Sunday, 30 August 2020

बेचारा राज्य उर्फ बिहार


* निर्भय देवयांश
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  बेचारा राज्य 
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 हिंदुस्तान में बिहार बेचारा राज्य है
दिल्ली वाले, मुंबई वाले कभी इस पर बैठकर
बातचीत नहीं करते कि 
बिहार को किस परिस्थितियों ने 
बेचारा, लाचार, असहाय 
निष्प्राण राज्य की संज्ञा दिला दी

आज तो हालत और भी खराब है
दूसरे राज्य के लोगों के कानों तक 
जैसे ही किसी बिहारी की आवाज सुनायी पड़ी 
लोग भागने लगते हैं
अफरा-तफरी मच जाती है
ऐसा कुछ होने लगता है
ये लोग इतने परेशान हो जाते हैं 
कि जैसे बिहारी कोई अछूत है
और उसके स्पर्श मात्र से 
उनकी बिसात मिट जाएगी 

यह बात कुछ हद तक सही है
हिंसा की खेती करता है बिहार 
और फसल पहुंचती है 
दिल्ली दरबार में।

*संगीन के साये में लोकतंत्र* कविता-संग्रह से 

नोट::1990 के दशक में 1989 से 1996 तक मुंबई यानी बॉलीवुड की स्याह दुनिया में दर-दर ठोकर खाने के बाद लगभग 25 साल पहले यह कविता लिखी थी। मुंबई के बाद महीनों तक दिल्ली में भी भटकता रहा था। बिहारी को लेकर जो कटु अनुभव दिखे, तभी यह महसूस हुआ था कि आखिर कोई राज्य और उसके निवासी इतने लाचार और बेचारे कैसे हो सकते हैं? सुशांत सिंह राजपूत हत्याकांड के बाद या विभिन्न राज्यों में हो रहे बिहारियों पर अत्याचार के बाद ये सवाल सुरसा मुँह की तरह हमारे सामने खड़े हैं? 


Thursday, 27 August 2020

ए फॉर अमर सिंह मने हर हाल में अमीर बनो, बी फॉर बॉलीवुड मने हत्या-बलात्कार को भी बेच डालो बनाम बॉलीवुड को हर ऐब पसंद है...


* निर्भय देवयांश 
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 अमर सिंह को दुबई के एक फिल्मी महोत्सव में जब शाहरुख खान ने गुंडा कहा था तो अमर सिंह का पलटवार भी कम जोरदार नहीं था। बकौल शाहरुख--अगर आप अमिताभ बच्चन के दोस्त नहीं होते तो आपको यहाँ से निकाल बाहर किया जाता। बदले में अमर सिंह ने कहा था-बिल्कुल ठीक, अगर बिग बी मेरे दोस्त नहीं होते तो तुम्हें अभी दिखा देते कि गुंडई किसे कहते हैं।

दरअसल अमर सिंह को शाहरुख खान द्वारा यह एहसास कराया जा रहा था कि आप इस महफिल के लायक नहीं हैं। बाद में अमर सिंह ने बॉलीवुड की महफिल में जो जगह बनायी और फिर अमिताभ से अनबन के बाद जो लात मारी, उसके दर्जनों उदाहरण सर्वविदित हैं। मसलन, जब बॉलीवुड का सुपरस्टार कहे कि अगर मुफलिसी के दिनों में अमर सिंह नहीं मिले होते तो मैं मुंबई की सड़कों पर टैक्सी चला रहा होता। मसलन, अमिताभ टू संजय दत्त टू सलमान सभी को मुलायम सिंह के गांव सैफई खींच लाए और रात भर नचाए---जोरा-जोरी चने के खेत में...। जब ये लोग आ गए तो फिर शाहरुख न आए, कोई फर्क पड़ता है क्या? अमर सिंह ने बता दिया कि शाहरुख तुम्हारे बिना भी महफिल सजायी जा सकती है। सजती है और सजती रहेगी। अगर किसी के दोस्त बड़े अंबानी थे तो छोटे अंबानी अमर सिंह के प्यारे थे। सहारा का भी उन्हें जो सहारा मिला, भला और किसे मिला! 

बॉलीवुड के लोगों को जब यह पता चल गया कि सुपरस्टार को अमर सिंह चाहिए होता है फिर उनकी क्या बिसात है? अमिताभ के घर रहते हुए उनसे कौन नहीं मिलने आए, देवानंद से लेकर अक्षय कुमार तक। यह दीगर बात है कि मिलने के लिए अमर सिंह को गेट पर जाना पड़ा। अमिताभ ने किसी को भी अपने अन्तरमहल के बैठकखाने में जगह नहीं दी। यह टीस अमर सिंह को सदा सालती रही कि जिस आदमी को एक बार फिर से दौड़ने लायक बना दिया, एकदम से खड़ा कर दिया। उस आदमी के घर में उसकी औकात महज गेस्टहाउस तक सीमित रही। यह दुःख बड़ा दुःख था, जिसे अमर सिंह भूल नहीं पाए। टीवी और अखबार में बार-बार व्यक्त करते रहे। 

अमर सिंह कोलकाता के ही थे। लहक से जुड़े कहानीकार विमलेश्वर द्विवेदी, शायर कवि रामगोपाल पारीख, प्रभाकर चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार हरेराम कात्यायन उनके घर-परिवार को करीब से जानते रहे हैं। अमर सिंह के छोटे भाई अरविंद सिंह तो 1970-80 के दशक में इन सभी के मित्र मंडली के अंग थे। इसलिए जब अमर सिंह प्रायः आए दिन किसी न किसी वजह से खबर बनाते तो इन्हें आश्चर्य नहीं होता। कारण कि उगते सूर्य का अमर सिंह के लिए काफी महत्व था। उनका संकल्प ही था कि चमकदार बनना है। फिर सिस्टम में ऐसे लोगों के लिए सरकार बनाना और गिराना बहुत छोटी बात हो जाती है। 

2004 से मेरा भी कोलकाता में रिपोर्टिंग के सिलसिले में अमर सिंह से मिलना-जुलना हुआ। पहली बार मुझे ताज होटल में मिलवाया गया। बस यूँ ही चला गया। बॉलीवुड के बारे में मुझे कुछ भी जानना नहीं था। राय-रत्ती से अधिक खुद ही जानता था।सात साल समय बर्बाद कर भीतरी नंगई देख चुका था। फिर बचा क्या रह गया...खैर। 

अमर सिंह से मुझे भारतीय लोकतंत्र, भारतीय पूंजीवाद, भारतीय अमीरवाद और काफी हद तक भारतीय दलालवाद समझना था। ये सभी सवाल मेरे अपने मन की जिज्ञासा थी। अखबार में इसकी कोई उपयोगिता नहीं थी, क्योंकि अमर सिंह समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद थे, और तब जागरण के मालिकों में एक मालिक नरेंद्र मोहन भी सपा से ही सांसद थे। यह खबर लगनी न थी। सिंगल या डबल लग जाए तो लग जाए। मेरा पहला ही सवाल था कि आपको दलाल कहलाने में इतनी खुशी क्यों मिलती है? अमर सिंह का जवाब था--दलाल नहीं, मैं कोई वेश्याओं का दलाल तो हूँ नहीं। मुझे इसलिए खुशी मिलती है कि लोग मुझे उद्योगपतियों का दलाल कहते हैं। यह सच है तो मैं इसे सहज स्वीकार कर लेता हूँ कि कम से कम मैं जिस महफिल में उठता-बैठता हूँ, वे सब देश के बड़े से बड़े उद्योगपति हैं। यहाँ से सत्ता भी बहुत बौनी नजर आती है। 

फिर अमर सिंह जो शुरू हुए कि लगभग दो घण्टे तक भारतीय सिस्टम की हर एक गुत्थी खोलकर रख दिए। पहली गुत्थी थी---हर हाल में अमीर बनो। मैंने पूछना चाहा कि यह हर हाल क्या होता है---अमर सिंह का जवाब था, जिन्हें अमीर बनना होता है, उन्हें हर हाल का भी पता होता है। एक लिहाज से ठीक ही है। पहले कांग्रेसी फिर समाजवादी! अमरवाणी जारी रहती है---जब आप अमीर हो गए तो सिस्टम के करीबी हिस्सा हो गए। मतलब कि मंच शेयर करने लगे। शेयरिंग की हिस्सेदारी के भागीदार। फिर आप जो चाहते हैं, सबकी पूर्ति होने लगती है। जो सपने देखे हैं उनकी पूर्ति करते जाएं। इस राह में चलते हुए आलोचना की चिंता कभी न करें। जैसे हाथी के चलने पर भौंकने वाले कुत्ते की कोई औकात होती भी है क्या? उद्योगपतियों के दलाल होने की सीढ़ी थी अमर सिंह का खुद उद्योगपति हो जाना। 

अमर सिंह के बाद का विकासवाद उनके बताए रास्ते से आगे बढ़ता गया। बहुत दूर तक। 'हर हाल में' का सिद्धांत कितने लोगों के जीवन में सफल होता है, सफल होने वाले ही बता पाएंगे। जैसे कि अमर सिंह खुलकर सबकुछ बताते थे। शेर-शायरी से पत्रकारों को हँसाते और विपक्षी नेताओं को जवाब व्यंग्य के लहजे में दे जाते। सुपरस्टार को फिर से खड़ा कर देने का गुमान भी अमर सिंह के पास था। अभिनेत्रियों के साथ मधुर संबंध भी उनके नाम दर्ज हैं। बॉलीवुड पर तंज कसते हुए अमर सिंह कहते थे कि इन्हें सबको दिखाने का शौक है और मुझे इन्हें नचाने का शौक। जब तक रहे नचाते ही तो रहे! 

बॉलीवुड का स्वार्थी और भाई-भतीजावादी चेहरा अमर सिंह बहुत  जल्द देख लिए थे। उनकी रुचि हर हाल में अमीर बनो का सिद्धांत बॉलीवुड का अंतिम निष्कर्ष है। जब मिल बैठेंगे दो दीवाने की तरह। बलात्कार बेच दो, हिंसा बेच दो, हत्या बेच दो, दंगा-फसाद बेच दो। प्रेमचंद के लिए यही 'बरहना-रक्स' है यानी नंगे नाच को कला बताने वाले लोग। प्रेमचंद नंगे नाच के हिस्सेदार न हुए। वाकई, बॉलीवुड को हर ऐब पसंद है। 

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Monday, 24 August 2020

बेरोजगारी की मार से त्रस्त हैं पत्रकार...



* लोकनाथ तिवारी
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की रे किछू काजेर संधान पेली, छ मास धोरे घोरे बंदी होये पोड़े आची। (क्या रे कोई काम काज खोजा, छह महीने से घर में कैद होकर रह गया हूं)। कोलकाता के मेरे एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र ने जब व्हाट्सअप पर सुबह-सुबह ये मैसेज भेजा तो कुछ समय के लिए मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। लॉकडाउन के पहले चरण में ही नौकरी गंवा चुके पत्रकार के सामने दो जून की रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है। घर में बूढ़े मां-बाप हैं। अपना मकान है इसलिए बीपीएल श्रेणी में नहीं है, अतः फ्री राशन का भी हकदार नहीं है। मेरे मन में तरह-तरह के बुरे विचार आने लगे। अप्रैल में मैंने बड़ी मजबूती से उसे दिलासा दी थी कि कुछ न कुछ व्यवस्था जरूर होगी, लेकिन अब क्या कहता, क्या जवाब देता। मार्च से ही वेतन नहीं मिलने के कारण अगस्त के प्रथम सप्ताह में मैंने स्वतः ऑफिस जाना बंद कर दिया था। अब उसके मैसेज से मन विचलित हो रहा था। 
आधे घंटे तक संकटमोचन का स्मरण करने के बाद भी मैसेज भेजने का साहस नहीं जुटा पाया। कहीं वह अधिक हताश न हो जाये, इसलिए मैंने उसे फोन लगाया और हाय-हैलो के बाद अपनी स्थिति बतायी कि मैं भी बेरोजगार हो गया हूं। एक तो पांच महीने का वेतन नहीं मिला दूजे अब नौकरी भी नहीं रही। घर बैठ गया हूं। मेरी स्थिति जानकर वह और दुखी हो गया लेकिन उसे संतोष भी हुआ कि वह अकेला इस स्थिति में नहीं है। फिर बातों ही बातों में उसने बताया कि राहुल, प्रभात, संतोष, राजीव, ईश्वर सहित दर्जनों साथियों का यही हाल है। हम तो सब्जी भी नहीं बेच सकते, ट्यूशन पढ़ा सकते थे, लेकिन कोरोनाकाल में वह भी बंद है. 
लॉकडाउन ने हमारी रोजी-रोटी ही नहीं छिना बल्कि भविष्य को भी अंधकारमय बना दिया है। ऐसे समय में जब पश्चिम बंगाल में अगले साल 2021 में चुनाव होनेवाला है। बंगाल में मीडिया में हाहाकार मचा हुआ है। सैकड़ों पत्रकार बेरोजगार हो गये हैं। दर्जन भर अखबार बंद हो गये हैं, जो छप रहे हैं, वहां भी छंटनी जारी है। पत्रकारों यह हाल केवल बंगाल में ही नहीं है। देश भर से इसी तरह की खबरें मिल रही हैं। कई पत्रकार तो आत्महत्या भी कर चुके हैं। बेरोजगारी का ये दर्दनाक आलम केवल पत्रकारिता की ही नहीं है। क्षेत्रों में भी स्थिति कमोबेश वही है। 
CMIE की अपनी ताज़ा रिपोर्ट में आगाह किया है कि जुलाई महीने में 50 लाख नौकरियां चली गईं। पिछले साल के औसत के मुकाबले इस साल अब तक 1 करोड़ 90 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। साफ है कि कोरोनावायरस संकट का असर अर्थव्यवस्था पर गहराता जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार फरवरी 2020 में ही बेरोजगारी दर बढ़कर 4 महीने के उच्च स्तर 7।78% पर पहुंच गयी थी। 
पिछले साल एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि साल 2019 में भारत में बेरोजगारी दर 45 सालों में अधिकतम स्तर पर थी। अर्थव्यवस्था में मंदी आ रही थी। सबसे अधिक रोजगार देने वाला क्षेत्र कृषि इस स्थिति में नहीं है कि इतने लोगों को खपा पाए। इसके बाद कोरोनावायरस की महामारी आ गई। इससे भारत में एक और बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई है। यानी पलायन की ऐसी स्थिति जो कभी नहीं देखी गई। यह पलायन शहरी क्षेत्रों में आर्थिक रूप से सक्रिय लोगों का था। ये लोग पहले से दयनीय ग्रामीण क्षेत्रों में लौटने लगे। अनुमान के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों के 10 करोड़ लोग ऐसे हैं जो लॉकडाउन के कारण बेरोजगार हो गए। दूसरी तरफ ऐसे पर्याप्त उपाय नहीं हैं जो उनकी उत्पादकता को ग्रामीण क्षेत्रों में बरकरार रख पाएं। इसने भारत को अभूतपूर्व बेरोजगारी के संकट में धकेल दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि 41 साल में पहली बार अर्थव्यवस्था सिकुड़ेगी। इसका सीधा का मतलब है कि पहली बार कोई विकास दर्ज नहीं होगा। इसलिए भीषण बेरोजगारी जारी रहेगी, नतीजतन गरीबी का स्तर बढ़ेगा।
इसी बीच अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने जीवनयापन को हुए नुकसान का आकलन किया है। यह अनुमान बताता है कि विश्व का आधा श्रम बल जो असंगठित क्षेत्र का कामगार भी है, तत्काल प्रभाव से अपनी रोजीरोटी से हाथ धो बैठेगा। इसका मतलब है कि 1।6 बिलियन असंगठित कामगार बेरोजगार हो जाएंगे। यह आंकड़ा विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत की आधी से ज्यादा आबादी के बराबर है। मार्च में करीब 2 बिलियन असंगठित क्षेत्र के कामगार अपनी 60 प्रतिशत आय खो चुके थे। इन कामगारों की आय इतनी ज्यादा नहीं है कि वे अधिक समय तक बिना रोजगार के जीवन की मूलभूत जरूरतें पूरी कर पाएं। अप्रैल में उनका रोजगार पूरी तरह खत्म हो गया और उनकी आय शून्य हो गई।
13 मई 2020 को यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट (यूएनसीटीएडी) द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, यह स्थिति 4-6 करोड़ लोगों को भीषण गरीबी के दलदल में धकेल देगी। रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक गरीबी रेखा से नीचे विश्व की वह आबादी आती है जो प्रतिदिन 143.41 (1.90 अमेरिकी डॉलर) रुपए से कम पर जिंदगी गुजारती है। 2020 तक वैश्विक गरीब 8।2 प्रतिशत बढ़कर 66.5 करोड़ हो जाएंगे। 2019 में ऐसे लोग 8।2 प्रतिशत यानी 63.2 करोड़ थे। दुनियाभर के 36 अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सहयोग से तैयार की गई यह रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक गरीबों में यह अप्रत्याशित वृद्धि 1998 से नहीं देखी गई है। उल्लेखनीय है कि 1998 में दुनिया 1997 में आए एशिया के वित्तीय संकट के झटके से जूझ रही थी। 
यह विडंबना ही है कि कोरोना काल में पिछले 5 महीनों में लगभग 2 करोड़ लोगों ने नौकरियां गंवाईं। फिर भी सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा नहीं है। झूठी और भ्रामक खबरों के जरिये जनमानस को भटकाया जा रहा है। नफ़रत फैलायी जा रही है।

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महेश भट्ट ने पाकिस्तानी अभिनेत्री 'मीरा' को भी अपनी चपेट में लिया था और दिया सिर्फ एक फ्लॉप फिल्म 'नजर', फिर कहर...


* निर्भय देवयांश 
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बॉलीवुड में प्रलोभन मिले तो एक जन्म क्या कई जन्मों तक इंतजार किया जा सकता है। जिस प्रकार की किंवदंती बना दी गई है कि इस इंड्रस्टी से संबद्ध लोग जीते जी तो ऐश-मौज भोगते ही हैं। मरने के बाद भी उनका दिलों में बसना जारी रहता है। उनके चाहने वाले सदा जीवित रहते हैं। निर्माता-निर्देशकों के लिए यह प्रलोभन ज्यादा कारगर होता है और वे हसीनाओं को यानी नयी- नवेली लड़कियों को सबसे पहले अपने कब्जे में लेते हैं। इसके पीछे कितने कारण होते होंगे, गिनती मुश्किल है और यदि आपकी गिनती में रुचि है तो आप भी कम ऐय्याश नहीं होंगे? वर्ना भूखे-प्यासों के बीच कला के नाम पर आवारगी तो उसे ही अच्छी लगेगी जिसने मनुष्यता से नाता तोड़ लिया है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता की पंक्तियाँ हैं--"यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाश पड़ी हो और दूसरे कमरे में तुम प्रार्थना कर रहे हो, तो मुझे तुमसे कुछ नहीं कहना।" जबकि अवस्था इससे भी खराब है लेकिन कला तो आखिर कला है और यही 'कला तो सिर्फ कला के लिए है।'

 'सौतन' फिल्म के निर्देशक सावन कुमार टाक ने दशकों पहले टीवी पर एक बातचीत में पत्रकार से दिलेरी से अधिक बेशर्मी से कहा था--अभिनेत्री रास्ते की पत्थर की तरह है। हम उसे तराश कर अलग ढंग से उसकी प्रतिमा बनाते हैं। फिर उसकी पूजा होने लगती है। यानी उसे पर्दे के माध्यम से दर्शकों का समूह देते हैं। ये दर्शक अभिनेत्री के दीवाने होते हैं और फिर क्या चाहिए! यदि इतना कुछ करने में अभिनेत्री के प्रति निर्माता-निर्देशक के दिल में अभिनेत्री पर दिल आ जाए तो? सम्बंध आगे बढ़ने लगे तो? फिर दो दिलों के मिलन को दुनिया अनैतिक कहे तो कहे, हम तो मजा करेंगे? तर्क गलत-सही हो सकता है, लेकिन इतना कुछ दावा अभिनेत्री पर इसलिए किया जा रहा है या जाता है कि करोड़ों रुपये दांव पर लगा रहे हैं, इसलिए थोड़ी सी छूट ले ली तो हाय-तौबा क्यों? 

 सुशांत सिंह राजपूत के मामले में जो कि प्रेमी-प्रेमिका के बीच की लड़ाई थी, में महेश भट्ट रिया चक्रवर्ती को नाता तोड़ कर बाहर निकल जाने की सलाह देते हैं। जिस दिन संबंध टूट जाता है और रिया सुशांत को छोड़कर चली जाती है। यानी 8 जून 2020 को। उस दिन व्हाट्सएप पर महेश भट्ट और रिया दोनों बतकही का जश्न मनाते हैं। माई एंजेल टू माई गॉडफादर तक की धड़कन में रिंगिंग होती है। जगत को बताने के लिए कुछ भी बचा नहीं रह जाता है कि ये बगुला भगत भीतर-भीतर क्या गुल खिलाते होंगे? 

पाकिस्तानी अभिनेत्री मीरा भी महेश भट्ट की चपेट में आयी थी। झाँसे में बहुत समय तक रही। फिर एक फिल्म मिली 2005 में 'नजर'। अमीषा पटेल के भाई अस्मित पटेल के साथ। अस्मित बिग बॉस में भी चर्चित हुए थे। लेकिन फिल्म 'नजर' को न जाने किसकी बुरी नजर लग गई। एक-दो फिल्म और मीरा को मिल तो गयी लेकिन चली नहीं। जैसे रिया को लेकर महेश भट्ट की फिल्म जलेबी पूरी तरह से जलेबी बनकर रह गयी। चासनी अधिक होने से जलेबी का स्वाद बिगड़ गया। महेश भट्ट ने मीरा को अस्मित से शादी करने की सलाह भी दी। बात बनी नहीं। शादी के बाद संभव है कि मीरा को भारतीय नागरिकता मिल जाती? 

2006 के आसपास ही जाने-माने निर्माता निर्देशक बिग ब्रो इकबाल दुर्रानी के साथ किसी फिल्म के प्रोजेक्ट को लेकर मीरा कोलकाता आयी थी। भाईजान देर शाम को बाद आने वाले थे। ग्रैंड ओबेरॉय होटल में मीरा ठहरी थी। मुझे बिग ब्रो ने कहा था कि अखबार से छुट्टी ले लो और मेरे आने तक मीरा के साथ रहो। मैंने वैसा ही किया। इस दौरान बातचीत में मीरा ने बॉलीवुड के अपने अनुभवों के बारे में विस्तार से बताया। ऐसी-ऐसी बातें जो लिखने में भी आपत्तिजनक है। मैंने पूछा-फिर टिकोगी कैसे? नहीं, नहीं मैं पाकिस्तान लौट जाऊँगी, मीरा ने कहा। यही सब करने के लिए मैं थोड़े न बॉलीवुड में आयी हूँ। पाकिस्तान में जी-खा लूँगी। जितना काम मिल जाए, वहाँ की फिल्मों में कर लूँगी? 

यही महेश भट्ट पॉर्न स्टार सन्नी लियोनी को भी हिंदी फिल्म में लाकर तहलका मचा चुके हैं। 'जिस्म' नाम की फ़िल्म का क्या हाल हुआ, जनता-जनार्दन को पता है। जिस्म को भी किसी की नजर लग गयी। अभी सड़क 2 को भी दर्शक की नजर लगी है। डिस्लाइकर की संख्या बढ़ रही है। आगे के दिनों में यह संख्या बढ़ती ही जाएगी। प्रेमचंद इस बॉलीवुड को बरहना-रक्स करार दे चुके हैं यानी नंगे नाच में जीने-मरने वाले लोग। 

                                  ***

Sunday, 23 August 2020

'बॉलीवुड में ईमानदारी जमींदोज है, बेईमानी पनाहगार है', कभी शशि कपूर ने मुझसे बातचीत में कहा था...


* निर्भय देवयांश
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बॉलीवुड में ईमानदारी से रहने पर सुशांत सिंह राजपूत की तरह शिकार हो जाना मामूली से मामूली बातों में से एक है। जो गैंग और माफिया है वह पता ही नहीं चलने देता है कि शिकार को कहाँ लपेटे में लेना है और कहाँ निपटा देना है। कायदे से आर्थिक नुकसान तो अंकिता लोखंडे को पहुंचाना था सुशांत के जीवन में, क्योंकि वह सात साल लिव इन रिलेशनशिप में रही थी। यहाँ पर सतर्कता दोनों तरफ से बनी रही तो घटना नहीं घटी। रिया चक्रवर्ती महज एक साल में ही इतनी उग्र क्यों हो गयी? अब जबकि राज खुल रहा है कि वह महेश भट्ट के करीब बहुत पहले से थी और सुशांत को छोड़कर जाने के बाद सबसे पहले बातचीत महेश भट्ट से ही करती है। दोनों तय कर चुके थे कि सुशांत के साथ किस प्रकार का व्यवहार करना है। व्हाट्सएप की बातचीत में दोनों एक दूसरे के लिए हमदर्दी व्यक्त करते हैं और भविष्य के खतरे से बच लिए जाने पर एक दूसरे को बधाई भी देते हैं। सुशांत सिंह की ईमानदारी उसकी जान लेकर जमींदोज कर दी गयी। रिया ने आर्थिक फायदा अपने पूरे परिवार के लिए उठाया। इसमें सुशांत के हित की चिंता थोड़ी भी रहती तो महेश भट्ट कहीं से भी बीच में एंजेल की भूमिका में नहीं होते?

 रिलेशनशिप तो महेश भट्ट और परवीन बॉबी की भी थी लेकिन क्या हाल हुआ परवीन बॉबी का। घर में ही मरी पायी गईं। परवीन को मेंटल बनाने तक उनका शोषण किया गया। ईमानदारी यहाँ भी जमींदोज की गयी। महेश भट्ट की सुख-समृद्धि रिया चक्रवर्ती तक कायम रही। वायरल तस्वीरों को देखने से तो यही प्रतीत होता है।

शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा पाँच दशक से अधिक बॉलीवुड से जुड़े रहने के बाद भी उन सच्चाई को नहीं बोल रहे हैं, जो हकीकत हैं। आन, बान, शान और महान की फर्जी तुकबंदी में एक अलग घटाटोप तैयार कर दे रहे हैं ताकि लोग रहस्यमयी फिल्मी दुनिया में अपने-अपने ढंग से मछली पकड़ते रहें और विचरण करते रहें। शॉटगन के सच बोलने के अपने खतरे हैं और इसका प्रभाव उनके कलाकार बच्चों पर सीधा पड़ेगा। इस नाते वह प्रखर भूमिका में तो हैं लेकिन पहचान में भी आ जा रहे हैं। पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट से आए शॉटगन के हाथ में एक बड़ा डिप्लोमा था, जो अनेक के लिए संभव नहीं है। पुणे इंस्टीट्यूट में ही उनकी दोस्ती सुभाष घई और जावेद अख्तर आदि से हुई थी। 'कालीचरण', 'विश्वनाथ' आदि फिल्में शॉटगन के लिए ही लिखी गयी थीं। यह भी बहुतों के लिए संभव नहीं है। किस समीकरण में कौन फिट हो जाए उसके लिए गैंग और माफिया की अहम भूमिका होती है। शत्रुघ्न सिन्हा सीधे तौर पर नाम लेकर गैंगबाजों और बॉलीवुड माफिया के खिलाफ बोलने में कंजूसी बरत रहे हैं। खैर। अब आते हैं शशि कपूर के कहे पर। 

शशि कपूर अंतिम समय में टूट से गए थे। टूटन की शुरुआत फिल्म 'अजूबा' के निर्माण के समय ही हो गयी थी। अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर को लेकर बनी इस फिल्म ने कोई धमाल नहीं किया। कमाल किया होता तो लागत की राशि से अधिक की कमाई होती। उनकी अपनी पूँजी निकल गयी थी। तबियत खराब पहले से थी ही। कोलकाता में एक मुलाकात के दौरान, 2008 के आसपास मुझसे बातचीत में शशि कपूर ने कहा था--बॉलीवुड में ईमानदारी की बात न कीजिए। यह मेरी ईमानदारी ही थी कि जो जमा पूंजी थी सब 'अजूबा' के निर्माण पर लगा दिए लेकिन जो हुआ कि पूछिए मत। अब मुझसे बॉलीवुड के बारे में कुछ मत पूछिए। लेकिन बेईमानों के लिए पनाहगार होना? यानी सबकुछ अपने आप ही समझिए। व्हीलचेयर पर बैठे शशि कपूर से फिर कुछ पूछने की मेरी इच्छा न हुई। मैं बॉलीवुड में बिताए समय और पाए कटु अनुभव से बहुत कुछ बिना बताए भी समझ लेता हूँ। उनकी आँखें तनी हुई थीं। एकदम सूखी। आए भी थे किताब लोकार्पण के लिए। फिर भी मुझे लगा कि पत्रकार के नाते कुछ फिल्मी बात करूँ। कोशिश बहुत सफल नहीं हुई। मैंने दैनिक जागरण में उनसे बातचीत की हेडिंग बनायी---अजूबा ने मुझे बर्बाद कर दिया। यह हेडिंग शशि कपूर को अच्छी लगी थी। दूसरे दिन की मुलाकात में कहा--बिना लाग-लपेट के लिख दिए। मैंने कहा--बात बनाने का कोई स्कोप नहीं था। जो था सिर्फ दुःख, दर्द। 

 लेकिन बेईमानी और बेईमानों को समझने के मतलब तो हैं ही। और वह यह कि शशि कपूर को कुछ लोगों ने अजूबा फिल्म बनाने से मना किया था। ऐसा इसलिए कि चमत्कार की फिल्म को दर्शक पचा नहीं पाते हैं। सेट निर्माण पर बेहिसाब खर्च किए गए। दोस्त अमिताभ और भतीजा ऋषि कपूर के कैरियर की भी चिंता थी। तो शशि कपूर ने अपनी चिंता क्यों छोड़ दी? जब शशि कपूर ने  'उत्सव' बनायी थी उस समय भी तो वैसी कमाई नहीं हुई थी, जैसी उम्मीद थी। फिर गलती पर गलती। शशि कपूर ने कहा--बॉलीवुड की आंतरिक गति को समझना आसान नहीं है। हाँ, शिकार होना आसान है, जबकि वह बॉलीवुड के बड़े खानदान से जुड़े थे। फिर भी शिकार हो गए। शशि कपूर की सुपुत्री संजना कपूर भी एक बार कोलकाता में मिली थीं। नाटक के सिलसिले में आई थीं। संजना कपूर ने बॉलीवुड को लेकर चर्चा से इनकार कर दिया। बस इतना ही कहा--पिताजी के साथ अच्छा नहीं हुआ।

                                      ***

'बॉलीवुड में ईमानदारी जमींदोज है, बेईमानी पनाहगार है', कभी शशि कपूर ने मुझसे बातचीत में कहा था...


* निर्भय देवयांश
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बॉलीवुड में ईमानदारी से रहने पर सुशांत सिंह राजपूत की तरह शिकार हो जाना मामूली से मामूली बातों में से एक है। जो गैंग और माफिया है वह पता ही नहीं चलने देता है कि शिकार को कहाँ लपेटे में लेना है और कहाँ निपटा देना है। कायदे से आर्थिक नुकसान तो अंकिता लोखंडे को पहुंचाना था सुशांत के जीवन में, क्योंकि वह सात साल लिव इन रिलेशनशिप में रही थी। यहाँ पर सतर्कता दोनों तरफ से बनी रही तो घटना नहीं घटी। रिया चक्रवर्ती महज एक साल में ही इतनी उग्र क्यों हो गयी? अब जबकि राज खुल रहा है कि वह महेश भट्ट के करीब बहुत पहले से थी और सुशांत को छोड़कर जाने के बाद सबसे पहले बातचीत महेश भट्ट से ही करती है। दोनों तय कर चुके थे कि सुशांत के साथ किस प्रकार का व्यवहार करना है। व्हाट्सएप की बातचीत में दोनों एक दूसरे के लिए हमदर्दी व्यक्त करते हैं और भविष्य के खतरे से बच जाने पर एक दूसरे को बधाई भी देते हैं। सुशांत सिंह की ईमानदारी उसकी जान लेकर जमींदोज कर दी गयी। रिया ने आर्थिक फायदा अपने पूरे परिवार के लिए उठाया। इसमें सुशांत के हित की चिंता थोड़ी भी रहती तो महेश भट्ट कहीं से भी बीच में एंजेल की भूमिका में नहीं होते?

 रिलेशनशिप तो महेश भट्ट और परवीन बॉबी की भी थी लेकिन क्या हाल हुआ परवीन बॉबी का। घर में ही मरी पायी गईं। परवीन को मेंटल बनाने तक उनका शोषण किया गया। ईमानदारी यहाँ भी जमींदोज की गयी। महेश भट्ट की सुख-समृद्धि रिया चक्रवर्ती तक कायम रही। वायरल तस्वीरों को देखने से तो यही प्रतीत होता है।

शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा पाँच दशक से अधिक बॉलीवुड से जुड़े रहने के बाद भी उन सच्चाई को नहीं बोल रहे हैं, जो हकीकत हैं। आन, बान, शान और महान की फर्जी तुकबंदी में एक अलग घटाटोप तैयार कर दे रहे हैं ताकि लोग रहस्यमयी फिल्मी दुनिया में अपने-अपने ढंग से मछली पकड़ते रहें और विचरण करते रहें। शॉटगन के सच बोलने के अपने खतरे हैं और इसका प्रभाव उनके कलाकार बच्चों पर सीधा पड़ेगा। इस नाते वह प्रखर भूमिका में तो हैं लेकिन पहचान में भी आ जा रहे हैं। पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट से आए शॉटगन के हाथ में एक बड़ा डिप्लोमा था, जो अनेक के लिए संभव नहीं है। पुणे इंस्टीट्यूट में ही उनकी दोस्ती सुभाष घई और जावेद अख्तर आदि से हुई थी। 'कालीचरण', 'विश्वनाथ' आदि फिल्में शॉटगन के लिए ही लिखी गयी थीं। यह भी बहुतों के लिए संभव नहीं है। किस समीकरण में कौन फिट हो जाए उसके लिए गैंग और माफिया की अहम भूमिका होती है। शत्रुघ्न सिन्हा सीधे तौर पर नाम लेकर गैंगबाजों और बॉलीवुड माफिया के खिलाफ बोलने में कंजूसी बरत रहे हैं। खैर। अब आते हैं शशि कपूर के कहे पर। 

शशि कपूर अंतिम समय में टूट से गए थे। टूटन की शुरुआत फिल्म 'अजूबा' के निर्माण के समय ही हो गयी थी। अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर को लेकर बनी इस फिल्म ने कोई धमाल नहीं किया। कमाल किया होता तो लागत की राशि से अधिक की कमाई होती। उनकी अपनी पूँजी निकल गयी थी। तबियत खराब पहले से थी ही। कोलकाता में एक मुलाकात के दौरान, 2007 के आसपास मुझसे बातचीत में शशि कपूर ने कहा था--बॉलीवुड में ईमानदारी की बात न कीजिए। यह मेरी ईमानदारी ही थी कि जो जमा पूंजी थी सब 'अजूबा' के निर्माण पर लगा दिए लेकिन जो हुआ कि पूछिए मत। अब मुझसे बॉलीवुड के बारे में कुछ मत पूछिए। लेकिन बेईमानों के लिए पनाहगार होना? यानी सबकुछ अपने आप ही समझिए। व्हीलचेयर पर बैठे शशि कपूर से फिर कुछ पूछने की मेरी इच्छा न हुई। मैं बॉलीवुड में बिताए समय और पाए कटु अनुभव से बहुत कुछ बिना बताए भी समझ लेता हूँ। उनकी आँखें तनी हुई थीं। एकदम सूखी। आए भी थे किताब लोकार्पण के लिए। फिर भी मुझे लगा कि पत्रकार के नाते कुछ फिल्मी बात करूँ। कोशिश बहुत सफल नहीं हुई। मैंने दैनिक जागरण में उनसे बातचीत की हेडिंग बनायी---'अजूबा ने मुझे बर्बाद कर दिया'। यह हेडिंग शशि कपूर को अच्छी लगी थी। दूसरे दिन की मुलाकात में कहा--बिना लाग-लपेट के लिख दिए। मैंने कहा--बात बनाने का कोई स्कोप नहीं था। जो था सिर्फ दुःख, दर्द। दर्द को छुपाकर हँसे। 

 लेकिन बेईमानी और बेईमानों को समझने के मतलब तो हैं ही। और वह यह कि शशि कपूर को कुछ लोगों ने 'अजूबा' फिल्म बनाने से मना किया था। ऐसा इसलिए कि चमत्कार की फिल्म को हिंदी दर्शक पचा नहीं पाते हैं। सेट निर्माण पर बेहिसाब खर्च किए गए। दोस्त अमिताभ और भतीजा ऋषि कपूर के कैरियर की भी चिंता थी। तो शशि कपूर ने अपनी चिंता क्यों छोड़ दी? जब शशि कपूर ने  'उत्सव' बनायी थी उस समय भी तो वैसी कमाई नहीं हुई थी, जैसी उम्मीद थी। फिर गलती पर गलती। शशि कपूर ने कहा--बॉलीवुड की आंतरिक गति को समझना आसान नहीं है। हाँ, शिकार होना आसान है, जबकि वह बॉलीवुड के बड़े खानदान से जुड़े थे। फिर भी शिकार हो गए। शशि कपूर की सुपुत्री संजना कपूर भी एक बार कोलकाता में मिली थीं। नाटक के सिलसिले में आई थीं। संजना कपूर ने बॉलीवुड को लेकर चर्चा से इनकार कर दिया। बस इतना ही कहा--पिताजी के साथ अच्छा नहीं हुआ।

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Tuesday, 18 August 2020

'डॉन क्विकजोट'-सर्वेंटीज, 'प्रेमचंद', कला संसार बनाम सूअर संसार में मारे गए 'बबुआ सुशांत' के लिए न्याय की भिखमंगी?


* निर्भय देवयांश 
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प्रेमचंद की यह सलाह कि तंजीम (संगठन) बनाकर फिल्म उद्योग का विरोध करें। क्यों विरोध करें? इसलिए कि सिनेमा के जरिये मगरिब की सारी बेहूदगियां हमारे अंदर दाखिल की जा रही हैं, और हम बेबस हैं। प्रेमचंद की बात प्रगतिशीलों को अच्छी नहीं लगती है शायद। क्या इसीलिए प्रेमचंद ने प्रगतिशीलता को एक निरर्थक शब्द कहा था! 

प्रेमचंद आगे कहते हैं-यह फिल्म उद्योग है क्या? यह है-बरहना यानी नग्न, और नीम बरहना तस्वीरें यानी नंगी तस्वीरें, कत्ल-ओ-खून और जब्र की वारदातें, मारपीट, गुस्सा, और ग़ज़ब और नफसानियत यानी वासना ही इस इंड्रस्टी के औजार हैं और इसी से वह इंसानियत का खून कर रही है। (निगम जी 13 नवंबर,1934, 19 मार्च 1935 को लिखे पत्र में यह सब विचार और नाराजगी व्यक्त करते हैं।) शब्द तो देखिए- बरहना- रक्स यानी नंगे नाच, बोसा-बाजी, और मर्दों का औरतों पर हमला। यह सब उनकी नजरों में जायज है। क्यों यह सब है, क्योंकि हयासोज यानी ये निर्लज्ज लोग हैं। 

प्रेमचंद की बात यानी मर्दों का औरतों पर हमला--दिशा सालियान पर हमला हुआ। सामूहिक बलात्कार हुआ। बहुमंजिली इमारत से दिशा सालियान की लाश को नग्न अवस्था में फेंक कर हत्या-आत्महत्या की गयी! प्रेमचंद कहते हैं- वह इंसानियत का खून कर रही है। तो यह बात भी सही साबित हुई। इंसान, मेहनत-मजदूरी कर मुकाम बनाने वाले सुशांत सिंह राजपूत की निर्मम हत्या-आत्महत्या की गयी? क्या है कला का संसार है--निर्लज्जता की दुनिया है। हयासोजों की। प्रेमचंद यह भी कहते हैं- नाअहलां यानी अयोग्य लोगों के हाथ पड़कर लानत हो रहा है। यह कला संसार कैसे सूअर संसार से अलग है? सूअरों के पास थोड़ी-सी नैतिकता होती है! सुअर ही सभ्यता के अंत तक जीवित रहे तो बेहतर...

स्पेन के विख्यात लेखक सर्वेंटीज अपने उपन्यास 'डॉन क्विकजोट' में दिखाते हैं कि अपने समाज में हीरो ऐसे लोग हैं जो अपने वाक-चमत्कार के सहारे लोगों की आँखों में धूल झोंक कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। यह भोगवादी रवैया, बलात्कार, हत्या, सत्ता सब एक साथ मिलकर एक ऐसी दुनिया रचते हैं, जहाँ इनके हमदर्द भी इनके गुणगान करते हैं। सच को पटक-पटक कर मार दिया जाता है। कौन जानता है सुशांत को भी पटक कर मारा गया होगा?

जब सत्ता, सौंदर्य, वर्चस्व, भोगवाद, वाक-चमत्कार, कानून के पहरेदार एक साथ मिल जाएंगे तो आमजन की आँख में सिर्फ और सिर्फ धूल ही धूल और ये सबूत को मिटाकर अपनी वासना की पूर्ति करते रहेंगे। प्रेमचंद कहते हैं-वल्गैरिटी को यह लोग एंटरटेनमेंट वैल्यू कहते हैं। 

एक कलाकार को न्याय दिलाने के लिए लाखों, करोड़ों लोग अभियान से जुड़े। कुछ मीडिया से जुड़े लोगों ने इसे मिशन बनाया तो अधिकांश रिया चरित्तर के झाँसे में गलबहियां ही करते नजर आए। तुम्हारी सत्ता बुरी और हमारी सत्ता द्वारा बलात्कार और हत्या भली की चोंचबाजी करते रहे। यह उनका अधिकार है कि एक सत्ता के समर्थक द्वारा बलात्कार अच्छा न लगे। हत्या भी अच्छी न लगे। दूसरी सत्ता द्वारा सब गलत काम अच्छा लगने लगे। कहाँ किसकी अंगुली दबी है, यह कौन जाने? कहाँ से कौन जीवन में मजा जुटा रहा है, यह सिर्फ लूटने वाला ही जान सकता है।

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Sunday, 16 August 2020

बिहारियों को गाली देने वाला "दिल्ली का दोगला मीडिया" जिसे अब सत्ता के बलात्कारी और हत्यारे के कारनामे सुहा रहे हैं? लुटियंस दोगले...


 * निर्भय देवयांश
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बात सिर्फ इतनी ही तो थी कि दिशा सालियन और उससे संबंधित सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमय मौत पर सत्ता समर्थित बलात्कारियों और हत्यारों की संलिप्तता पर कुछ कहें, कुछ लिखें। मीडिया का प्रथम और आखिरी काम बस इतना ही तो है कि कायदे से सवाल उठाते रहे ताकि सत्ता से बहुत रहने वाले लोगों में न्याय की आशा जगी रहे। दिल्ली के दोगले मीडियाबाजों को यह काम भी नागवार लगा। उलटे उसने सुशांत सिंह राजपूत के बहाने पूरे बिहारी समाज को ही "toxic Bihari families" करार दे दिया। न्याय का मामला बिहारियों को गाली देने पर शिफ्ट कर दिया गया। इतना ही नहीं, यह मामला " Cow Belt " तक पहुँच गया? सवाल है कि इतनी उग्रता की जरूरत क्या थी? क्यों है? क्यों अचनाक इतनी बेहयाई? क्यों इतनी अश्लील दोगलई? सुशांत सिंह राजपूत की हत्या-आत्महत्या और फिर उसकी लीपापोती में सत्ता के साथ दोगले मीडियाबाजों की मजाखोरी की भी संलिप्तता तो नहीं है? आखिर प्रतिदिन की पार्टी-साटी का मामला है। पीने-खाने, चूमने-झूमने का मौका मिलता है। यही से मनोरंजन की खबरें निकलती हैं। जीने के लिए और क्या चाहिए! दुःखद कि इनके आकाओं के हाथ से पहले बलात्कार और फिर साजिशन सबूत मिटाने के लिए हत्या-आत्महत्या हो गयी? अब बचाव में न उतरे तो भविष्य में पीना-पिलाना, चूमना-झूमना कैसे चलेगा?

यह तो सत्ताखोरों की भाषा थी कि सुशांत सिंह राजपूत की सीबीआई जांच जरूरी नहीं है। अब इस मामले को बंद कर देना चाहिए। दूसरे ने कहा कि मरने के बाद उसका ज्यादा नाम हो गया। तीसरे ने कहा कि वह अवसादग्रस्त था। चौथे ने कहा कि उसकी मौत पर बहस "सड़क छाप" राजनीति है? दिल्ली का दोगला मीडिया आखिर सत्ताखोरों के साथ  "हनी ट्रैपर" क्योंकर बन गया?

क्या उसे अब सत्ता से जुड़े लोगों द्वारा आमजन की बहू-बेटियों के साथ बलात्कार पसंद है? क्या उसे भी वही मजा उसकी वकालत करने से मिल रहा है, जो बलात्कारियों को किसी की इज्ज़त रौंदने से मिला था? क्या अब सत्ता के हत्यारे भी उसके रिश्तेदार हो गए हैं? क्या यह सांठगांठ पहले से है या मजाखोरी के विकासी स्वभाव के चलते हाल के दिनों में विकसित हुआ है? आखिर यह सब कुछ पता तो चलना ही चाहिए?

आखिर दिल्ली के दोगले मीडियाबाजों की क्रांतिकारी पत्रकारिता यही है न- कि तुम सत्ता की आँख में आँख डालकर बात करते हो,  सत्ता समर्थित सेंगर और स्वामी चिन्मय की बलात्कार में संलिप्तता पर सवाल दागते हो, फिर सबूत के तौर पर परिवार की नृशंस हत्या पर कोहराम मचाते हो? फिर ऐसे ही दूसरे मामले में तुम्हारी क्रांतिकारिता कहाँ घुस जाती है? दिशा सालियन और सुशांत की हत्या-आत्महत्या कैसे भिन्न है? आखिर यह कैसी दोगली क्रांतिकारिता है? 

अपनी क्रांतिकारिता में ये "दिल्ली के दोगले मीडियाबाजों " ने पूरे बिहारी समाज को toxic यानी जहरीला-विषैला बता दिया। क्या कभी यह बताने की कोशिश, छोटी कोशिश कि Cow Belt के होते हुए भी, toxic Bihari families का देश भर में बिहारी का "सुसाइड रेट 0.5" यानी सबसे कम क्यों है? कभी बताए हो toxic दिल्ली के दोगले मिडियाबाजो? कभी ये भी बता देते कि तुम लोग कितने अवसादग्रस्त हो और तुम्हारा सुसाइड रेट बिहार के बनिस्पत इतना अधिक क्यों है? पहले बिहारी की तरह पसीना बहाना सीखो, तब तुम्हें पता चलेगा कि मनुष्य होना किसे कहते हैं। श्रमिक होना किसे कहते हैं? बिना पसीना की प्रतिभा तो सत्ता के बलात्कारी और हत्यारे की प्रशंसक बना ही देगी! इसमें कोई शक हो कभी तो अपने कुकृत्य और कारनामे पर नजर डाल लिया करो। लुटियंस के दोगले!

दिल्ली के दोगले मीडियाबाजों ने कभी यह भी बताया कि बिहार जैसे Cow Belt और toxic Bihari families से मुंबई पहुँचा सुशांत सिंह राजपूत को राजकुमार हिरानी जैसे निर्देशक और विधु विनोद जैसे निर्माता अपनी फिल्म 'पीके' में क्यों चयन करता है? क्यों सारा खान के साथ उसे 'केदारनाथ' में लिया जाता है? क्यों 'छिछोरे' में उसे लीड रोल मिलता है? क्यों हनी-मनी ट्रैप गैंग के सरगना करण जौहर अपनी फिल्म 'ड्राइव' में मुख्य रोल में लेता है? मीडिया के नाम पर पेशे की इतनी ईमानदारी तो बनती है कि नहीं? महज एक दशक में इतनी महत्वपूर्ण फिल्में? यदि इतना बड़ा स्टार नहीं था तो फिर लेने की क्या जरूरत थी? सुशांत की 34 वर्ष की सफलता तुम्हारे पके सफेद बालों से बहुत आगे निकल चुकी थी।

सत्ता के बलात्कारी और हत्यारे दिल्ली के दोगले मीडियाबाजों को  सुहा रहा है, तो उसे यह भी बताना होगा कि जिस्मफरोशी में तुम भी हिस्सेदार तो नहीं? क्या तुम्हें आमजन के न्याय से अधिक खास लोगों की जिस्मफरोशी पसंद आ गयी है? इन जिस्मखोरों के साथ उठने-बैठने की बिगड़ी लत से मुक्ति अच्छी नहीं लग रही है?

गिनो -गिनो अपने पापों को, बापों को भी। कब-कब किसका साथ दिए? 'जो तटस्थ है समय लिखेगा उसका भी इतिहास', बस इतना याद रखना है। 

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Friday, 14 August 2020

प्रेमचंद का हिंदी फिल्म उद्योग के खिलाफ (तंजीम) संगठन बनाकर विरोध करने का सपना 85 वर्ष बाद पूरा हुआ... फिल्म 'सड़क 2' का बहिष्कार शुरू...


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सिनेमा के जरिये मगरिब की सारी बेहूदगियां हमारे अंदर दाखिल की जा रही हैं : प्रेमचंद 
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* निर्भय देवयांश 
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प्रेमचंद ने "प्रगतिशीलता" को निरर्थक शब्द कहा था, क्योंकि वे जानते थे इसकी आड़ में कला-संस्कृति के नाम पर लोग 'गोरखधंधा' करेंगे। अब जिसका अर्थ गलतधंधा हो गया है। प्रेमचंद साहित्य के विशेषज्ञ कमल किशोर गोयनका इसे बार-बार दोहराते हैं कि गिरोहबंदी से जुड़े लोगों ने अपने फायदे के लिए इस शब्द का घनघोर दुरुपयोग किया है। 

प्रेमचंद अपने जीवन की बेहतरी के लिए फिल्म लाइन में काम करने के लिए मुंबई गए थे। लगभग दस माह वहाँ रहे लेकिन बरहना रक्स यानी नंगे नाच देखकर उनका मन उचट गया। वे कहते भी हैं कि बोसा बाजी और औरतों पर मर्दों का हमला के सिवा क्या है? यह सब फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों को जायज लगता है।

दिशा सालियन और सुशांत सिंह राजपूत की हत्या-आत्महत्या हत्याकांड के बाद प्रेमचंद की बात शत-प्रतिशत साबित हो रही है। इन दोनों के पहले दिव्या भारती और जिया खान की संदिग्ध हत्या-आत्महत्या की गुत्थी अभी तक सुलझी नहीं है। यानी प्रेमचंद की बात-"मर्दों का औरतों पर हमला" , सच होती दिख रही है। यह लेखक की मानवतावादी दृष्टिकोण है। प्रेमचंद इस सच  को महज दस माह में ही समझ गए थे। सुशांत सिंह हत्याकांड में जिस तरह सत्ता और बॉलीवुड की गलबहियां दिख रही हैं, उससे जनता में नाराजगी स्वाभाविक है। जब फिल्म के इतने बड़े कलाकार की संदिग्ध हत्या हो सकती है, तो फिर छोटे कलाकारों की क्या बिसात है? ये लोग कैसे अपनी लड़ाई उस फिल्म उद्योग में लड़ेंगे, जहाँ प्रेमचंद का मोहभंग हो गया था!

प्रेमचंद,  निगम जी को 19 मार्च, 1935 को लिखे पत्र में कहते हैं-- "सिनेमा में किसी इस्लाह की तवक्को करना बेकार है। यह सनत भी उसी तरह सरमायादारों के हाथ में है जैसे शराब फरोशी। इन्हें इससे बहस नहीं कि पब्लिक के मज़ाक पर क्या असर पड़ता है। इन्हें तो अपने पैसे से मतलब। बरहना रक्स यानी नंगे नाच, बोसाबाजी और मर्दों का औरतों पर हमला। यह सब उनकी नजरों में जायज है। पब्लिक का मज़ाक इतना गिर गया है कि जब तक ये मुखरिब यानी घातक और हयासोज यानी निर्लज्ज नजारे न हों, उसे तस्वीर में मजा नहीं आता। मज़ाक की इस इस्लाह का बीड़ा कौन उठाए? सिनेमा के जरिये मगरिब की सारी बेहूदगियां हमारे अंदर दाखिल की जा रही हैं, और हम बेबस हैं। पब्लिक में तंजीम यानी संगठन नहीं, न नेक-ओ- बद का इम्तियाज यानी पहचान है।"

मुकेश भट्ट निर्मित और महेश भट्ट निर्देशित फिल्म 'सड़क 2' की ट्रेलर लाखों लोगों द्वारा नापसंद की गयी। तो क्या प्रेमचंद की आत्मा लोगों में अचानक जाग गयी? सुशांत की मौत का बहाना लेकर। आलिया भट्ट और संजय दत्त अभिनीत इस फिल्म का भविष्य अभी से अंधेरे में है। सुशांत सिंह राजपूत हत्याकांड में जगह-जगह अभियान चलाए जा रहे हैं ताकि संदिग्ध मौत के शिकार कलाकार को न्याय मिल सके। दूसरी तरफ सत्ता अपनी सनक-हनक में अब सुशांत के पीड़ित परिवार को ही निशाना बना रही है ताकि वे कुछ बोल न सकें। मकसद है अपराधी को सफेदपोश हाथों से बचा लिया जाए? खाकी सफेदपोश की सेवा में रहने के लिए बाध्य है, शायद यह लोकतांत्रिक बाध्यता है। इस पर ताली बजाने की मनाही है। 

प्रेमचंद की भविष्यवाणियां आने वाले दिनों में प्रायः अक्षरशः साबित होंगी। अभी शुरुआत भर है। प्रेमचंद की सलाह थी कि जिन्हें साहित्य का रस लेना हो, उन्हें सिनेमा को दूर से सलाम करना चाहिए। अब आमजन की बारी है। 

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प्रेरणा लिए न कि फंसे...इस लायक नहीं हैं ये बॉलीवुड वाले... आमजन की निजी जिंदगी इनसे लाख गुनी बेहतर है : इकबाल दुर्रानी


* निर्भय देवयांश 
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प्रेरणा लेने-देने के चक्कर में सामान्य जिंदगी भी कभी-कभी असामान्य हो जाती है। चमक न हो तो आकर्षक का भी पता कम ही चलता है। वे लोग जो चमक-दमक के झांसे में आ जाते हैं, शायद सबसे अधिक गुनाह खुद पर करते हैं। आखिर उनके जीवन को इतना वक्त ही कैसे मिलता है कि वे प्रेरणा-प्रेरणा के खेल में उलझ कर रह जाएं?

जाने-माने निर्माता-निर्देशक व लगभग दर्जनों फिल्मों के पटकथा लेखक बिग ब्रो इकबाल दुर्रानी जब कहते हैं कि आमजन की निजी जिंदगी बॉलीवुड वालों से लाख गुनी अच्छी है, तो वह उस हकीकत पर से पर्दा उठा रहे हैं, जिसे हम अब तक प्रेरणाश्रोत मानते आ रहे हैं। उनके अनुसार-सच यह है कि फिल्मवालों की निजी जिंदगी गर दर्शक सामने से देख लें तो घृणा हो जाएगी। यह कितनी बड़ी सच्चाई है! तो क्या कला के नाम पर दिखावा कर ये बॉलीवुड वाले-दोहरे जीवन जीते हैं और उसी को कारोबार और करोड़ी क्लब का नाम दे बैठे हैं?

 इकबाल दुर्रानी कहते हैं कि बस दो घन्टे की फिल्म देखिए और अच्छा लगे तो तारीफ कीजिए और भूल जाइए। फिल्म की कहानी को आप जिस घर में रहते हैं और जो जिंदगी जीते हैं वहाँ तक मत ले जाएं। आप अपने घर और निजी जिंदगी में फिल्म वालों से लाख गुने बेहतर हैं। 

अभी लॉक डाउन के माह-दो माह पहले बिग ब्रो के कोलकाता प्रवास के दौरान शाम में घण्टों उनके साथ बैठकर हम फिल्मों पर चर्चा करते थे। मेरे अलावा शायर रामगोपाल पारीख, पत्रकार हरेराम कात्यायन, कहानीकार विमलेश्वर द्विवेदी सब मिलकर दुर्रानी साब से अनचाहे सवाल भी करते थे। बिग ब्रो शांति से जवाब देते और कहते कि संजीदगी यही है कि आप जो जीते हैं और उसमें जो सरोकार है वही आपकी पहचान है। उदाहरण के लिए अमिताभ बच्चन अच्छे कलाकार हैं, हो सकते हैं। उसके बाद उनमें कोई दिलचस्पी नहीं होनी चाहिए। फिल्म के बाद यदि बॉलीवुड में दिलचस्पी है तो फिर आपकी अपने में दिलचस्पी कम है। इस बात को मानकर चलिए। दूसरे उदाहरण को लेते हैं-मैंने पूछा कि आपकी लिखी कहानी 'फूल और कांटे' पर कुकू कोहली के निर्देशन में बनी फिल्म का यह गाना---तुम्हीं ही हो जिस पर दिल मरता है, कि तुमसे मिलने को दिल करता है रे बाबा...। अब इस गाना की व्याख्या भी बिग ब्रो अपने ढंग से करते हैं। उनके अनुसार-जब फिल्म निर्माण होता है तब हर निर्माता-निर्देशक यही चाहता है कि चमकदार इतना बनाओ कि आकर्षण में लोग खिंचे चले आएं। यह कमाई का जरिया है। लेकिन गाना का दर्शन इसके ठीक विपरीत भी हो सकता है--सिर्फ तुम्हीं क्यों ऐसा क्यों हो कि तुमसे मिलने को दिल करता है। इसी फिल्म का दूसरा गाना है--धीरे-धीरे प्यार को बढ़ाना है। अब यहाँ धीरे-धीरे यानी समझिए-बूझिए आगे बढ़िए। बेहतर समझ में पहले कदम पर लिए जाने वाले फैसले कभी-कभार हमारी आँख खोलने में भी सक्षम हैं।

दुर्रानी साहब भी जब मुंबई गए थे तो अविभाजित बिहार के ही थे। अभी गोड्डा झारखंड में है। उन्होंने अपनी प्रतिभा की बॉलीवुड में धूम मचा दी थी। सुशांत सिंह राजपूत भी दस-पंद्रह साल में अच्छे-अच्छे निर्देशकों के साथ फिल्म कर रहे थे। कइयों से आगे निकल रहे थे। भाई-भतीजावाद वाले उनके दुश्मन बन गए थे। नहीं तो भला इतनी निर्मम मौत होती भी क्या ? 

अब सोचिए कि जो बॉलीवुड पथ-प्रदर्शक होने का दावा करता है।  करीने से किसी की हत्या भी कर सकता है, करवा सकता है? पर्दे से यह प्रेरणा लेने पर फिर विकास दुबे उर्फ 'पंडित बोल रहा है' का भयानक सच समाज में राज करेगा। दुर्रानी साब ने लहक से अंतिम बात यह कही कि --आमलोगों के खून-पसीने और संघर्ष की जिंदगी के सामने बॉलीवुड वाले की निजी जिंदगी से बहुत दूर रहने की जरूरत है। मामला कुछ-कुछ ऐसा ही है-'दीवाने हुए न कि दर्द लिए'।

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Thursday, 13 August 2020

कैंपस की बेहयाई के शिकार, हिंदी साहित्य के दो खिदमतगार-कमल किशोर गोयनका और भारत यायावर...


* निर्भय देवयांश
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प्रेमचंद साहित्य के अनुसंधान पर अपने जीवन को न्यौछावर करने वाले कमल किशोर गोयनका मित्रों की इस राय से आंशिक सहमत होते हुए भी पूर्ण रूप से असहमत हैं कि --- तो क्या सिफारिश गैंग के सामने अपनी साधना में तन्मय रहने के चलते पदोन्नति व अन्य सुविधाओं को त्याज्य मान लेना चाहिए? कैंपस की बेहयाई, गिरोहबंदी और तथाकथित प्रगतिशीलता पर गोयनकाजी कहते हैं---
" कई मित्रों ने सही कहा है कि प्रोफेसर होना महत्त्वपूर्ण नहीं है,  जितना ज्ञान की साधना करने वाला और कुछ नये अज्ञात-अप्राप्य ज्ञान को समाज के सामने लाने वाला। यह सत्य है पर इस संतोष से क्या योग्यता की उपेक्षा और अयोग्य को वरदान के अलोकतांत्रिक पक्षपात का हम समर्थन नहीं कर रहे हैं। समाज अयोग्य, सिफारिशी, निष्ठाहीन व्यक्तियों को उच्च पदों पर बैठाने से चलेगा या योग्य को उसकी योग्यता के सम्मान से होगा। योग्यता को अपमानित करने के दुष्परिणामों को समझना जरूरी है। अतः ऐसे अन्याय की भर्त्सना जरूरी है और ऐसे लोगों के चेहरों से नकाब उठाना भी जरूरी है और समाज को जागृत करना भी जरूरी है।"

गोयनकाजी जी की यह पीड़ा अकेले की नहीं है। इन्हीं के समानधर्मा भारत यायावर जो अपने को फणीश्वरनाथ रेणु साहित्य को समर्पित कर चुके हैं, कुछ अलग अंदाज में लहक से बातचीत में अपनी राय रखते हैं। भारत जी कहते हैं-- " साधना में रत अनुसंधानकर्ता को अपने काम से अधिक मतलब होता है। सुविधाएं जरूरी हैं लेकिन उन्हें पाने के लिए जो भीतरिया साजिशन प्रक्रिया है, वह सबके वश की बात नहीं है। बहुत माथापच्ची है। पदोन्नति सामान्य प्रक्रिया के साथ होती ही है, होनी भी चाहिए। क्यों नहीं होती है, इसके पीछे जो कारण हैं, उनकी खोजबीन मैंने कभी नहीं की। रेणु साहित्य में इस तरह रमा रहा कि सुविधाओं से वंचित होना भी स्वीकार करता रहा।" 

कैंपस में यदि चयन प्रक्रिया सही होती तो कमल किशोर गोयनका रीडर की जगह प्रोफेसर पद से रिटायर होते। भारत यायावर भी लेक्चरर से आगे बढ़कर रीडर और फिर प्रोफेसरी तक पहुँचते? लेकिन यह योग्यता का कैसा सम्मान है कि अगले वर्ष 2021 में वह रिटायर होंगे लेक्चरर पद से। जबकि भारत जी 2004 से ही विश्वविद्यालय के पीजी के छात्रों को पढ़ा रहे हैं। 

कैंपस के गलियारे की ही चर्चा है कि गिरोहबंदी कइयों की प्रतिभा पर भारी पड़ी है। जो गिरोह में थे बहुत आगे निकलते गए। गोयनका जी दिल्ली विश्वविद्यालय में एमए के छात्रों को पढ़ाते थे, जबकि सुधीश पचौरी बीए। आपको पता ही होगा कि सुधीश पचौरी कहाँ तक पहुँच गए! प्रोफेसरी से भी आगे। प्रतिभा और योग्यता रहते कमल किशोर गोयनका रीडर और भारत यायावर लेक्चरर तक ही! 

कुमार पंकज अपनी पुस्तक 'रंजिश ही सही...' (राधाकृष्ण प्रकाशन) अध्याय 'तबियत इन दिनों बेगाना-ए-गम होती...' में लिखते हैं--- अपनी मान्यताओं में रामस्वरूप चतुर्वेदी अडिग थे। 'नामवर के निमित्त' आयोजन जब इलाहाबाद में हुआ तो ग्रोवर बंधुओ (दिनेश ग्रोवर/ रमेश ग्रोवर) के बहुत आग्रह करने पर वह दोपहर के भोजन में तो शामिल हो गए लेकिन किसी भी सम्मान गोष्ठी में शामिल नहीं हुए। इससे पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पद के लिए हुई चयन-समिति में, नामवर सिंह विशेषज्ञ थे, जो निर्णय हुए थे, उससे चतुर्वेदी जी इतने क्षुब्ध हुए थे कि तभी दशकों पुरानी चतुर्वेदी-नामवर मित्रता के टुकड़े-टुकड़े हो गए थे। यह विडंबना ही कही जाएगी कि जिस वरिष्ठता की आड़ लेकर चतुर्वेदी जी को माताबदल जायसवाल के मुकाबले प्रोफेसर पद से वंचित किया गया था। (योग्यता में चतुर्वेदी जी यदि राजा भोज थे तो माताबदल जायसवाल...), उसी वरिष्ठता को आधार बनाकर चतुर्वेदी जी ने एक साठोत्तरी लेखक/अध्यापक को, जो अभ्यर्थियों में सर्वाधिक योग्य था, प्रोफेसर पद से वंचित करने की कोशिश की। अंतर मात्र इतना ही है कि चतुर्वेदी जी को बाद में दोबारा मौका मिला लेकिन बेचारा लेखक तो सेवानिवृत्त ही हो गया। (पेज नं.33)...

 कमल किशोर गोयनका और भारत यायावर बेचारा तो बिल्कुल ही नहीं हैं। ये दोनों उन सभी प्रोफेसरों पर बीस पड़ेंगे जो बहुत दूर तक कुचक्र से पहुँच गए! चिंता बस इतनी कि कैंपस की बेहयाई में योग्यता और प्रतिभा कब तक कुचली-मसली जाती रहेगी? क्या इस साजिश को हम संतोष का नाम दे सकते हैं?

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Wednesday, 12 August 2020

सत्ताखोर होने का मतलब "किसी का रेप कर दो फिर शेष कर दो"... तो है नहीं...उठ रहा है बॉलीवुड का गंदा पर्दा...


* निर्भय देवयांश 
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सत्ताखोर होने के ढेर सारे फायदे हैं, नुकसान बहुत कम। यहाँ जरूरत से अधिक चमचे मिल जाते हैं। चमचों के हौसले सदा बुलंद रहते हैं। इस वर्ग के लोग किस श्रेणी से आते हैं और किस श्रेणी में रखे जाते हैं, इस बात पर निर्भर करता है कि चमचागिरी का अंदाज कितना निराला है। 

सुशांत सिंह राजपूत बड़ा स्टार था कि बहुत छोटा था कि चर्चा करने लायक न था कि उसकी निर्मम मौत पर बहस नहीं होनी चाहिए, यह किस आधार पर तय होगा? यानी हत्या भी तुम करो, सेक्स भी तुम करो और चर्चा के तरीके का चयन भी तुम्हीं करो। और ज्यादती कि इसी को सिस्टम भी कहना है कि यही जनता का खेवनहार है! अगर सत्ताखोर होने के बहाने इतने सारे कारनामे के अपवित्र अधिकार मिल जाते हैं तो फिर पर्दे के पीछे अब तक जो भी चलता रहा है, बहुत बुरा चलता रहा है। फिर बहुत बुरा और बॉलीवुड के गठजोड़ में फर्क कहाँ रह जाता है? चमचों ने अपनी दुनिया चमकाने के लिए बहुत गंदी दुनिया की अच्छी तारीफ क्यों की होगी? इसके भी कारण छोटे-मोटे तो होंगे नहीं! चूँकि चमचे ऊपर से नीचे तक फिट हैं इसलिए वे जत्थे में हमलावर होते हैं। उनके पास बाजार की चमकीली बेहयाई भाषा होती है। एक तरह से भाषा पर ऐसा नियंत्रण होता है कि उनके सारे तर्क कम समझदार लोगों को स्पंदित करने के लिए काफी होते हैं। इसी से उनका घर चलता है। शहर-दर-शहर ठिकाना होता है। रात की ऐय्याशियां और दिन भर की कमीनगी! सब मिल कर एक ऐसा दृश्य रचते हैं कि हत्यारे और बलात्कारी भी यहाँ निफ्रिक दिखता है। हत्यारे और बलात्कारी को अपने चमचे पर यकीन होता है कि मजा लूटने के बाद थोड़ी-सी जिस्मखोरी इनके हिस्से में छोड़ दी  जाएगी।  

बलात्कारी और हत्यारा जब तय करने लगे कि उसे सजा भी उसकी शर्त पर मिलनी चाहिए तो स्पष्ट है कि वे अपने मंसूबों में बार-बार कामयाब होंगे। कभी दिव्या भारती, कभी जिया खान, कभी दिशा सालियन तो कभी सुशांत सिंह राजपूत हादसों के मामूली शिकार भर बताए जाते रहेंगे? आखिर हवस की पूर्ति ही तो करनी है और वह भी आउटसाइडर के साथ? जो पहले से सिस्टम में आउटसाइडर है उसका साथ भी आखिर कौन देगा और क्योंकर देगा? यह सवाल उन सभी के लिए है जो चमचे नहीं हैं, जो सत्ता के करीब नहीं हैं? कौन कह सकता है कि चमचे की बहू- बेटियाँ अर्से तक सुरक्षित रहेंगी और चश्मदीद गवाह चमचे अपनी बारी आने पर सुशांत सिंह राजपूत न बना दिए जाएंगे और उनकी बहू-बेटियाँ दिशा सालियन, दिव्या भारती, जिया खान?

इसलिए समय रहते चमचों खतरे को भांप लो। पाप को पाप ही कहो। ऐसा कर न तुम खुद को बचा लोगे बल्कि पर्दे पर बदल रहे दृश्यों के बहाने जो ठगे जा रहे हैं, उन्हें भी सच के करीब लाया जा सकता है। वर्ना सुशांत की मौत दिशाहीन (दिशा सालियन) होगी और इसमें किसी प्रकार की दिव्यता (दिव्या भारती) न होगी। 

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जबलपुर बॉय :: बॉलीवुड की "अश्लील गलबहियां" सिर्फ अश्लीलता को बढ़ावा देती हैं... 'भूतनाथ' फेम निर्देशक विवेक शर्मा ने लहक से कहा...


* निर्भय देवयांश
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 सुशांत सिंह राजपूत की हत्या-आत्महत्या कांड के बाद बॉलीवुड वाले काफी सतर्क हो गए हैं। फूंक-फूंक कर, नाप-तौल कर बोल रहे हैं। कदम-कदम पर खतरा है। एक गलत बयान यानी बॉलीवुड लॉबी की नजर में किसी का कैरियर हमेशा के लिए बर्बाद कर सकता है। दिशा सालियन हत्याकांड की कीमत सुशांत सिंह राजपूत की जान से वसूली गयी है। यह एक घटना ही तो थी। ऐसे बयान देने वाले सभी शूरवीर चुप हैं। बोलते हैं तो बॉलीवुड लॉबी के पक्ष में, वर्ना चुप रहना अभी अभिनय क्षेत्र में बने रहने के लिए बेहतर खुराक है। जीते रहे तो लाख उपाय की सोच की आँधी बह रही है बॉलीवुड में। 

 जबलपुर वाले 'भूतनाथ' फेम निर्देशक विवेक शर्मा थोड़ा-बहुत बॉलीवुड वाले से अलग हैं। जो कुछ भी कहना होता है, कह देते हैं। कहने से उन्हें गुरेज नहीं है। नतीजा जो भी, उसकी चिंता भाई-भतीजावाद वालों की तुलना में कम करते हैं। बॉलीवुड के ताजा हालात पर जारी उठापटक के बीच विवेक शर्मा ने लहक से बातचीत में कहा-बॉलीवुड की 'अश्लील गलबहियां' सिर्फ अश्लीलता को बढ़ावा देती हैं। कुछ लोगों के इस मजा और फायदे से दर्शक को कुछ भी लेना-देना नहीं है। आमजन पर कुसंस्कृति थोप कर कहेंगे कि यही मांग है। यह पूरी तरह से गलत है। यह सच्चाई नहीं है कि आमजन अश्लीलता चाहते हैं। परोसने वाले अपनी सोच को दर्शक पर लादते हैं। 

लहक के इस सवाल पर कि बॉलीवुड में परिवर्तन कैसे संभव है? विवेक शर्मा ने दो टूक लहजे में कहा कि पारदर्शी लोगों को फिल्म निर्माण में धन लगाना होगा। यदि इनके वर्चस्व को धत्ता बताना है तो समानांतर आर्थिक फंड तैयार करना होगा। बिना इसके आप अच्छी सामाजिक फिल्म जो सर्जनात्मक है, सार्वजनिक हित में है, नहीं बना सकते हैं। इसके लिए मजबूती से पहल करनी होगी। जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक बॉलीवुड पर पहले से काबिज लोग अपनी मनमर्जियां करते रहेंगे और दर्शक अपनी रुचि को हिंसात्मक बनाकर समाज को कलंकित करते रहेंगे। विवेक शर्मा के अनुसार आखिर मामला वर्चस्व तोड़ने का है तो उसके लिए वैसे ही लोगों को आगे आना होगा जो फिल्म निर्माण को सामाजिक कार्य मानते हैं। 

 विवेक शर्मा ने जीतोड़ मेहनत कर बॉलीवुड में साफगोई के साथ अपनी जगह बनायी है। 1992-93 में फिजिक्स में एमए की पढ़ाई करने के बाद मुंबई पहुँच गए। जेहन में यह बात सदा बनी रही कि छोटे शहर से हैं। घर-परिवार का कोई फिल्मी नाता नहीं है। नाता यही है कि पांचवीं कक्षा से ही कहानियां उनके मन-मस्तिष्क में घूमने लगीं। मौका मिलते ही विवेक मुंबई पहुँचे और सहायक निर्देशक के तौर पर महेश भट्ट के साथ सफर की शुरुआत की। 'चाहत', 'डुप्लीकेट', 'फिर भी दिल है हिंदुस्तानी' आदि दर्जन से अधिक फिल्मों में महेश भट्ट के सहायक रहे। यहीं पर काम करते हुए उनकी शाहरुख खान, जूही चावला, अक्षय कुमार, मिथुन चक्रवर्ती आदि-आदि से परिचय बढ़ा। 

विवेक ने सभी से अपने ढंग से रिश्ते प्रगाढ़ किए। जैसे कि वह जूही चावला को 'जूही मां' कहते हैं। शाहरुख खान को 'शाह खान' और अमिताभ बच्चन को 'दादा'। विवेक के यह अलग रिश्ते का अंदाज ही है कि जब भूतनाथ फिल्म की कहानी लिख रहे थे और अपनी पसंद की कलाकारों से मिल रहे थे, तो सभी ने उन्हें प्रोत्साहित किया। अमिताभ बच्चन उर्फ दादा, जूही मां और शाह खान तीनों ने अपनी सहमति दे दी। 2008 में बनी यह फिल्म आज भी दर्शकों में अच्छी पहचान लिए हुए यादों में जिंदा है। 2009 में विवेक ने 'कल किसने देखा' फिल्म बनायी। बताते चलें कि बड़े कलाकारों ने 'भूतनाथ' के निर्माण में यथासंभव सहयोग किया। 

विवेक शर्मा ने एक नया प्रयोग करते हुए अपनी अलग कंपनी बना डाली। नाम रखा है-"फिल्मजोन"। इस बैनर के तले इसी वर्ष (2020) एक फिल्म रिलीज की गयी-'ए गेम कॉल्ड रिलेशनशिप'। यह फिल्म 14 फरवरी यानी वेलेंटाइन डे को रिलीज हुई। लगभग 600 सौ बड़े- छोटे सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई। अच्छा रिस्पांस मिला। वर्तमान में विवेक कोरोना काल में मिले समय का भरपूर सदुपयोग कर रहे हैं। तीन फिल्म पर एकसाथ काम कर रहे हैं। संभावित फिल्म क ख ग घ ड़ है। इसमें अमिताभ बच्चन को लेने की योजना है। एक दौर की बातचीत भी  हुई है। दूसरी फिल्म 'राम सिंह' और तीसरी है 'लंगड़ा'। इनके अलावा भी फिल्मों की कहानी विवेक द्वारा लिखी जा रही है। लॉक डाउन के बाद जब सब कुछ सामान्य हो जाएगा तो फिल्म निर्माण का काम आगे बढ़ेगा। 

 अब चूँकि विवेक को बात करते-करते भूख लग गयी। घर से बाहर जाकर बादाम लाना, फिर पोहा बनाना है। फिर पानी-पूरी का मजा। बैचलर विवेक को खुद पोहा बनाना है। मैंने भी कहा-बना लो भाई, खा लो भाई-अपनी जिंदगी है जी लो भाई। विवेक की फिल्म की तरह---'कल किसने देखा'। 

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Saturday, 8 August 2020

संजय दत्त गर 'ड्रगिस्ट-स्मैकियर' है तो पसंद है लेकिन बिहारी सुशांत सिंह राजपूत का तथाकथित 'डिप्रेशन अनपच' हो गया... " कि जान ही ले लिए आखिर "?


* निर्भय देवयांश 
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 खानदान-वानदान के बच्चों के लिए कितनी छूट है जीवन की राहों पर। दूसरे-तीसरे के लिए यह सुविधा नहीं है क्योंकि वह बिहार से कुछ सपने लेकर उस मायानगरी में आता है, जहाँ न्यूरोटिक संजय दत्त हर हाल में अपने लोगों द्वारा अपनाया जाता है। स्वीकार किया जाता है। उसके जेल जाने पर मित्र-मंडली वहाँ मिलने जाती थी। जेल में साप्ताहिक मिलना-जुलना था। सभी मिलने के लिए मौके की तलाश में रहते थे। इस न्यूरोटिक को तरह-तरह के नाम दिए गए। बाबा, संजू बाबा, और न जाने क्या-क्या? इतना ही नहीं, इमेज चमकाने के लिए बायोपिक भी 'संजू' नाम से बनायी गयी। आखिर यह फर्क इतना बड़ा कैसे और क्योंकर बॉलीवुड द्वारा मंजूर किया गया? इसलिए तो नहीं कि सुनील दत्त और नरगिस का पुत्र ठहरा? अगर यह प्रमाण-पत्र है तो बहुत अच्छा संकेत नहीं है कला की तथाकथित दुनिया में। सुशांत सिंह राजपूत मायानगरी में किसी के रहमोकरम पर नहीं गया था। उसे भरोसा था कि उसमें कला है और उसके प्रदर्शन के लिए फिल्म उद्योग ही एकमात्र जगह है। भला किसी भाई-भतीजावाद से जुड़े बॉलीवुड के बच्चों ने भी उतनी मेहनत की, जितनी सुशांत ने की? ठीक है भाई कि यह तुम्हारी खेती है, तुम जैसे चाहो इसे रौंदो। इसके लिए जरूरी है कि देश में एक कानून ही बना दिया जाए कि बॉलीवुड कुछ लोगों की जागीर है और छोटे शहर के लोग वहाँ सपने लेकर न जाएं। यदि गए तो सपने तो कुचले-मसले जाएंगे ही। जान भी खींच ली जाएगी। नग्न कर बहुमंजिली इमारत से फेंक दिए जाएंगे। तुम्हारा नाम कुछ भी हो सकता है-दिव्या भारती, दिशा सालियान, जिया खान? हत्या कहीं भी की जा सकती है? 

1990 के दशक में मुंबई के जुहू चौपाटी के जिस यूनिटी कम्पाउंड में मैं अपने स्ट्रगलर मित्रों के साथ स्ट्रेला आंटी के पेइंग गेस्ट के तौर पर रहता था। यह ठिकाना संजय दत्त का तब स्थायी ठिकाना हुआ करता था। वजह ड्रग सेवन। कई स्मैकियर स्ट्रेला आंटी के रहमोकरम पर चौकी के नीचे रात में सोते थे। ये सभी संजय दत्त के ड्रग सेवन के दोस्त थे। दो स्मैकियर मेरे बेड के नीचे भी सोता था। स्ट्रेला आंटी से जब मैंने शिकायत की कि यह ठीक नहीं है। दूसरे पेइंग गेस्ट इस माहौल में रह सकते हैं लेकिन मैं नहीं। प्यारी स्ट्रेला आंटी ने तब अपने आंगन में शेड दिलवाकर स्मैकियरों के लिए रहने की व्यवस्था करवा दी थीं। स्ट्रेला आंटी के यार जो कि चलने-फिरने से लाचार थे, ने मुझसे कहा- ये सभी संजय दत्त के दोस्त हैं। तुम क्यों नहीं मिलजुल कर रहते हो। कभी काम ही आ जाए। मैंने कहा-अंकल, मैं जीवन में इस तरह की शर्तों को ठोकर मारता रहा हूँ। समीकरण की जिंदगी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। 'ऐसा करेंगे तो ऐसा होगा', यह समीकरण सब पर फिट नहीं हो सकता? तभी स्ट्रेला आंटी आ गयीं और यार से खसम बने अंकल को दो-चार गाली करीने से दीं। अंकल के होश जो ठिकाने आए कि फिर कभी कोई सलाह नहीं दी।

संजय दत्त, सैफ अली खान, विद्या बालन, जब प्रदीप सरकार निर्देशित फिल्म 'परिणीता' की शूटिंग 2004-2005 में कोलकाता में कर रहे थे तो मेरी अक्सर मुलाकात होती थी। मैं दैनिक जागरण में राजनीति के साथ-साथ कला-संस्कृति का भी रिपोर्टर था। पहली मुलाकात में ही मैंने संजय दत्त से कहा कि मुंबई में मैं स्ट्रेला आंटी का पेइंग गेस्ट रहा हूँ 7 साल, तो जवाब मिला कि तब तो आप मेरे बारे में बहुत कुछ पहले से जानते हैं। स्ट्रेला आंटी के लिए संजय के मन में आदर दिखा। निर्माता विधु विनोद चोपड़ा ने शूटिंग के लोकेशन पर भी बुलाया। समयानुसार विक्टोरिया भी एकाध बार गया। कोलकाता के विभिन्न इलाकों में फिल्म की शूटिंग हुई थी। एक दिन मुंबई से मेरे मित्र अमरनाथ कोलकाता आए हुए थे। उन्होंने मिलने के बारे में पूछा तो मैंने उनसे कहा-ताज होटल में हूँ संजय दत्त के साथ। अमरनाथ जी भी आ गए। संजय से अमरनाथ का परिचय कराया। परिणीता के बाद प्रदीप सरकार की एकाध फिल्म आयी-गयी। एक बार फोन पर बात हुई तो प्रदीप सरकार ने कहा-आपसे बॉलीवुड के बारे में कुछ छिपा नहीं है। मुझे साइड लाइन किया जाता रहा। राजकुमार हिरानी ही विधु विनोद चोपड़ा की पसंद के निर्देशक बने रहे। क्या किया जा सकता है अपनी खेती है, अपनी जागीर!

 सुशांत सिंह राजपूत अपनी हत्या-आत्महत्या कांड के ठीक एक दिन पहले निखिल आडवाणी और रमेश तुरानी जैसे नामचीन निर्देशक-निर्माता के साथ नयी फिल्म को लेकर दो-तीन दौर में लगभग घन्टे भर बात करता है। इन लोगों ने मीडिया से बातचीत में कहा भी कि सुशांत एकदम नार्मल था। अपनी भूमिका को लेकर सवाल-जवाब कर रहा था। उसे स्क्रिप्ट देने पर भी सहमति बनी थी। ऐसे भी कोई आत्महत्या करता है तो? जूस पीकर? उसे किस बिना पर अवसादग्रस्त घोषित करने पर तुले थे बॉलीवुड वाले? बॉलीवुड को जागीर समझने वाले? जो हत्याकांड के पहले सुशांत को अपनी फिल्म में लेने के लिए कोरोना काल में बातचीत कर रहे थे, कहीं वे भी तो अवसादग्रस्त नहीं थे? देख लेना, पता कर लेना जरूरी है?

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Saturday, 1 August 2020

बॉलीवुड में 'मंजू' के जिंदा प्यार को मार देना...'मीना कुमारी' उर्फ 'बेबी मुन्ना' वाया चंदन उर्फ 'कमाल अमरोही'...


* निर्भय देवयांश 
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प्यार सोचा था, प्यार ढूंढ़ा था
ठंडी-ठंडी सी हसरतें ढूंढ़ीं 
सोंधी-सोंधी सी, रूह की मिट्टी 
तपते, नोकीले, नंगे रस्तों पर 
नंगे पैरों ने दौड़कर, थमकर, 
धूप में सेंकी छांव की चोटें 
छांव में देखे धूप के छाले
अपने अंदर महक रहा था प्यार---
खुद से बाहर तलाश करते थे....

मीना कुमारी की इन पंक्तियों से गुजरने के बाद शायद पत्थर दिल इंसान भी पसीज जाए कि आखिर ईश्वरों के पास इतना फालतू वक्त कैसे होता है कि किसी को दर्द का समंदर तो किसी को खुशियों का आसमान दे देते हैं। प्यार की तलाश जब भी मन के बाहर किया गया है, फिर जो हाल हुआ है कि कहा न जाए। बेबी मुन्ना की जिंदगी पत्थर ही थी। पत्थर हो गयी थी। बिस्तर पर पत्थर रखकर उसके साथ संवाद किया जाता। उसे प्यार किया जाता। उसे पुचकारा और दुलारा जाता। वजह कि मंजू दिल खोलकर सबकुछ कहती, लड़ती-झगड़ती थी। पत्थर कोई जवाब नहीं देता था। खामोश रहता। खामोशी से मोहब्बत हो जाना इसी को कहते हैं। जीवन में बिल्कुल पत्थर हो जाना। न बचपन की जिद देखी, न जवानी की चाहत। मंजू की कुल 36 वर्ष की जिंदगी। सुशांत सिंह राजपूत की 34 वर्ष की जिंदगी। सबकुछ दूसरे के लिए, अपने लिए सिर्फ मौत!

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, 
धज्जी-धज्जी रात मिली।
जिसका जितना आँचल था, 
उतनी ही सौगात मिली।।
जब चाहा दिल को समझें,
हँसने की आवाज सुनो।
जैसे कोई कहता हो, लो
फिर तुमको अब मात मिली।।
बातें कैसी? घातें क्या ?
चलते रहना आठ पहर।
दिल-सा साथी जब पाया
बेचैनी भी साथ मिली।।

तीन बहनों में सबसे छोटी बेबी मुन्ना उर्फ महजबीं महज छह साल की उम्र से यानी 1939 से घर की जिम्मेदारी अपने कंधे पर उठा ली। 1939 से 1972 तक हर सांस पर जो भार था उसे ब्रांडी की बोतल भर- भर लत ने नहीं बल्कि मौत ने राहत दी। बेबी मुन्ना की माँ प्रभावती देवी रवींद्रनाथ टैगोर की परिवार से संबद्ध थीं लेकिन पहले ईसाई फिर इस्लाम धर्म स्वीकार कर इकबाल बेगम बन गयीं। पहली शादी नहीं टिक पाई। मुंबई में दूसरी शादी अल बक्स से की। घर की माली हालत ऐसी कि बेबी मुन्ना को रोटी, नमक, प्याज और हरी मिर्च के स्वाद की आदत पड़ गयी। यह आदत गरीबी की थी जिससे कभी मुक्ति नहीं मिली। मौत ही आखिर अंतिम रूप से बेचैनी दूर कर सकी।

थका-थका सा बदन
रूह बोझिल-बोझिल
कहाँ हाथ से कुछ छूट गिरा, याद नहीं
न जाने यह कुछ चटखने की आवाज कहाँ से आई 
और एहसास दराड़ों में कैसे पहुँचा
शहर वीरान, झरोखे खामोश, मुंडेरें चुप 
खामोशी उफ! खलाओं का(शून्य का) दम भी घुटने लगा
अचानक आ गयी हो मौत वक्त को जैसे 
हाय! रफ्तार की नब्जें रुकीं, दिल डूब गया
कहाँ शुरू हुए ये सिलसिले कहाँ टूटे 
न इस सिरे का पता है न उस सिरे का...

मंजू की इस कविता, शीर्षक (खामोशी) के दर्द को आखिर जान न्यौछावर करने वाले चंदन उर्फ कमाल अमरोही भी कहाँ समझ पाए? 1952 के आसपास फिल्म 'तमाशा' के सेट पर ही तो कमाल अमरोही उर्फ चंदन से मंजू की पहली मुलाकात हुई थी। दो वर्ष के अंदर ही चोरी-छिपे शादी और फिर पिता के घर से निकाला। यह प्यार एकतरफा भी नहीं था। मीना कुमारी का पहली बार किसी पर दिल आया था और वही सपनों का राजकुमार था। मंजू को इसमें भी कोई दिलचस्पी नहीं थी कि उनका राजकुमार पहले से शादीशुदा है और बच्चों के पिता हैं। इतनी बड़ी कुर्बानी! फिल्में 1952 से ही हिट पर हिट होने लगी थीं। पैसे कमाल अमरोही संभालते। पिता के घर की जिम्मेदारी भी निभायी जा रही थी। 

'खाली है मेरे हाथ' शीर्षक कविता की पंक्तियां हैं :-

खाली है मेरे हाथ, मेरे पास कुछ भी नहीं
दामाने-दिल (दिल रूपी दामन) में तलखिए-एहसास (अनुभूतियों की कटुता) के सिवा 
देखे थे कितने ख्वाबे-तरब, (सुखद स्वप्न) किस तरह कहूँ
जब कुछ नहीं मिल सका अलम-ओ-यास (दुःख) के सिवा
आखिर वह एक आस थी दम तोड़ने लगी 
सब कुछ ही खो चुका था जिस इक आस के सिवा

मैं जिंदगी को देती रही अपना खूने-दिल 
खुद मेरी जिंदगी ने मगर क्या दिया मुझे 
मेरे ही ख्वाब मेरे लिए जहर बन गए 
मेरे तसव्वुरात (कल्पनाओं में) ने ही डस लिया मुझे

मीना कुमारी इन पंक्तियों में साफ इशारा कर रही हैं कि जिस कमाल अमरोही को अपना सर्वस्व दे दिया। पिता को नाराज कर शादी की। अब वही चंदन कह रहा है मंजू से कि तुम्हें किसी से नहीं मिलना है, जिससे मिलो सार्वजनिक मिलो, अकेले में मत मिलो और शाम छह बजे तक घर आ जाओ। एक साथ इतनी पाबंदियां! क्या खूब कहती है बेबी मुन्ना-" मेरे ही ख्वाब मेरे लिए जहर बन गए।" लेकिन मंजू जब ब्रांडी की बोतलों में अपने अकेलेपन में जी-मर रही थी तब भी चंदन का पत्र आया कि 'पाकीज़ा' को पूरा कर दो। एक ऐसी फिल्म जिसे बनाने में लगभग 15 वर्ष लगे। चंदन हर हाल में खुश रहे। मंजू ने हर वादा पूरा किया मगर पाबंदियां कतई मंजूर न थीं और अंतिम सांस तक आजादी की छटपटाहट जारी रही। 

जब अंतिम समय में अस्पताल में भर्ती हुई  मंजू तो बड़ी बहन खुर्शीद ने कहा कि महज सौ रुपये हैं। मंझली बहन मधु रो रही थी। एक प्रोड्यूसर ने दस हजार की मदद की। फिर चंदन उर्फ कमाल अमरोही मदद को पहुंचे। तब तक मंजू टूट चुकी थी। तसल्ली यही कि चंदन की बाहों में जान निकली। कब्र भी मुंबई में दोनों के अगल-बगल हैं।

बॉलीवुड की इस चकाचौंध दुनिया में न धन की कमी मीना कुमारी के पास थी, न सुशांत सिंह राजपूत के पास? मगर जो असली कमी है संवेदना की, जिस झूठ को परोस कर यह दर्शक को धोखा देता है। प्रेमचंद इसे ही इंसानियत का खून करना कहते हैं फिल्म उद्योग द्वारा। 

मंजू की कविता 'टूटे रिश्ते झूठे नाते' की पंक्तियां हैं:-

टूट गए सब रिश्ते आखिर
दिल अब अकेला रोए
नाहक जान यह खोए
इस दुनिया में कौन किसी का 
झूठे सारे नाते
बस चलता तो---
हम पहले ही इस दिल को समझाते
हम भी न समझे दिल भी न समझा
कैसी ठोकर खाई
अब हम हैं और जीते जी को
दर्द भरी तन्हाई!

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