* निर्भय देवयांश
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तुलसी बाबा की कही बातें हूबहू घटित हो रही हैं। एक भक्त कवि को यह कैसे पाँच सौ साल पहले पता चल गया कि आने वाला समय भड़ूओं का है! यह तात्कालीन समय की गति का संकेत था या अलौकिक दिव्य दृष्टि का नतीजा? मनुष्य की चेतन-अवचेतन प्रक्रियाओं से इस कदर लाग-लगाव के गहरे अर्थ हैं, क्योंकि अभी सभी क्षेत्रों में कुछ ऐसा ही घटित हो रहा है। यह घटन आज उत्तर आधुनिकतावाद से आगे निकलकर अति उत्तर आधुनिकतावाद तक पहुँच गया है। आदमी अपने होने की मीमांसा को ढूंढ रहा है। इस रास्ते में जितने भी अनैतिक कर्म-कुकर्म हो सकते हैं, उसे अपना कर ही 'सफल आदमी' का लबादा लादकर स्व-विकास के रास्ते पर चल पड़ा है। बाजार-बॉलीवुड की सफलता का प्रथम और अंतिम खाका यही है। जो थोड़ी सी भी नैतिकता, संवेदना की बात करेगा, उसकी मौत कितनी निर्मम हो सकती है, भड़ूए के सिवाय किसी को नहीं पता है? कैसे-कैसे लोग धरती पर सुखी होंगे तुलसी बाबा की 'दोहावली' के एक दोहा में वर्णित है:-
चोर, चतुर, बटमार, नट-प्रभु प्रिय भड़ूआ भंड।
सब भक्षक परमार्थी-कलि सुपथ पाषंड।।
अर्थात कलियुग में यही सही रास्ते बताए जाएंगे।
सुशांत सिंह राजपूत जब मानसिक रूप से परेशान था तो प्रेमिका का तो यही दायित्व बनता था कि अधिक से अधिक वह अपने प्रेमी के लिए हमदर्दी दिखाए-जताए। बकौल कंगना रनौत यह प्रेमिका कई बार सेक्सिस्ट मार्कर निर्देशक महेश भट्ट को सुशांत के घर पर ले आती थी। कंगना पूछती है-क्या महेश भट्ट मनोचिकित्सक है? यदि है तो पहले उसे अपने पुत्र का दिमाग ठीक करना था, जो देशद्रोही गतिविधियों में संलिप्त अमेरिकी आतंकी हेडली का साथ दे रहा था? यह सवाल कंगना क्यों, कोई भी पूछ सकता है कि यह सब किसके इशारे पर चल रहा था? सुशांत की प्रेमिका की जो तस्वीरें महेश भट्ट के साथ सामने आ रही हैं, उन्हें देखकर लगता है कि पीठ पीछे की गलबहियां के तहखाने में कोई राज तो नहीं छुपा है? सुशांत के चाहने वालों की चिंता जायज है कि इन तस्वीरों की सच्चाई सबूत के तौर पर पेश न हों? यह भी तो एक सवाल है कि जब सुशांत सिंह राजपूत मनोचिकित्सक से इलाज करा रहा था, फिर दूसरे तथाकथित मनोचिकित्सक महेश भट्ट की क्या जरूरत थी? जबकि महेश भट्ट के छोटे भाई मुकेश भट्ट यह बार-बार कहते सुने जा रहे हैं कि सुशांत का हाल भी परवीन बॉबी जैसे होगा? तो क्या परवीन बॉबी भी साजिश की शिकार हुई?
मनोचिकित्सक फ्रायड के बारे में कहा जाता है कि जो महिला रोगी उसके इलाज से ठीक नहीं होती थी गलबहियां से ठीक हो जाती थी। महिला मनोरोगियों को ठीक करने के इस उपाय को फ्रायड ने जीवन पर्यंत जारी रखा। मनोवैज्ञानिक जुंग और एडलर से अलग कुछ मनोवैज्ञानिकों, जिनमें एलिस हवलाक शामिल हैं। इनका कहना है कि भावनात्मक रूप से जुड़कर मनोरोगी का इलाज संभव है। देखना यह जरूरी है कि यदि निश्चल आवेग हो तो प्रेमिका की गलबहियां भी अवसादग्रस्त प्रेमी के लिए दवा से कम नहीं हैं। नोबेल पुरस्कार ठुकराए लेखक सार्त्र और सिमोन के प्रेम कुछ ऐसे ही थे। यानी जिंदगी भर सिमोन समर्पित रहीं और दोनों की अपनी-अपनी आजादी अंतिम समय तक प्रिय रही। तथाकथित मनोचिकित्सक महेश भट्ट नहीं बल्कि असली मनोचिकित्सक जिससे सुशांत का इलाज चल रहा था, क्या उन्होंने भी 'मिडिल मैंन' की गतिविधियों पर नजर नहीं रखी?
आखिर यह सवाल तो उठेगा ही कि एक 75-80 वर्ष के बूढ़े सेक्सिस्ट मार्कर निर्देशक को गलबहियां की इतनी जरूरत क्यों पड़ रही है? जबकि 34 साल के अभिनेता की हत्या-आत्महत्या की जा रही है? तुलसीदास जिस भड़ूआवाद का संकेत दे रहे हैं उससे बॉलीवुड का कलावाद कैसे अलग है? सुशांत सिंह राजपूत की दुर्भाग्यपूर्ण जान जाने के बाद दर्शक तुलसीदास जी के कहे पर गंभीरता से सोचने को बाध्य हैं। आखिर वे कब तक अपनी जेब से कला के नाम पर ऐय्याशों को गलबहियां करने की छूट देते रहेंगे और छोटे शहरों से आए अभिनेता साजिशन हत्या-आत्महत्या कांड की भेंट चढ़ते रहेंगे!
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