Tuesday, 19 May 2020

रामचंद्र शुक्ल को लेकर ताजा विवाद पर जाने - माने कवि - आलोचक चंद्रेश्वर और निर्भय देवयांश के हस्तक्षेप

( आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर चल रही बहस को ध्यान में रखकर मैंने निर्भय देवयांश की वॉल पर आज ही टिप्पणी की तो उन्होंने उसे एक पोस्ट बना दिया ¦ कुछ सुधार के साथ उसे पुनःयहाँ  दे रहा हूँ ¦ कल मैंने वीरेन्द्र यादव जी की वॉल पर भी एक टिप्पणी की थी | उसे भी यथावत यहाँ दे रहा हूँ ¦)

चंद्रेश्वर जी ने #शुक्लजी को #बलि का बकरा #बनाकर #राजनीति की  रोटी सेंकने वालों को #अर्थपूर्ण जवाब दिया है। देखें और सोचें कि जहाँ तर्क और संवाद नहीं होते वहाँ #नेतागिरी कैसे #चमकायी जाती है...
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Nirbhay Devyansh जी आप सही कह रहे हैं ¦ यहाँ साहित्य की चिंता कम,नेतागिरी की चिंता ज़्यादा है ¦ साहित्य में मैं अस्मितामूलक विमर्शों के प्रति बहुत ही नरम और संजीदा रूख अपनाता रहा हूँ ¦ यह साहित्य के जनतंत्रीकरण और सेहत के लिए अच्छा होता है कि उसमें समाज के हर तबके के लोगों को विमर्श का मौका मिले ¦ यहाँ पिछले दिनों पं. रामचंद्र शुक्ल के इतिहास लेखन की स्थापनाओं पर जो सवाल उठाए गए या उठाए जा रहे हैं ,उनको लेकर किसी लोकतांत्रिक चेतना से प्रतिबद्ध लेखक को दिक्कत नहीं होनी चाहिए ¦ मेरे गुरुदेव और हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक शिवकुमार मिश्र की एक पुस्तक ही है कि " मार्क्सवाद देव मूर्तियाँ नहीं गढ़ता ¦" शुक्ल जी पर तमाम सवाल पहले भी उठे हैं ¦ आगे भी उठते रहेंगे ¦ उनके लेखन की ख़ूबियों या खामियों पर रोशनी डालने का काम पहले भी हुआ है | यह स्वस्थ आलोचना की पहचान है | रामचंद्र शुक्ल के ब्रिटिश उपनिवेशवाद विरोधी लेखन को नज़रअंदाज़ करना सही नहीं है ¦ वे व्यापक संदर्भों में मानवतावादी परिप्रेक्ष्य के लेखक हैं ¦ उनकी आलोचना में देशी और पश्चिमी लेखकों के चिंतन की भी गहरी छाप है ¦ यहाँ तो मंशा है उनको हिन्दी साहित्य से वहिष्कृत करने या उनको देश निकाला देने की ¦ इनलोगों का अगर वश चले तो ये लोग यूँ चुटकी बजाते शुक्ल जी को ख़ारिज कर दें ¦ आप क्यों नहीं तर्क और शोध से नया और दूसरा हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखते हैं ! आपको किसने रोका है ! कब रोका है ! इस देश में बाबा साहब भीम राव अंबेडकर का संविधान लागू है ¦ क्या आपके विरोध करने से या गाली देने से  सबलोग लिखना बंद कर देंगे !  आप भी लिखें ,हम भी लिखें ¦ फ़ैसला वक़्त पर छोड़ दें ¦ बहुतेरे पिछड़े और दलित लोग सामंती मिज़ाज़ के मिल सकते हैं,लेखक भी ¦  सन् 1992 में 6 दिसंबर को अयोध्या में  बाबरी मस्ज़िद को ढहाने पहुँची भीड़ में बहुसंख्यक पिछड़े और दलित समाज के लोग थे ¦ क्या वे आपके आह्वान पर हिन्दू धर्म से बाहर आ जायेंगे ? आपको ज़मीनी हक़ीक़त से बावस्ता होना चाहिए ,रूबरू होना चाहिए ¦ हमारा समाज एक बहुरंगी,विविधवर्णी समाज है ¦ इसमें कई मेल और सोच के लोग हैं ¦ आप सबको एक ही साँचे में क्यों ढालना चाहते हैं ¦ यह कुंठा की मानसिकता तज दीजिए तो बेहतर हो ¦ आप को जो न पसंद आये उसे न पढ़िए | अपनी राह स्वयं बनाइए ¦ आपको चुनने की आज़ादी है ¦ अतीत में जाकर जातिवादी प्रतिशोध लेने से कोई समाधान नहीं निकलेगा ¦ डार्विन की थियरी न अपनाइए ¦ आप भी जियें औरों को भी जीने,लिखने का हक़ दीजिए ¦ आपके चाहने से सबकुछ एकायामी नहीं हो जायेगा ¦ वैसे भी भँड़ास साहित्य नहीं होता भाई ¦ आप सबपर शक ही करेंगे तो कैसे परिवर्तन होगा !  शुक्ल जी को पवित्र गाय न मानें ,उनपर विवेक से बात करें ¦ कोई नहीं रोकेगा आपको ¦ हर लेखक की युगीन या वर्गीय सीमायें होती हैं ¦ शुक्ल जी अपवाद नहीं हैं ¦ शुक्ल जी की बखिया उधेड़ दीजिए ¦  सिर्फ़ ठोर मारने से नहीं होगा ,कुछ ठोस करना पड़ेगा ¦
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आपलोग जिस तरह से सवाल पर सवाल  
उठा रहे हैं ,वह स्वागतयोग्य है ¦ जड़ और जड़ीभूत सौन्दर्यानुभूति ,बोध ,अभिरूचि  या उनसे जुड़ी हुईं स्थापनाओं पर लगातार चोट पड़नी चाहिए | उनपर विवेक का रंदा चलना चाहिए ¦ हिन्दी में एक कुलीन वर्ग हमेशा ऐसे सवालों की अनदेखी करता रहा है | उन सवालों से टकराना नहीं चाहता है ¦  रामचंद्र शुक्ल को उत्तेजना में गाली देने से बेहतर होगा कि उनकी स्थापनाओं को तार्किक तरीके से ख़ारिज करते हुए एक नया हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा जाय | यह कार्य टीम वर्क के साथ भी हो सकता है ¦ रामचंद्र शुक्ल के आगे का इतिहास लिखा जाना अपेक्षित है अभी ¦ उनके बाद के आलोचकों ने भी कोई इस तरह का बड़ा काम नहीं किया है ¦ अब वह वक़्त आ गया है भाई साहब ¦ रामचंद्र शुक्ल की अपनी वर्गीय या जातीय सीमायें थीं | उनको प्रश्नांकित होना ही चाहिए | यही साहित्य का सही और असली जनतंत्र है ¦ हिन्दी में पिछले तीन दशकों में हुए अस्मितामूलक विमर्शों ने पुराने तमाम लेखकों की हदों को सामने ला दिया है ¦ यह हमारी हिन्दी के विकास का परिचायक है न कि उसके पतन का ¦
* साभार- चंद्रेश्वर जी की फेसबुक पोस्ट से *
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