Saturday, 23 May 2020
मनुष्य अपने पाप को स्वीकार न कर भूल कर रहा है। इसकी जो कीमत चुकानी पड़ रही है या पड़ेगी वह अकल्पनीय होगी। सुख, आनंद, मजा के उलट फेर, रहस्यों- रोमांच से पैदा हुए मनुष्य के पास फिर इतनी आलोचना आती कहाँ से है? इस पर विचार करने का वक्त उनके पास भी नहीं है जो पूरी जिंदगी आलोचनामा में लगा देते हैं। घाव बस यही है कि जन्म हुआ और मरने की धीरे धीरे तैयारी करनी है लेकिन माया मोह को यह विचार नागवार लगता है। आखिर इन आलोचनाओं के बलबूते कोई भी पहुंचेगा कहाँ तक। जब कहीं पहुंचना नहीं है। एक बंद कोठरी से आए और एक खुले चितास्थल पर जल जाना है। इसके लिए इतना कोहराम क्यों लगा रखा है कि जैसे आसमां गिर पड़े। कोई भी ऐसी समस्या इस दुनिया में नहीं है जिसकी जवाबदेही से मनुष्य बच सकता है। बचना ही आलोचनामा का अंबार है।
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