**....प्रतिष्ठित पत्रिका का संपादक ऐसा लफंगापन कर सकता है, तो फिर शायद यह आवा ही बिगड़ा हुआ है : प्रेमचंद
* निर्भय देवयांश
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प्रेमचंद की पच्चीस-तीस कहानियों को छोड़कर बाकी सब कूड़ा है। हंस के संपादक संजय सहाय के इस बयान के बाद से ही हो-हल्ला होने के बाद तय था कि राजेंद्र यादव गैंग के गुर्गे मैदान में उतारे जाएंगे। यह इसलिए जरूरी था कि नब्बे दशक के बाद वाले गुर्गे संजय सहाय को बचाने में सफल नहीं हो पा रहे थे। लानत-मलानत लगातार भेजी जा रही थी। एक लाइव में मैंने खुद संजय सहाय के समक्ष बहुतेरे सवाल रखे थे, जिनमें एक सवाल यह भी था कि राजेंद्र यादव की कितनी कहानियां कूड़ा हैं और साहस हो तो मन्नू भंडारी के बारे में भी कहने की हिम्मत जुटाई जाए। लेकिन यह संभव कहाँ होता है? मैंने हंस की प्रबंध निदेशक रचना यादव से भी बात की थी और वे भी संजय सहाय के पक्ष में सुर में सुर मिला रही थीं। मसलन, 'बड़े घर की बेटी' जैसी कहानी की अब कोई प्रासंगिकता नहीं है? यही बात तो संजय सहाय भी कह रहे थे। प्रेमचंद के कामों पर अपना जीवन खपा चुके कमल किशोर गोयनका ने भी सवाल पूछे थे संजय सहाय से, लेकिन जवाब नहीं आना था, सो नहीं आया।
लेकिन क्या संजय सहाय पहली बार प्रेमचंद पर हमला कर रहे थे। बिल्कुल नहीं। सफर में संजय सहाय जैसे कितने लोग आए-गए होंगे। कोई गिनती भी है क्या? लेकिन प्रेमचंद को यह पता था कि जब उनके जीते जी उनके खिलाफ हास्यास्पद घृणा फैलाई जा रही है तो जब वे नहीं रहेंगे तब क्या होगा? उन्हें जीवित रहते हुए आभास हो गया था कि पत्रिका 'हंस' और उनकी रचना के साथ क्या-क्या और कैसी-कैसी शरारतें की जाएंगी।
प्रेमचंद ने लिखा था-" श्रीनाथ सिंह मुझसे मिल चुके हैं और कितने ही मनुष्यों के बारे में ऐसी बातें कर चुके हैं कि यदि मैं लिखूं तो वह प्रयाग में हल्के हो जाएंगे; लेकिन ऐसी बातें करना जितनी बड़ी नीचता है, उसका जिक्र करना, उससे बड़ी नीचता है। इस तरह के प्रोपेगेंडे से श्रीनाथ सिंह जी न साहित्य का उपकार कर रहे हैं , न '' सरस्वती" का, न अपना; वरन संसार के सामने हिंदी के संपादकों की भद्द करा रहे हैं, उन्हें कलंकित कर रहे हैं। आपकी यह कृति देखकर इसके अलावा और क्या होगा कि दुनिया कहेगी-जब "सरस्वती"- जैसी पत्रिका का संपादक ऐसा लफंगापन कर सकता है, तो फिर शायद यह आवा ही बिगड़ा हुआ है।
( पुस्तक, प्रेमचंद और उनका युग, रामविलास शर्मा, पेज न.120)
लेकिन जब हंस की हो रही बदनामी हो रही थी और संजय सहाय, राजेंद्र यादव की रचनाओं में कितना कूड़ा है, की गूंज बढ़ रही थी तो उसे दबाने के लिए शिवमूर्ति और संजीव मैदान में उतारे गए। बहाना मिला उन्हें रेणु के साथ जाति कार्ड का और टारगेट पर आ गए रामविलास शर्मा। जाहिर सी बात है कि लोहा लोहे को काटता है। प्रेमचंद के सामने रचना में खिलन्दरी करने वाले राजेंद्र यादव तो चलेंगे नहीं। संजय सहाय की फिर क्या बिसात है? तो फिर कुछ कद काठी वाले शिवमूर्ति और संजीव ठीक रहेंगे! हुआ भी वही, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। इन दोनों ने रेणु के बहाने जाति कार्ड खेलकर अंततः प्रेमचंद की रचनाओं को कूड़ा साबित करने वाले संजय सहाय का साथ दिया! यदि ऐसा नहीं था तो कायदे से दोनों को हंस के संपादक को कटघरे में खड़ा करना चाहिए था। प्रेमचंद की रचनाओं को बचानी थी। कूड़ा शब्द को राजेंद्र यादव की तरफ शिफ्ट कर एक बार दूर से तमाशबीन होकर देखना था। लेकिन संजीव और शिवमूर्ति की इतनी जुर्रत? आखिर राजेंद्र यादव गैंग के ये दोनों गुर्गे जो ठहरे! नाम, शोहरत, इज्जत मिली है उस गैंग में शामिल होकर। नौकरी भी। कार्यकारी संपादक के पद पर बैठ कर संजीव वर्षों कहानियों की कटनी-छंटनी करते रहे हैं। कैसे शिवमूर्ति और संजीव भला प्रेमचंद के पक्ष में बोलेंगे? राजेंद्र यादव न सही लेकिन क्या संजय सहाय की अदावत मोल लेंगे? यही संजीव हैं न जो 'लेखक कायर होता है' बयान दे चुके हैं। शिवमूर्ति के उपन्यास "कुच्ची का कानून" को लहक ने अपने कई अंकों में चोरी का आरोप लगा कर बहस चलाई थी। लहक के खिलाफ शिवमूर्ति ने लखनऊ के जयशंकर प्रसाद सभागार में संगोष्ठी की और लहक के खिलाफ अधिकांश वक्ताओं ने हमला बोला। वहाँ के अखबारों ने इस पर खबर बनायी।
कुछ सवाल छोड़कर अपनी बात रोकते हैं और वे ये हैं कि रेणु को जाति कार्ड में फिट कर और सवर्णवादी? आलोचक रामविलास शर्मा द्वारा रेणु की उपेक्षा और रचनाओं को महत्व न देने से शिवमूर्ति और संजीव अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगे? शायद नहीं। ऐसा इसलिए कि रेणु प्रेमचंद के बाद दूसरे लेखक हैं जो दर्जनों राजेंद्र यादव मिलकर भी उतनी जगह अपने लिए नहीं घेर सकते हैं। कभी "तीसरी कसम" और "सारा आकाश" फ़िल्म की तुलना से इस सच्चाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं। रेणु नेपाल की क्रांति में अपनी भूमिका निभा चुके हैं और सदा जमीन से जुड़े रहे। उन्हें शौक नहीं था कि तथाकथित फर्जी नयी कहानी आंदोलन में अपनी कहानी को पहली कहानी घोषित करवाएं। बाजी मार ली निर्मल वर्मा की परिंदे ने। कागजी लड़ाई में जब जीत न मिली तो क्रांति में शामिल रेणु को जाति कार्ड से कोई भी पाठक क्योंकर देखेगा? भारत यायावर जैसे बुद्धि संपन्न लेखक-कवि अपने समय को रेणु पर यूँ ही तो नहीं गला रहे हैं! भारत यायावर का कद सुनते हैं कि संजीव और शिवमूर्ति से कम भारी नहीं है। बचे रह गए रामविलास शर्मा तो शिवमूर्ति और संजीव उनका कुछ बिगाड़ कर दिखाएं। सुनते हैं कि रामविलास शर्मा की आलोचना पुस्तक को पाठक संजीव और शिवमूर्ति के उपन्यासों से अधिक चाव-चाह से पढ़ते हैं। संजीव-शिवमूर्ति से अधिक पाठक रामविलास शर्मा की किताबों के नाम भी जानते हैं, होंगे। ये सब बातें तो परखने की हैं।
आपने सही कहा।कितना भी बड़ा समीक्षक या रचनाकार क्यों न हो उसे निराधार महानता पर कीचड़ उछालने का कोई नैतिक आधार नही
ReplyDeleteवे कौन से मानक हैं जिनके अनुसार प्रेमचंद का अधिकांश लेखन कूडा है क्या बता पाएंगे संजय सहाय?ऐसा क्या लिख डाला उन्होंने खुद जिसके बूते वे प्रेमचंद तक चढ़ गए?आदमी को अपना कद पहले नाप लेना चाहिए।कुंठित स्त्रीवादी, दलित वादी राजेन्द्र यादव की जूतियां सीधी करने वाले साहित्य का इतिहास लिखने की कोशिश कर रहे हैं।जिनको मालूम नही कल प्रेम चंद रह जाएंगे और तुम्हारी गलीज़ बातें इतिहास के गटर में पड़ी होंगी।
आपने कायदे से इन सभी को चौराहे पर ला खड़ा किया। यह कि प्रेमचंद तक चढ़ गए---पहले इन्हें अपने और आका के किए धरे की प्रासंगिकता और उनमें कूड़ा की पहचान करने की जरूरत थी। लेकिन ऐसा वे कर नहीं सकते हैं तो नहीं ही करेंगे। और फिर जो करेंगे वह सब गैंग के गुर्गे के माध्यम से ही करेंगे। ऐसा करने में वे खुद को बेपर्दा कर लेंगे और इस मामले में भी यही हुआ।
ReplyDeleteविचारोत्तेजक आलेख ।
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