* निर्भय देवयांश
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शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा देर से ही सही अपनी बेटी सोनाक्षी सिन्हा के कैरियर को दांव पर लगाकर यह बोल पाए हैं - "बॉलीवुड किसी की जागीर नहीं है, किसी के पिता के पिता की।" उनके इस बयान से बॉलीवुड लॉबी काफी समय तक हिसाब चुकाएगी उनकी बेटी से। इसके लिए उन्हें तैयार रहना चाहिए। दोनों पुत्र लव-कुश सिन्हा की कोई पहचान नहीं बन सकी। मिलाजुलाकर पुत्री ही पिता की विरासत संभाल रही है। दूसरे मूवर्स एंड शेखर यानी शेखर सुमन पटना से लेकर मुंबई तक कंगना रनौत की राह पर चलते हुए सुशांत सिंह राजपूत हत्या-आत्महत्या कांड मामले की सीबीआई जाँच के लिए रट लगा रहे हैं। शेखर ने तो बॉलीवुड को "रंगदारों की जमात" तक कह दिया। ये सारे गुस्से जायज इसलिए फिलहाल प्रतीत हो रहे हैं, क्योंकि इन्हें आगे भी बिहार आना-जाना है। अपने गृह राज्य से जुड़े मामले को इग्नोर करना इन दोनों के लिए मुश्किल है। दोनों की राजनीति महत्वकांक्षा है और आगामी चुनावों में सुशांत सिंह राजपूत का मामला छाया रहेगा।
शत्रुघ्न सिन्हा के लिए फिल्मी सफर आसान नहीं था लेकिन पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट की एक्टिंग डिग्री बहुत काम आयी। यहीं पर उनके क्लासमेट और रूम मेट थे सुभाष घई और जावेद अख़्तर। दोस्ती ही थी कि सुभाष घई ने मित्र शॉटगन को लेकर शुरुआती दिनों में ही दो बड़ी सुपरहिट फिल्म दी थी 'कालीचरण' और 'विश्वनाथ'। यह दम्भ ही था शॉटगन का कि एक सेकेंड हैंड कार से मुंबई में चलते थे और जहाँ कार रुक जाती तो साथ में बैठे आमिताभ बच्चन को कहते -अमित तो थोड़ा कार को धक्का दो। तब अपने से आठ साल छोटे शॉटगन के कहे को अमिताभ इनकार नहीं करते थे। उस समय शॉटगन के पास ही सिर्फ कार थी और मित्रमंडली उसी से कहीं आती- जाती थी। वैसे शत्रु को भी आउटसाइडर का दंश झेलना पड़ा था। आज भी शॉटगन खलनायक-नायक की पहचान से बाहर नहीं निकले हैं।
शेखर सुमन को यूँ तो आते ही शशि कपूर के प्रोडक्शन के बैनर तले निर्मित 'उत्सव' में रेखा के ऑपोजिट अभिनय करने का चांस मिला लेकिन यह कामयाबी भी उन्हें बहुत दूर नहीं ले जा सकी। 'नाचे मयूरी' आदि कुछ सोलो फिल्म को छोड़कर शेखर को बड़े पर्दे से छोटे पर्दे पर आना पड़ा। सरवाइवल के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। यह सही है कि शेखर सुमन भी चिकित्सक पुत्र हैं और पटना में रहते हुए उन्हें अच्छी परवरिश मिली थी। शत्रुघ्न सिन्हा की तरह शेखर भी काफी संपन्न मध्यवर्गीय परिवार से आते हैं। जो भी हो, शत्रुघ्न सिन्हा के पुत्र न चल पाए लेकिन बेटी को फिल्में मिल रही हैं। यह सुविधा शेखर सुमन के पुत्र अध्ययन सुमन के लिए उपलब्ध नहीं हो सकी। लांचिंग तो हुई लेकिन रफ्तार नहीं मिली। अध्ययन सुमन से तो कंगना रनौत के रोमांस के किस्से भी खूब सुने गए, पर बॉलीवुड में बिन सफलता रोमांस का कोई मतलब नहीं है।
सुशांत सिंह राजपूत छोटे पर्दे से बड़े पर्दे पर आकर छा गए थे। नाज-नखरे बड़े स्टारों के बच्चों से कम नहीं। शौक-सुविधा जुटाने के लिए पहले दिन से प्रयासरत। बॉलीवुड सुशांत से चाह रहा था कि मनोज वाजपेयी की तरह शांत रहे। स्टेज से दूर। चुपचाप। लेकिन सुशांत की कद-काठी मनोज वाजपेयी की तरह नहीं थी। वह अपने मिजाज में जिंदा था। स्टार पुत्रों की तरह काबिले-तारीफ अंग्रेजी बोलता था। बॉलीवुड लॉबी की संतानों से कम प्रतिभाशाली नहीं था। अगर सुशांत अपनी पूरी उम्र बॉलीवुड में गुजारता तो संभव है कि अब तक के बिहार का सबसे बड़ा स्टार होता। जहाँ तक सुशांत पहुँचा था वहाँ तक पहुँचने में न शॉटगन ने मदद की थी और न शेखर सुमन ने। मनोज वाजपेयी की तो वैसी हैसियत ही कभी नहीं होगी कि वह किसी को एक कदम आगे बढ़ा सके। मनोज को तो खुद ढंग का काम नहीं मिल रहा है और जीने के लिए वेब सीरीज के मोहल्ले में आना पड़ा है। वर्ना एक तरह से दुकान बंद ही समझें, हो गयी है।
सुशांत सिंह राजपूत की प्रतिभा को मौत के घाट उतारने के लिए बॉलीवुड लॉबी ने पूरी ताकत झोंक दी। इस साजिश का भंडाफोड़ जरूरी है, यदि भविष्य में बाहर से आयी प्रतिभाओं को बचाना है। यदि आउटसाइडर के लिए बॉलीवुड में कोई कोना सुरक्षित रखना है!
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