Friday, 22 May 2020

हिंदी में हाशिए पर रखने और ठेल देने की कलाबाजी का कोई जवाब नहीं है। यदि आपके पास कुछ नहीं है लेकिन तिकड़म है तो आपकी प्रतिष्ठा आसमानी हो जाएगी। इसे एक प्रसंग से समझते हैं। यह सच भी हो कि महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1903 में सरस्वती के संपादक बनने के बाद से कहानी विधा , जो तब आख्यायिका कही जाती थी, को प्रोत्साहित करने के लिए मनमानी छूट लेखकों को दे दी। हद तो यह कि हिंदी नवजागरण के अग्रदूत कहे जाने वाले द्विवेदी जी ने तीन आख्यायिका खुद लिख डाली-महारानी चन्द्रिका, तीन देवता व भारत वर्ष का तारा। द्विवेदी जी भी यह दावे के साथ नहीं बता सकते थे कि यह विदेशी साहित्य की नकल नहीं है और असली है। इसे एक उदाहरण से समझना उचित होगा। किशोरीलाल गोस्वामी की कहानी इंदुमती सरस्वती में 1900 के जून अंक में प्रकाशित हुई। सवाल है कि श्यामसुंदर दास यह क्यों नहीं समझ पाए कि इंदुमती शेक्सपियर की रचना टेम्पेस्ट की नकल भर है। कुछ घटा-बढ़ाकर। लेकिन यह बात छुपी नहीं रही। अंग्रेजी साहित्य के दीवाने रामचंद्र शुक्ल से भला यह बात कैसे छुपी रह सकती थी। सो, उन्होंने कहा कि यह तो भाषान्तर है। बकौल श्यामसुंदर दास- आख्यायिका का आकार आधुनिक युग की आवश्यकता के अनुसार ऐसा था , जो पाठकों के लिए सुविधाजनक सिद्ध हुआ। इसी कारण सामयिक पत्रों-पत्रिकाओं में उसे स्थायी स्थान प्रदान किया गया है। जिससे उसकी ओर जनता का ध्यान अधिक मात्रा में आकृष्ट हो सका है। आख्यायिकों की इस लोकप्रियता के कारण एक तो लेखकों को आर्थिक और व्यावसायिक दृष्टि से लाभ होता है और दूसरी ओर उन्हें समीक्षकों, संपादकों तथा पाठकों की सम्मति जानने का अधिक अवसर प्राप्त होता है। सहित्यालोचन, पेज 183। तो पूर्वजों ने ही नकल कर , चोरी चमारी कर , इधर-उधर से हेरा-फेरी कर हाथ और मुँह मारने की खुली छूट दे रखी है। फिर इस चोरी चमारी से चिंतित प्रेमघन को यह नहीं कहना पड़ता-कुछ परिश्रम स्वीकार कर मस्तिष्क लड़ा विशुद्ध भाषा और भाव के संग विद्या और शिक्षा लाने से भाषा का उपकार संभव है, न कि केवल ऐसी कहानियों के लिख डालने से जैसा कि लोग प्रायः जबानी कहा करते हैं और जिनके पढ़ डालने के पीछे नेत्रों के कुछ कष्ट होने या समय व्यर्थ जाने के अतिरिक्त पाठकों को और कुछ लाभ न हो। पत्रिका आनंद कादम्बिनी, 1908। *अगली किश्त बंग महिला उर्फ राजेंद्रबाला घोष ने जब इस चौर्य कांड का खुलासा किया तो चरित्र हनन की कोशिश की गयी*। आश्चर्य है कि महावीर प्रसाद द्विवेदी और शुक्ल जी भी चुप रहना बेहतर समझे। याद रहे कि लहक ने कमलेश्वर के समान्तर कहानी आंदोलन को फर्जीवाड़ा घोषित किया। 1971 में कथाकार सिद्धेश ने सारिका में एक पत्र लिखकर तहलका मचा दिया था। लहक में सिद्धेश जी ने ही लेख लिखकर फर्जी कहानी लेखन की पोल खोली।

1 comment:

  1. महावीर प्रसाद द्विवेदी 2003 में कहाँ थे जो आख्यायिकाएँ लिखीं। जनाब-ए- आली साल ठीक कर दीजिए।

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