Sunday, 19 July 2020

बॉलीवुड से ' आ अब लौट चलें ' क्योंकि प्रेमचंद भी लौट गये थे, बच्चन भी। अरे, महेश भट्ट ने कंगना रनौत पर फेंकी चप्पल!


* निर्भय देवयांश 
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मैं जब बॉलीवुड से 1996 में लौट रहा था तब सवाल था कि क्यों 1989 से वर्षों यहाँ समय बर्बाद किए। मुंबई से लौटते तो पटना वापस आते। दिल्ली क्यों चले गए। वह भी एक मित्र असमिया आलोक माली को लेकर जिसका मन मुंबई में रहते हुए घूंट रहा था। हालाँकि वह बॉलीवुड से जुड़ा नहीं था लेकिन रहता था जुहू में स्ट्रगलरों के साथ ही पेइंग गेस्ट के तौर पर। दिल्ली भी दरबार है  जो बॉलीवुड से कम हत्यारिन नहीं है। कोरोना काल में कितने लोग दिल्ली से दर-बदर हुए होंगे? किसी के पास कोई हिसाब-किताब है!

 भोगा हुआ दर्द दूसरे, तीसरे, चौथे आदमीनुमा इंसान के लिए किसी महानगर में बदलता होगा, ऐसा है क्या? कुछ भी बदलता नहीं है। यदि हमारे या आपके नाना, दादा के कुछ अपने खानदान-वानदान न हो! इसके अभाव में जो सफरिंग होती है न, वो जानलेवा होती है। मतलब जान ले ही लेती है। जैसे कि सुशांत सिंह राजपूत की जान ले ली गयी। 

 विकास दुबे ने फिल्म 'अर्जुन पंडित' से अपने रुतबे के लिए 'पंडित' शब्द तो ले लिया और 'मैं पंडित बोल रहा हूँ' डायलॉग से वर्षों तक अपराध जगत पर राज किया। लेकिन इस फिल्म से और भी कुछ लिया जा सकता था समझदारी बढ़ाने के लिए। यह गाना क्या खराब था- ' हर कदम पर कोई कातिल है, कहाँ जाएं हम-जिंदा रहना बड़ी मुश्किल है कहाँ जाएं हम।' विकास दुबे ने इस गाना को जीवन में न अपना कर पंडित डायलॉग लिया और फिर एनकाउंटर को अपना जीवन दे दिया। 

 सुशांत सिंह राजपूत घिसट-घिसट कर जीना चाहता तो जी ही लेता। घिसट कर जीने वाले लोग अपने जीवन को संघर्षशील बताते अघाते नहीं है। यह विषय विवाद का नहीं होना चाहिए इसलिए कि आउटसाइडर के लिए कोई स्थायी ठिकाना नहीं होता। आउटसाइडर घिसट-घिसट कर जी नहीं सकता। उसके लिए जीवन का मकसद 'मध्यम वर्ग' की तरह सिर्फ सुविधाओं को बटोरने के लिए जीना नहीं होता है। समय का मूल्य आउटसाइडर के लिए खास होता है। एक्ट और एक्शन में थोड़ी भी देर हुई न कि सुशांत सिंह राजपूत बन जाता है। मुझ जैसा आदमी शहर को छोड़, सपने को लात मार भूल जाता है। सवाल है कि जो लाखों की संख्या में लोग वहाँ स्ट्रगलर हैं वे कहाँ जाएंगे? अभी 20 लाख स्ट्रगलर हैं और इनके सपने हैं कि पर्दे पर दिखें लेकिन पर्दे पर कुछ लोगों की बपौती है। आप क्या करेंगे? तो कोसिए अपने जन्म को। जितने बड़े सपने होंगे उतने बड़े कोसने, उतने बड़े गुस्से, उतनी बड़ी मौत! इसलिए सपने देखने में जल्दबाजी उचित नहीं है। कभी-कभी सपने को रात का अवचेतन स्वप्नदोष समझकर बात आई-गई समझ लेनी चाहिए। सपने से चिपकू किंवदंती के लिए ठीक है, जिनके उदाहरण बाप-दादाओं से लेकर नाना-नानियों तक देते रहते हैं। काश! ये उदाहरण किसी की जान बचा ले। सुशांत सिंह राजपूत को ही जिंदा रख लेता? कलावादी नहीं आखिर विज्ञान से जुड़ा दिमाग और मानसिक विकास था। फिर क्या हुआ? कद छोटा और सपने बड़े हो गए। फिर तो मौत अवश्यम्भावी है। 

 प्रेमचंद अपने बम्बई, अरे यही बॉलीवुड, जाने को लेकर कहते हैं-तन गल रहा है। धन आ नहीं रहा। लड़की की शादी में कर्ज हो गया। 'हंस' और 'जागरण' दोनों ने हमेशा घाटा ही दिया। दोनों लड़कों की शिक्षा पर खर्च बढ़ गया। पैसा! कहाँ से आये। उसूलों की हत्या करके बम्बई फिल्मउद्योग में चाकरी की। संविदा -अवधि भी पूरी न कर पाये। एक वर्ष की जगह दस महीने गुजारने मुश्किल हो गये। क्या मिला बम्बई से? जैनेन्द्र को 14 मई, 1935 के खत में बताया: " बम्बई से क्या लाया? कुल 6300 रुपये। इसमें से 1500 रुपये लड़कों के लिए, 400 रुपये लड़की ने; 500 रुपये प्रेस ने। दस महीने में बम्बई का खर्च बड़ी किफायत से भी 2500 रुपये से कम न हो सका। वहाँ से कुल 1400 रुपये लेकर अपना सा मुँह लिए चले आये। अब ये यहाँ से प्रेस के उठाने में खर्च हो जायेंगे। "

 बच्चन भी अपनी आत्मकथा में बम्बई जाने का जिक्र और दर्द लेकर लौटने की टीस भरी बात लिखते हैं। जो दर्द बयां है उससे बॉलीवुड बेपर्दा ही होता है। 

लेकिन अब इसका जवाब कौन देगा कि किसी करण जौहर पर किसी ने चप्पल फेंकी या पूजा भट्ट पर, या आलिया भट्ट पर? महेश भट्ट ने कंगना रनौत को 'गैंगस्टर' फिल्म में काम क्या दिया कि उन्हें अभिनेत्री पर चप्पल फेंकने का अधिकार मिल गया? यानी प्रेमचंद की माने तो उसूलों की हत्या कर ही कोई बॉलीवुड जाता है लेकिन उसका नतीजा अगर खानदान-वानदान साथ में चिपका नहीं है तो चप्पल खाओ या फिर जान दो। 
   हर कदम पर कोई कातिल है कहाँ जाएं हम
   जिंदा रहना बड़ी मुश्किल है कहाँ जाएं हम....

 

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