Tuesday, 19 May 2020

हमें अपने पूर्वजों पर नाज नहीं नाराजगी है, चाहे वे साहित्यकार हों या राजनेता। किसी भी देश के इतिहास को बनाने के लिए सफरिंग में उस संवेदना की जरूरत पड़ती है कि आप अपने लिए कितना कम से कम लेते हैं और दूसरों के लिए कितना अधिक से अधिक छोड़ते हैं। बुद्ध के देश में मैकियावेली की इतनी गहरी घुसपैठ समझ से परे है। हमारे निर्माण में खोट है। हम बर्बादी के शुभ संकेत की ओर बढ़ रहे हैं, जब हम बर्बादी को अशुभ मानकर ही नहीं चल रहे हैं तब शुभ संकेत ही कहना बेहतर है। इस बर्बादी के लिए अब तक किसी की जिम्मेदारी तय नहीं हुई है। मैकियावेली हँस रहा है, बुद्ध मौन हैं। मौन।

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