* निर्भय देवयांश
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प्यार सोचा था, प्यार ढूंढ़ा था
ठंडी-ठंडी सी हसरतें ढूंढ़ीं
सोंधी-सोंधी सी, रूह की मिट्टी
तपते, नोकीले, नंगे रस्तों पर
नंगे पैरों ने दौड़कर, थमकर,
धूप में सेंकी छांव की चोटें
छांव में देखे धूप के छाले
अपने अंदर महक रहा था प्यार---
खुद से बाहर तलाश करते थे....
मीना कुमारी की इन पंक्तियों से गुजरने के बाद शायद पत्थर दिल इंसान भी पसीज जाए कि आखिर ईश्वरों के पास इतना फालतू वक्त कैसे होता है कि किसी को दर्द का समंदर तो किसी को खुशियों का आसमान दे देते हैं। प्यार की तलाश जब भी मन के बाहर किया गया है, फिर जो हाल हुआ है कि कहा न जाए। बेबी मुन्ना की जिंदगी पत्थर ही थी। पत्थर हो गयी थी। बिस्तर पर पत्थर रखकर उसके साथ संवाद किया जाता। उसे प्यार किया जाता। उसे पुचकारा और दुलारा जाता। वजह कि मंजू दिल खोलकर सबकुछ कहती, लड़ती-झगड़ती थी। पत्थर कोई जवाब नहीं देता था। खामोश रहता। खामोशी से मोहब्बत हो जाना इसी को कहते हैं। जीवन में बिल्कुल पत्थर हो जाना। न बचपन की जिद देखी, न जवानी की चाहत। मंजू की कुल 36 वर्ष की जिंदगी। सुशांत सिंह राजपूत की 34 वर्ष की जिंदगी। सबकुछ दूसरे के लिए, अपने लिए सिर्फ मौत!
टुकड़े-टुकड़े दिन बीता,
धज्जी-धज्जी रात मिली।
जिसका जितना आँचल था,
उतनी ही सौगात मिली।।
जब चाहा दिल को समझें,
हँसने की आवाज सुनो।
जैसे कोई कहता हो, लो
फिर तुमको अब मात मिली।।
बातें कैसी? घातें क्या ?
चलते रहना आठ पहर।
दिल-सा साथी जब पाया
बेचैनी भी साथ मिली।।
तीन बहनों में सबसे छोटी बेबी मुन्ना उर्फ महजबीं महज छह साल की उम्र से यानी 1939 से घर की जिम्मेदारी अपने कंधे पर उठा ली। 1939 से 1972 तक हर सांस पर जो भार था उसे ब्रांडी की बोतल भर- भर लत ने नहीं बल्कि मौत ने राहत दी। बेबी मुन्ना की माँ प्रभावती देवी रवींद्रनाथ टैगोर की परिवार से संबद्ध थीं लेकिन पहले ईसाई फिर इस्लाम धर्म स्वीकार कर इकबाल बेगम बन गयीं। पहली शादी नहीं टिक पाई। मुंबई में दूसरी शादी अल बक्स से की। घर की माली हालत ऐसी कि बेबी मुन्ना को रोटी, नमक, प्याज और हरी मिर्च के स्वाद की आदत पड़ गयी। यह आदत गरीबी की थी जिससे कभी मुक्ति नहीं मिली। मौत ही आखिर अंतिम रूप से बेचैनी दूर कर सकी।
थका-थका सा बदन
रूह बोझिल-बोझिल
कहाँ हाथ से कुछ छूट गिरा, याद नहीं
न जाने यह कुछ चटखने की आवाज कहाँ से आई
और एहसास दराड़ों में कैसे पहुँचा
शहर वीरान, झरोखे खामोश, मुंडेरें चुप
खामोशी उफ! खलाओं का(शून्य का) दम भी घुटने लगा
अचानक आ गयी हो मौत वक्त को जैसे
हाय! रफ्तार की नब्जें रुकीं, दिल डूब गया
कहाँ शुरू हुए ये सिलसिले कहाँ टूटे
न इस सिरे का पता है न उस सिरे का...
मंजू की इस कविता, शीर्षक (खामोशी) के दर्द को आखिर जान न्यौछावर करने वाले चंदन उर्फ कमाल अमरोही भी कहाँ समझ पाए? 1952 के आसपास फिल्म 'तमाशा' के सेट पर ही तो कमाल अमरोही उर्फ चंदन से मंजू की पहली मुलाकात हुई थी। दो वर्ष के अंदर ही चोरी-छिपे शादी और फिर पिता के घर से निकाला। यह प्यार एकतरफा भी नहीं था। मीना कुमारी का पहली बार किसी पर दिल आया था और वही सपनों का राजकुमार था। मंजू को इसमें भी कोई दिलचस्पी नहीं थी कि उनका राजकुमार पहले से शादीशुदा है और बच्चों के पिता हैं। इतनी बड़ी कुर्बानी! फिल्में 1952 से ही हिट पर हिट होने लगी थीं। पैसे कमाल अमरोही संभालते। पिता के घर की जिम्मेदारी भी निभायी जा रही थी।
'खाली है मेरे हाथ' शीर्षक कविता की पंक्तियां हैं :-
खाली है मेरे हाथ, मेरे पास कुछ भी नहीं
दामाने-दिल (दिल रूपी दामन) में तलखिए-एहसास (अनुभूतियों की कटुता) के सिवा
देखे थे कितने ख्वाबे-तरब, (सुखद स्वप्न) किस तरह कहूँ
जब कुछ नहीं मिल सका अलम-ओ-यास (दुःख) के सिवा
आखिर वह एक आस थी दम तोड़ने लगी
सब कुछ ही खो चुका था जिस इक आस के सिवा
मैं जिंदगी को देती रही अपना खूने-दिल
खुद मेरी जिंदगी ने मगर क्या दिया मुझे
मेरे ही ख्वाब मेरे लिए जहर बन गए
मेरे तसव्वुरात (कल्पनाओं में) ने ही डस लिया मुझे
मीना कुमारी इन पंक्तियों में साफ इशारा कर रही हैं कि जिस कमाल अमरोही को अपना सर्वस्व दे दिया। पिता को नाराज कर शादी की। अब वही चंदन कह रहा है मंजू से कि तुम्हें किसी से नहीं मिलना है, जिससे मिलो सार्वजनिक मिलो, अकेले में मत मिलो और शाम छह बजे तक घर आ जाओ। एक साथ इतनी पाबंदियां! क्या खूब कहती है बेबी मुन्ना-" मेरे ही ख्वाब मेरे लिए जहर बन गए।" लेकिन मंजू जब ब्रांडी की बोतलों में अपने अकेलेपन में जी-मर रही थी तब भी चंदन का पत्र आया कि 'पाकीज़ा' को पूरा कर दो। एक ऐसी फिल्म जिसे बनाने में लगभग 15 वर्ष लगे। चंदन हर हाल में खुश रहे। मंजू ने हर वादा पूरा किया मगर पाबंदियां कतई मंजूर न थीं और अंतिम सांस तक आजादी की छटपटाहट जारी रही।
जब अंतिम समय में अस्पताल में भर्ती हुई मंजू तो बड़ी बहन खुर्शीद ने कहा कि महज सौ रुपये हैं। मंझली बहन मधु रो रही थी। एक प्रोड्यूसर ने दस हजार की मदद की। फिर चंदन उर्फ कमाल अमरोही मदद को पहुंचे। तब तक मंजू टूट चुकी थी। तसल्ली यही कि चंदन की बाहों में जान निकली। कब्र भी मुंबई में दोनों के अगल-बगल हैं।
बॉलीवुड की इस चकाचौंध दुनिया में न धन की कमी मीना कुमारी के पास थी, न सुशांत सिंह राजपूत के पास? मगर जो असली कमी है संवेदना की, जिस झूठ को परोस कर यह दर्शक को धोखा देता है। प्रेमचंद इसे ही इंसानियत का खून करना कहते हैं फिल्म उद्योग द्वारा।
मंजू की कविता 'टूटे रिश्ते झूठे नाते' की पंक्तियां हैं:-
टूट गए सब रिश्ते आखिर
दिल अब अकेला रोए
नाहक जान यह खोए
इस दुनिया में कौन किसी का
झूठे सारे नाते
बस चलता तो---
हम पहले ही इस दिल को समझाते
हम भी न समझे दिल भी न समझा
कैसी ठोकर खाई
अब हम हैं और जीते जी को
दर्द भरी तन्हाई!
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