#धरती विचारधाराओं से #मुक्त रहती
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विचारधाराओं में लिखी गयी रचनाएं
मनुष्यता की नृशंस हत्या करती हैं
यह विश्वास उनको नहीं होगा जो
खुद वर्षों दशकों तक सुविधाओं से खेलते रहे हैं
लेकिन उनकी वकालत गजब की होती है
गरीबों पर अत्याचार के लिए
विचारधारा को नहीं शासक को दोषी ठहराते हैं
कभी इन्होंने ऐसे हत्यारे शासकों के लिए फांसी की मांग की
यह इनके बूते की बात न रही कभी
इनके बूते के अंदर सिर्फ नपुंसक शब्द हैं
जिनकी बलि तरह तरह की रचनाओं की विधाओं में देते हैं
शोकगीत की तरह रुदाली गाते हुए
आखिरी सांस तक इन्हें अपने लिखे पर यकीन नहीं होगा
कुदाल पकड़ कर कुछ करते तो
दो चार पसेरी अनाज पैदा करते
रचनाएं तो दो चार भूखे के लिए
रोटी न जुटा सकी
गुहार न लगा सकी
संवेदना की भीड़ न जुटा सकी
इन्हें मालूम नहीं शायद
नपुंसक शब्द उस रचनाकार की हत्या
पाठक से पहले कर देते हैं
रचनाओं की हत्या बार बार करने से बेहतर है
अपने आपसे यह पूछना कि विचारधाराओं के वादे
जनता के हित में पूरे नहीं हुए लेकिन
जिन्होंने पैदा किए उनके सूअर सपने भी पूरे हो गए कैसे
ये सवाल दांते के शब्द पूछ सकते हैं
काफ्का के शब्द भी
विचारधारा वादियों के शब्दों पर विश्वास कर
गरीब और उसकी भूख बार बार रौंदी गयी हैं
इसलिए दुनिया के सारे शब्दों को
रचनाओं में उड़ेल देने से भी
एक इंच भी जमीन की जुताई न हो सकेगी
धान की बुआई न हो सकेगी
शौचालय की सफाई न हो सकेगी
शब्दों से हम ज्यादा ठेला ठेली कर रहे हैं
अपने ही अभिमान का प्रचार कर रहे हैं
आप जो नहीं हैं उसी को सच बता रहे हैं
सरोकार जिंदा रहता तो
धरती विचारधाराओं से मुक्त रहती
अवांछित पीड़ा न सहती...
#फकीर
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