Tuesday, 19 May 2020

निर्भय देवयांश की कविता

अब #खेल प्रकृति #खेलेगी
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दुनिया पर रहम
आदमी की सोच में नहीं 
इसलिए जब रौंदता है
जिस्मों को तो उसे मालूम होता है यही मजा है 
यह अनुवांशिक गुण है
पागलपन भी खानदानी पेशा की तरह 
राजा बनने का शौक भी खून से आता है
अपाहिज भी, नपुंसक भी, हत्यारे भी 
हमारे शासक हुए हैं 
हमने उनके इतिहास लिखे हैं 
आदमी के लिए मजा की जो चौहद्दी बनाई गई है
उसमें सबकुछ जायज होता है

सुकरात की चिंता थी
हम नाजायज औलादें तो नहीं हैं
फिर क्यों नँगा सच बोलने से आदमी डरता है
पेट तो सूअर, गधे, कुत्ते सभी के हैं 
उसके लिए झूठ का संसार रचेंगे 
ऐसा करने से होगा ही क्या आखिर 
जब मरेंगे हजारों मजा के लिए 
लाखों पाप पर खून के पंजे होंगे 
तो ऐसी दुनिया में सुकरात नहीं रहेगा 
सच कहेगा और मूर्ख शासक द्वारा मरेगा
सुख के लिए कुछ भी करने की जिजीविषा
मनुष्य के लिए तय नहीं है 
उसे तो जलना है सूर्य की तरह
मगर हवस में जल रहा है 
पैदाइशी वासना का समंदर में डूबा
फुर्सत कहाँ है दो पल 
प्रकृति के पास बैठे 
सांसों की माला समर्पित करे

रौंदना जानवर का भी स्वाभाव नहीं है
फूल पत्ते और ओस की बूंदें 
जब सूर्य की किरणों से स्पंदित होती हैं 
वहां संवेदना से हाल चाल पूछा जाता है
भावनाओं की ऐसी पकड़
समझो गले मिले हों कि कल फिर मिलेंगे 

सदियों के बाद यह दावा की आदमी विकास करता है
जरूर अपने दुश्मनों को क्रूरता से मरता है 
कमजोरों पर अत्याचार
अबलाओं के साथ बलात्कार
यह विकास ही है उसके लिए 
जिसके पास दंभ है वही आदमी है
जिसके पास नहीं है वह फिराक में है
विचारधारा पैदा करने की कोशिश में 
गरीबों के नाम पर अपने बुरे दिन बदलने हैं
कितने सिद्धांत आए गए
गरीब ठीक वहीं खड़ा मिलेगा 
जहां से आदमी होना अस्वीकार किया गया है
उसे कभी आदमी होना नहीं है

प्रकृति ऐसी किसी मनोवृत्ति को जानती हो
धरती पर किसी जीव जंतु के पास वर्चस्व है
उसे सृष्टि को अंत करने का मादा है
ऐसी सृष्टि बना देने की औकात पर 
आदमी सदा खामोश रहता है 
जो बना सकता है 
उसे बर्बाद करने की कुव्वत प्रकृति नहीं देती है

आदमी अपनी हवस में बर्बाद हुआ जा रहा है
उसे होना ही है बर्बाद 
उसे अपनी मौत का तमाशा भी देखना है
कितने सारे यंत्रों को बनाकर नाचा है वो
प्रकृति को यही यंत्र विधवा बनाए हैं 

अब खेल प्रकृति खेलेगी 
तमाशबीन आदमी होगा...
          #फकीर

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