाथ में है जैसे शराब फ़रोसी। इन्हें इससे बहस नहीं कि पब्लिक की रुचि पर क्या असर पड़ता है। इन्हें तो अपने पैसे से मतलब। बरहना रक्स(नंगे नाच), बोसा-बाजी और मर्दों का औरतों पर हमला। यह सब उनकी नजरों में जायज है। पब्लिक का मजाक इतना गिर गया है कि जब तक ये मुखरिब (घातक), और हयासोज (निर्लज्ज) नजारे न हों, उसे फ़िल्म में मजा नहीं आता। मजाक(रुचि) की इस इस्लाह का बीड़ा कौन उठाए? सिनेमा के जरिये मगरिब की सारी बेहूदगियों हमारे अंदर दाखिल की जा रही हैं, और हम बेबस हैं। पब्लिक में तंजीम (संगठन) नहीं, न नेक-ओ-बंद का इम्तियाज (पहचान) है। आप अखबारों में कितना ही फरियाद कीजिए वह बेकार है, और अखबार वाले भी तो साफगोई से काम नहीं लेते। हीरो-हीरोइन के कसीदे गाये जाएं तो क्यों न हमारे नौजवानों पर इसका असर हो। मई 1935 में रामकृपाल मेहता को लिखे पत्र में प्रेमचंद कहते हैं--" जिन्हें साहित्य का रस लेना हो, उन्हें सिनेमा को दूर से सलाम करना चाहिए। उन्हें तो अपनी कुटी में बैठकर ही साहित्य का आनंद लेना चाहिए।" क्योंकि यहाँ कदम-कदम पर उसूलों की हत्या की जाती है!

 प्रेमचंद से कवि बच्चन ने कोई सीख ली थी? बात ऐसी भी नहीं है। वे अपनी आत्मकथा में लिखते हैं --जहाँ वे काम मांगने जाते वहाँ लोग उनकी पत्नी को उनसे अधिक निहारते। तेजी बच्चन और हरिवंशराय बच्चन असहज हो जाते और फिर लौटने का निर्णय लिया। 

फिर उस बॉलीवुड को लेकर नाटककारों, साहियकारों, संगीतकारों में दीवानगी क्यों है? कारण स्पष्ट है --देह और नेह के बीच जिंदगी का मजा लेना। इंसानों की रुचि को अपने जैसा बनाकर उन्हें उपभोक्ता बनाना और माल बटोरना। अब समय आ गया है कि प्रेमचंद की जयंती पर बॉलीवुड की नंगई को खुली आँखों से देखें और जहाँ तक हो सके जनता की रुचि को बिगड़ने न दें। प्रेमचंद को मानते हैं तो यही हम-सबकी उनके प्रति उनकी जयंती पर सच्ची श्रद्धांजलि होगी...।

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Thursday, 30 July 2020

'त्रिया चरित्तर' देव नहीं समझ सके तो 'रिया चरित्तर' सुशांत सिंह राजपूत की कोरे जानतो ? भालोवासा ते बरो-बरो धाक्का के खेते जावे...खेते गेलेई मारा जावे!


* निर्भय देवयांश
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मशहूर लेखक काफ्का के बारे में उसकी प्रेमिका मिलेना कहती है-जब भी उससे बात करने की कोशिश करती, वह असहज हो जाता? घर-परिवार की समस्या और पिता के व्यवहार से काफ्का इस कदर आतंकित रहता कि उसे पता ही नहीं चलता कि जो महिला उससे बात कर रही है उसकी प्रेमिका होने के लिए लालायित है, लेकिन जिसे प्रेमी होना है वह डरा-सहमा है। आखिर घर के माहौल और पिता के कुव्यवहार ने काफ्का को मनुष्य तक होने नहीं दिया। शायद यही वजह है कि काफ्का अपनी चर्चित कृति 'द ट्रायल' के अंत में कहता है-Like a dog! कुत्ते की तरह, यह आम आदमी की जिंदगी है? 

काफ्का के नतीजे से प्रेम को समझने की कोशिश करने पर कुछ चीजें बहुत स्पष्ट हो जाती हैं। मसलन, पुरुष के पास भावात्मक क्षमता कितनी मजबूत है? आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक परिवेश की क्षमता? चूँकि मेरे खुद के अनुभव विकट हैं और कदम-कदम पर धक्कों की भरमार है इसलिए प्रेम-प्यार महज सौदा ही प्रतीत हुआ है। काफ्का हेड क्लर्क था। एक बीमा कंपनी में नौकरी करने की बाध्यता के आधार पर आर्थिक हैसियत पहले ही कमजोर हो गयी। जिस कंपनी में काम करता था वहीं पर चोरी का आरोप लगा दिया गया। उस पर मुकदमा चला। 'द ट्रायल' की यही कहानी है। सजा बिना फैसले के सुनाई गयी। अंत में एक निर्जन जगह ले जाकर पात्र 'के' के सीने में चाकू घोंप कर मौत के घाट उतार दिया जाता है। यानी आम आदमी अपने जीवन में जीवन भर किसी न किसी तरह की परेशानियों से मुकदमे की तरह जूझता रहता है और आखिर में थक-हार कर मर जाता है या मार दिया जाता है?

मुंबई के रिश्ते बेहद नाजुक हैं। प्रायः सभी को कंधे की जरूरत पड़ती है। महेश भट्ट के साथ जो रिया की तस्वीरें बाजार में दिख रही हैं ऐसी अंतरंग तस्वीरें प्रेमिका होते हुए भी सुशांत सिंह राजपूत के साथ क्यों नहीं हैं? यह गंभीर मसला है? 75-80 साल के बूढ़े को इतनी भावात्मक चाहत है तो फिर सुशांत सिंह राजपूत की आंतरिक भावात्मक जरूरत कितनी रही होगी, अब यह मौत ही बता रही है! महेश भट्ट की पहली पत्नी से बेटी पूजा भट्ट है। अपनी बेटी से, यदि वह बेटी नहीं होती तो शादी कर लेता, जैसी बात कह कर सुर्खियों में रहने वाला यह शख्स पोर्न स्टार सन्नी लियोनी तक को लेकर 'जिस्म' जैसी घटिया फिल्म बनाकर दर्शक के भाव केंद्र को दूषित करता है। ... तो क्या जिस्म पार्ट 2 के लिए अंदर ही अंदर रिया के साथ महेश भट्ट ट्रायल ले रहे थे? काफ्का के Like a dog ! सुशांत सिंह राजपूत को मौत के घाट उतार दिया गया। टार्चर किया गया। टार्चर पर टार्चर किया गया। महेश भट्ट अपनी दूसरी पत्नी सोनी राजदान के बारे में कहते हैं कि उनके अलावा यदि कोई उनकी पत्नी को चाहे तो वह उसकी हत्या कर देंगे। टीवी पर एक इंटरव्यू में एंकर के सवाल के जवाब में महेश भट्ट ने कहा था। सुशांत सिंह राजपूत को भी यह अधिकार मिलना चाहिए था कि नहीं?--जो उसकी प्रेमिका को चाहे उसका खून कर दे, लेकिन यहाँ तो प्रेमी का ही खून कर दिया गया? आलिया भट्ट यही महेश भट्ट और सोनी राजदान की पुत्री है, जो सुशांत सिंह राजपूत को लेकर अच्छी धारणा नहीं रखती थी। ओह! एक आदमी के कितने दुश्मन? 

महाभारत में कहा गया है " त्रिया चरित्रं देवो न जानाति कुतो मनुष्यः।" सुशांत सिंह राजपूत जैसा सहज इंसान कैसे जान सकता था 'रिया चरित्तर' के बारे में? जब देवता असफल रहे हैं 'त्रिया चरित्तर' को समझने में! पटना जैसे शहर से आए एक संघर्षशील मध्यम परिवार के लड़के, जिसकी बॉलीवुड की कोई पृष्ठभूमि नहीं है। उसे सपना देखना अच्छा लगता था इसलिए सपनों के शहर मायानगरी मुंबई पहुँच गया। इंजीनियरिंग के छात्र होकर उसके पास अंतरिक्ष और चाँद पर जाने के भी सपने थे! बॉलीवुड में मेहनत कर जगह बनायी थी। बैक डांसर से धारावाहिक और फिर बड़े पर्दे का सफर तीन वर्ष के इंतजार के बाद शुरू हुआ था। इन यातनाओं में कोई 'रिया चरित्तर' की मदद मिली? रिया चरितम की शुरुआत ही होती है जब 'माल मैटर' जुटने लगे। सुशांत के संघर्ष के दिनों में कंधे देते रिया चरितम जैसी सखियों की तस्वीरें बाजार में कहाँ दिख रही हैं? 

महज एक-दो साल पहले जीवन में आई कोई प्रेमिका, जिसके सामने अभी प्रेमी के कैरियर को बुलंदी पर पहुंचाने का लक्ष्य होना चाहिए था। वह रिया चरित्तर बेचारे सुशांत को लूटने में लग लगी। वह भी अकेले नहीं बल्कि परिवार के सदस्य भी रिया चरितम गिरोह में शामिल हो गए। कम्पनियाँ खोली जाने लगीं। परिवार के सदस्य निदेशक बनाए जाने लगे। बाहर गुलछर्रे भी साथ-साथ। गहने-जेवर की लूट-खसोट? ...बैंक-बैलेंस पर डाका? साल भर के अंदर 15 करोड़ की लूट, वह भी प्रेमिका के तौर पर। अभी पत्नी होना बाकी है! इतना कुछ हो रहा मगर सुशांत के परिवार के सदस्य का कहीं कोई अता-पता नहीं? आज जब पर्दा उठ रहा है तो बॉलीवुड के जश्ने-बहारा की गति और चमक नकली साबित हो रही है।
 
बॉलीवुड लॉबी में अपनी उपेक्षा से तंग आकर अपने जीवन को बचाने के लिए केरल जाकर यह अभिनेता जब आर्गेनिक खेती करने की बात करता है। उसके लिए यह भी संभव नहीं हो सका। कारण तथाकथित प्रेमिका ने ऐसा करने और मुंबई छोड़ने पर मानसिक चिकित्सा से जुड़े कागजात सार्वजनिक करने की चेतावनी दी। पहले पागल कर दो और फिर दुनिया से डराओ कि सबको बता दूंगी कि तुम पागल हो! 

 'रिया चरित्तर!' काश! सुशांत सिंह राजपूत पहले जान पाता! 
  बांग्ला में लोग कहते हैं- "भालोवासा ते बरो- बरो धाक्का के खेते जावे। खेते गेलेई मारा जावे!" यानी प्यार-मोहब्बत की राहें आसान नहीं हैं। बड़े-बड़े धक्के खाने पड़ते हैं। यदि भूल से इस पथ के राही बन गए तो मौत निश्चित है। सुशांत भूल से इस पथ पर आकर अपनी जान गंवा दी। 

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Monday, 27 July 2020

तुलसीदास कह गए हैं-भड़ूआ-भंड भगवान के प्रिय होंगे-"प्रभु प्रिय भड़ूआ भंड"...प्रेमिका की हमदर्दी सुशांत सिंह राजपूत की जरूरत थी गलबहियां मगर महेश भट्ट के साथ अच्छी लगती हैं !


* निर्भय देवयांश
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तुलसी बाबा की कही बातें हूबहू घटित हो रही हैं। एक भक्त कवि को यह कैसे पाँच सौ साल पहले पता चल गया कि आने वाला समय भड़ूओं का है! यह तात्कालीन समय की गति का संकेत था या अलौकिक दिव्य दृष्टि का नतीजा? मनुष्य की चेतन-अवचेतन प्रक्रियाओं से इस कदर लाग-लगाव के गहरे अर्थ हैं, क्योंकि अभी सभी क्षेत्रों में कुछ ऐसा ही घटित हो रहा है। यह घटन आज उत्तर आधुनिकतावाद से आगे निकलकर अति उत्तर आधुनिकतावाद तक पहुँच गया है। आदमी अपने होने की मीमांसा को ढूंढ रहा है। इस रास्ते में जितने भी अनैतिक कर्म-कुकर्म हो सकते हैं, उसे अपना कर ही 'सफल आदमी' का लबादा लादकर स्व-विकास के रास्ते पर चल पड़ा है। बाजार-बॉलीवुड की सफलता का प्रथम और अंतिम खाका यही है। जो थोड़ी सी भी नैतिकता, संवेदना की बात करेगा, उसकी मौत कितनी निर्मम हो सकती है, भड़ूए के सिवाय किसी को नहीं पता है? कैसे-कैसे लोग धरती पर सुखी होंगे तुलसी बाबा की 'दोहावली' के एक दोहा में वर्णित है:-
चोर, चतुर, बटमार, नट-प्रभु प्रिय भड़ूआ भंड।
सब भक्षक परमार्थी-कलि सुपथ पाषंड।। 
अर्थात कलियुग में यही सही रास्ते बताए जाएंगे। 

 सुशांत सिंह राजपूत जब मानसिक रूप से परेशान था तो प्रेमिका का तो यही दायित्व बनता था कि अधिक से अधिक वह अपने प्रेमी के लिए हमदर्दी दिखाए-जताए। बकौल कंगना रनौत यह प्रेमिका कई बार सेक्सिस्ट  मार्कर निर्देशक महेश भट्ट को सुशांत के घर पर ले आती थी। कंगना पूछती है-क्या महेश भट्ट मनोचिकित्सक है? यदि है तो पहले उसे अपने पुत्र का दिमाग ठीक करना था, जो देशद्रोही गतिविधियों में संलिप्त अमेरिकी आतंकी हेडली का साथ दे रहा था? यह सवाल कंगना क्यों, कोई भी पूछ सकता है कि यह सब किसके इशारे पर चल रहा था? सुशांत की प्रेमिका की जो तस्वीरें महेश भट्ट के साथ सामने आ रही हैं, उन्हें देखकर लगता है कि पीठ पीछे की गलबहियां के तहखाने में कोई राज तो नहीं छुपा है? सुशांत के चाहने वालों की चिंता जायज है कि इन तस्वीरों की सच्चाई सबूत के तौर पर पेश न हों? यह भी तो एक सवाल है कि जब सुशांत सिंह राजपूत मनोचिकित्सक से इलाज करा रहा था, फिर दूसरे तथाकथित मनोचिकित्सक महेश भट्ट की क्या जरूरत थी? जबकि महेश भट्ट के छोटे भाई मुकेश भट्ट यह बार-बार कहते सुने जा रहे हैं कि सुशांत का हाल भी परवीन बॉबी जैसे होगा? तो क्या परवीन बॉबी भी साजिश की शिकार हुई? 

मनोचिकित्सक फ्रायड के बारे में कहा जाता है कि जो महिला रोगी उसके इलाज से ठीक नहीं होती थी गलबहियां से ठीक हो जाती थी। महिला मनोरोगियों को ठीक करने के इस उपाय को फ्रायड ने जीवन पर्यंत जारी रखा। मनोवैज्ञानिक जुंग और एडलर से अलग कुछ मनोवैज्ञानिकों, जिनमें एलिस हवलाक शामिल हैं। इनका कहना है कि भावनात्मक रूप से जुड़कर मनोरोगी का इलाज संभव है। देखना यह जरूरी है कि यदि निश्चल आवेग हो तो प्रेमिका की गलबहियां भी अवसादग्रस्त प्रेमी के लिए दवा से कम नहीं हैं। नोबेल पुरस्कार ठुकराए लेखक सार्त्र और सिमोन के प्रेम कुछ ऐसे ही थे। यानी जिंदगी भर सिमोन समर्पित रहीं और दोनों की अपनी-अपनी आजादी अंतिम समय तक प्रिय रही। तथाकथित मनोचिकित्सक महेश भट्ट नहीं बल्कि असली मनोचिकित्सक जिससे सुशांत का इलाज चल रहा था, क्या उन्होंने भी 'मिडिल मैंन' की गतिविधियों पर नजर नहीं रखी?

 आखिर यह सवाल तो उठेगा ही कि एक 75-80 वर्ष के बूढ़े सेक्सिस्ट मार्कर निर्देशक को गलबहियां की इतनी जरूरत क्यों पड़ रही है? जबकि 34 साल के अभिनेता की हत्या-आत्महत्या की जा रही है? तुलसीदास जिस भड़ूआवाद का संकेत दे रहे हैं उससे बॉलीवुड का कलावाद कैसे अलग है? सुशांत सिंह राजपूत की दुर्भाग्यपूर्ण जान जाने के बाद दर्शक तुलसीदास जी के कहे पर गंभीरता से सोचने को बाध्य हैं। आखिर वे कब तक अपनी जेब से कला के नाम पर ऐय्याशों को गलबहियां करने की छूट देते रहेंगे और छोटे शहरों से आए अभिनेता साजिशन हत्या-आत्महत्या कांड की भेंट चढ़ते रहेंगे!


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Sunday, 26 July 2020

...का जानू मैं सजनिया-चमकेगी कब चंदनिया- घर में गरीब के-उठाई ले घुँघटा चाँद देख ले, गाना, जुहू चौपाटी और मेरा दोस्त गैंगस्टर के हत्थे चढ़ गया!

*  निर्भय देवयांश 
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अभी कुछ देर पहले ही तो हम चार मित्र बप्पा, सुबल, आलोक और मैं जुहू चौपाटी पर घूम-घामकर अपने निवास स्ट्रेला आंटी के पेइंग गेस्ट वाले ठिकाने पर पहुँचे थे। चारों मस्ती में एक छोड़ता तो दूसरा लय पकड़ता, फिल्म 'हम पाँच' का गाना- का जानू मैं सजनिया-चमकेगी कब चंदनिया-घर में गरीब के-उठाई ले घुँघटा-चाँद देख ले, चौपाटी पर गा रहे थे। थोड़ा-बहुत नाच सिर्फ सुबल और बप्पा रहा था। मैं और आलोक स्वर और ताली दे रहे थे। चूँकि बप्पा और सुबल कैमरामैन, सो दोनों के पास मस्तियाँ कुछ अधिक थीं। इसी बीच, सुबल सिगरेट लाने बाहर निकल गया फिर से वहीं चौपाटी पर। निवास से चौपाटी का एक मिनट का रास्ता। हम तीनों बातचीत में मशगूल हो गए। 

काफी देर बाद तक जब सुबल नहीं आया तो हमें चिंता होने लगी कि क्या हुआ? 1990 का दशक था। मोबाइल आया नहीं था। बप्पा ने कहा - चल बाहर देखते हैं। चौपाटी के यूनिटी कम्पाउंड निवास से निकले तो पता चला कि आपका दोस्त भाई के गैंग के हत्थे चढ़ गया। हम तीनों ने कहा कि हमें भी वहाँ ले चलो। उस आदमी ने कहा कि वहाँ कोई नहीं जा सकता है। मालकिन स्ट्रेला आंटी जो अपने समय की मशहूर वेश्या थीं। दर्जनों दीवाने थे उनके। उनमें से एक दीवाने की दी जमीन पर कामचलाऊ घर बनाकर जुहू के यूनिटी कम्पाउंड में रह रही थीं। स्ट्रेला आंटी तब बूढ़ी हो चली थीं। उनका पुत्र सुकेश ने भी एक वेश्या से ही शादी की थी। दोनों की जोड़ी बहुत प्यारी थी। सुकेश हीरो माफिक लगता था। सुबल के अपहरण की खबर सुन स्ट्रेला आंटी बेचैन हो गयीं। यह कैसे हो सकता है मेरे पेइंग गेस्ट के साथ। यूनिटी कम्पाउंड के बाबा, यह बाबा शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा और अमिताभ बच्चन का करीबी था। दोनों की फिल्मों में बाबा साथ-साथ देखा गया है। बाबा की लंबाई भी बिग बी की तरह ही थी। कम्पाउंड के खुले मैदान में प्रख्यात संगीतकार सरदार मल्लिक (जाने -माने संगीतकार अन्नू मल्लिक के पिताजी) और विख्यात गीतकार कमर जलालावादी आपस में गुफ्तगू कर रहे थे। इन दोनों के पुराने मकान यूनिटी कम्पाउंड में थे। बाबा ने हम तीनों से पूछा-पूरी घटना बताओ। हमने चौपाटी पर उस दिन जो-जो हुआ था, सबकुछ बता दिया। बाबा ने स्ट्रेला आंटी को कहा-मदर अभी देखता हूँ। 

 1990 का दशक। देश में उदारवाद अभी आना शुरू हुआ था। सरदार मल्लिक को अपने मंझले पुत्र अबू मल्लिक की डांस कोचिंग में जाते देख मैं कमर अंकल के पास पहुँच गया। उनसे मेरा परिचय हो गया था। ये तीनों मेरे मित्र अपने में सिमट कर रहने वाले थे। करीबियों के बीच ही हँसी-ठहाका। मेरी दोस्ती हम उम्रों से कम बुजुर्गों से गाँव से लेकर मुंबई और अब साहित्य में भी अधिक रही है। अभी हिंदी साहित्य के लगभग जितने भी 80 वय पार साहित्यकार हैं उनके साथ मेरी प्रायः बातचीत होती है। कोलकाता में 80 पार लेखक गण कोई बड़े भाई तो कुछ चाचू हैं। चाचू बहुत कम हैं एक-दो। 

कमर अंकल ने कहा कि तुम लोगों की गतिविधियां तथाकथित स्थानीय आकाओं को खटकी होंगी इसलिए यह घटना घटी। आए दिन जुहू चौपाटी में ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं। तुम्हारी मालकिन दबंग महिला हैं। मैं पूछा-उसे कुछ होगा तो नहीं? बूढ़े हो चुके कमर अंकल ने कहा-देखो क्या होता है। कमर अंकल के लिखे गाने अमर हैं- मेरा नाम चिन चिन चू-रात चाँदनी मैं और तू-हैलो मिस्टर... आदि आदि। 'हावड़ा ब्रिज' को देखते यह गाना याद आ जाता है। फिर हम तीनों मिलकर दूसरे-तीसरे-चौथे लोगों से पूछने लगे कि ये भाई कौन हैं। मुंबई में कितने भाई हैं। इस भाई के ऊपर भी कोई भाई है क्या? जिनसे पूछते वही आँख दिखाता- भाई के बारे में बोलने का नहीं। समझा क्या! 

  रात के दस बजने वाले थे। बप्पा और आलोक ने मुझसे कहा-तुम भी देखो। भाइयों से तेरी पहचान हल्की-फुल्की है। मैंने कहा- भाई के गुर्गे से पहचान है यार। नाम जीतू भाई। जीतू भाई, भाई का शूटर था। महीनों से बीआर चोपड़ा-रवि चोपड़ा के बंगला के ठीक सामने के बनारसी होटल में मिलने पर चाय साथ-साथ लेते थे। जीतू भाई तसीली-वसूली में लगा था। इस घटना के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं थी। मैंने उसे कहा कि जीतू भाई उसे छुड़ा कर लाओ। बाबा और स्ट्रेला आंटी भी वहाँ पहुँच गयीं जहाँ हम तीनों उससे बात कर रहे थे। जीतू आश्वस्त कर गया कि तुम सभी अड्डे पर जाओ-हम देखते हैं, चिंता न करो। आधे घन्टे बाद सुबल जीतू भाई के साथ आया। बाबा और स्ट्रेला आंटी उससे पूछ रहे थे-क्या हुआ रे सुबल-बता बता। बाबा बोला-अरे मुंबई में यह सब होता रहता है। 

जीतू भाई ने मुझे बाहर बुला कर कहा-दरअसल सुबल के बाल बड़े हैं। कान में कनबाली है। जोर-जोर से तुम लोग गाना गा रहे थे। भाई के गुर्गे को लगा कि तुम लोग भी मस्तान माफिक हो। मैंने कहा-यार जीतू भाई। मुंबई में यह सब? उसने कहा-आगे से ये सब करने से बचो। वैसे मुझसे जान-पहचान है तो कोई बात नहीं। लेकिन शांति से जुहू चौपाटी पर घूमो-टहलो। 

अड्डे पर आया तो सुबल डरा-सहमा था। रोने के माफिक। सब उसके चेहरे को देख रहे थे। स्ट्रेला आंटी भाई के मदर-फदर को अपनी भाषा में आशीर्वाद दे रही थीं । बाबा आंटी से मजाक कर रहा था। कमर अंकल अपनी  यूनिटी कम्पाउंड में बेटी के घर से अपने घर के लिए जा रहे थे। पेइंग गेस्ट के सभी मित्र आ गए थे। नरेंद्र सतीश कौशिक का सहायक था। राजा खान अभिनेता। राजेश सिंह पंजाब वाला महेश भट्ट की कंपनी में काम करता था। नरेंद्र ने कहा-अब खाना बनाने में जुट जाओ। बप्पा और आलोक ने अंडा, आलू, चावल को मिलाकर डिश तैयार किया। अगले दिन से जुहू चौपाटी जाना बंद। समय मिलने पर हम सभी किशोर कुमार गांगुली मार्ग के हनुमान मंदिर जाने लगे। ... का जानू मैं सजनिया गाना पता नहीं अब मेरे मित्र गाते भी होंगे कि नहीं। बॉलीवुड की हलचल में यह घटना भी याद आ गयी। राजा खान असम लौट गया। बप्पा दारू पी पी कर मर गया। सुबल मुंबई में है। नरेंद्र भी। आलोक गुवाहाटी में अफसर बन अफ़सरगिरी कर रहा है और संपर्क पूरी तरह से तोड़ चुका है। 

सुबल ने मुझसे कहा-तुम जब तक इधर को रहेगा, हम रहेगा। तुम्हारे जाने के बाद कहीं और चला जाएगा। सभी मित्र अलग-अलग भटक गए। मैंने 1996 में मुंबई छोड़ दिया। हम समझ सकते हैं सुशांत सिंह राजपूत के फैलाव से कितने आकाओं को परेशानी होती होगी। उसके हाथ का फैलाव कितना बड़ा था-महेंद्र सिंह धोनी माफिक!

                                      ***




Saturday, 25 July 2020

... घराने नहीं तो ठिकाने लगा दिए जाएंगे, नाम है रहस्यमय मौत, मास्को में लालबहादुर शास्त्री-मुंबई में सुशांत सिंह राजपूत, मनाली से मोर्चा संभाल रही कंगना रनौत!


* निर्भय देवयांश
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घराने में जन्म न होना जनता होना है। मौत रेल पटरियों पर दौड़ती है। इतिहास के पन्ने पर जिनके कब्जे हैं उन्हें राजा-महाराजा कहा जाता है। जनता से थोड़ी-सी अधिक बौद्धिकता दमित वासना की पराकाष्ठा है। भोगने की संस्कृति मध्यम वर्ग पर आकर टिक गयी है। वासना यहाँ से आगे बढ़ेगी नहीं इसलिए सपने यहाँ बेहद खतरनाक पैदा होते हैं। राजनीति चाहे कला, दोनों जगह की बेईमानी पर दुनिया के तमाम चिंतकों, लेखकों, दार्शनिकों ने काफी कुछ लिखा है। मसलन, चिंतक जार्ज लुकाच अमीरों की इच्छा पैदा करने वाली फैक्टरी के खिलाफ थे। उनका कहना था-बहुतेरी इच्छाएं पूरी हो जाने के बाद अमीर अब नाम, शोहरत के लिए कला में घुसपैठ करता है। ऐसा वह इसलिए करेगा, क्योंकि मरने के बाद उसकी प्रतिष्ठा कायम रहे। लिहाजा वह अपना कुनबा तैयार करेगा और जब अमीर नहीं होगा, उसकी गैर-मौजूदगी में चमचे उसके कारनामे को जिंदा रखेंगे। 

   पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जब भारत से 'ताशकंद समझौते' के लिए मास्को गए थे, क्या पता था कि लौटेंगे नहीं। उनके यहाँ पहुँचने से पहले रहस्य वहाँ पहुँच गया था। रहस्य में बस मौत को जोड़ना था जिसका पूरा नाम है-रहस्यमय मौत। लौटा उनका शव। घराने के लोग का पीछा न रहस्य करता है, न मौत करती है! क्यों नहीं करती है, का सीधा जवाब है कि घराने के घेरे इतने बड़े हैं कि उसमें रहस्य और मौत घुसे तो कैसे? इतनी नजर रहती है कि तिनका भी हिले-डुले ना। करवट बदलने की भी छूट नहीं है। खबरों के बीच रहस्यमय मौत और रहस्यमयी हो जाती है। रोटी, पानी, प्याज वाली जनता को रहस्यमय मौत से क्या लेना-देना। मध्यम वर्ग को अपनी सूअर संतुष्टि की इतनी गहरी चिंता रहती है कि इन विषयों पर कुछ सोचे-विचारे? झल्लाहट में यह वर्ग कहता भी है कि हमारी औकात ही क्या है कि हम कुछ करें। हमें कुछ हो जाएगा तो फिर क्या करेंगे? चिंता वाजिब है। 

 प्रख्यात लेखक लेफ तोल्स्तोय अपने चर्चित उपन्यास 'युद्ध और शांति' के निष्कर्ष भाग में कुछ गहरे सवाल उठाते हैं। वे पूछते हैं कि गरीबों का यानी बे-घराना वाले लोगों का कोई इतिहास लिखा भी जाएगा कि नहीं? आखिर यह कब तक चलेगा? ऐसी अमीरों की दुनिया में गरीब कब तक शोषित होते रहेंगे। इतिहासकारों ने अब तक जितने भी इतिहास लिखे हैं, सभी शासकों की प्रशंसा में लिखे गए हैं। यह देखकर दुःख होता है। तोल्स्तोय के दुःख को समझा जा सकता है लेकिन कुछ किया नहीं जा सकता है। रूसी लेखक को भी पता था-युद्ध के मैदान में प्येर चलती गोलियों के बीच भी बेफिक्र क्यों है? 'युद्ध और शांति' के पात्र प्येर अमीर है। फिर उसे बे-घराना वालों से डर-भय क्यों होना चाहिए?

 सुशांत सिंह राजपूत द्वारा लूनर प्रोपर्टी के माध्यम से चाँद पर जमीन खरीदने की चाहत लगता है महँगी पड़ गयी! जब घराने के किसी बच्चे ने अपने बाप-दादाओं से ऐसी जिद न की थी। फिर बे-घराना बिहारी सुशांत सिंह राजपूत को इसकी जरूरत क्यों पड़ गयी? यह सवाल लंबे समय तक देश-दुनिया के उन बच्चों को कुरेदते रहेगा, जो खतरनाक सपने देखेंगे और भ्रूण हत्या के शिकार होंगे! या फिर सुशांत की तरह हत्या-आत्महत्या कांड के हिस्सेदार हो जाएंगे? इसे भी नाम दिया जाएगा-'रहस्यमय मौत'। इस मौत में आसानी यह होती है कि खबरों की भीड़ सच को दबा देती है। साजिश करने वाले सशंकित होकर भी बाल-बाल बच जाते हैं। फिर अगले शिकार की तलाश शुरू हो जाती। 

 कंगना रनौत अपनी लड़ाई सुशांत सिंह राजपूत को न्याय दिलाने के लिए मनाली से लड़ रही है। उसे मुंबई में रहना खतरे से खाली नहीं लग रहा है। बे-घराने वाले भाग-भाग कर, दौड़-दौड़ कर, बच-बच कर लड़ते हैं। घराने वाले बे-घराना वाले की इस समझ को 'चूहे-बिल्ली' की भागदौड़ बताते हैं। आखिर वे नाम भी क्या देंगे ऐसे लोगों की जिद को। जो सपने अमीरों के लिए तय है, उसे गरीब पेड़ से तोड़ ले। यह कौन सहन करेगा? बे-घराना वाले डरना नहीं सीखेंगे तो बेमौत मारे जाएंगे! रहस्यमयी मौत! हत्या-आत्महत्या की मौत! 
 
बॉलीवुड की फिल्म 'घराना' के एक गाना की चंद पंक्तियां हैं-
  
      " मेरे आँसुओं सीख लो मुस्कुराना 
       खुशी का है मौका मगर क्या करूँ मैं 
        नहीं आज कोई खुशी का तराना
        मेरे आँसुओं सीख लो मुस्कुराना।"
                                 
                           ***

Friday, 24 July 2020

बॉलीवुड, वर्चस्ववादी घराने और लाखों स्ट्रगलरों के मानसिक हालात?


* निर्भय देवयांश 
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हरिवंशराय बच्चन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि उन्होंने अपने पुत्र अमिताभ बच्चन को बॉलीवुड में काम देने के लिए किसी को पत्र नहीं लिखा। न जाने यह अफवाह कैसे उड़ी कि केए अब्बास ने पत्र के चलते 'सात हिंदुस्तानी' में अमिताभ को अभिनय का मौका दिया। बात चाहे जो भी रही हो एक कवि पिता का नाम तो था ही न अमिताभ के साथ? ये संयोग और सौभाग्य विरले को नसीब हैं। नेता रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान के भी बॉलीवुड में किस्मत आजमाने की चर्चा खूब चली थी, माहौल को भांप राजनीति की अच्छी-खासी विरासत भा गयी। एक तरह से अच्छा ही हुआ कि बॉलीवुड के जानलेवा धक्के खाने से राजनेता पुत्र बच गए। वैसे पिता के पत्र हो तो क्या कहने! किसी नेता की पैरवी हो तो फिर कहना ही क्या है। 

 जिनके पास कुछ नहीं होता है, वे किस चीज को लेकर बॉलीवुड जाते होंगे या जा रहे हैं? ये सवाल इसलिए जरूरी हैं कि बिना इसके किसी निष्कर्ष तक पहुंचना मुश्किल है। क्या अभिनय में दिलचस्पी भर से कोई मुंबई चला आएगा? कुछ नाटक कर लेने के चलते? छोटे शहरों में अभिनय क्षमता की इज्ज़त न होने के कारण? स्कोप की तलाश में? अभिनय में डिग्री-डिप्लोमा के चलते? इन गुणों-अवगुणों-जुनूनों के बावजूद बेकारी के दंश भी विकराल वजह होते हैं। नाम, शोहरत, इज्जत, प्रसिद्धि अगर बॉलीवुड में नहीं होती तो बहुत कम लोग जाते। अपने-अपने शहरों में ही नाटक कर, लिख-पढ़ कर या इसी तरह के ढेर सारे काम कर समय निकालते। जो मुंबई नहीं गए- क्या वे अपने शहरों में अभिनय नहीं कर रहे हैं? कर रहे हैं। उन्हें लोग जानते भी हैं। कोलकाता, दिल्ली, पटना, लखनऊ, जबलपुर, भोपाल, रायपुर आदि-आदि शहरों में लगातार नाटक खेले जा रहे हैं। सभी की अपनी अलग-अलग भीड़ है। फिर भी यह जो सपना है खींचता है सारी रात लंबे सफर पर जाने के लिए। आकाशीय सैर के लिए। देश-विदेश में तफरी के लिए। सत्तासीनों के साथ बैठने-उठने के लिए।

मुंबई की तरफ जाने वाले अधिकांश लोग मध्यम, निम्न वर्गीय परिवार के होते हैं। शत्रुघ्न सिन्हा, शेखर सुमन, सुशांत सिंह राजपूत मध्यमवर्गीय के बेहतर उदाहरण हैं। वहीं मनोज वाजपेयी निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के हैं। मने जैसा आपका वर्ग होगा वैसा ही सघन संघर्ष होगा। कुछ माता-पिता अर्थ की उपलब्धता की वजह से पुत्र के संघर्ष को बल देने के लिए मासिक दस- बीस हजार रुपये भेजते हैं। जिन्हें यह सुविधा नहीं है, वे दर-दर की ठोकर खाते थे, हैं। बच निकलने का कोई उपाय नहीं है। छोटी-छोटी भूमिका की तलाश में उम्र निकल जाती है। पर्दे पर आने का सपना आखिर सपना ही रह जाता है। एक दिन सुशांत सिंह राजपूत हो जाते हैं जबकि उन्हें इतनी बड़ी उपलब्धि और प्रसिद्धि भी नहीं मिलती है।

अब जब बॉलीवुड में वंशवलियां फूलने-फलने लगीं और उसको चुनौती देने के लिए कंगना रनौत और सुशांत सिंह राजपूत जैसे लोग बॉलीवुड पहुंचेंने लगे तो परेशानी पैदा होने लगी। बाप जो बाहरी लोगों पर करोड़ों रुपए का दांव दूसरे पर लगाएगा, उसी रुपए को क्यों नहीं पुत्र-पुत्री मोह में अपने घर की प्रतिभा पर खर्च करेगा! फिर बाहरी लोगों के लिए बचा क्या रह गया। साइड कलाकार के रोल? हीरो-हीरोइन के आगे-पीछे करने वाले, मारपीट करने वाले या मां-बाप-दादा-नानी-चाची की कलाकारी। सबको तो मुख्य रोल मिलेगा नहीं। और उत्तर आधुनिकता तो यही है कि जो कुछ नहीं हो सकता है, उसे बहुत कुछ-सबकुछ बना दो। पूँजी इसमें अहम रोल अदा करती है। सर्वोत्तम सुख खुद के लिए सुरक्षित है।

 आउटसाइडर के पास पूँजी नहीं होती तो उसे बॉलीवुड में इनसाइडर के साथ मिलकर रहने की बाध्यता है। अनुराग कश्यप इसका बेहतर नमूना है। पहले 'प्रिविलेज्ड क्लास' को कोसा और नजदीकी बढ़ गयी तो कंगना रनौत आदि के अंत की घोषणा सुशांत सिंह राजपूत की तरह ही होगा, करने लगा। अनुराग को पता है कि आउटसाइडर के साथ जाने से सुविधाएं छीन जाएंगी। बेहतर है इनसाइडर की माला जपते रहो। 

अब जो अहम सवाल है कि लाखों की संख्या में मौजूद स्ट्रगलरों के मानसिक हालात का जायजा कौन लेगा? अगर कायदे से इनकी जाँच हो तो कितने अवसादग्रस्त, कितने बाइपोलर डिसऑर्डर, कितने पागलपन के शिकार निकल जाएंगे? अभी देश को इस काबिल होना है। अभी बॉलीवुड को कला का स्थान बनना है। असली-नकली प्रतिभा की पहचान होनी है। सुशांत सिंह राजपूत के हत्यारे की शिनाख्त भी तो अभी बाकी है?

Thursday, 23 July 2020

शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा के कहे 'बॉलीवुड किसी की जागीर नहीं है' और शेखर सुमन के कहे' रंगदारों की जमात है बॉलीवुड' वाया आउटसाइडर की प्रतिभा


* निर्भय देवयांश 
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शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा देर से ही सही अपनी बेटी सोनाक्षी सिन्हा के कैरियर को दांव पर लगाकर यह बोल पाए हैं - "बॉलीवुड किसी की जागीर नहीं है, किसी के पिता के पिता की।" उनके इस बयान से बॉलीवुड लॉबी काफी समय तक हिसाब चुकाएगी उनकी बेटी से। इसके लिए उन्हें तैयार रहना चाहिए। दोनों पुत्र लव-कुश सिन्हा की कोई पहचान नहीं बन सकी। मिलाजुलाकर पुत्री ही पिता की विरासत संभाल रही है। दूसरे मूवर्स एंड शेखर यानी शेखर सुमन पटना से लेकर मुंबई तक कंगना रनौत की राह पर चलते हुए सुशांत सिंह राजपूत हत्या-आत्महत्या कांड मामले की सीबीआई जाँच के लिए रट लगा रहे हैं। शेखर ने तो बॉलीवुड को "रंगदारों की जमात" तक कह दिया। ये सारे गुस्से जायज इसलिए फिलहाल प्रतीत हो रहे हैं, क्योंकि इन्हें आगे भी बिहार आना-जाना है। अपने गृह राज्य से जुड़े मामले को इग्नोर करना इन दोनों के लिए मुश्किल है। दोनों की राजनीति महत्वकांक्षा है और आगामी चुनावों में सुशांत सिंह राजपूत का मामला छाया रहेगा। 

 शत्रुघ्न सिन्हा के लिए फिल्मी सफर आसान नहीं था लेकिन पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट की एक्टिंग डिग्री बहुत काम आयी। यहीं पर उनके क्लासमेट और रूम मेट थे सुभाष घई और जावेद अख़्तर। दोस्ती ही थी कि सुभाष घई ने मित्र शॉटगन को लेकर शुरुआती दिनों में ही दो बड़ी सुपरहिट फिल्म दी थी 'कालीचरण' और 'विश्वनाथ'। यह दम्भ ही था शॉटगन का कि एक सेकेंड हैंड कार से मुंबई में चलते थे और जहाँ कार रुक जाती तो साथ में बैठे आमिताभ बच्चन को कहते -अमित तो थोड़ा कार को धक्का दो। तब अपने से आठ साल छोटे शॉटगन के कहे को अमिताभ इनकार नहीं करते थे। उस समय शॉटगन के पास ही सिर्फ कार थी और मित्रमंडली उसी से कहीं आती- जाती थी। वैसे शत्रु को भी आउटसाइडर का दंश झेलना पड़ा था। आज भी शॉटगन खलनायक-नायक की पहचान से बाहर नहीं निकले हैं। 

शेखर सुमन को यूँ तो आते ही शशि कपूर के प्रोडक्शन के बैनर तले निर्मित 'उत्सव' में रेखा के ऑपोजिट अभिनय करने का चांस मिला लेकिन यह कामयाबी भी उन्हें बहुत दूर नहीं ले जा सकी। 'नाचे मयूरी' आदि कुछ सोलो फिल्म को छोड़कर शेखर को बड़े पर्दे से छोटे पर्दे पर आना पड़ा। सरवाइवल के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। यह सही है कि शेखर सुमन भी चिकित्सक पुत्र हैं और पटना में रहते हुए उन्हें अच्छी परवरिश मिली थी। शत्रुघ्न सिन्हा की तरह शेखर भी काफी संपन्न मध्यवर्गीय परिवार से आते हैं। जो भी हो, शत्रुघ्न सिन्हा के पुत्र न चल पाए लेकिन बेटी को फिल्में मिल रही हैं। यह सुविधा शेखर सुमन के पुत्र अध्ययन सुमन के लिए उपलब्ध नहीं हो सकी। लांचिंग तो हुई लेकिन रफ्तार नहीं मिली। अध्ययन सुमन से तो कंगना रनौत के रोमांस के किस्से भी खूब सुने गए, पर बॉलीवुड में बिन सफलता रोमांस का कोई मतलब नहीं है। 

 सुशांत सिंह राजपूत छोटे पर्दे से बड़े पर्दे पर आकर छा गए थे। नाज-नखरे बड़े स्टारों के बच्चों से कम नहीं। शौक-सुविधा जुटाने के लिए पहले दिन से प्रयासरत। बॉलीवुड सुशांत से चाह रहा था कि मनोज वाजपेयी की तरह शांत रहे। स्टेज से दूर। चुपचाप। लेकिन सुशांत की कद-काठी मनोज वाजपेयी की तरह नहीं थी। वह अपने मिजाज में जिंदा था। स्टार पुत्रों की तरह काबिले-तारीफ अंग्रेजी बोलता था। बॉलीवुड लॉबी की संतानों से कम प्रतिभाशाली नहीं था। अगर सुशांत अपनी पूरी उम्र बॉलीवुड में गुजारता तो संभव है कि अब तक के बिहार का सबसे बड़ा स्टार होता। जहाँ तक सुशांत पहुँचा था वहाँ तक पहुँचने में न शॉटगन ने मदद की थी और न शेखर सुमन ने। मनोज वाजपेयी की तो वैसी हैसियत ही कभी नहीं होगी कि वह किसी को एक कदम आगे बढ़ा सके। मनोज को तो खुद ढंग का काम नहीं मिल रहा है और जीने के लिए वेब सीरीज के मोहल्ले में आना पड़ा है। वर्ना एक तरह से दुकान बंद ही समझें, हो गयी है।

 सुशांत सिंह राजपूत की प्रतिभा को मौत के घाट उतारने के लिए बॉलीवुड लॉबी ने पूरी ताकत झोंक दी। इस साजिश का भंडाफोड़ जरूरी है, यदि भविष्य में बाहर से आयी प्रतिभाओं को बचाना है। यदि आउटसाइडर के लिए बॉलीवुड में कोई कोना सुरक्षित रखना है!

  

Wednesday, 22 July 2020

बॉलीवुड-लॉबीवुड और बिहार का सुसाइड रेट 'सबसे कम 0.5' बनाम सुशांत सिंह राजपूत की हत्या-आत्महत्या!


* निर्भय देवयांश 
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सुशांत सिंह राजपूत क्या भविष्य में बॉलीवुड कैंप के कलाकारों की तुलना में बड़ा कलाकार होने जा रहा था? क्या कुछ घरानों के बच्चों से आगे निकल गया था? फिल्में अगर नहीं चल रही थीं, तो बड़े निर्माता-निर्देशक क्यों उसके साथ काम करने को इच्छुक थे? इन सवालों पर बॉलीवुड लॉबी कैसे हावी होती गयी और और अंत में उसे ही रास्ते से हटा दिया गया, जो सबके लिए खतरा पैदा कर रहा था। सबके लिए रास्ते का कांटा बनता जा रहा था। 

 क्या बिहारी असफलता से हार मान कर आत्महत्या कर लेता है? यदि ऐसी बात होती तो बिहार में आत्महत्याओं की बाढ़ आ गयी होती! ऐसा इसलिए कि देश के विभिन्न राज्यों की तुलना में बिहार में गरीबी और दुःख-तकलीफ अधिक होते हुए भी लोगों को अपनी मेहनत और पसीना पर भरोसा अधिक है। प्रकृति मार दे तो मार दे, एक बिहारी बद से बदतर अवस्था में भी आत्महत्या के बारे में नहीं सोचता है। यह देश का आंकड़ा कह रहा है कि बिहार में सुसाइड रेट महज 0.5 है। यानी एक प्रतिशत भी नहीं जबकि नागालैंड में 0.9 है। महाराष्ट्र में जहाँ बॉलीवुड है, वहाँ 14 प्रतिशत है। यह दर्शाता है कि बिहारियों में संघर्ष की क्षमता इतनी अधिक है कि कभी आत्महत्या के बारे में सोच भी नहीं सकता। खून में है लड़ेगा और लड़ते हुए मरेगा। पलायन नहीं, संघर्ष में मौत आए तो भी उसकी परवाह नहीं। जब भूखे-प्यासे, आर्थिक तंगी से विपन्न बिहारी की सोच में आत्महत्या नहीं है। उस माहौल से आए, अपनी मेहनत से लाखों रुपए के फ्लैट में रहने वाला, लाखों की कार में चलने वाला सुशांत सिंह इतनी आसानी से आत्महत्या कर लेगा? मुकाम जो भी मिला था उसके लिए लगभग 15 साल पसीने बहाए गए थे! कैरियर बनाने के लिए हाथ में और न जाने कितने विकल्प थे लेकिन रुचि के चलते बॉलीवुड की राह पकड़ी। मौत उस शहर का शऊर है, जानता तो कभी आता बॉलीवुड? शायद नहीं। जहाँ जिंदगी संवारने की इतनी तैयारी हो, चाँद पर जाने का ख्वाब हो, वहाँ तो दुश्वारियां भी हसीन लगती हैं लेकिन 'आत्महत्या' यह कैसे संभव है? 

 सुशांत सिंह की हत्या-आत्महत्या के समय की पूँजी लगभग साठ-सत्तर करोड़ रुपये की बतायी जा रही है। तत्काल बैंक में 5 करोड़ जमा पूँजी है। यह कलाकर सार्वजनिक हित में विभिन्न संस्थाओं को करोड़ रुपए का डोनेशन देता है। घर से मजबूत है। घर का अकेला लड़का है। चाचा के परिवार में एक भाई विधायक है। पढ़ने में तेज। पढ़ाई का बेहतर रिकार्ड  है। बॉलीवुड में इंट्री के लिए डांस का सहारा लेता है और सीढ़ी-दर-सीढ़ी आगे बढ़ता जाता है। तो क्या बिहारियों द्वारा सपने देखना बॉलीवुड लॉबी को पसंद नहीं है? आखिर सुशांत सिंह राजपूत महज 34 साल की उम्र में दुनिया छोड़ गया। जब प्रवेश किया होगा तब उम्र भी क्या रही होगी 18-20 साल के करीब? कोई गॉडफादर नहीं। मेहनत ही पहली और आखिरी गॉडफादर। कोई कैंप नहीं। लॉबी से जुड़ाव नहीं। तो क्या यह सफलता आँखों की किरकिरी बन गयी। चुभने लगी? जलन पैदा करने लगी? स्टेज पर कई बार बेइज्जती की गयी। शो में सुशांत की खिल्ली उड़ायी गयी। ये सब कभी बॉलीवुड-लॉबीवुड वालों को अपने लिए भी करना शोभा देता, तो कर लेना चाहिए था! मतलब कोई स्टार पुत्र-पुत्री कहता-रणवीर कपूर कौन है? आलिया भट्ट कौन है? करण जौहर कौन है? मजाक ही करना है न! स्क्रिप्टेड है, पहले से तैयार है तो क्यों अपने ऊपर मजाक क्यों नहीं कर सकते? करके देखो लेकिन करोगे नहीं, क्यों? इमेज खराब हो जाएगा! आखिर सुपरस्टार-डुपरस्टार के इमेज का सवाल है! उस पर कुठाराघात उचित नहीं है! बाकी पर तो सभी प्रकार की फब्तियां जायज हैं?



Tuesday, 21 July 2020

अनुराग कश्यप अब खुद 'प्रिविलेज्ड क्लास' का अगुआ बन गया!


* निर्भय देवयांश
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बॉलीवुड में नशा कैसे चढ़ता है यह कोई अनुराग कश्यप जैसे निर्माता-निर्देशकों से सीखे। अब उसके साथ 'गैंग्स ऑफ वासेपुर, 'उड़ता हुआ पंजाब' है। बॉलीवुड में अब वह आउटसाइडर नहीं रहा। उसके पैर जम गए हैं। अनुराग ने मुझसे बातचीत में 2004-2005 के दौरान कहा था कि हाँ, आउटसाइडर के लिए मुंबई फिल्म उद्योग आसान नहीं है। बहुत संघर्ष करना पड़ता है। यहाँ भी भाई-भतीजावाद है। मैंने भी अपना अनुभव अनुराग के साथ शेयर किया था। अब जब करण जौहर के साथ 'कॉफी विद करण' में शामिल होने और मिलने-जुलने का मौका मिलने लगा तो वह 'प्रिविलेज्ड क्लास' के पावर का खुद नशेड़ी बन गया। दर्शक को यकीन था कि यह आदमी सच्चा नहीं हो सकता, इसलिए अनुराग के बड़े बजट की फिल्म 'नो स्मोकिंग' भयंकर रूप से फ्लॉप साबित हुई थी। जान अब्राहम के कैरियर पर उस फिल्म की असफलता का बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। काफी दिनों तक जान को फिल्म का ऑफर तक नहीं मिला था। 
 
बॉलीवुड में आउटसाइडर टिकने के लिए पहले लॉबी ढूंढता है। बिना उसके टिकना मुश्किल है। सुशांत सिंह राजपूत धारावाहिक से बड़े पर्दे पर गया तो उसकी चुनौती और भी बड़ी थी, क्योंकि छोट पर्दे से आए लोगों को बड़े पर्दे वाले कलाकार आसानी से स्वीकार नहीं करते हैं। बड़े पर्दे की लॉबी में इंट्री भी आसानी से नहीं मिलती है। कुछ घरानों को छोड़कर किसी और के लिए वहाँ जगह नहीं होती है। चूँकि अनुराग ने पहले 'प्रिविलेज्ड क्लास' के नाम पर करण जौहर, अभिषेक बच्चन आदि के खिलाफ माहौल बनाया और मौका मिलते खुद को वहाँ फिट कर लिया। इसलिए आज उसे सुशांत सिंह राजपूत के पक्ष में बोलने में परेशानी हो रही है। बोलने पर अनुराग का खतरा बढ़ जाएगा और मजबूत लॉबी से नाता टूट जाएगा। ऐसे में जरूरी है कि आदित्य चोपड़ा और करण जौहर का साथ दे और 'कॉफी विद करण' की चुस्की लेते रहे। 

पिछली पोस्ट में ही अनुराग के छोटे भाई 'दबंग' फेम निर्देशक अभिनव कश्यप ने लहक से बातचीत की थी। अभिनव कश्यप का खुलेआम कंगना रनौत, सोनू निगम को समर्थन है। ये लोग खुलकर बॉलीवुड लॉबी के खिलाफ बोल रहे हैं। भविष्य के खतरे मोल रहे हैं। इन्हें भारी कीमत चुकानी होगी। कहीं काम नहीं मिलेगा। अभिनव कश्यप ने तो कहा भी कि अभी हालात ठीक नहीं है। यहां तक कि सरवाइवल के लिए एक दुकान खोल लेंगे या ऑटो चलाएंगे लेकिन झुकेंगे नहीं। 

अनुराग अपने कैरियर के सामने कुछ भी नहीं देख रहा है। छोटे भाई की अवस्था ठीक नहीं है लेकिन मदद के लिए कभी हाथ नहीं बढ़ाया। जबकि अनुराग अपने बैनर में दूसरे निर्देशकों को अवसर देता है। अपने छोटे भाई को क्यों नहीं? यह एक सवाल अपनी जगह कायम है। अभिनव ने लहक के इस प्रश्न का जवाब सही ढंग से नहीं दिया कि बड़े भाई से स्पोर्ट क्यों नहीं लेते? सिर्फ इतना ही कि घर का मामला है। जब ऐसी नौबत आएगी तब घर के अंदर ही बात कर लेंगे। यह विचित्र है कि अनुराग कंगना रनौत को डराने के लिए सुशांत सिंह राजपूत जैसे अंत की बात ट्विटर पर कर रहा है। दूसरी तरफ छोटा भाई ट्विटर पर बॉलीवुड लॉबी के खिलाफ मुखर है। 

जो हालात पैदा हुए हैं उससे एक बात तो साफ है कि सुशांत सिंह राजपूत के मामले को कमजोर करने की कोशिश हो रही है। ऐसा होने पर बॉलीवुड लॉबी बच जाएगी और अनुराग कश्यप जैसे लोग खुद को सुरक्षित बचा ले जाएंगे। छोटे भाई और आउटसाइडर कंगना रनौत, सोनू निगम जैसों की दुश्वारियों से अनुराग को क्यों चिंता होने लगी। नशा तो आखिर नशा है, चढ़ता ही जाता है। 

Monday, 20 July 2020

बॉलीवुड में बोलने के बहुतेरे खतरे हैं और हम बेखौफ हैं हर अंजाम से-दबंग फेम निर्देशक अभिनव कश्यप ने कहा...


* निर्भय देवयांश 
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अभिनव कश्यप ने सलमान खान को लेकर एक सुपर-डुपर हिट फिल्म दी थी 'दबंग'। उम्मीद थी निर्देशक को कि दबंग भाग- 2 में भी उन्हें मौका दिया जाएगा। ऐसा होता है लेकिन हुआ नहीं। राजकुमार हिरानी को विधु विनोद चोपड़ा ने मुन्नाभाई एमबीबीएस में बार-बार मौका दिया है। सो, अभिनव कश्यप की उम्मीद बेमानी नहीं थी। आखिर हिट फिल्म के ही तो सिक्वल बनते हैं। फ्लॉप फिल्मों को कहाँ ऐसी सुविधा नसीब है। 
 अभी पिछले दिनों लहक ने अभिनव कश्यप से सुशांत सिंह राजपूत की दुर्भाग्यपूर्ण आत्महत्या पर बात की। अभिनेत्री कंगना रनौत बॉलीवुड के काले सच को सामने ला रही हैं, तो दूसरी तरफ अभिनव कश्यप लगातार मुखर हैं। उन्होंने कहा कि सच को सच की तरह ही कह रहे हैं और निडर होकर कह रहे हैं। आख़िरकार उनके कैरियर से खेला गया है। यह छोटी घटना तो है नहीं। आखिर दर्शक के पैसे से चलने वाले बॉलीवुड में दो-चार घरानों का ही वर्चस्व क्यों रहे? यह सवाल है कि नहीं। जिन्हें हाशिए पर ढकेला जा रहा है, क्या वे औरों से कम प्रतिभावान हैं? दबंग जैसी सुपरहिट फिल्म तो अभिनव कश्यप ने ही दी। फिर उन्हें सिक्वल से दूर करने-रखने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
 लहक ने अभिनव कश्यप से सवाल किया कि बॉलीवुड में सरवाइवल के भयंकर खतरे हैं। अभिनव ने साहस भरे जवाब दिए और कहा कि जब सच के साथ ही जीना है तो फिर कोई भी काम कर लेंगे। एक दुकान खोल लेंगे, ऑटो चला लेंगे, पर किसी के सामने आत्मसमर्पण नहीं करेंगे। यही करना था तो फिर इस लाइन में आते ही क्यों? सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या से विचलित अभिनव कश्यप लगातार सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। ट्विटर पर बॉलीवुड के काले कारनामे को सार्वजनिक कर रहे हैं। उन्हें ऐसा करने में कोई डर, भय किसी से नहीं है। 
 लहक ने अभिनव कश्यप से अगला सवाल किया कि जो कि पूछना शायद ठीक नहीं था कि आपके बड़े भाई अनुराग कश्यप तो दूसरे-तीसरे निर्देशक को चांस देते हैं। आप उनके बैनर से क्यों नहीं जुड़ते? अभिनव जिस मानसिक अवस्था से गुजर रहे हैं, वहाँ ऐसे सवाल जरूरी नहीं होते। फिर भी अभिनव कश्यप ने कहा कि इसे लेकर हम बात नहीं करना चाहेंगे। यह घर का मामला है। घर में ही रहने दें। जब कभी ऐसी बात होगी तो वह घर के दायरे में हो जाएगी। दबंग के अलावे उनके द्वारा निर्देशित फिल्म 'बेशर्म' भी चर्चित रही है। मणिरत्नम के सहायक के तौर पर फिल्म 'युवा' से भी जुड़े रहे हैं। इनके अलावा धारावाहिक व अन्य फिल्मों के निर्देशन से भी अभिनव का जुड़ाव रहा है। 
 सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद बॉलीवुड दो खेमे में बंट गया है। एक का प्रतिनिधित्व दो- चार घराने और उससे जुड़े लोग कर रहे हैं तो दूसरे का प्रतिनिधित्व आउटसाइडर अभिनव कश्यप, कंगना रनौत, शेखर सुमन आदि कर रहे हैं। कला की दुनिया हो या राजनीति की दुनिया चंद घरानों के लिए नहीं होती है, बल्कि आउटसाइडर भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। शुरू-शुरू में अनुराग कश्यप ने भी 'प्रिविलेज्ड क्लास' की बात उठायी थी। आज यह बड़ा मामला बन गया है, जो किसी के दबाने से दबने वाला नहीं है। दर्शक भी इस मसले से जुड़ गये हैं। 

Sunday, 19 July 2020

बॉलीवुड से ' आ अब लौट चलें ' क्योंकि प्रेमचंद भी लौट गये थे, बच्चन भी। अरे, महेश भट्ट ने कंगना रनौत पर फेंकी चप्पल!


* निर्भय देवयांश 
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मैं जब बॉलीवुड से 1996 में लौट रहा था तब सवाल था कि क्यों 1989 से वर्षों यहाँ समय बर्बाद किए। मुंबई से लौटते तो पटना वापस आते। दिल्ली क्यों चले गए। वह भी एक मित्र असमिया आलोक माली को लेकर जिसका मन मुंबई में रहते हुए घूंट रहा था। हालाँकि वह बॉलीवुड से जुड़ा नहीं था लेकिन रहता था जुहू में स्ट्रगलरों के साथ ही पेइंग गेस्ट के तौर पर। दिल्ली भी दरबार है  जो बॉलीवुड से कम हत्यारिन नहीं है। कोरोना काल में कितने लोग दिल्ली से दर-बदर हुए होंगे? किसी के पास कोई हिसाब-किताब है!

 भोगा हुआ दर्द दूसरे, तीसरे, चौथे आदमीनुमा इंसान के लिए किसी महानगर में बदलता होगा, ऐसा है क्या? कुछ भी बदलता नहीं है। यदि हमारे या आपके नाना, दादा के कुछ अपने खानदान-वानदान न हो! इसके अभाव में जो सफरिंग होती है न, वो जानलेवा होती है। मतलब जान ले ही लेती है। जैसे कि सुशांत सिंह राजपूत की जान ले ली गयी। 

 विकास दुबे ने फिल्म 'अर्जुन पंडित' से अपने रुतबे के लिए 'पंडित' शब्द तो ले लिया और 'मैं पंडित बोल रहा हूँ' डायलॉग से वर्षों तक अपराध जगत पर राज किया। लेकिन इस फिल्म से और भी कुछ लिया जा सकता था समझदारी बढ़ाने के लिए। यह गाना क्या खराब था- ' हर कदम पर कोई कातिल है, कहाँ जाएं हम-जिंदा रहना बड़ी मुश्किल है कहाँ जाएं हम।' विकास दुबे ने इस गाना को जीवन में न अपना कर पंडित डायलॉग लिया और फिर एनकाउंटर को अपना जीवन दे दिया। 

 सुशांत सिंह राजपूत घिसट-घिसट कर जीना चाहता तो जी ही लेता। घिसट कर जीने वाले लोग अपने जीवन को संघर्षशील बताते अघाते नहीं है। यह विषय विवाद का नहीं होना चाहिए इसलिए कि आउटसाइडर के लिए कोई स्थायी ठिकाना नहीं होता। आउटसाइडर घिसट-घिसट कर जी नहीं सकता। उसके लिए जीवन का मकसद 'मध्यम वर्ग' की तरह सिर्फ सुविधाओं को बटोरने के लिए जीना नहीं होता है। समय का मूल्य आउटसाइडर के लिए खास होता है। एक्ट और एक्शन में थोड़ी भी देर हुई न कि सुशांत सिंह राजपूत बन जाता है। मुझ जैसा आदमी शहर को छोड़, सपने को लात मार भूल जाता है। सवाल है कि जो लाखों की संख्या में लोग वहाँ स्ट्रगलर हैं वे कहाँ जाएंगे? अभी 20 लाख स्ट्रगलर हैं और इनके सपने हैं कि पर्दे पर दिखें लेकिन पर्दे पर कुछ लोगों की बपौती है। आप क्या करेंगे? तो कोसिए अपने जन्म को। जितने बड़े सपने होंगे उतने बड़े कोसने, उतने बड़े गुस्से, उतनी बड़ी मौत! इसलिए सपने देखने में जल्दबाजी उचित नहीं है। कभी-कभी सपने को रात का अवचेतन स्वप्नदोष समझकर बात आई-गई समझ लेनी चाहिए। सपने से चिपकू किंवदंती के लिए ठीक है, जिनके उदाहरण बाप-दादाओं से लेकर नाना-नानियों तक देते रहते हैं। काश! ये उदाहरण किसी की जान बचा ले। सुशांत सिंह राजपूत को ही जिंदा रख लेता? कलावादी नहीं आखिर विज्ञान से जुड़ा दिमाग और मानसिक विकास था। फिर क्या हुआ? कद छोटा और सपने बड़े हो गए। फिर तो मौत अवश्यम्भावी है। 

 प्रेमचंद अपने बम्बई, अरे यही बॉलीवुड, जाने को लेकर कहते हैं-तन गल रहा है। धन आ नहीं रहा। लड़की की शादी में कर्ज हो गया। 'हंस' और 'जागरण' दोनों ने हमेशा घाटा ही दिया। दोनों लड़कों की शिक्षा पर खर्च बढ़ गया। पैसा! कहाँ से आये। उसूलों की हत्या करके बम्बई फिल्मउद्योग में चाकरी की। संविदा -अवधि भी पूरी न कर पाये। एक वर्ष की जगह दस महीने गुजारने मुश्किल हो गये। क्या मिला बम्बई से? जैनेन्द्र को 14 मई, 1935 के खत में बताया: " बम्बई से क्या लाया? कुल 6300 रुपये। इसमें से 1500 रुपये लड़कों के लिए, 400 रुपये लड़की ने; 500 रुपये प्रेस ने। दस महीने में बम्बई का खर्च बड़ी किफायत से भी 2500 रुपये से कम न हो सका। वहाँ से कुल 1400 रुपये लेकर अपना सा मुँह लिए चले आये। अब ये यहाँ से प्रेस के उठाने में खर्च हो जायेंगे। "

 बच्चन भी अपनी आत्मकथा में बम्बई जाने का जिक्र और दर्द लेकर लौटने की टीस भरी बात लिखते हैं। जो दर्द बयां है उससे बॉलीवुड बेपर्दा ही होता है। 

लेकिन अब इसका जवाब कौन देगा कि किसी करण जौहर पर किसी ने चप्पल फेंकी या पूजा भट्ट पर, या आलिया भट्ट पर? महेश भट्ट ने कंगना रनौत को 'गैंगस्टर' फिल्म में काम क्या दिया कि उन्हें अभिनेत्री पर चप्पल फेंकने का अधिकार मिल गया? यानी प्रेमचंद की माने तो उसूलों की हत्या कर ही कोई बॉलीवुड जाता है लेकिन उसका नतीजा अगर खानदान-वानदान साथ में चिपका नहीं है तो चप्पल खाओ या फिर जान दो। 
   हर कदम पर कोई कातिल है कहाँ जाएं हम
   जिंदा रहना बड़ी मुश्किल है कहाँ जाएं हम....

 

Friday, 17 July 2020

संजय सहाय के 'कूड़ा प्रसंग' को दबाने के लिए रेणु के बहाने 'जाति कार्ड' लेकर मैदान में कूदे राजेंद्र यादव के गुर्गे शिवमूर्ति-संजीव!



**....प्रतिष्ठित पत्रिका का संपादक ऐसा लफंगापन कर सकता है, तो फिर शायद यह आवा ही बिगड़ा हुआ है : प्रेमचंद

* निर्भय देवयांश 
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प्रेमचंद की पच्चीस-तीस कहानियों को छोड़कर बाकी सब कूड़ा है। हंस के संपादक संजय सहाय के इस बयान के बाद से ही हो-हल्ला होने के बाद तय था कि राजेंद्र यादव गैंग के गुर्गे मैदान में उतारे जाएंगे। यह इसलिए जरूरी था कि नब्बे दशक के बाद वाले गुर्गे संजय सहाय को बचाने में सफल नहीं हो पा रहे थे। लानत-मलानत लगातार भेजी जा रही थी। एक लाइव में मैंने खुद संजय सहाय के समक्ष बहुतेरे सवाल रखे थे, जिनमें एक सवाल यह भी था कि राजेंद्र यादव की कितनी कहानियां कूड़ा हैं और साहस हो तो मन्नू भंडारी के बारे में भी कहने की हिम्मत जुटाई जाए। लेकिन यह संभव कहाँ होता है? मैंने हंस की प्रबंध निदेशक रचना यादव से भी बात की थी और वे भी संजय सहाय के पक्ष में सुर में सुर मिला रही थीं। मसलन, 'बड़े घर की बेटी' जैसी कहानी की अब कोई प्रासंगिकता नहीं है? यही बात तो संजय सहाय भी कह रहे थे। प्रेमचंद के कामों पर अपना जीवन खपा चुके कमल किशोर गोयनका ने भी सवाल पूछे थे संजय सहाय से, लेकिन जवाब नहीं आना था, सो नहीं आया। 

 लेकिन क्या संजय सहाय पहली बार प्रेमचंद पर हमला कर रहे थे। बिल्कुल नहीं। सफर में संजय सहाय जैसे कितने लोग आए-गए होंगे। कोई गिनती भी है क्या? लेकिन प्रेमचंद को यह पता था कि जब उनके जीते जी उनके खिलाफ हास्यास्पद घृणा फैलाई जा रही है तो जब वे नहीं रहेंगे तब क्या होगा? उन्हें जीवित रहते हुए आभास हो गया था कि पत्रिका 'हंस' और उनकी रचना के साथ क्या-क्या और कैसी-कैसी शरारतें की जाएंगी। 
 
 प्रेमचंद ने लिखा था-" श्रीनाथ सिंह मुझसे मिल चुके हैं और कितने ही मनुष्यों के बारे में ऐसी बातें कर चुके हैं कि यदि मैं लिखूं तो वह प्रयाग में हल्के हो जाएंगे; लेकिन ऐसी बातें करना जितनी बड़ी नीचता है, उसका जिक्र करना, उससे बड़ी नीचता है। इस तरह के प्रोपेगेंडे से श्रीनाथ सिंह जी न साहित्य का उपकार कर रहे हैं , न '' सरस्वती" का, न अपना; वरन संसार के सामने हिंदी के संपादकों की भद्द करा रहे हैं, उन्हें कलंकित कर रहे हैं। आपकी यह कृति देखकर इसके अलावा और क्या होगा कि दुनिया कहेगी-जब "सरस्वती"- जैसी पत्रिका का संपादक ऐसा लफंगापन कर सकता है, तो फिर शायद यह आवा ही बिगड़ा हुआ है। 
 ( पुस्तक, प्रेमचंद और उनका युग, रामविलास शर्मा, पेज न.120)

  लेकिन जब हंस की हो रही बदनामी हो रही थी और संजय सहाय, राजेंद्र यादव की रचनाओं में कितना कूड़ा है, की गूंज बढ़ रही थी तो उसे दबाने के लिए शिवमूर्ति और संजीव मैदान में उतारे गए। बहाना मिला उन्हें रेणु के साथ जाति कार्ड का और टारगेट पर आ गए रामविलास शर्मा। जाहिर सी बात है कि लोहा लोहे को काटता है। प्रेमचंद के सामने रचना में खिलन्दरी करने वाले राजेंद्र यादव तो चलेंगे नहीं। संजय सहाय की फिर क्या बिसात है? तो फिर कुछ कद काठी वाले शिवमूर्ति और संजीव ठीक रहेंगे! हुआ भी वही, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। इन दोनों ने रेणु के बहाने जाति कार्ड खेलकर अंततः प्रेमचंद की रचनाओं को कूड़ा साबित करने वाले संजय सहाय का साथ दिया! यदि ऐसा नहीं था तो कायदे से दोनों को हंस के संपादक को कटघरे में खड़ा करना चाहिए था। प्रेमचंद की रचनाओं को बचानी थी। कूड़ा शब्द को राजेंद्र यादव की तरफ शिफ्ट कर एक बार दूर से तमाशबीन होकर देखना था। लेकिन संजीव और शिवमूर्ति की इतनी जुर्रत? आखिर राजेंद्र यादव गैंग के ये दोनों गुर्गे जो ठहरे! नाम, शोहरत, इज्जत मिली है उस गैंग में शामिल होकर। नौकरी भी। कार्यकारी संपादक के पद पर बैठ कर संजीव वर्षों कहानियों की कटनी-छंटनी करते रहे हैं। कैसे शिवमूर्ति और संजीव भला प्रेमचंद के पक्ष में बोलेंगे? राजेंद्र यादव न सही लेकिन क्या संजय सहाय की अदावत मोल लेंगे? यही संजीव हैं न जो 'लेखक कायर होता है' बयान दे चुके हैं। शिवमूर्ति के उपन्यास "कुच्ची का कानून" को लहक ने अपने कई अंकों में चोरी का आरोप लगा कर बहस चलाई थी। लहक के खिलाफ शिवमूर्ति ने लखनऊ के जयशंकर प्रसाद सभागार में संगोष्ठी की और लहक के खिलाफ अधिकांश वक्ताओं ने हमला बोला। वहाँ के अखबारों ने इस पर खबर बनायी। 

कुछ सवाल छोड़कर अपनी बात रोकते हैं और वे ये हैं कि रेणु को जाति कार्ड में फिट कर और सवर्णवादी? आलोचक रामविलास शर्मा द्वारा रेणु की उपेक्षा और रचनाओं को महत्व न देने से शिवमूर्ति और संजीव अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगे? शायद नहीं। ऐसा इसलिए कि रेणु प्रेमचंद के बाद दूसरे लेखक हैं जो दर्जनों राजेंद्र यादव मिलकर भी उतनी जगह अपने लिए नहीं घेर सकते हैं। कभी "तीसरी कसम" और "सारा आकाश" फ़िल्म की तुलना से इस सच्चाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं। रेणु नेपाल की क्रांति में अपनी भूमिका निभा चुके हैं और सदा जमीन से जुड़े रहे। उन्हें शौक नहीं था कि तथाकथित फर्जी नयी कहानी आंदोलन में अपनी कहानी को पहली कहानी घोषित करवाएं। बाजी मार ली निर्मल वर्मा की परिंदे ने। कागजी लड़ाई में जब जीत न मिली तो क्रांति में शामिल रेणु को जाति कार्ड से कोई भी पाठक क्योंकर देखेगा? भारत यायावर जैसे बुद्धि संपन्न लेखक-कवि अपने समय को रेणु पर यूँ ही तो नहीं गला रहे हैं! भारत यायावर का कद सुनते हैं कि संजीव और शिवमूर्ति से कम भारी नहीं है। बचे रह गए रामविलास शर्मा तो शिवमूर्ति और संजीव उनका कुछ बिगाड़ कर दिखाएं। सुनते हैं कि रामविलास शर्मा की आलोचना पुस्तक को पाठक संजीव और शिवमूर्ति के उपन्यासों से अधिक चाव-चाह से पढ़ते हैं। संजीव-शिवमूर्ति से अधिक पाठक रामविलास शर्मा की किताबों के नाम भी जानते हैं, होंगे। ये सब बातें तो परखने की हैं।

Thursday, 16 July 2020

महादेवी वर्मा, मृणाल सेन और एक बांग्ला फिल्म


  * जयनारायण प्रसाद
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वरिष्ठ पत्रकार व कला-समीक्षक


  मृणाल सेन की फिल्मों के बारे में सोचना जितना सहज है, उनकी फिल्मों पर टिप्पणी करना उतना ही जटिल है। मृणाल सेन की ऐसी ही एक बांग्ला फिल्म है 'नील आकाशेर नीचे'। यह मृणाल सेन की दूसरी फिल्म है, जो बनीं तो बांग्ला भाषा में, लेकिन हिंदी की जानी-मानी कवयित्री महादेवी वर्मा की एक छोटी-सी कथा पर आधारित है‌। इस हिंदी कहानी का नाम है 'चीनी फेरीवाला'। 
  'नील आकाशेर नीचे' का हिंदी में मतलब है नीले आसमान के नीचे। 'नील आकाशेर नीचे' कोलकाता में 20 फरवरी, 1958 को रिलीज हुई थीं। तब श्वेत-श्याम फिल्मों का जमाना था। जाहिर है, यह भी श्वेत-श्याम फिल्म है। मृणाल सेन बहुत पढ़ाकू थे। छात्र तो वे साइंस के थे, लेकिन भारतीय और विदेशी साहित्य में उनकी दिलचस्पी बेहिसाब थी। सिनेमा भी खूब देखते थे।
 सिनेमा की दुनिया में पूरी तरह उतरने से पहले मृणाल सेन उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव थे। उसी समय कवयित्री महादेवी वर्मा की इस कहानी से वे परिचित हुए। परिचित मतलब एक दोस्त ने महादेवी वर्मा की 'चीनी फेरीवाला' शीर्षक कहानी उन्हें पढ़कर सुनाई थी। तभी से यह कहानी उनका पीछा कर रही थीं। 
  मृणाल सेन ने शायद तभी मन बना लिया था कि एक दिन इस कथा पर वे फिल्म बनाएंगे। फिर, जब 1957 में इस फिल्म के लिए वे निर्माता ढूंढने लगे, तो आखिर में संगीतकार हेमंत मुखर्जी इसमें पैसा लगाने के लिए तैयार हुए। कई दौर की बातचीत के बाद हेमंत मुखर्जी और उनकी गायिका पत्नी बेला मुखर्जी राजी हुईं। उसके बाद 'हेमंत-बेला प्रोडक्शंस' नामक एक फिल्म कंपनी बनी। फिर, 'नील आकाशेर नीचे' का निर्माण शुरू हुआ। हेमंत और बेला मुखर्जी की दो संतान हैं। बेटा जयंत मुखर्जी और बेटी रानू मुखर्जी। रानू ने 1960 के दौर में संगीत की दुनिया में काफी नाम कमाया था। बेटा जयंत मुखर्जी की शादी अभिनेत्री मौसमी चटर्जी से हुई है। जयंत रवींद्र ‌संगीत के गायक भी रहे हैं और फिल्म निर्माता हैं।
  बहरहाल,‌ लेखिका महादेवी वर्मा की यह कहानी 'चीनी फेरीवाला' मूलतः एक ऐसी कथा है, जिसमें साम्राज्यवाद का विरोध है। इस कहानी में वांग लू नामक एक अप्रवासी चीनी फेरीवाला है, जो 1930 के आसपास कलकत्ता में फेरी का काम करता था। कहते हैं कि उसका एक चीनी दोस्त उसे अफीम के गोरखधंधे में लाना चाहता था, लेकिन अपनी मेहनत और ईमानदारी से वह डिगा नहीं। कोलकाता में फेरी करते-करते उसकी मुलाकात वासंती नामक एक महिला से हुई, जो उस समय साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन से जुड़ी हुई थी।
 
  कालांतर में दोनों में बहन-भाई का रिश्ता बन जाता है।

  लेकिन, वासंती आजादी की लड़ाई के लिए होने वाले आंदोलनों से जुड़ी रहती है। एक दिन वह जेल भी चली जाती है। दोनों में संबंध के कारण वांग लू भी शक के घेरे में आ जाता है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ हिंदुस्तान में चलने वाले आंदोलनों के प्रति यह चीनी फेरीवाला सहानुभूति भी रखने लगा था। लेकिन, किसी तरह बच-बचाकर आखिर में 1931 में वांग लू अपने देश चीन लौट जाता है। फिर, वह अपने देश में जाकर साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों में जुट जाता है। उस समय जापान और चीन के बीच संघर्ष भी चल रहा था। वांग लू नामक इस चीनी फेरीवाले की कथा बस इतनी-सी है। छोटी-सी, लेकिन मारक ! एक बार पढ़ेंगे, तो जेहन में हमेशा तरोताजा बनी रहेगी। अच्छी कहानी पर बनीं बेहतरीन फिल्में हर पीढ़ी पर असर डालती हैं। ऐसा इस देश के जीनियस फिल्मकार सत्यजित राय भी मानते थे। दुर्भाग्य से अब यह 'शायद' में तब्दील होता जा रहा है !
  133 मिनट की यह ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म जब रिलीज हुई, तो मृणाल सेन अचानक चर्चा में आ गए। इसे देखने के लिए लोगों की भीड़ लग गई। कुछ ही हफ्तों के बाद मृणाल सेन की इस बांग्ला फिल्म 'नील आकाशेर नीचे' पर प्रतिबंध लग गया। 
  बहुत कम लोगों को मालूम होगा मृणाल सेन की बांग्ला फिल्म 'नील आकाशेर नीचे' भारत की वह पहली फिल्म है, जिस पर प्रतिबंध लगा था। हालांकि, यह प्रतिबंध थोड़े समय के लिए था। बुद्धिजीवियों के हो-हल्ले के दो महीने के बाद ही इस फिल्म पर से प्रतिबंध हटा लिया गया। लेकिन, बंदिश की वजह से इस फिल्म की मांग बढ़ गई थी और कोलकाता और पूरे देश में मृणाल सेन एक जाना-पहचाना नाम बन गया था। इसे कहते हैं साहित्य और सिनेमा की ताकत ! बेहतरीन साहित्य पर जब 'कायदे का सिनेमा' बनता है, तो सत्ता भी सिहरने लगती है। हिंदी भाषा की कहानी, फिल्म बनी बांग्ला जुबान में और पूरी दुनिया उसके मर्म को जानने-समझने लगी। सुना है, कहीं आपने !
  'नील आकाशेर नीचे' की पटकथा मृणाल सेन और गीतकार गौरीप्रसन्न मजुमदार ने मिलकर लिखी थी। इस फिल्म में गीत गौरीप्रसन्न मजुमदार ने ही लिखे थे। संगीतकार थे हेमंत मुखर्जी। निर्देशक की कमान मृणाल सेन के जिम्मे थी। शैलजा चटर्जी की फोटोग्राफी अव्वल दर्जे की थी। अब भी इसके एक-एक दृश्य आंखों के सामने तैरते-से दिखते हैं।
 हेमंत मुखर्जी की पत्नी बेला मुखर्जी भी तब बड़ी गायिका थीं और लेखराज भाखरी की फिल्म 'सहारा' में गीत गाकर हिंदी सिनेमा में स्थापित हो चुकी थीं। 'सहारा'‌ वर्ष 1958 की फिल्म है, जिसमें मीना कुमारी, मनोज कुमार और लीला मिश्रा की यादगार भूमिका थी।‌ तब तक हेमंत मुखर्जी की हिंदी सिनेमा में पहचान बन चुकी थी। गायक और संगीतकार दोनों रूपों में।
   दो दफा राष्ट्रपति पुरस्कार पाए हेमंत मुखर्जी बीस साल बाद, कोहरा, राहगीर, खामोशी समेत अनेक हिंदी-बांग्ला फिल्मों के कामयाब संगीतकार रहे हैं। उन्होंने वर्ष 1972 में इंडो-अमेरिकन बैनर तले बनीं अंग्रेजी फिल्म 'सिद्धार्थ' में भी संगीत दिया था। हरमन हेश के इसी नाम के अंग्रेजी उपन्यास पर बनीं इस फिल्म में शशि कपूर, सिमी ग्रेवाल और रोमेश शर्मा ने अभिनय किया था। करनाड रुक्स ने इस फिल्म का निर्देशन किया था।
  फिल्म 'नील आकाशेर नीचे' में काली बनर्जी, मंजू डे, स्मृति विश्वास और विकास राय ने अभिनय किया था। बांग्ला की मशहूर फिल्मों 'दादार कीर्ति'‌ और 'गुरु दक्षिणा' जैसी फिल्मों में अमर किरदार निभाने वाले काली बनर्जी ने वर्ष 1972 में ऋषिकेश मुखर्जी की हिंदी फिल्म 'बावर्ची' में भी अभिनय किया है। उनके जैसा अभिनय का 'तोड़' अब बांग्ला सिनेमा में नदारद-सा है। ऐसे थे अभिनेता काली बनर्जी ! 
  काली बनर्जी जन्मे थे कोलकाता में जरूर, लेकिन वर्ष 1993 में वे लखनऊ में गुजरे। एक हिंदी सिनेमा में अभिनय के सिलसिले में उनका वहां जाना हुआ था।
  यादों के पन्ने पलटता हूं तो कई चीजें याद आती हैं। 'नील आकाशेर नीचे' की‌ एक नायिका हैं स्मृति विश्वास, जो उस दौर में बांग्ला और हिंदी दोनों फिल्मों में अभिनय किया करती थीं। बाद में उस जमाने के सबसे पढ़े-लिखे फिल्मकार एसडी‌ नारंग से विवाह किया। एसडी नारंग अर्थशास्त्र में पीएचडी थे और पाकिस्तान के लायलपुर में जन्मे थे। लायलपुर तब के पंजाब प्रांत में था।‌ वर्ष 1948 से‌ 1951 तक एसडी नारंग कलकत्ता में भी रहे। तब कलकत्ता में न्यू थिएटर्स का जमाना था और अच्छी फिल्में यहीं बनती थीं। 
  यादों का कारवां बताता है नायिका के‌ रूप में स्मृति विश्वास 1930 से 1960 तक सक्रिय थीं और एसडी नारंग की प्रायः हर फिल्म की हीरोइन थीं।
  यहूदी की लड़की, रागिनी,‌ नेक दिल, चांदनी चौक, दो ठग, एक औरत, दिल्ली का ठग आदि स्मृति विश्वास की यादगार फिल्में हैं। मेरी किस्मत अच्छी है कि स्मृति विश्वास ‌से मिला हूं। अपनी हिंदी फिल्मों से कभी उनका नाता था। अब‌ वह काफी दूर है। नायिका स्मृति विश्वास अब एक अतीत है- सुनहरी यादों का अतीत ! बेटे के साथ महाराष्ट्र के नासिक में रहती हैं, वहीं जहां कभी अभिनेता सदाशिव अमरापुरकर रहते थे।
  एसडी नारंग 25 जनवरी, 1986 को बंबई में गुजरे, पर उनके निर्देशन में बनी 'शहनाई' समेत कई लाजवाब फिल्में अभी भी जेहन में हैं।
                    
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      फिल्म 'मृगया', मृणाल सेन और मिथुन चक्रवर्ती
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हिंदी फिल्म 'मृगया' के बगैर फिल्मकार मृणाल सेन अधूरे हैं। 'मृगया' वह फिल्म है, जो आजादी के बाद के हमारे अधूरेपन का पर्दाफाश करती है और यह भी बताती है कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का नाम नहीं है। सिनेमा वह है, जो जिंदगी और उसकी बेतरतीबी से आपको रूबरू कराए। सिनेमा वह भी है, जो दर्शकों को ‌जागरूक बनाए। ऐसी ही फिल्म है 'मृगया' !
  'मृगया' वर्ष 1976 में बनी और मृणाल सेन की पहली रंगीन फिल्म भी है। यह फिल्म एक ऐसी कथा है, जिसमें संथाल आदिवासियों का शोषण, उस पर ढाए जा रहे जुल्म, क्रूर महाजनी व्यवस्था और इन सबके बीच इससे टकराने का जज्बा इसके केंद्र में है।
  'मृगया' (रायल हंट) का मतलब है शिकार। ओड़िया के जाने-माने लेखक भगवती चरण पाणिग्रही की एक छोटी-सी कहानी पर यह फिल्म बनी है। पाणिग्रही की ओड़िया कहानी का नाम‌ भी था 'शिकार'। दिलचस्प कहानी है। पढ़ेंगे तो पढ़ते ही जाएंगे। तब पता चलेगा कि ओडिशा जैसे छोटे राज्य में भी 'हमारी व्यथा' को व्यक्त करने वाला साहित्य बहुत पहले से लिखा जा रहा है। भगवती चरण पाणिग्रही ऐसा ही एक‌ नाम है।
  ओडिशा के साहित्य और वहां के लोगों से बातचीत करने पर पता चलता है कि भगवती चरण पाणिग्रही ओड़िया में छोटी कहानियों के बेहद संवेदनशील लेखक थे। पाणिग्रही की कहानियां मर्म को छूती ही नहीं, 'वार' भी करती हैं। जैसे हम किसी 'युद्धस्थल' में हों ! 
  भगवती चरण पाणिग्रही लेखन के साथ-साथ राजनीति से भी जुड़े थे। वर्ष 1907 में भगवती चरण पाणिग्रही का जन्म हुआ,  लेकिन 23 अक्तूबर, 1943 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हुई। यह देश को आजादी मिलने से बहुत पहले की कथा है। एक ऐसे कहानीकार की, जो बंगाल और बिहार का पड़ोसी भी है ! 
  पाणिग्रही ओडिशा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पहले राज्य सचिव भी थे। 'नवयुग साहित्य संसद' नामक एक साहित्यिक संस्था भी चलाते थे। साथ में 'आधुनिका' (यानी आधुनिक) नाम से एक ओड़िया पत्रिका का संपादन भी। ओड़िया साहित्य की बहुत धारदार पत्रिका थीं यह ! कहते हैं कि इस पत्रिका में ओड़ियाभाषी लोगों का जीवन धड़कता था।
  बहरहाल, मृणाल सेन ने उनकी 'शिकार' कहानी को बहुत पहले से पढ़ रखा था। कहते हैं भगवती चरण पाणिग्रही ने वर्ष 1930 के आसपास यह कहानी लिखी थी। मृणाल सेन ने वर्ष 1974 से इस पर काम शुरू किया। 
  एक दफा पुणे के फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान के दीक्षांत समारोह में उन्हें अतिथि बनने का मौका मिला। तभी उन्होंने मिथुन चक्रवर्ती को मंच पर चढ़ते और सर्टिफिकेट लेते देखा था। उस दीक्षांत समारोह में थिएटर के जानकार इब्राहिम अल्काजी भी थे। मन ही मन मृणाल सेन ने उसी समय मिथुन चक्रवर्ती का चयन 'मृगया' के लिए कर लिया था। तब साथ में कैमरामैन केके महाजन भी वहां थे। बाद में केके महाजन से उन्होंने मिथुन का पूरा डिटेल भेजने को कहा।
  महाजन मिथुन चक्रवर्ती से मिले। फिर, मिथुन कलकत्ता आए। कई दौर में मिथुन से मृणाल दा की बात हुई और वर्ष 1975 के आखिर में 'मृगया' बननी शुरू हुई। कहना चाहिए मृणाल सेन की यह फिल्म, फिल्म कम इतिहास ज्यादा है, क्योंकि 'मृगया' मिथुन चक्रवर्ती और ममता शंकर ‌दोनों की पहली फिल्म भी है। फिल्म 'मृगया' में केके महाजन ने गजब की सिनेमाटोग्राफी की है। लगता है, मिथुन के तीर चलाने के अंदाज को केके महाजन ही पकड़ सकते थे !
  ममता शंकर देश की बेहतरीन नृत्यांगना भी है और कोरियोग्राफर भी। वे अपने जमाने के मशहूर नर्तक उदय शंकर की बेटी और ‌सितारवादक पंडित रविशंकर की भतीजी हैं। अभिनय के साथ-साथ वे बहुत पहले से कोलकाता में 'ममता शंकर बैले समूह' भी चलाती हैं। यह एक नृत्य-संस्था है, जिसका कोलकाता और विदेशों में भी काफी नाम है। सत्यजित राय, मृणाल सेन, बुद्धदेव दासगुप्ता, गौतम घोष और ऋतुपर्ण घोष जैसे फिल्मकारों की वे पसंदीदा अभिनेत्री भी रही हैं। ममता शंकर की बांग्ला फिल्म 'गृहयुद्ध' अभी भी एक लैंडमार्क फिल्म मानी जाती है। बुद्धदेव दासगुप्ता की इस फिल्म में गौतम घोष मुख्य अभिनेता हैं और ममता शंकर अभिनेत्री।
  सिनेमा के पन्नों को पलटता हूं तो पता चलता है 'मृगया' 6 जून, 1976 को रिलीज हुई थीं। इस फिल्म के लिए बहुत मुश्किल से मृणाल सेन निर्माता ढूंढ पाए थे। वे पहले से ही कर्ज में डूबे हुए थे। आखिर में 'मृगया' के लिए एक निर्माता मिले। निर्माता थे दक्षिण भारतीय के राजेश्वर राव। सलील चौधरी को 'मृगया' में संगीत का काम सौंपा गया था। उसके बाद एक-एक कर दूसरे कलाकारों का चयन हुआ। साधु मेहर, समित भांजा और सजल रायचौधरी। बहुत कम लोगों को मालूम है कि 'मृगया' में अभिनेता टाम अल्टर भी थे। अंग्रेज बने ‌थे और ‌उनके अभिनय से मृणाल सेन काफी मुग्ध थे। टाम को अंग्रेजी, हिंदी के अलावा बहुत अच्छी ऊर्दू जुबान भी आती थी। बाद में वे राजकपूर की फिल्म में भी दिखे।
  अपनी पहली ही फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती ने इतना आकर्षक अभिनय किया कि उन्हें वर्ष 1977 में देश के 24वें भारतीय फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रपति पुरस्कार मिल गया। इस फिल्म के लिए मृणाल सेन को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला था। दसवें मास्को अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सव में भी 'मृगया' सराही गई थी। 
  'मृगया' कम बजट की फिल्म थी। कलकत्ता के टाली क्लब और बाकी की शूटिंग झाड़ग्राम में हुई थी। 'मृगया' में मिथुन चक्रवर्ती ने घिनुआ का किरदार निभाया था और अभिनेत्री ममता शंकर ने डुंगरी का। अभिनेता साधु मेहर ने डोरा का और समित भांजा ने सोल्पू का। टाम अल्टर तो थे ही। अभिनेता सजल रायचौधरी मनीलेंडर यानी सूदखोर महाजन के किरदार में थे। 
 आदिवासियों पर जुल्म और शोषण के खिलाफ बगावत करते हुए मिथुन चक्रवर्ती 'मृगया' में अंत में मारे भी जाते हैं। फिल्म में समित भांजा का भी ऐसा ही हश्र होता है। लेकिन, सबकी भूमिका इस फिल्म में इस कदर है कि 'मृगया' भारतीय फिल्मों के इतिहास में रेखांकित हो जाती है। अब भी यह फिल्म कहीं दिखती है तो मृणाल सेन और उनकी प्रतिभाशाली टीम के लिए दिल और दिमाग से 'वाह' निकलता है!
  अरुण कौल और मोहित चट्टोपाध्याय ने 'मृगया'‌ की पटकथा लिखी थीं। अरुण कौल ने हिंदी में 'दीक्षा' (1991) फिल्म बनाई है। 'दीक्षा' में नाना पाटेकर और ‌मनोहर‌ सिंह ने गजब का अभिनय किया था। अरुण कौल यश चोपड़ा की 'चांदनी' फिल्म के भी संवाद लेखक थे। इससे पहले कौल मृणाल सेन की ही हिंदी फिल्म 'एक अधूरी कहानी' के निर्माता थे। गुलज़ार की फिल्म 'इजाजत' और 'लेकिन' में अरुण कौल सहायक थे। 
  मोहित चट्टोपाध्याय वर्ष 2012 में कैंसर से गुजरे। वे‌ बंगाल में थिएटर की एक बड़ी हस्ती थे और संगीत नाटक अकादमी विजेता भी। मोहित चट्टोपाध्याय ने वर्ष 1980 में बांग्ला में एक शिशु फिल्म भी बनाई थी।‌ नाम था उसका 'मेघेर खेला' (द प्ले आफ क्लाउड्स)।
  अभिनेता साधु मेहर अब ओडिशा में रहते हैं। एक जमाने में साधु मेहर ने निर्देशक श्याम बेनेगल की अंकुर, निशांत, मंथन, मृणाल सेन की भुवन सोम, तपन सिन्हा की बाल फिल्म सफेद हाथी जैसी फिल्में की हैं। 27 डाउन, घरौंदा, अभिमान और देवशिशु भी साधु मेहर की उत्कृष्ट फिल्में हैं। साधु मेहर को फिल्म 'अंकुर' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है।
  अभिनेता समित भांजा भी अब नहीं है।‌ ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'गुड्डी' के इस अभिनेता का निधन बहुत ‌पहले हो चुका है। वे जमशेदपुर में पैदा हुए थे और कोलकाता में 24 जुलाई, 2003 को गुजरे। 'गुड्डी' के अलावा 'कितने पास, कितने दूर', 'अनजाने मेहमान', 'वही रात, वही आवाज' समित भांजा की हिंदी फिल्में हैं। वे पुणे के फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान से निकले थे और बांग्ला में सत्यजित राय की 'अरण्येर दिनरात्रि' से‌ लेकर तपन सिन्हा की 'हाटे बाजारे' और 'आपनजन' तक में अभिनय किया है।‌ बांग्ला फिल्म 'हाटे बाजारे' (1967) में अशोक कुमार, वैजयंतीमाला समेत अनेक ‌लोग थे। तपन सिन्हा की बांग्ला फिल्म 'आपनजन' (1968) की ही हिंदी (रिमेक) फिल्म थी 'मेरे अपने',‌ जिसमें मीना कुमारी और विनोद खन्ना ‌ने अभिनय किया था। इसे वर्ष 1984 में गुलज़ार ‌ने बनाया था। बहुत बाद में गुलज़ार की 'मेरे अपने' कन्नड़ भाषा में भी बनी। नाम था उसका 'बेंकी बीरुगली'। यह कन्नड़ की हिट फिल्म मानी जाती है।
  'गुड्डी' 1 जनवरी, 1971 को रिलीज हुई थी। इसमें धर्मेंद्र,‌ जया भादुड़ी, एके हंगल, उत्पल दत्त, सुमिता सान्याल, समित भांजा और केष्टो मुखर्जी भी थे। बाद में 'गुड्डी' तमिल में भी बनी थीं।‌ नाम था 'सिनेमा पेंथियम'। इस तमिल फिल्म में कमल हसन और जयाचित्रा ने क्या खूब अभिनय किया था ! तो‌ यह है कहानी मृणाल सेन और उनकी हिंदी फिल्म 'मृगया' से जुड़े कलाकारों/सहयोगियों की। किसी दरख्त की शाखा पहले एक‌ निकलती है, लेकिन उसकी प्रशाखाएं जब फैलती हैं, तो अनंत होती जाती है। और उसकी छांव पाने को सभी बेताब दिखते हैं।‌ खुशबूदार दरख्त हो, तो कहना ही क्या ! सिनेमा का संसार भी‌‌ ऐसा ही है !

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    'अंतरीन', डिंपल कपाड़िया और मृणाल सेन
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  फिल्मकार मृणाल सेन की बेहतरीन फिल्मों में से एक है 'अंतरीन' (द कन्फाइंड), जिसमें डिंपल कपाड़िया ने अभिनय किया है। वर्ष 1993 में बनीं 'अंतरीन' है तो बांग्ला फिल्म, लेकिन इस फिल्म की कहानी सआदत हसन मंटो की लिखी हुई है। सन् 1950 के आसपास सआदत हसन मंटो ने 'बादशाहत का खात्मा' (एंड आफ किंग्सीप) नामक एक कहानी लिखी थीं, जिसे मृणाल सेन ने काफी पहले पढ़ रखा था। एक खूबसूरत नायिका की तलाश में उन्होंने सालों बिताए। आखिर में 1992 में उन्हें डिंपल कपाड़िया मिलीं। बेहद कम पैसे में वे इस बांग्ला फिल्म को करने के लिए तैयार हो गईं। वजह थी मृणाल सेन, क्योंकि उस समय मृणाल दा की फिल्म में अभिनय करने का मतलब था अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर हो जाना ! 
  कहते हैं कि डिंपल कपाड़िया को 'अंतरीन' में अभिनय कराने के लिए मृणाल सेन को ज्यादा समय नहीं लगा। वर्ष 1993 में इसकी शूटिंग कोलकाता में शुरू हुई। कोलकाता के सदर्न एवेन्यू के एक खूबसूरत बंगले पर सारा सेट लगा। तब जनसत्ता अखबार को कोलकाता में आए तीसरा वर्ष था। याद आता है बड़ी मुश्किल से डिंपल कपाड़िया का इंटरव्यू करने का मौका मिला था। उनकी फर्राटेदार अंग्रेजी मेरे सिर के ऊपर से गुजर रही थीं। शायद बारिश का मौसम भी था। भीगते हुए दफ्तर पहुंचा था। वो भी क्या दिन थे !
   बहरहाल, डिंपल कपाड़िया से बहुत सकुचाते हुए
 कहना पड़ा- मैं हिंदी अखबार से हूं। संभल कर अंग्रेजी बोलिए। 
  फिर, धीरे-धीरे बोलीं और हिंदी सिनेमा तथा
  उसकी दीन-दुनिया पर बढ़िया बातचीत हुई।

  सदर्न एवेन्यू से उत्तर कलकत्ता के बीके पाल एवेन्यू आने में उस रोज मुझे करीब तीन घंटे लग गए थे। एक छोर से दूसरा छोर। मैं इतना खुश था कि कहिए मत ! राजकपूर की 'बाबी' से जो मिल चुका था ! उस रात ठीक से सो भी नहीं सका था। दूसरे दिन बुखार से बदन तप रहा था। 
  उस दिन डिंपल कपाड़िया से बातचीत के वक्त मेरे संग फोटोग्राफर अरुणांशु रायचौधरी भी थे। अरुणांशु आजकल मुंबई में 'द हिंदू' में ‌हैं। जनसत्ता, कोलकाता में छपी मेरी कई अच्छी स्टोरी के साक्षी हैं अरुणांशु। 
  बहरहाल, तपते-से बदन लेकर शाम को किसी तरह दफ्तर भी पहुंच गया था- सहकर्मियों की प्रतिक्रिया जानने के लिए। इसे कहते हैं भीतर की खुशी ! यह 'खुशी' ही खींच कर दफ्तर ले गई थी घरवालों के लाख मना करने के बावजूद। पांव जैसे नाचने को आतुर थे और दिल में 'डम डम डिगा डिगा'‌ हो‌ रहा था ! 

  अच्छी तरह याद है बंबई से बाहर किसी गैर-हिंदी फिल्म में अभिनय करने का डिंपल कपाड़िया का यह पहला तजुर्बा था ! मृणाल सेन से डिंपल ने वादा किया था फिल्म पूरी होते-होते वे बांग्ला बोलना सीख जाएंगी। बांग्ला फिल्म 'अंतरीन' से पहले डिंपल ने 1986 में तमिल फिल्म 'विक्रम' किया था। 'विक्रम' के निर्देशक थे राजशेखर। इस तमिल फिल्म में डिंपल कपाड़िया के अलावा कमल हसन और अमजद खान भी थे। एस रंगराजन के उपन्यास पर बनी 'विक्रम' काफी हिट फिल्म थी। रंगराजन मूलतः इंजीनियर थे। रंगराजन अक्सर 'सुजाता' के छद्म नाम से भी लेखन किया करते थे। रंगराजन ने लगभग 100 उपन्यास और 250 के करीब विज्ञान कथाएं भी लिखी हैं। रंगराजन वर्ष 2008 में गुजरे। यह फिल्म बाद में तेलुगु भाषा में भी 'डब' की गई थीं। तेलुगु में इसका नाम था 'एजेंट विक्रम'।
  बहरहाल, 'विक्रम' फिल्म के साथ एक अनूठा इतिहास भी जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि यह पहली ऐसी भारतीय फिल्म है, जिसके सभी गीत कंप्यूटर पर रिकॉर्ड किए गए थे। तो डिंपल ने बंबई से बाहर पहली दफा तमिल फिल्म 'विक्रम' किया। उसके बाद मृणाल सेन की बांग्ला फिल्म 'अंतरीन' में अभिनय करने के लिए कलकत्ता आईं।।
  'अंतरीन' फिल्म में सिर्फ दो ही मुख्य पात्र हैं। एक हैं डिंपल कपाड़िया और दूसरे हैं अभिनेता अंजन दत्त। अंजन मृणाल सेन के प्रिय अभिनेता भी‌ रहे हैं। वे मूलतः गायक हैं और हिंदी में 'बड़ा दिन' (1998) नामक फिल्म भी बना चुके हैं। 'बड़ा दिन' में शबाना आजमी, मार्क रोबिनसन और तारा देशपांडे ने भी अभिनय किया है। अंजन दत्त मृणाल सेन की हिंदी फिल्म 'एक दिन अचानक' में भी अभिनय कर चुके हैं। अंजन के खाते में अनेक बेहतरीन बांग्ला फिल्में शुमार हैं। बांग्ला फिल्में- चालचित्र, खारिज, गृहयुद्ध और युगांत को बार-बार देखने की इच्छा होती है। इन बांग्ला फिल्मों के बगैर अंजन अधूरे-से हैं।
  बांग्ला फिल्म 'अंतरीन' की कथा एकदम सहज है। एक लेखक है, जो एकदिन कलकत्ता में एक दोस्त के बंगले पर एकांत में लिखने के लिए आता है। एक दिन उसे अचानक एक महिला का फोन आता है। फोन आता नहीं, बल्कि गलती से लग जाता है। और फिर, लेखक (अंजन दत्त) व उस महिला (डिंपल कपाड़िया) में 'फोनालाप' शुरू हो जाता है। दोनों में यह रोज का रिवाज बन जाता है। फिल्म के आखिर में तय होता है वह लेखक से मिलने आ रही हैं। ट्रेन के डिब्बे में जब वह नायिका (डिंपल कपाड़िया) चढ़ने को सवार होती है, तभी सामने नायक (अंजन दत्त) होता है। नायक के 'आइए कहने' (बांग्ला में वह 'आसुन' कहता है) मात्र से वह उसे पहचान जाती है। तभी ट्रेन खुल जाती है। नायिका ट्रेन पर चढ़ जाती है और नायक स्टेशन पर उतर कर ट्रेन को देखता रह जाता है। 
  'अंतरीन' की कहानी इतनी-सी है। यह एक तरह की 'लवलेश स्टोरी' है। कहते हैं कि सआदत हसन ‌मंटो की कथा का अंत कुछ और था। मृणाल सेन ने कहानी के अंत को बदल दिया है। 'अंतरीन' को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिल चुका है। इस फिल्म में अभिनय के लिए डिंपल कपाड़िया की विदेशों में काफी सराहना भी हुई है। कैमरामैन शशि आनंद का छायांकन देखने लायक है। शशि 'अंतरीन' के संगीतकार भी ‌हैं। शशि आनंद पुणे फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान से निकले हैं और इसी कोलकाता में पले-बढ़े हैं। वे वर्ष 1991 में‌‌ बनी मृणाल सेन की बांग्ला फिल्म 'महापृथ्वी' के भी कैमरामैन थे।
  लेकिन, डिंपल कपाड़िया आखिर तक बांग्ला बोलना नहीं सीख पाईं। अंत में डिंपल की आवाज को अनुषया चटर्जी नामक महिला से 'डब' करवाया गया। अनुषया की आवाज डिंपल कपाड़िया से काफी-कुछ मिलती जुलती थी। तो यह थी कथा 'अंतरीन, डिंपल कपाड़िया और मृणाल सेन की !