* जयनारायण प्रसाद
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वरिष्ठ पत्रकार व कला-समीक्षक
मृणाल सेन की फिल्मों के बारे में सोचना जितना सहज है, उनकी फिल्मों पर टिप्पणी करना उतना ही जटिल है। मृणाल सेन की ऐसी ही एक बांग्ला फिल्म है 'नील आकाशेर नीचे'। यह मृणाल सेन की दूसरी फिल्म है, जो बनीं तो बांग्ला भाषा में, लेकिन हिंदी की जानी-मानी कवयित्री महादेवी वर्मा की एक छोटी-सी कथा पर आधारित है। इस हिंदी कहानी का नाम है 'चीनी फेरीवाला'।
'नील आकाशेर नीचे' का हिंदी में मतलब है नीले आसमान के नीचे। 'नील आकाशेर नीचे' कोलकाता में 20 फरवरी, 1958 को रिलीज हुई थीं। तब श्वेत-श्याम फिल्मों का जमाना था। जाहिर है, यह भी श्वेत-श्याम फिल्म है। मृणाल सेन बहुत पढ़ाकू थे। छात्र तो वे साइंस के थे, लेकिन भारतीय और विदेशी साहित्य में उनकी दिलचस्पी बेहिसाब थी। सिनेमा भी खूब देखते थे।
सिनेमा की दुनिया में पूरी तरह उतरने से पहले मृणाल सेन उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव थे। उसी समय कवयित्री महादेवी वर्मा की इस कहानी से वे परिचित हुए। परिचित मतलब एक दोस्त ने महादेवी वर्मा की 'चीनी फेरीवाला' शीर्षक कहानी उन्हें पढ़कर सुनाई थी। तभी से यह कहानी उनका पीछा कर रही थीं।
मृणाल सेन ने शायद तभी मन बना लिया था कि एक दिन इस कथा पर वे फिल्म बनाएंगे। फिर, जब 1957 में इस फिल्म के लिए वे निर्माता ढूंढने लगे, तो आखिर में संगीतकार हेमंत मुखर्जी इसमें पैसा लगाने के लिए तैयार हुए। कई दौर की बातचीत के बाद हेमंत मुखर्जी और उनकी गायिका पत्नी बेला मुखर्जी राजी हुईं। उसके बाद 'हेमंत-बेला प्रोडक्शंस' नामक एक फिल्म कंपनी बनी। फिर, 'नील आकाशेर नीचे' का निर्माण शुरू हुआ। हेमंत और बेला मुखर्जी की दो संतान हैं। बेटा जयंत मुखर्जी और बेटी रानू मुखर्जी। रानू ने 1960 के दौर में संगीत की दुनिया में काफी नाम कमाया था। बेटा जयंत मुखर्जी की शादी अभिनेत्री मौसमी चटर्जी से हुई है। जयंत रवींद्र संगीत के गायक भी रहे हैं और फिल्म निर्माता हैं।
बहरहाल, लेखिका महादेवी वर्मा की यह कहानी 'चीनी फेरीवाला' मूलतः एक ऐसी कथा है, जिसमें साम्राज्यवाद का विरोध है। इस कहानी में वांग लू नामक एक अप्रवासी चीनी फेरीवाला है, जो 1930 के आसपास कलकत्ता में फेरी का काम करता था। कहते हैं कि उसका एक चीनी दोस्त उसे अफीम के गोरखधंधे में लाना चाहता था, लेकिन अपनी मेहनत और ईमानदारी से वह डिगा नहीं। कोलकाता में फेरी करते-करते उसकी मुलाकात वासंती नामक एक महिला से हुई, जो उस समय साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन से जुड़ी हुई थी।
कालांतर में दोनों में बहन-भाई का रिश्ता बन जाता है।
लेकिन, वासंती आजादी की लड़ाई के लिए होने वाले आंदोलनों से जुड़ी रहती है। एक दिन वह जेल भी चली जाती है। दोनों में संबंध के कारण वांग लू भी शक के घेरे में आ जाता है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ हिंदुस्तान में चलने वाले आंदोलनों के प्रति यह चीनी फेरीवाला सहानुभूति भी रखने लगा था। लेकिन, किसी तरह बच-बचाकर आखिर में 1931 में वांग लू अपने देश चीन लौट जाता है। फिर, वह अपने देश में जाकर साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों में जुट जाता है। उस समय जापान और चीन के बीच संघर्ष भी चल रहा था। वांग लू नामक इस चीनी फेरीवाले की कथा बस इतनी-सी है। छोटी-सी, लेकिन मारक ! एक बार पढ़ेंगे, तो जेहन में हमेशा तरोताजा बनी रहेगी। अच्छी कहानी पर बनीं बेहतरीन फिल्में हर पीढ़ी पर असर डालती हैं। ऐसा इस देश के जीनियस फिल्मकार सत्यजित राय भी मानते थे। दुर्भाग्य से अब यह 'शायद' में तब्दील होता जा रहा है !
133 मिनट की यह ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म जब रिलीज हुई, तो मृणाल सेन अचानक चर्चा में आ गए। इसे देखने के लिए लोगों की भीड़ लग गई। कुछ ही हफ्तों के बाद मृणाल सेन की इस बांग्ला फिल्म 'नील आकाशेर नीचे' पर प्रतिबंध लग गया।
बहुत कम लोगों को मालूम होगा मृणाल सेन की बांग्ला फिल्म 'नील आकाशेर नीचे' भारत की वह पहली फिल्म है, जिस पर प्रतिबंध लगा था। हालांकि, यह प्रतिबंध थोड़े समय के लिए था। बुद्धिजीवियों के हो-हल्ले के दो महीने के बाद ही इस फिल्म पर से प्रतिबंध हटा लिया गया। लेकिन, बंदिश की वजह से इस फिल्म की मांग बढ़ गई थी और कोलकाता और पूरे देश में मृणाल सेन एक जाना-पहचाना नाम बन गया था। इसे कहते हैं साहित्य और सिनेमा की ताकत ! बेहतरीन साहित्य पर जब 'कायदे का सिनेमा' बनता है, तो सत्ता भी सिहरने लगती है। हिंदी भाषा की कहानी, फिल्म बनी बांग्ला जुबान में और पूरी दुनिया उसके मर्म को जानने-समझने लगी। सुना है, कहीं आपने !
'नील आकाशेर नीचे' की पटकथा मृणाल सेन और गीतकार गौरीप्रसन्न मजुमदार ने मिलकर लिखी थी। इस फिल्म में गीत गौरीप्रसन्न मजुमदार ने ही लिखे थे। संगीतकार थे हेमंत मुखर्जी। निर्देशक की कमान मृणाल सेन के जिम्मे थी। शैलजा चटर्जी की फोटोग्राफी अव्वल दर्जे की थी। अब भी इसके एक-एक दृश्य आंखों के सामने तैरते-से दिखते हैं।
हेमंत मुखर्जी की पत्नी बेला मुखर्जी भी तब बड़ी गायिका थीं और लेखराज भाखरी की फिल्म 'सहारा' में गीत गाकर हिंदी सिनेमा में स्थापित हो चुकी थीं। 'सहारा' वर्ष 1958 की फिल्म है, जिसमें मीना कुमारी, मनोज कुमार और लीला मिश्रा की यादगार भूमिका थी। तब तक हेमंत मुखर्जी की हिंदी सिनेमा में पहचान बन चुकी थी। गायक और संगीतकार दोनों रूपों में।
दो दफा राष्ट्रपति पुरस्कार पाए हेमंत मुखर्जी बीस साल बाद, कोहरा, राहगीर, खामोशी समेत अनेक हिंदी-बांग्ला फिल्मों के कामयाब संगीतकार रहे हैं। उन्होंने वर्ष 1972 में इंडो-अमेरिकन बैनर तले बनीं अंग्रेजी फिल्म 'सिद्धार्थ' में भी संगीत दिया था। हरमन हेश के इसी नाम के अंग्रेजी उपन्यास पर बनीं इस फिल्म में शशि कपूर, सिमी ग्रेवाल और रोमेश शर्मा ने अभिनय किया था। करनाड रुक्स ने इस फिल्म का निर्देशन किया था।
फिल्म 'नील आकाशेर नीचे' में काली बनर्जी, मंजू डे, स्मृति विश्वास और विकास राय ने अभिनय किया था। बांग्ला की मशहूर फिल्मों 'दादार कीर्ति' और 'गुरु दक्षिणा' जैसी फिल्मों में अमर किरदार निभाने वाले काली बनर्जी ने वर्ष 1972 में ऋषिकेश मुखर्जी की हिंदी फिल्म 'बावर्ची' में भी अभिनय किया है। उनके जैसा अभिनय का 'तोड़' अब बांग्ला सिनेमा में नदारद-सा है। ऐसे थे अभिनेता काली बनर्जी !
काली बनर्जी जन्मे थे कोलकाता में जरूर, लेकिन वर्ष 1993 में वे लखनऊ में गुजरे। एक हिंदी सिनेमा में अभिनय के सिलसिले में उनका वहां जाना हुआ था।
यादों के पन्ने पलटता हूं तो कई चीजें याद आती हैं। 'नील आकाशेर नीचे' की एक नायिका हैं स्मृति विश्वास, जो उस दौर में बांग्ला और हिंदी दोनों फिल्मों में अभिनय किया करती थीं। बाद में उस जमाने के सबसे पढ़े-लिखे फिल्मकार एसडी नारंग से विवाह किया। एसडी नारंग अर्थशास्त्र में पीएचडी थे और पाकिस्तान के लायलपुर में जन्मे थे। लायलपुर तब के पंजाब प्रांत में था। वर्ष 1948 से 1951 तक एसडी नारंग कलकत्ता में भी रहे। तब कलकत्ता में न्यू थिएटर्स का जमाना था और अच्छी फिल्में यहीं बनती थीं।
यादों का कारवां बताता है नायिका के रूप में स्मृति विश्वास 1930 से 1960 तक सक्रिय थीं और एसडी नारंग की प्रायः हर फिल्म की हीरोइन थीं।
यहूदी की लड़की, रागिनी, नेक दिल, चांदनी चौक, दो ठग, एक औरत, दिल्ली का ठग आदि स्मृति विश्वास की यादगार फिल्में हैं। मेरी किस्मत अच्छी है कि स्मृति विश्वास से मिला हूं। अपनी हिंदी फिल्मों से कभी उनका नाता था। अब वह काफी दूर है। नायिका स्मृति विश्वास अब एक अतीत है- सुनहरी यादों का अतीत ! बेटे के साथ महाराष्ट्र के नासिक में रहती हैं, वहीं जहां कभी अभिनेता सदाशिव अमरापुरकर रहते थे।
एसडी नारंग 25 जनवरी, 1986 को बंबई में गुजरे, पर उनके निर्देशन में बनी 'शहनाई' समेत कई लाजवाब फिल्में अभी भी जेहन में हैं।
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फिल्म 'मृगया', मृणाल सेन और मिथुन चक्रवर्ती
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हिंदी फिल्म 'मृगया' के बगैर फिल्मकार मृणाल सेन अधूरे हैं। 'मृगया' वह फिल्म है, जो आजादी के बाद के हमारे अधूरेपन का पर्दाफाश करती है और यह भी बताती है कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का नाम नहीं है। सिनेमा वह है, जो जिंदगी और उसकी बेतरतीबी से आपको रूबरू कराए। सिनेमा वह भी है, जो दर्शकों को जागरूक बनाए। ऐसी ही फिल्म है 'मृगया' !
'मृगया' वर्ष 1976 में बनी और मृणाल सेन की पहली रंगीन फिल्म भी है। यह फिल्म एक ऐसी कथा है, जिसमें संथाल आदिवासियों का शोषण, उस पर ढाए जा रहे जुल्म, क्रूर महाजनी व्यवस्था और इन सबके बीच इससे टकराने का जज्बा इसके केंद्र में है।
'मृगया' (रायल हंट) का मतलब है शिकार। ओड़िया के जाने-माने लेखक भगवती चरण पाणिग्रही की एक छोटी-सी कहानी पर यह फिल्म बनी है। पाणिग्रही की ओड़िया कहानी का नाम भी था 'शिकार'। दिलचस्प कहानी है। पढ़ेंगे तो पढ़ते ही जाएंगे। तब पता चलेगा कि ओडिशा जैसे छोटे राज्य में भी 'हमारी व्यथा' को व्यक्त करने वाला साहित्य बहुत पहले से लिखा जा रहा है। भगवती चरण पाणिग्रही ऐसा ही एक नाम है।
ओडिशा के साहित्य और वहां के लोगों से बातचीत करने पर पता चलता है कि भगवती चरण पाणिग्रही ओड़िया में छोटी कहानियों के बेहद संवेदनशील लेखक थे। पाणिग्रही की कहानियां मर्म को छूती ही नहीं, 'वार' भी करती हैं। जैसे हम किसी 'युद्धस्थल' में हों !
भगवती चरण पाणिग्रही लेखन के साथ-साथ राजनीति से भी जुड़े थे। वर्ष 1907 में भगवती चरण पाणिग्रही का जन्म हुआ, लेकिन 23 अक्तूबर, 1943 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हुई। यह देश को आजादी मिलने से बहुत पहले की कथा है। एक ऐसे कहानीकार की, जो बंगाल और बिहार का पड़ोसी भी है !
पाणिग्रही ओडिशा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पहले राज्य सचिव भी थे। 'नवयुग साहित्य संसद' नामक एक साहित्यिक संस्था भी चलाते थे। साथ में 'आधुनिका' (यानी आधुनिक) नाम से एक ओड़िया पत्रिका का संपादन भी। ओड़िया साहित्य की बहुत धारदार पत्रिका थीं यह ! कहते हैं कि इस पत्रिका में ओड़ियाभाषी लोगों का जीवन धड़कता था।
बहरहाल, मृणाल सेन ने उनकी 'शिकार' कहानी को बहुत पहले से पढ़ रखा था। कहते हैं भगवती चरण पाणिग्रही ने वर्ष 1930 के आसपास यह कहानी लिखी थी। मृणाल सेन ने वर्ष 1974 से इस पर काम शुरू किया।
एक दफा पुणे के फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान के दीक्षांत समारोह में उन्हें अतिथि बनने का मौका मिला। तभी उन्होंने मिथुन चक्रवर्ती को मंच पर चढ़ते और सर्टिफिकेट लेते देखा था। उस दीक्षांत समारोह में थिएटर के जानकार इब्राहिम अल्काजी भी थे। मन ही मन मृणाल सेन ने उसी समय मिथुन चक्रवर्ती का चयन 'मृगया' के लिए कर लिया था। तब साथ में कैमरामैन केके महाजन भी वहां थे। बाद में केके महाजन से उन्होंने मिथुन का पूरा डिटेल भेजने को कहा।
महाजन मिथुन चक्रवर्ती से मिले। फिर, मिथुन कलकत्ता आए। कई दौर में मिथुन से मृणाल दा की बात हुई और वर्ष 1975 के आखिर में 'मृगया' बननी शुरू हुई। कहना चाहिए मृणाल सेन की यह फिल्म, फिल्म कम इतिहास ज्यादा है, क्योंकि 'मृगया' मिथुन चक्रवर्ती और ममता शंकर दोनों की पहली फिल्म भी है। फिल्म 'मृगया' में केके महाजन ने गजब की सिनेमाटोग्राफी की है। लगता है, मिथुन के तीर चलाने के अंदाज को केके महाजन ही पकड़ सकते थे !
ममता शंकर देश की बेहतरीन नृत्यांगना भी है और कोरियोग्राफर भी। वे अपने जमाने के मशहूर नर्तक उदय शंकर की बेटी और सितारवादक पंडित रविशंकर की भतीजी हैं। अभिनय के साथ-साथ वे बहुत पहले से कोलकाता में 'ममता शंकर बैले समूह' भी चलाती हैं। यह एक नृत्य-संस्था है, जिसका कोलकाता और विदेशों में भी काफी नाम है। सत्यजित राय, मृणाल सेन, बुद्धदेव दासगुप्ता, गौतम घोष और ऋतुपर्ण घोष जैसे फिल्मकारों की वे पसंदीदा अभिनेत्री भी रही हैं। ममता शंकर की बांग्ला फिल्म 'गृहयुद्ध' अभी भी एक लैंडमार्क फिल्म मानी जाती है। बुद्धदेव दासगुप्ता की इस फिल्म में गौतम घोष मुख्य अभिनेता हैं और ममता शंकर अभिनेत्री।
सिनेमा के पन्नों को पलटता हूं तो पता चलता है 'मृगया' 6 जून, 1976 को रिलीज हुई थीं। इस फिल्म के लिए बहुत मुश्किल से मृणाल सेन निर्माता ढूंढ पाए थे। वे पहले से ही कर्ज में डूबे हुए थे। आखिर में 'मृगया' के लिए एक निर्माता मिले। निर्माता थे दक्षिण भारतीय के राजेश्वर राव। सलील चौधरी को 'मृगया' में संगीत का काम सौंपा गया था। उसके बाद एक-एक कर दूसरे कलाकारों का चयन हुआ। साधु मेहर, समित भांजा और सजल रायचौधरी। बहुत कम लोगों को मालूम है कि 'मृगया' में अभिनेता टाम अल्टर भी थे। अंग्रेज बने थे और उनके अभिनय से मृणाल सेन काफी मुग्ध थे। टाम को अंग्रेजी, हिंदी के अलावा बहुत अच्छी ऊर्दू जुबान भी आती थी। बाद में वे राजकपूर की फिल्म में भी दिखे।
अपनी पहली ही फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती ने इतना आकर्षक अभिनय किया कि उन्हें वर्ष 1977 में देश के 24वें भारतीय फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रपति पुरस्कार मिल गया। इस फिल्म के लिए मृणाल सेन को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला था। दसवें मास्को अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सव में भी 'मृगया' सराही गई थी।
'मृगया' कम बजट की फिल्म थी। कलकत्ता के टाली क्लब और बाकी की शूटिंग झाड़ग्राम में हुई थी। 'मृगया' में मिथुन चक्रवर्ती ने घिनुआ का किरदार निभाया था और अभिनेत्री ममता शंकर ने डुंगरी का। अभिनेता साधु मेहर ने डोरा का और समित भांजा ने सोल्पू का। टाम अल्टर तो थे ही। अभिनेता सजल रायचौधरी मनीलेंडर यानी सूदखोर महाजन के किरदार में थे।
आदिवासियों पर जुल्म और शोषण के खिलाफ बगावत करते हुए मिथुन चक्रवर्ती 'मृगया' में अंत में मारे भी जाते हैं। फिल्म में समित भांजा का भी ऐसा ही हश्र होता है। लेकिन, सबकी भूमिका इस फिल्म में इस कदर है कि 'मृगया' भारतीय फिल्मों के इतिहास में रेखांकित हो जाती है। अब भी यह फिल्म कहीं दिखती है तो मृणाल सेन और उनकी प्रतिभाशाली टीम के लिए दिल और दिमाग से 'वाह' निकलता है!
अरुण कौल और मोहित चट्टोपाध्याय ने 'मृगया' की पटकथा लिखी थीं। अरुण कौल ने हिंदी में 'दीक्षा' (1991) फिल्म बनाई है। 'दीक्षा' में नाना पाटेकर और मनोहर सिंह ने गजब का अभिनय किया था। अरुण कौल यश चोपड़ा की 'चांदनी' फिल्म के भी संवाद लेखक थे। इससे पहले कौल मृणाल सेन की ही हिंदी फिल्म 'एक अधूरी कहानी' के निर्माता थे। गुलज़ार की फिल्म 'इजाजत' और 'लेकिन' में अरुण कौल सहायक थे।
मोहित चट्टोपाध्याय वर्ष 2012 में कैंसर से गुजरे। वे बंगाल में थिएटर की एक बड़ी हस्ती थे और संगीत नाटक अकादमी विजेता भी। मोहित चट्टोपाध्याय ने वर्ष 1980 में बांग्ला में एक शिशु फिल्म भी बनाई थी। नाम था उसका 'मेघेर खेला' (द प्ले आफ क्लाउड्स)।
अभिनेता साधु मेहर अब ओडिशा में रहते हैं। एक जमाने में साधु मेहर ने निर्देशक श्याम बेनेगल की अंकुर, निशांत, मंथन, मृणाल सेन की भुवन सोम, तपन सिन्हा की बाल फिल्म सफेद हाथी जैसी फिल्में की हैं। 27 डाउन, घरौंदा, अभिमान और देवशिशु भी साधु मेहर की उत्कृष्ट फिल्में हैं। साधु मेहर को फिल्म 'अंकुर' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है।
अभिनेता समित भांजा भी अब नहीं है। ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'गुड्डी' के इस अभिनेता का निधन बहुत पहले हो चुका है। वे जमशेदपुर में पैदा हुए थे और कोलकाता में 24 जुलाई, 2003 को गुजरे। 'गुड्डी' के अलावा 'कितने पास, कितने दूर', 'अनजाने मेहमान', 'वही रात, वही आवाज' समित भांजा की हिंदी फिल्में हैं। वे पुणे के फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान से निकले थे और बांग्ला में सत्यजित राय की 'अरण्येर दिनरात्रि' से लेकर तपन सिन्हा की 'हाटे बाजारे' और 'आपनजन' तक में अभिनय किया है। बांग्ला फिल्म 'हाटे बाजारे' (1967) में अशोक कुमार, वैजयंतीमाला समेत अनेक लोग थे। तपन सिन्हा की बांग्ला फिल्म 'आपनजन' (1968) की ही हिंदी (रिमेक) फिल्म थी 'मेरे अपने', जिसमें मीना कुमारी और विनोद खन्ना ने अभिनय किया था। इसे वर्ष 1984 में गुलज़ार ने बनाया था। बहुत बाद में गुलज़ार की 'मेरे अपने' कन्नड़ भाषा में भी बनी। नाम था उसका 'बेंकी बीरुगली'। यह कन्नड़ की हिट फिल्म मानी जाती है।
'गुड्डी' 1 जनवरी, 1971 को रिलीज हुई थी। इसमें धर्मेंद्र, जया भादुड़ी, एके हंगल, उत्पल दत्त, सुमिता सान्याल, समित भांजा और केष्टो मुखर्जी भी थे। बाद में 'गुड्डी' तमिल में भी बनी थीं। नाम था 'सिनेमा पेंथियम'। इस तमिल फिल्म में कमल हसन और जयाचित्रा ने क्या खूब अभिनय किया था ! तो यह है कहानी मृणाल सेन और उनकी हिंदी फिल्म 'मृगया' से जुड़े कलाकारों/सहयोगियों की। किसी दरख्त की शाखा पहले एक निकलती है, लेकिन उसकी प्रशाखाएं जब फैलती हैं, तो अनंत होती जाती है। और उसकी छांव पाने को सभी बेताब दिखते हैं। खुशबूदार दरख्त हो, तो कहना ही क्या ! सिनेमा का संसार भी ऐसा ही है !
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'अंतरीन', डिंपल कपाड़िया और मृणाल सेन
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फिल्मकार मृणाल सेन की बेहतरीन फिल्मों में से एक है 'अंतरीन' (द कन्फाइंड), जिसमें डिंपल कपाड़िया ने अभिनय किया है। वर्ष 1993 में बनीं 'अंतरीन' है तो बांग्ला फिल्म, लेकिन इस फिल्म की कहानी सआदत हसन मंटो की लिखी हुई है। सन् 1950 के आसपास सआदत हसन मंटो ने 'बादशाहत का खात्मा' (एंड आफ किंग्सीप) नामक एक कहानी लिखी थीं, जिसे मृणाल सेन ने काफी पहले पढ़ रखा था। एक खूबसूरत नायिका की तलाश में उन्होंने सालों बिताए। आखिर में 1992 में उन्हें डिंपल कपाड़िया मिलीं। बेहद कम पैसे में वे इस बांग्ला फिल्म को करने के लिए तैयार हो गईं। वजह थी मृणाल सेन, क्योंकि उस समय मृणाल दा की फिल्म में अभिनय करने का मतलब था अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर हो जाना !
कहते हैं कि डिंपल कपाड़िया को 'अंतरीन' में अभिनय कराने के लिए मृणाल सेन को ज्यादा समय नहीं लगा। वर्ष 1993 में इसकी शूटिंग कोलकाता में शुरू हुई। कोलकाता के सदर्न एवेन्यू के एक खूबसूरत बंगले पर सारा सेट लगा। तब जनसत्ता अखबार को कोलकाता में आए तीसरा वर्ष था। याद आता है बड़ी मुश्किल से डिंपल कपाड़िया का इंटरव्यू करने का मौका मिला था। उनकी फर्राटेदार अंग्रेजी मेरे सिर के ऊपर से गुजर रही थीं। शायद बारिश का मौसम भी था। भीगते हुए दफ्तर पहुंचा था। वो भी क्या दिन थे !
बहरहाल, डिंपल कपाड़िया से बहुत सकुचाते हुए
कहना पड़ा- मैं हिंदी अखबार से हूं। संभल कर अंग्रेजी बोलिए।
फिर, धीरे-धीरे बोलीं और हिंदी सिनेमा तथा
उसकी दीन-दुनिया पर बढ़िया बातचीत हुई।
सदर्न एवेन्यू से उत्तर कलकत्ता के बीके पाल एवेन्यू आने में उस रोज मुझे करीब तीन घंटे लग गए थे। एक छोर से दूसरा छोर। मैं इतना खुश था कि कहिए मत ! राजकपूर की 'बाबी' से जो मिल चुका था ! उस रात ठीक से सो भी नहीं सका था। दूसरे दिन बुखार से बदन तप रहा था।
उस दिन डिंपल कपाड़िया से बातचीत के वक्त मेरे संग फोटोग्राफर अरुणांशु रायचौधरी भी थे। अरुणांशु आजकल मुंबई में 'द हिंदू' में हैं। जनसत्ता, कोलकाता में छपी मेरी कई अच्छी स्टोरी के साक्षी हैं अरुणांशु।
बहरहाल, तपते-से बदन लेकर शाम को किसी तरह दफ्तर भी पहुंच गया था- सहकर्मियों की प्रतिक्रिया जानने के लिए। इसे कहते हैं भीतर की खुशी ! यह 'खुशी' ही खींच कर दफ्तर ले गई थी घरवालों के लाख मना करने के बावजूद। पांव जैसे नाचने को आतुर थे और दिल में 'डम डम डिगा डिगा' हो रहा था !
अच्छी तरह याद है बंबई से बाहर किसी गैर-हिंदी फिल्म में अभिनय करने का डिंपल कपाड़िया का यह पहला तजुर्बा था ! मृणाल सेन से डिंपल ने वादा किया था फिल्म पूरी होते-होते वे बांग्ला बोलना सीख जाएंगी। बांग्ला फिल्म 'अंतरीन' से पहले डिंपल ने 1986 में तमिल फिल्म 'विक्रम' किया था। 'विक्रम' के निर्देशक थे राजशेखर। इस तमिल फिल्म में डिंपल कपाड़िया के अलावा कमल हसन और अमजद खान भी थे। एस रंगराजन के उपन्यास पर बनी 'विक्रम' काफी हिट फिल्म थी। रंगराजन मूलतः इंजीनियर थे। रंगराजन अक्सर 'सुजाता' के छद्म नाम से भी लेखन किया करते थे। रंगराजन ने लगभग 100 उपन्यास और 250 के करीब विज्ञान कथाएं भी लिखी हैं। रंगराजन वर्ष 2008 में गुजरे। यह फिल्म बाद में तेलुगु भाषा में भी 'डब' की गई थीं। तेलुगु में इसका नाम था 'एजेंट विक्रम'।
बहरहाल, 'विक्रम' फिल्म के साथ एक अनूठा इतिहास भी जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि यह पहली ऐसी भारतीय फिल्म है, जिसके सभी गीत कंप्यूटर पर रिकॉर्ड किए गए थे। तो डिंपल ने बंबई से बाहर पहली दफा तमिल फिल्म 'विक्रम' किया। उसके बाद मृणाल सेन की बांग्ला फिल्म 'अंतरीन' में अभिनय करने के लिए कलकत्ता आईं।।
'अंतरीन' फिल्म में सिर्फ दो ही मुख्य पात्र हैं। एक हैं डिंपल कपाड़िया और दूसरे हैं अभिनेता अंजन दत्त। अंजन मृणाल सेन के प्रिय अभिनेता भी रहे हैं। वे मूलतः गायक हैं और हिंदी में 'बड़ा दिन' (1998) नामक फिल्म भी बना चुके हैं। 'बड़ा दिन' में शबाना आजमी, मार्क रोबिनसन और तारा देशपांडे ने भी अभिनय किया है। अंजन दत्त मृणाल सेन की हिंदी फिल्म 'एक दिन अचानक' में भी अभिनय कर चुके हैं। अंजन के खाते में अनेक बेहतरीन बांग्ला फिल्में शुमार हैं। बांग्ला फिल्में- चालचित्र, खारिज, गृहयुद्ध और युगांत को बार-बार देखने की इच्छा होती है। इन बांग्ला फिल्मों के बगैर अंजन अधूरे-से हैं।
बांग्ला फिल्म 'अंतरीन' की कथा एकदम सहज है। एक लेखक है, जो एकदिन कलकत्ता में एक दोस्त के बंगले पर एकांत में लिखने के लिए आता है। एक दिन उसे अचानक एक महिला का फोन आता है। फोन आता नहीं, बल्कि गलती से लग जाता है। और फिर, लेखक (अंजन दत्त) व उस महिला (डिंपल कपाड़िया) में 'फोनालाप' शुरू हो जाता है। दोनों में यह रोज का रिवाज बन जाता है। फिल्म के आखिर में तय होता है वह लेखक से मिलने आ रही हैं। ट्रेन के डिब्बे में जब वह नायिका (डिंपल कपाड़िया) चढ़ने को सवार होती है, तभी सामने नायक (अंजन दत्त) होता है। नायक के 'आइए कहने' (बांग्ला में वह 'आसुन' कहता है) मात्र से वह उसे पहचान जाती है। तभी ट्रेन खुल जाती है। नायिका ट्रेन पर चढ़ जाती है और नायक स्टेशन पर उतर कर ट्रेन को देखता रह जाता है।
'अंतरीन' की कहानी इतनी-सी है। यह एक तरह की 'लवलेश स्टोरी' है। कहते हैं कि सआदत हसन मंटो की कथा का अंत कुछ और था। मृणाल सेन ने कहानी के अंत को बदल दिया है। 'अंतरीन' को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिल चुका है। इस फिल्म में अभिनय के लिए डिंपल कपाड़िया की विदेशों में काफी सराहना भी हुई है। कैमरामैन शशि आनंद का छायांकन देखने लायक है। शशि 'अंतरीन' के संगीतकार भी हैं। शशि आनंद पुणे फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान से निकले हैं और इसी कोलकाता में पले-बढ़े हैं। वे वर्ष 1991 में बनी मृणाल सेन की बांग्ला फिल्म 'महापृथ्वी' के भी कैमरामैन थे।
लेकिन, डिंपल कपाड़िया आखिर तक बांग्ला बोलना नहीं सीख पाईं। अंत में डिंपल की आवाज को अनुषया चटर्जी नामक महिला से 'डब' करवाया गया। अनुषया की आवाज डिंपल कपाड़िया से काफी-कुछ मिलती जुलती थी। तो यह थी कथा 'अंतरीन, डिंपल कपाड़िया और मृणाल सेन की !
कोलकाता में हिंदी के पत्रकारों में से कुछ नाम हैं जिनमें एक जयनारायण प्रसाद हैं, जिन्हें सिनेमा की अच्छी और गहरी समझ है। वह लगातार दशकों से कला-समीक्षक की अपनी पहचान को पुख्ता करते रहे हैं। कोलकाता के जनसत्ता में दशकों तक सेवारत रहते हुए हिंदी, बांग्ला और यथासंभव अंग्रेजी फिल्मों की बारीकियों पर लिखते रहे हैं। कोलकाता फिल्म महोत्सव में जयनारायण जी की सक्रियता मैं खुद देख चुका हूं। विदेश से आए कलाकारों, निर्देशकों के साथ उनकी बातचीत और सवाल के अंदाजे-बयां का कायल रहा हूँ।
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