कविता-समय की जन-आहट
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★शोषण, जुल्म और यातना के प्रतिकार और जनविद्रोह को लेकर अनेक कविताएं शम्भू बादल के संग्रहों में भरी पड़ी हैं, जिनमें से कुछेक का नाम न लेना कवि के साथ ज्यादती होगी, बहरहाल, इनमें से कविता गुजरा, बाज और चिड़िया, शिकार, चिड़िया, मैं ही महेंद्र सिंह हूँ, रचनाकर और जनता, हरीश दुखी है, साँवली लड़की, लेनिन की आवाज, कबूतर, मारा गया फुलवा, चिड़िया वही मारी गई, भगत-रूप धर प्यारे, साथ साथ साथ, बुधन ने सपना देखा, चाँद मुर्मू, पोयट बहार का आदि विशेषत: उल्लेखनीय हैं। ये कविताएं उस जन के साथ खड़ी हैं जो समाज के उत्पीड़ित जन, क्रांतिकारी विचारधारा, क्रान्ति-नायकों के विचारों, भावों, व्यक्तित्वों से प्रभावित होकर प्रतिकूल परिस्थितियों को बदलेने के लिए तत्पर, सक्रिय रहते हैं। यहाँ पात्र विशेष ही नहीं, उसके साथ पूरा समाज उद्वेलित, गतिशील और संघर्षरत दिखता है। मनुष्य के साथ पशु-पक्षी भी उत्पीड़न महसूस करते हैं। वे केवल निरीह जीव न होकर आक्रोश और प्रतिरोध के भाव से लैस मिलते हैं। यहाँ चिड़ियाँ एक सामान्य पक्षी ही नहीं, चहचहाती भर नहीं, विरोध का सामर्थ्य भी रखती है। ‘शिकार’ कविता की तोता-मैना का उदगार
शिकारी जब तक जिंदा है
हर दिन हमें मारता है /
भून-भान खाता है/
शराब पीता है/
ऐश करता है/
असल में हमारे मांस का/
चसका लगा है शिकारी को /
हम शिकारी पकड़ेंगे/
इसके लिए चलें/
जाल बनाएँ/
जाल को/
शिकारी के माथे पर गिराएँ/
शिकारी जाल में उलझेगा/
हम चोंच से मारेंगे/
वह छटपटाएगा / (पृ सं – 22/ शम्भु बादल की चुनी हुई कविताएं )
जब कवि परिवेश या लोक के साथ स्वयं को इतना साधारणीकृत या सामंजित कर लेता है कि जनभाषा को काव्यभाषा में रचने की जादुई शक्ति उसे हासिल हो जाती है तो वह सर्वहारा शक्ति का वाहक बनकर अपनी कविता को क्रांतिधर्मी बना देता है। रचनाकारों में यह शक्ति बिरले ही आ पाती है। इसका सीधा संबंध उन काव्येतर मूल्यों से है जो किसी लेखक का विशिष्ट लक्षण होता है और जिसे हम उनमें ‘ईमानदारी और साहस’ भी कहते हैं। इसी ईमानदारी और साहस के विशिष्ट काव्येतर गुण ने कुमार विकल, गोरख पाण्डे, अवतार सिंह संधु ‘पाश’, नाज़िम हिकमत आदि कवियों के अंदर जनविद्रोह के स्फुट स्वर पैदा किए जिसका प्रसन्न विकास हमें कवि शंभू बादल की कविताओं में भी देखने को मिलता है। शंभु बादल ऐसे ही लोककवि हैं जिनकी भाषा जनभाषा है जो कहीं रुक्ष, कहीं अनगढ़ तो कहीं लोक-रस से आप्लावित दिखती हैं जो भाषा के कुछ बड़े कवियों की आभिजात्य प्रकृति से बिलकुल अलग है।
अपने पहले कविता–संग्रह ‘पैदल चलने वाले पूछते है’ (1986) में ही शंभु बादल ने कविता की दुनिया में अपने विद्रोही स्वभाव और चरित्र का संकेत दे दिया था। यह व्यापक जनवादी संदर्भों की 12 खंडों में एक लंबी कविता है जिसमें सेरा (एक पात्र) के सवाल श्रमजीवी स्पर्श पाकर नई ताकत प्राप्त करते हैं –
‘हम गीता की आत्मा नहीं /
विद्रूप हैं /
सुरूपता के नाम पर /
हमें और विद्रुप बनाने की चाल/
चल रहा कौन? /
भूख से मौत के लिए /
कौन ज़िम्मेदार है ? /
मृत या /
जीवित मनुष्य ?’
ऐसे बहुत सारे सेरा के अनगढ़ सवाल भद्रलोक के भद्राचार को तोड़ते नजर आते हैं, जिसे बिना किसी अतिरिक्त सर्जनात्मकता या सुघड़ता के कवि ने कविता में रखते हुए अपनी जनपक्षधरता को वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ मजबूती प्रदान किया है। पैदल चलने वाले जन का आज भी यही सवाल है और अब उन्हें इन सवालों को पूछने और ढूँढने से रोका नहीं जा सकता जो यह शंभु बादल की कविता की दीर्घजीविता का प्रमाण है।
बादल जी का दूसरा संग्रह काफी विलंब से बीस वर्षों के अंतराल पर आया – ‘मौसम को हाँक चलो’ (2007) । इन वर्षों में लोकजीवन में सामाजिक-आर्थिक विषमता और गहरायी, विपन्नता और नए वीभत्स रूप में हमारे सामने आई, राजनीतिक जीवन ज्यादा अराजक और कुचक्रों के शिकार होने लगे, नायकों के और कुत्सित चरित्र उजागर हुए, उन सबकी ही बानगी दूसरे संग्रह की हासिल है। इतने सालों के बाद भी कवि संघर्षशील जनता के पक्ष में उसी मजबूती से खड़ा दिखाई देता है, यहाँ विरोध के स्वर पहले से और तीखे, नाद और स्वरित, दृश्य और मार्मिक दिखते हैं। कवि की भाषा पहले से अधिक सघन, प्रतीकमयी और भाव-बोधात्मक हो गई है, अंडरटोन और लहजे अधिक संयत, भेदस और दो-टूक हो गए हैं। पैदल चलने वाले अब पूछते भर ही नहीं, अच्छे समय की प्रतीक्षा से खिन्न हो इस दुर्निवार समय(मौसम) को खुद हाँकने की तैयारी में खड़े दिखते है। एक नई लड़ाई की तैयारी में उद्धत दिखते हैं -
‘बेर का सूखता पेड़ /
पास के सघन सन्नाटे में घिरा /
बहुत उदास दिखता है /
उसे अनुकूल मौसम का इंतजार है /
मौसम के इंतजार में खड़ा न रहो पेड़ /
मौसम को हाँक चलो /
हरा-भरा बनो /
जड़ें गहरी हैं /
ऊर्जा है /
ग्रहण करो’ –
यानि यातना के भीतर आत्महीनता के बोध से दबे समाज के थके-हारे जन में आक्रोश अब आकार ले रहा है और फूटने को है।
तीसरे काव्य संग्रह “सपनों से बनते हैं सपने” में आवरण-पृष्ठ पर बक़ौल केदारनाथ सिंह ‘मिट्टी, पत्थर और काँटों की हाथ देखने की आकांक्षा रखने वाला कवि गहरे अर्थ में जनपक्षधर चेतना का हामी कवि है जिसका प्रमाण इस संग्रह की अनेक कविताओं में देखा जा सकता है। वस्तुत: ये जन को संबोधित कविताएं हैं वहाँ कला की काट-छाँट पर कम और सीधे सम्प्रेषण पर ज़ोर अधिक दिखाई पड़ता है।‘
हम कह सकते हैं कि समय की तमाम त्रासद स्थितियों यथा; बाजारवाद, लूट, भ्रष्टाचार, गरीबी, विस्थापन, रूढ़िवाद की जकड़न, कुत्सित राजनीति, युद्ध की विभीषिका, शोषण, जुल्म आदि के बीच शम्भू बादल की कविताओं का मूल स्वर और संप्रेष्य जनविद्रोह ही है जो अन्य समकालीन कवियों से इन्हें न केवल अलगाता है, बल्कि महत्वपूर्ण और प्रासंगिक भी बनाता है क्योंकि इसमें बदलने वाले समय की जन-आहट है।
@ सुशील कुमार
* साभार-सुशील कुमार की फेसबुक पोस्ट से *
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