Friday, 24 July 2020

बॉलीवुड, वर्चस्ववादी घराने और लाखों स्ट्रगलरों के मानसिक हालात?


* निर्भय देवयांश 
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हरिवंशराय बच्चन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि उन्होंने अपने पुत्र अमिताभ बच्चन को बॉलीवुड में काम देने के लिए किसी को पत्र नहीं लिखा। न जाने यह अफवाह कैसे उड़ी कि केए अब्बास ने पत्र के चलते 'सात हिंदुस्तानी' में अमिताभ को अभिनय का मौका दिया। बात चाहे जो भी रही हो एक कवि पिता का नाम तो था ही न अमिताभ के साथ? ये संयोग और सौभाग्य विरले को नसीब हैं। नेता रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान के भी बॉलीवुड में किस्मत आजमाने की चर्चा खूब चली थी, माहौल को भांप राजनीति की अच्छी-खासी विरासत भा गयी। एक तरह से अच्छा ही हुआ कि बॉलीवुड के जानलेवा धक्के खाने से राजनेता पुत्र बच गए। वैसे पिता के पत्र हो तो क्या कहने! किसी नेता की पैरवी हो तो फिर कहना ही क्या है। 

 जिनके पास कुछ नहीं होता है, वे किस चीज को लेकर बॉलीवुड जाते होंगे या जा रहे हैं? ये सवाल इसलिए जरूरी हैं कि बिना इसके किसी निष्कर्ष तक पहुंचना मुश्किल है। क्या अभिनय में दिलचस्पी भर से कोई मुंबई चला आएगा? कुछ नाटक कर लेने के चलते? छोटे शहरों में अभिनय क्षमता की इज्ज़त न होने के कारण? स्कोप की तलाश में? अभिनय में डिग्री-डिप्लोमा के चलते? इन गुणों-अवगुणों-जुनूनों के बावजूद बेकारी के दंश भी विकराल वजह होते हैं। नाम, शोहरत, इज्जत, प्रसिद्धि अगर बॉलीवुड में नहीं होती तो बहुत कम लोग जाते। अपने-अपने शहरों में ही नाटक कर, लिख-पढ़ कर या इसी तरह के ढेर सारे काम कर समय निकालते। जो मुंबई नहीं गए- क्या वे अपने शहरों में अभिनय नहीं कर रहे हैं? कर रहे हैं। उन्हें लोग जानते भी हैं। कोलकाता, दिल्ली, पटना, लखनऊ, जबलपुर, भोपाल, रायपुर आदि-आदि शहरों में लगातार नाटक खेले जा रहे हैं। सभी की अपनी अलग-अलग भीड़ है। फिर भी यह जो सपना है खींचता है सारी रात लंबे सफर पर जाने के लिए। आकाशीय सैर के लिए। देश-विदेश में तफरी के लिए। सत्तासीनों के साथ बैठने-उठने के लिए।

मुंबई की तरफ जाने वाले अधिकांश लोग मध्यम, निम्न वर्गीय परिवार के होते हैं। शत्रुघ्न सिन्हा, शेखर सुमन, सुशांत सिंह राजपूत मध्यमवर्गीय के बेहतर उदाहरण हैं। वहीं मनोज वाजपेयी निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के हैं। मने जैसा आपका वर्ग होगा वैसा ही सघन संघर्ष होगा। कुछ माता-पिता अर्थ की उपलब्धता की वजह से पुत्र के संघर्ष को बल देने के लिए मासिक दस- बीस हजार रुपये भेजते हैं। जिन्हें यह सुविधा नहीं है, वे दर-दर की ठोकर खाते थे, हैं। बच निकलने का कोई उपाय नहीं है। छोटी-छोटी भूमिका की तलाश में उम्र निकल जाती है। पर्दे पर आने का सपना आखिर सपना ही रह जाता है। एक दिन सुशांत सिंह राजपूत हो जाते हैं जबकि उन्हें इतनी बड़ी उपलब्धि और प्रसिद्धि भी नहीं मिलती है।

अब जब बॉलीवुड में वंशवलियां फूलने-फलने लगीं और उसको चुनौती देने के लिए कंगना रनौत और सुशांत सिंह राजपूत जैसे लोग बॉलीवुड पहुंचेंने लगे तो परेशानी पैदा होने लगी। बाप जो बाहरी लोगों पर करोड़ों रुपए का दांव दूसरे पर लगाएगा, उसी रुपए को क्यों नहीं पुत्र-पुत्री मोह में अपने घर की प्रतिभा पर खर्च करेगा! फिर बाहरी लोगों के लिए बचा क्या रह गया। साइड कलाकार के रोल? हीरो-हीरोइन के आगे-पीछे करने वाले, मारपीट करने वाले या मां-बाप-दादा-नानी-चाची की कलाकारी। सबको तो मुख्य रोल मिलेगा नहीं। और उत्तर आधुनिकता तो यही है कि जो कुछ नहीं हो सकता है, उसे बहुत कुछ-सबकुछ बना दो। पूँजी इसमें अहम रोल अदा करती है। सर्वोत्तम सुख खुद के लिए सुरक्षित है।

 आउटसाइडर के पास पूँजी नहीं होती तो उसे बॉलीवुड में इनसाइडर के साथ मिलकर रहने की बाध्यता है। अनुराग कश्यप इसका बेहतर नमूना है। पहले 'प्रिविलेज्ड क्लास' को कोसा और नजदीकी बढ़ गयी तो कंगना रनौत आदि के अंत की घोषणा सुशांत सिंह राजपूत की तरह ही होगा, करने लगा। अनुराग को पता है कि आउटसाइडर के साथ जाने से सुविधाएं छीन जाएंगी। बेहतर है इनसाइडर की माला जपते रहो। 

अब जो अहम सवाल है कि लाखों की संख्या में मौजूद स्ट्रगलरों के मानसिक हालात का जायजा कौन लेगा? अगर कायदे से इनकी जाँच हो तो कितने अवसादग्रस्त, कितने बाइपोलर डिसऑर्डर, कितने पागलपन के शिकार निकल जाएंगे? अभी देश को इस काबिल होना है। अभी बॉलीवुड को कला का स्थान बनना है। असली-नकली प्रतिभा की पहचान होनी है। सुशांत सिंह राजपूत के हत्यारे की शिनाख्त भी तो अभी बाकी है?

1 comment:

  1. बॉलीवुड में बड़े घरानों के रहते प्रतिभा सदा पिसती रहेगी।

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