* निर्भय देवयांश
प्रेमचंद हिंदी फिल्म उद्योग (मुंबई) यानी बॉलीवुड की नंगई वर्ष 1934 में बता रहे हैं। जो दृश्य दिखा रहे हैं वे सारे भयानक और भयंकर हैं। क्या है उस फिल्म इंडस्ट्री में-नग्नता, वासना, हत्या, मारपीट, पैसा और पतनशीलता। यह इंडस्ट्री काम क्या कर रही है-इंसानियत का खून। इंड्रस्टी एक्सप्लाइट करना जानती है और यहाँ इंसान के मुक़्क़द्दस्तरीन(पवित्रतम) जज़्बात को एक्सप्लाइट कर रही है।
वर्ष 1934 और 2020 के बीच 86 वर्ष गुजर गए। कुछ दशक पहले ही यानी लगभग दो दशक दादा साहेब फाल्के ने इस फिल्म उद्योग की स्थापना किसी उद्देश्य से की होगी-प्रेमचंद के भोगे यथार्थ के आधार पर धज्जियाँ उड़ जाती हैं। ...तो क्या नंगई और वासना ही इसके मूल में हैं ? लेकिन एक्सप्लाइटेशन इंसानों का क्यों? हम जिन्हें इंसान कह रहे हैं वे आमजन और भोली- भाली जनता है जो मन के उकता जाने पर चकाचौंध के वशीभूत होकर गाढ़ी मेहनत की कमाई को दूसरों की नग्नता और वासना को देखने पर बर्बाद कर देती है। एक तरफ कुछ घन्टे में आमजन समय से लेकर पैसे तक गंवा देते हैं तो दूसरी तरफ ये तमाशाई जो पवित्रतम की हत्या करते हैं वे इन हथियारों के जरिए मोटी कमाई कर लेते हैं। करोड़ों के बंगले में रहते हैं। नाम भी करीने से रखते हैं बंगले का-आशीर्वाद, प्रतीक्षा, मन्नत, जलसा, जनक, वाटिका, वसुधा आदि आदि।
प्रेमचंद मुंबई बुलावे पर गए थे। 'सेवासदन' पर फिल्म बनाने का अजंता सिनेटोन, बम्बई से मुआबिदा हुआ। प्रेमचंद के लिए यह एक खुशखबरी थी। 14 फरवरी, 1934 को जैनेन्द्र कुमार को लिखे पत्र में कहते हैं- पहली जून 1934 को बम्बई पहुँचे। फिल्म बनकर तैयार हो गयी। प्रेमचंद इस जिंदगी से उकता जाते हैं। 2 जनवरी 1935 को जैनेन्द्र को लिखा-" भाई, मैं तो इस जिंदगी से उकता गया हूँ। यहाँ डाइरेक्टरों की ज़ेहनिय ही अनोखी है। अपने सिवा किसी की सुनते नहीं। 'बाजारे-हुस्न' की मिट्टी पलीद कर दी।
निराश प्रेमचंद उकताकर, कुढ़कर, कुछ न कर पाने में स्वयं को असमर्थ पाकर, फिल्मी दुनिया के रंग-ढंग से ऊबकर नये अनुभव प्राप्त करके दस महीने बाद आखिरकार बनारस लौट आये। प्रेमचंद को पहला अनुभव यह हुआ कि सिनेमा एक उद्योग है। *साहित्य, संस्कृति, कला और नैतिकता से इसका कोई लेना-देना नहीं है*। सिर्फ मुनाफा कमाने की धुन में सभी मशगूल हैं। पैसा-पैसा और सिर्फ पैसा चाहिए। वहाँ के हर आदमी को पैसे कमाने के ओछे और नीच हथकण्डे अपनाए जाने में किसी को कोई शर्म मालूम नहीं होती।
1 अक्टूबर 1934 को बनारसीदास चतुर्वेदी को लिखे पत्र में प्रेमचंद कहते हैं-" सब रुपये कमाने की धुन में हैं। फिल्में कितनी भी गंदी और भ्रष्ट हों। सब इस काम को सोलहों आना व्यवसाय की दृष्टि से देखते हैं, और जनरुचि को पीछे छोड़ते हैं। *किसी का कोई आदर्श, कोई सिद्धांत नहीं*। शिक्षित रुचि की कोई परवाह नहीं करता। *वही औरतों को उठाया जाना, बलात्कार, हत्या, नकली और हास्यजनक लड़ाइयां सभी फिल्मों में आ जाती हैं*। जो लोग बड़े सफल समझे जाते हैं, वे भी इसके सिवा और कुछ नहीं करते कि अंग्रेजी फिल्मों के सीन नकल कर लें और अंट-शंट कथा गढ़कर उन सभी सीनों को उसमें खींच लाएं।"
निगम जी को 13 नवम्बर, 1934 को लिखे पत्र में प्रेमचंद कहते हैं-" मगर जिस हाथों में फिल्म की किस्मत है। वह बदकिस्मती से इसे इंडस्ट्री समझ बैठे हैं। इंड्रस्टी को रुचि और इस्लाह से क्या निस्बत? वह एक्सप्लाइट करना जानती है और यहाँ इंसान के मुक़्क़द्दसतरीन (पवित्रतम) जज़्बात को एक्सप्लाइट कर रही है। बरहना (नग्न) और नीम बरहना तस्वीरें, कत्ल-ओ-खून और जब्र की वारदातें, मारपीट, गुस्सा, और गज़ब और नफसानियत(वासना) ही इस इंड्रस्टी के औजार हैं और इसी से वह इंसानियत का खून कर रही है।
जिस बम्बई की नंगई दस माह में देखकर प्रेमचंद बनारस लौट गए, उस नंगई को सुशांत सिहं राजपूत क्यों नहीं लगभग 15 साल में देख पाया? परवीन बॉबी हो या फिर जिया खान और दिव्या भारती? मैं खुद आत्महत्या के पूर्व नंगई देखकर ही मुंबई छोड़कर वापस पटना लौट गया था। मेरे दिमाग में प्रेमचंद चिल्ला रहे थे-भागो नंगों के बीच से यदि तुम्हें नंगई पसंद नहीं है।
प्रेमचंद 28 नवंबर 1934 को जैनेन्द्र को लिखे पत्र में कहते हैं-" वल्गैरिटी को यह लोग एंटरटेनमेंट वैल्यू कहते हैं। अद्भुत ही में इनका विश्वास है। राजा-रानी, उनके मंत्रियों के षड्यंत्र, नकली लड़ाई, बोसेबाजी, यही इनके मुख्य साधन हैं। मैंने सामाजिक कहानियाँ लिखी हैं, जिन्हें शिक्षित समाज भी देखना चाहे लेकिन फ़िल्म करते इन लोगों को संदेह होता है कि चले या न चले। "
दरअसल प्रेमचंद पतनशील संस्कृति से तंग आकर बनारस लौटे थे। देखिए, इंद्रनाथ मदान को 26 दिसंबर 1934 को लिखे पत्र में लिखते हैं---" सिनेमा में साहित्यिक व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं है। मैं इस लाइन में यह सोचकर आया था कि इसमें आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सकने का कुछ मौका था लेकिन अब मैं देखता हूँ कि धोखे में था और मैं वापस साहित्य को लौटा जा रहा हूँ। सच तो यह है कि मैंने लिखना कभी बंद नहीं किया, उसको मैं अपने जीवन का लक्ष्य समझता हूं। सिनेमा मेरे लिए वैसी ही चीज है, जैसी कि वकालत होती, अंतर इतना है कि यह अधिक स्वस्थ होती है।"
कला के नाम पर और उसे मूल्य बताकर जो कुछ भी बॉलीवुड कर रहा है। अपने इन पत्रों में और वह भी 86 वर्ष पूर्व जिस तरह प्रेमचंद खोल रहे हैं। वह खतरे की घण्टी है। नंगई समाज में व्याप्त हो वह प्रेमचंद जैसे साहित्यकार कभी नहीं चाहेंगे। निगम जी को 19 मार्च 1935 को लिखे पत्र में प्रेमचंद कहते हैं--" सिनेमा में किसी इस्लाह की तवक्को करना बेकार है। यह सनत भी उसी तरह सरमायदारों के हाथ में है जैसे शराब फ़रोसी। इन्हें इससे बहस नहीं कि पब्लिक की रुचि पर क्या असर पड़ता है। इन्हें तो अपने पैसे से मतलब। बरहना रक्स(नंगे नाच), बोसा-बाजी और मर्दों का औरतों पर हमला। यह सब उनकी नजरों में जायज है। पब्लिक का मजाक इतना गिर गया है कि जब तक ये मुखरिब (घातक), और हयासोज (निर्लज्ज) नजारे न हों, उसे फ़िल्म में मजा नहीं आता। मजाक(रुचि) की इस इस्लाह का बीड़ा कौन उठाए? सिनेमा के जरिये मगरिब की सारी बेहूदगियों हमारे अंदर दाखिल की जा रही हैं, और हम बेबस हैं। पब्लिक में तंजीम (संगठन) नहीं, न नेक-ओ-बंद का इम्तियाज (पहचान) है। आप अखबारों में कितना ही फरियाद कीजिए वह बेकार है, और अखबार वाले भी तो साफगोई से काम नहीं लेते। हीरो-हीरोइन के कसीदे गाये जाएं तो क्यों न हमारे नौजवानों पर इसका असर हो। मई 1935 में रामकृपाल मेहता को लिखे पत्र में प्रेमचंद कहते हैं--" जिन्हें साहित्य का रस लेना हो, उन्हें सिनेमा को दूर से सलाम करना चाहिए। उन्हें तो अपनी कुटी में बैठकर ही साहित्य का आनंद लेना चाहिए।" क्योंकि यहाँ कदम-कदम पर उसूलों की हत्या की जाती है!
प्रेमचंद से कवि बच्चन ने कोई सीख ली थी? बात ऐसी भी नहीं है। वे अपनी आत्मकथा में लिखते हैं --जहाँ वे काम मांगने जाते वहाँ लोग उनकी पत्नी को उनसे अधिक निहारते। तेजी बच्चन और हरिवंशराय बच्चन असहज हो जाते और फिर लौटने का निर्णय लिया।
फिर उस बॉलीवुड को लेकर नाटककारों, साहियकारों, संगीतकारों में दीवानगी क्यों है? कारण स्पष्ट है --देह और नेह के बीच जिंदगी का मजा लेना। इंसानों की रुचि को अपने जैसा बनाकर उन्हें उपभोक्ता बनाना और माल बटोरना। अब समय आ गया है कि प्रेमचंद की जयंती पर बॉलीवुड की नंगई को खुली आँखों से देखें और जहाँ तक हो सके जनता की रुचि को बिगड़ने न दें। प्रेमचंद को मानते हैं तो यही हम-सबकी उनके प्रति उनकी जयंती पर सच्ची श्रद्धांजलि होगी...।
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