* निर्भय देवयांश
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घराने में जन्म न होना जनता होना है। मौत रेल पटरियों पर दौड़ती है। इतिहास के पन्ने पर जिनके कब्जे हैं उन्हें राजा-महाराजा कहा जाता है। जनता से थोड़ी-सी अधिक बौद्धिकता दमित वासना की पराकाष्ठा है। भोगने की संस्कृति मध्यम वर्ग पर आकर टिक गयी है। वासना यहाँ से आगे बढ़ेगी नहीं इसलिए सपने यहाँ बेहद खतरनाक पैदा होते हैं। राजनीति चाहे कला, दोनों जगह की बेईमानी पर दुनिया के तमाम चिंतकों, लेखकों, दार्शनिकों ने काफी कुछ लिखा है। मसलन, चिंतक जार्ज लुकाच अमीरों की इच्छा पैदा करने वाली फैक्टरी के खिलाफ थे। उनका कहना था-बहुतेरी इच्छाएं पूरी हो जाने के बाद अमीर अब नाम, शोहरत के लिए कला में घुसपैठ करता है। ऐसा वह इसलिए करेगा, क्योंकि मरने के बाद उसकी प्रतिष्ठा कायम रहे। लिहाजा वह अपना कुनबा तैयार करेगा और जब अमीर नहीं होगा, उसकी गैर-मौजूदगी में चमचे उसके कारनामे को जिंदा रखेंगे।
पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जब भारत से 'ताशकंद समझौते' के लिए मास्को गए थे, क्या पता था कि लौटेंगे नहीं। उनके यहाँ पहुँचने से पहले रहस्य वहाँ पहुँच गया था। रहस्य में बस मौत को जोड़ना था जिसका पूरा नाम है-रहस्यमय मौत। लौटा उनका शव। घराने के लोग का पीछा न रहस्य करता है, न मौत करती है! क्यों नहीं करती है, का सीधा जवाब है कि घराने के घेरे इतने बड़े हैं कि उसमें रहस्य और मौत घुसे तो कैसे? इतनी नजर रहती है कि तिनका भी हिले-डुले ना। करवट बदलने की भी छूट नहीं है। खबरों के बीच रहस्यमय मौत और रहस्यमयी हो जाती है। रोटी, पानी, प्याज वाली जनता को रहस्यमय मौत से क्या लेना-देना। मध्यम वर्ग को अपनी सूअर संतुष्टि की इतनी गहरी चिंता रहती है कि इन विषयों पर कुछ सोचे-विचारे? झल्लाहट में यह वर्ग कहता भी है कि हमारी औकात ही क्या है कि हम कुछ करें। हमें कुछ हो जाएगा तो फिर क्या करेंगे? चिंता वाजिब है।
प्रख्यात लेखक लेफ तोल्स्तोय अपने चर्चित उपन्यास 'युद्ध और शांति' के निष्कर्ष भाग में कुछ गहरे सवाल उठाते हैं। वे पूछते हैं कि गरीबों का यानी बे-घराना वाले लोगों का कोई इतिहास लिखा भी जाएगा कि नहीं? आखिर यह कब तक चलेगा? ऐसी अमीरों की दुनिया में गरीब कब तक शोषित होते रहेंगे। इतिहासकारों ने अब तक जितने भी इतिहास लिखे हैं, सभी शासकों की प्रशंसा में लिखे गए हैं। यह देखकर दुःख होता है। तोल्स्तोय के दुःख को समझा जा सकता है लेकिन कुछ किया नहीं जा सकता है। रूसी लेखक को भी पता था-युद्ध के मैदान में प्येर चलती गोलियों के बीच भी बेफिक्र क्यों है? 'युद्ध और शांति' के पात्र प्येर अमीर है। फिर उसे बे-घराना वालों से डर-भय क्यों होना चाहिए?
सुशांत सिंह राजपूत द्वारा लूनर प्रोपर्टी के माध्यम से चाँद पर जमीन खरीदने की चाहत लगता है महँगी पड़ गयी! जब घराने के किसी बच्चे ने अपने बाप-दादाओं से ऐसी जिद न की थी। फिर बे-घराना बिहारी सुशांत सिंह राजपूत को इसकी जरूरत क्यों पड़ गयी? यह सवाल लंबे समय तक देश-दुनिया के उन बच्चों को कुरेदते रहेगा, जो खतरनाक सपने देखेंगे और भ्रूण हत्या के शिकार होंगे! या फिर सुशांत की तरह हत्या-आत्महत्या कांड के हिस्सेदार हो जाएंगे? इसे भी नाम दिया जाएगा-'रहस्यमय मौत'। इस मौत में आसानी यह होती है कि खबरों की भीड़ सच को दबा देती है। साजिश करने वाले सशंकित होकर भी बाल-बाल बच जाते हैं। फिर अगले शिकार की तलाश शुरू हो जाती।
कंगना रनौत अपनी लड़ाई सुशांत सिंह राजपूत को न्याय दिलाने के लिए मनाली से लड़ रही है। उसे मुंबई में रहना खतरे से खाली नहीं लग रहा है। बे-घराने वाले भाग-भाग कर, दौड़-दौड़ कर, बच-बच कर लड़ते हैं। घराने वाले बे-घराना वाले की इस समझ को 'चूहे-बिल्ली' की भागदौड़ बताते हैं। आखिर वे नाम भी क्या देंगे ऐसे लोगों की जिद को। जो सपने अमीरों के लिए तय है, उसे गरीब पेड़ से तोड़ ले। यह कौन सहन करेगा? बे-घराना वाले डरना नहीं सीखेंगे तो बेमौत मारे जाएंगे! रहस्यमयी मौत! हत्या-आत्महत्या की मौत!
बॉलीवुड की फिल्म 'घराना' के एक गाना की चंद पंक्तियां हैं-
" मेरे आँसुओं सीख लो मुस्कुराना
खुशी का है मौका मगर क्या करूँ मैं
नहीं आज कोई खुशी का तराना
मेरे आँसुओं सीख लो मुस्कुराना।"
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यथार्थ बेहद कडुवा और विद्रूप भरा होता है।हमेशा बड़ेलोग छोटों को ऊपर न आने देने की साजिश करते हैं।व्यक्तिगत, जातिगत, सत्ता गत घमण्ड कारण हो सकते हैं।रौयल डायनेस्टी जैसी बातें भी यह षड्यंत्र करवाती हैं।आज सुशांत की मौत के बाद यह अन्याय हदें पार कर गया और लोग विरोध में खड़े होने लगे।ऐसा होता है।
ReplyDeleteहर अन्याय और शोषण के खिलाफ संघर्ष विकल्प है पलायन या आत्महत्या नही।मरने से पूर्व गलत को खत्म करो।यही जीत होगी मानवता की
भूपेन्द्र जी बिल्कुल दुरुस्त कह रहे हैं। सच तो यही है।
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