Saturday, 30 May 2020

सौदे की जिंदगी के सवाल

* निर्भय देवयांश की कविता 

तय जिंदगी किसे धरती पर मिलती है
एकाध भी हो तो उसकी बात होती है
ऐसा होने से उसे अपराध माना जाएगा

कबूल करने में दिक्कत यह है 
अपराध को जिंदगी नहीं मानते 
उसमें पवित्रता ढूंढ़ते हैं
हत्यारे के लिए चुंबन का क्या मतलब है 
जब उसके हाथ से खून की तैयारी हो चुकी है 

हमारे हाथ से बेहतर दुनिया का विकल्प निकल गया है
समय काटने के लिए हम यहाँ है
अच्छे प्यार हो चुके हैं 
अब जो बचे हैं तिरस्कृत और बुरे हैं 

हम अपने जन्म के बारे में सोचते हुए बूढ़े हो गए
जब न रहेंगे धरती पर 
विदा हो जाएंगे सदा के लिए 
किसी को याद नहीं आएंगे

सौदे में बचता है प्रेम 
आदमी की चाहत।
  फकीर




Friday, 29 May 2020

हिंदी साहित्य के पाठक नहीं, असमय मरे लेखकों की पत्नियों के योगदान को सलाम


* निर्भय देवयांश 
हिंदी साहित्य में पाठकों के पास क्या यह संस्कार विकसित हुआ है कि उनकी भाषा के बड़े या छोटे लेखक असमय मर जाएं तो उनकी रचनाएं धन संग्रह कर ऐसे रचनाकारों की कृतियाँ प्रकाशित करा सकें। अगर गुट के लेखक हुए, संगठन के लेखक हुए, विचारधारा के लेखक हुए, रसरंजन भरी महफ़िल के लेखक हुए तो संभव है कि कुछ सफल हुए हों। भविष्य भी उनके लिए इंतजार कर रहा है। वर्तमान में उन पर कुछ काम हो रहा होगा। 
 विजयदेव नारायण साही आपको याद होंगे। अरे वे नहीं जो आप समझ रहे हैं कि समय-समय अज्ञेय और अशोक वाजपेयी ने मौके-बेमौके मार्क्सवादियों के विरोध के लिए उनका इस्तेमाल किया और साही जी होते भी रहे। आप उन्हें इस रूप में बेहतर ढंग से याद करें तो ज्यादा उनके लिए और आपके लिए बेहतर होगा कि साही जी ने " लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस" जैसा दमदार लेख लिखा था, जिसकी गूंज आज भी अपनी जगह कायम है। आपको नहीं लगता है कि जब भी हिंदी कविता में लघु मानव की बात होती है, विजयदेव नारायण साही वहां उपस्थित हो जाते हैं। अब सोचिए कि जो आलोचक हिंदी साहित्य में सीमा का रेखांकन कर रहा हो और वो अचानक दुनिया छोड़ जाए तो पाठक वर्ग का कोई दायित्व बनता है कि नहीं? अच्छा तो यह बात है कि हिंदी का पाठक वर्ग साहित्य को सिर्फ मनोरंजन के लिए पढ़ता है! अजी यह भी कम एहसान नहीं है रचनाकारों पर? तो फिर जो साही जी से मौके-बेमौके काम निकालते रहे, वही उनकी कुछ रचनाएं जो कि अभी तक अप्रकाशित हैं, छपवा देते? जब इसकी भी उम्मीद न रही होगी तब विजयदेव नारायण साही की पत्नी आगे आईं और जितना बन पड़ा, रचनाएं प्रकाशित हुईं। मगर आज भी बहुत कुछ अप्रकाशित हैं और साया होने के बेचैन! कितने तो हिंदी में आउंडेशन-फाउंडेशन हैं, आपकी पहुँच वहाँ तक हो तो लहक पत्रिका की इस चिंता को जरूर वहाँ तक पहुचाएं। जो ऐसा करेंगे और करते हैं, लहक थाली भर- भर कर दुआ और उनकी बेहतरी के लिए कामना करती है और करती रहेगी। साही जी 'तीसरा सप्तक' के कवि भी थे। इस नाते भी उनको उचित सम्मान मिलना चाहिए कि नहीं? आलोचना के अंक में उनके लेख की तब कितनी प्रशंसा हुई थी जिसका शीर्षक है-"प्रगतिवादी आलोचना की मार्क्सवादी परिणति"। अभी आगे भी देखिए-इलाहाबाद की विवेचना गोष्ठी में पढ़े उनके निबंध"शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट"। ""यह तो हिंदुस्तानी एकेडमी का शुक्र है कि जायसी पर साही जी के व्याख्यानों का संग्रह 'जायसी' नाम से उनके मरणोपरांत प्रकाशित कराकर बड़ा काम किया। साही जी का यह काम इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि रामचंद्र शुक्ल से अलग राय और विचार के तहत जायसी को कवि के रूप में पहचान दिलाते हैं, जबकि शुक्ल जी सूफी। इतना ही नहीं साही जी के निबंध साहित्य क्यों? और छठा दशक आज भी बेजोड़ हैं और पठनीय हैं। 
  देवीशंकर अवस्थी भी असमय दुनिया छोड़ गये और उनकी पत्नी ने उनकी रचनाओं को पाठकों तक पहुंचाने के लिए जो मेहनत - तपस्या कीं, उसके लिए सलाम तो बनता ही है। अब प्रकाशचंद्र गुप्त की बात करेंगे तो आप कहेंगे कि हिंदी में ऐसे भरे पड़े हैं, किन्हें- किन्हें साया करेंगे। अरे, जहां तक हो बंधु कीजिए।  जरूरी तो है नहीं कि बहुत कुछ करें मगर कुछ तो कर ही सकते हैं तो कीजिए। काश! प्रकाशचन्द्र की पत्नी या परिवारवाले ही यह बीड़ा उठाते तो कुछ रचनाएं ही सही, प्रकाशित तो होतीं!

Sunday, 24 May 2020

दुःखी चेहरे से नफरत की बात समझ में आती है

दुःखी चेहरे से नफरत की बात समझ में आती है
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कोख के गणित को कभी किसी मूर्ख से पूछकर देखने से
पता चलता है उसे ज्ञात नहीं
किस रहस्य की बात की जा रही है
नफरत ऐसे लोगों की पैदाइश में है
हम कहते नहीं है इसलिए कि
जब कभी हम तंगहाल होंगे तो तलाश की जाएगी
उन कोखों की जो हमारे जन्म के कारण हैं
अमीरी की सबसे बुरी लत है
उसके पास गालियाँ सिर्फ कमजोरों के लिए हैं
कभी कभी अपने कुकर्मों को गाली दी जा सकती है
कोई आगे आए तो सही उसका इतिहास बनेगा
एक अमीर ने अपनी अमीरी को गाली दी है

सुख से हरे भरे चेहरे को देखकर
दुःखी आदमी नफरत नहीं करता है
उसे आता नहीं है यह सब करना
भूखे पेट से नफरत पैदा होती तो
अभी इतिहास के पन्ने पर शासकों के चित्र,
राजा की वंशवलियां नहीं होतीं
सूनी माँग होती 
विधवा विलाप से सराबोर माहौल

दुःखी चेहरे किसी भी संविधान के लिए गहरे घाव हैं
सभ्यताएँ मिट जाए तो भी नफरत नहीं मिटती है
इन्हें ताउम्र रोना है
अकाल मौत में छिपी मुस्कान के साथ

यह आश्चर्य है
उदासी में हँसना कोई इनसे सीखे
जो कई दिनों से भूखे प्यासे हैं...

                 *फकीर 


        

Saturday, 23 May 2020

मनुष्य अपने पाप को स्वीकार न कर भूल कर रहा है। इसकी जो कीमत चुकानी पड़ रही है या पड़ेगी वह अकल्पनीय होगी। सुख, आनंद, मजा के उलट फेर, रहस्यों- रोमांच से पैदा हुए मनुष्य के पास फिर इतनी आलोचना आती कहाँ से है? इस पर विचार करने का वक्त उनके पास भी नहीं है जो पूरी जिंदगी आलोचनामा में लगा देते हैं। घाव बस यही है कि जन्म हुआ और मरने की धीरे धीरे तैयारी करनी है लेकिन माया मोह को यह विचार नागवार लगता है। आखिर इन आलोचनाओं के बलबूते कोई भी पहुंचेगा कहाँ तक। जब कहीं पहुंचना नहीं है। एक बंद कोठरी से आए और एक खुले चितास्थल पर जल जाना है। इसके लिए इतना कोहराम क्यों लगा रखा है कि जैसे आसमां गिर पड़े। कोई भी ऐसी समस्या इस दुनिया में नहीं है जिसकी जवाबदेही से मनुष्य बच सकता है। बचना ही आलोचनामा का अंबार है।

Friday, 22 May 2020

हिंदी में हाशिए पर रखने और ठेल देने की कलाबाजी का कोई जवाब नहीं है। यदि आपके पास कुछ नहीं है लेकिन तिकड़म है तो आपकी प्रतिष्ठा आसमानी हो जाएगी। इसे एक प्रसंग से समझते हैं। यह सच भी हो कि महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1903 में सरस्वती के संपादक बनने के बाद से कहानी विधा , जो तब आख्यायिका कही जाती थी, को प्रोत्साहित करने के लिए मनमानी छूट लेखकों को दे दी। हद तो यह कि हिंदी नवजागरण के अग्रदूत कहे जाने वाले द्विवेदी जी ने तीन आख्यायिका खुद लिख डाली-महारानी चन्द्रिका, तीन देवता व भारत वर्ष का तारा। द्विवेदी जी भी यह दावे के साथ नहीं बता सकते थे कि यह विदेशी साहित्य की नकल नहीं है और असली है। इसे एक उदाहरण से समझना उचित होगा। किशोरीलाल गोस्वामी की कहानी इंदुमती सरस्वती में 1900 के जून अंक में प्रकाशित हुई। सवाल है कि श्यामसुंदर दास यह क्यों नहीं समझ पाए कि इंदुमती शेक्सपियर की रचना टेम्पेस्ट की नकल भर है। कुछ घटा-बढ़ाकर। लेकिन यह बात छुपी नहीं रही। अंग्रेजी साहित्य के दीवाने रामचंद्र शुक्ल से भला यह बात कैसे छुपी रह सकती थी। सो, उन्होंने कहा कि यह तो भाषान्तर है। बकौल श्यामसुंदर दास- आख्यायिका का आकार आधुनिक युग की आवश्यकता के अनुसार ऐसा था , जो पाठकों के लिए सुविधाजनक सिद्ध हुआ। इसी कारण सामयिक पत्रों-पत्रिकाओं में उसे स्थायी स्थान प्रदान किया गया है। जिससे उसकी ओर जनता का ध्यान अधिक मात्रा में आकृष्ट हो सका है। आख्यायिकों की इस लोकप्रियता के कारण एक तो लेखकों को आर्थिक और व्यावसायिक दृष्टि से लाभ होता है और दूसरी ओर उन्हें समीक्षकों, संपादकों तथा पाठकों की सम्मति जानने का अधिक अवसर प्राप्त होता है। सहित्यालोचन, पेज 183। तो पूर्वजों ने ही नकल कर , चोरी चमारी कर , इधर-उधर से हेरा-फेरी कर हाथ और मुँह मारने की खुली छूट दे रखी है। फिर इस चोरी चमारी से चिंतित प्रेमघन को यह नहीं कहना पड़ता-कुछ परिश्रम स्वीकार कर मस्तिष्क लड़ा विशुद्ध भाषा और भाव के संग विद्या और शिक्षा लाने से भाषा का उपकार संभव है, न कि केवल ऐसी कहानियों के लिख डालने से जैसा कि लोग प्रायः जबानी कहा करते हैं और जिनके पढ़ डालने के पीछे नेत्रों के कुछ कष्ट होने या समय व्यर्थ जाने के अतिरिक्त पाठकों को और कुछ लाभ न हो। पत्रिका आनंद कादम्बिनी, 1908। *अगली किश्त बंग महिला उर्फ राजेंद्रबाला घोष ने जब इस चौर्य कांड का खुलासा किया तो चरित्र हनन की कोशिश की गयी*। आश्चर्य है कि महावीर प्रसाद द्विवेदी और शुक्ल जी भी चुप रहना बेहतर समझे। याद रहे कि लहक ने कमलेश्वर के समान्तर कहानी आंदोलन को फर्जीवाड़ा घोषित किया। 1971 में कथाकार सिद्धेश ने सारिका में एक पत्र लिखकर तहलका मचा दिया था। लहक में सिद्धेश जी ने ही लेख लिखकर फर्जी कहानी लेखन की पोल खोली।

चतुर्थ मानबहादुर सिंह लहक सम्मान 2020 से संस्मरण के पुरोधा कांतिकुमार जैन सागर में और साहित्य के साधक मधुरेशजी बरेली में सम्मानित किये गये। 14 मार्च को बरेली के रोटरी क्लब में मधुरेशजी का सम्मान हुआ और 15 मार्च को सागर में जैन साहब का। इस बीच बीना में प्रसिद्ध ग़ज़लकार महेश कटारे सुगम जी के सौजन्य से एक रात रहने का सुअवसर मिला। बरेली में कार्यक्रम की अध्यक्षता यशपाल जी के सुपुत्र आनंद यशपाल और संचालन दुनिया इन दिनों के संपादक कवि सुधीर सक्सेना ने किया। वक्ता में अमीरचंद वैश्य, रणजीत पांचाले, प्रसिद्ध आलोचक कर्ण सिंह चौहान, प्रदीप सक्सेना, अंजू तोमर, दीबा नियाजी, अजित प्रियदर्शी, बीनू सिन्हा रहे। मानबहादुर सिंह का परिचय उमाशंकर सिंह परमार ने दिया। धन्यवाद ज्ञापन सुरेश कुमार ने किया। लेखक लवलेश दत्त, नितिन सेठी, निर्भय सक्सेना व अन्य की मौजूदगी रही। सागर में सम्मान समारोह की अध्यक्षता प्रख्यात आलोचक कर्ण सिंह चौहान ने की जबकि संचालन उमाशंकर सिंह परमार ने किया। वक्ता में टीका राम त्रिपाठी, डॉ उदय जैन, सुधीर सक्सेना, साधना कांतिकुमार शामिल रहीं। जैन साहब की सुपुत्री गोपा और उनके सुपुत्र सात्विक ने भी नाना को फूल देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम में छबिल कुमार मेहेर, आशुतोष मिश्रा, विमलेश्वर द्विवेदी, रामगोपाल पारीक, निर्भय देवयांश उपस्थित थे। बरेली, सागर और बीना की कुछ तस्वीरें।

हिंदी की जानी मानी लेखिका निर्मला जैन से Me too प्रकरण पर निर्भय देवयांश की टेलीफोनिक बातचीत

https://youtu.be/lF5a8jN9TVM

Wednesday, 20 May 2020

निर्भय देवयांश की कविता

#जब बार- बार #आएगा #कोरोना 
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आखिर हम अकेले हो ही गये प्रिये 
साथ आए थे ही क्यों जब मिलन में दुश्वारियां थीं 

क्या सूर्य ने घासों को 
चाँद ने फूलों को 
करीब आने से इसीलिए तो नहीं रोके रखा 
ज्यादा पास आना
एक दूसरे के मिजाज में खलल है 
बेहतर है दूर रह कर 
चाहे जितना फूलों फलों
इनके भी अपने लार होते हैं
मजा मगर दूर से लेते रहे

आदमी जो कि इंसानियत से सदा दूर रहकर 
आखिर क्यों सूअर स्वार्थ में गंधाता रहा 
एक दूसरे के चुम्बनों में सराबोर हो 
मोक्ष पाने की जिद कर बैठा
जबकि तय था बहुत दूर रहो
जज्ब करो इंसानियत महसूसी है
करीब आने से जैसे स्वार्थ में टकराहट 
चूर चूर कर देने की चुनौती
लैला मजनू, रोमियो जूलियट के किस्से
कोरोना के बनाए तो हैं नहीं
कमिनगोई की आवारगी के लिए 
जब दोपाई आदमी खुद को जिम्मेवार नहीं ठहराएगा
कोरोना को ऐसी जलालत भरी हरकत से क्या लेना देना 
उसे तो किये की सजा देनी है 
खूब मजे लेकर 

यह सूअर संतुष्टि ने तय किया 
विचारधारा में संगठित होकर आदमी विकास करता है
लूट खसोट के जरिए वजूद बनाता है
औरों से अलग होकर बुद्धिजीवी कहलाता है
करीब से देखने पर 
जिसके पास सूअर सुविधा के अलग अलग अंदाज हैं
उसे जब कोई आदमी कहता है
तो खुद के आदमी को ही गाली देता है
सूअर सुविधा विकास का तकाजा है 
यह किसने तय किया है करुणा ने 
या कोरोना ने

यही विचारधारों ने तो संगठित होकर कत्लेआम किए 
बलात्कारियों ने इंसानियत की इज्ज़त तार तार किए
सामाजिकता के सिद्धांत जब गढ़े गये तो उसमें 
यह क्यों नहीं बताया गया कि कोरोना जैसे रोग को पैदा करना
आदमी की लम्पटगिरी है
विज्ञान की बेहयाई
पूंजी की नंगई है

बुद्धिजीवियों की बेहद नंगई का पर्दाफाश
सिद्धांत, विज्ञान, विकास का खुलासा जब 
कोई रोग कोरोना करे
फिर यह तय किया जाए 
अब सामाजिक सरोकार को बचाए रखने के लिए 
दूर दूर रहो
पास न आओ
चुम्बन न खाओ
सोए को जगाने के लिए 
थाली न हो घर में 
दो हाथ है उसी से ताली बजाओ

ऐसा करते वक्त ईश्वर 
आदमी के सूअर स्वार्थ से पैदा हुआ कोरोना का तांडव देखेंगे
वैज्ञानिक संभव हो हाइड्रोजन बम से भी खतरनाक
कोई बम बनाकर कोरोना को सबक सिखाएंगे
कलाकार व्यवसाय करेंगे
पूँजीपति चाँद पर घर बनाने का सूअर सपना देखेंगे 

कोरोना बार बार आएगा 
सूअर सुविधा से लतपथ होते मनुष्य के होश को 
ठिकाने में लाने के लिए जलवा दिखायेगा
ईश्वर के प्रतिनिधि बनकर आए कोरोना से 
कुछ भी सीख लेकर आदमी 
जीव जंतुओं के प्रति नफरत छोड़ 
थोड़ी भी करुणा पैदा कर सके
सूअर स्वार्थ में खाने में मजे के लिए
सांपों, बिच्छू, बिल्लियों को आहार न बनाएं
फिर ईश्वर भी सहमे नजर आएंगे
दोपाई जानवर मनुष्य से प्रकृति की इज्ज़त की उम्मीद
शायद बेमानी न हो

ईश्वरों को उम्मीद है
आदमी शायद कभी न कभी 
आदमी बनकर दिखाएगा 

आदमी को आदमी होने के 
कुछ मौके और दिए जाएं
इसके लिए भी थाली पीटने, 
ताली बजाने की जरूरत है। 
    #फकीर

Tuesday, 19 May 2020

हमें अपने पूर्वजों पर नाज नहीं नाराजगी है, चाहे वे साहित्यकार हों या राजनेता। किसी भी देश के इतिहास को बनाने के लिए सफरिंग में उस संवेदना की जरूरत पड़ती है कि आप अपने लिए कितना कम से कम लेते हैं और दूसरों के लिए कितना अधिक से अधिक छोड़ते हैं। बुद्ध के देश में मैकियावेली की इतनी गहरी घुसपैठ समझ से परे है। हमारे निर्माण में खोट है। हम बर्बादी के शुभ संकेत की ओर बढ़ रहे हैं, जब हम बर्बादी को अशुभ मानकर ही नहीं चल रहे हैं तब शुभ संकेत ही कहना बेहतर है। इस बर्बादी के लिए अब तक किसी की जिम्मेदारी तय नहीं हुई है। मैकियावेली हँस रहा है, बुद्ध मौन हैं। मौन।

तृतीय मानबहादुर सिंह लहक सम्मान 2019 से सम्मानित हुए प्रख्यात कवि मलय और विख्यात आलोचक धनंजय वर्मा। लहक और तीसरा पक्ष की तरफ से मलय जी के लिए जबलपुर और वर्मा जी के लिए दुनिया इन दिनों पत्रिका और लहक की ओर से भोपाल के स्वराज भवन में आयोजन किये गये। दोनों सम्मान समारोहों की कुछ तस्वीरें। जबलपुर में पहल के संपादक ज्ञानरंजन भी मंच पर उपस्थित थे। दोनों जगह अध्यक्षता कर्ण सिंह चौहान, मुख्य वक्ता नीलकांत, उमाशंकर सिंह परमार, ज्ञानरंजन, देवेश चौधरी, अरुण कुमार, ओम भारती, प्रज्ञा रावत व अन्य रहे। दोनों जगह संचालन का जिम्मा दुनिया इन दिनों के संपादक व कवि सुधीर सक्सेना ने निभाया। जबलपुर में धन्यवाद ज्ञापन जाने- माने कवि व मंडला के डीएम असंग घोष ने किया। समारोह में प्रसिद्ध कवि राजेश जोशी, लेखक शशांक, रमाकांत श्रीवास्तव, रामगोपाल पारीक, विवेक चतुर्वेदी, निर्भय देवयांश मौजूद थे।