* निर्भय देवयांश
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प्रेमचंद साहित्य के अनुसंधान पर अपने जीवन को न्यौछावर करने वाले कमल किशोर गोयनका मित्रों की इस राय से आंशिक सहमत होते हुए भी पूर्ण रूप से असहमत हैं कि --- तो क्या सिफारिश गैंग के सामने अपनी साधना में तन्मय रहने के चलते पदोन्नति व अन्य सुविधाओं को त्याज्य मान लेना चाहिए? कैंपस की बेहयाई, गिरोहबंदी और तथाकथित प्रगतिशीलता पर गोयनकाजी कहते हैं---
" कई मित्रों ने सही कहा है कि प्रोफेसर होना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना ज्ञान की साधना करने वाला और कुछ नये अज्ञात-अप्राप्य ज्ञान को समाज के सामने लाने वाला। यह सत्य है पर इस संतोष से क्या योग्यता की उपेक्षा और अयोग्य को वरदान के अलोकतांत्रिक पक्षपात का हम समर्थन नहीं कर रहे हैं। समाज अयोग्य, सिफारिशी, निष्ठाहीन व्यक्तियों को उच्च पदों पर बैठाने से चलेगा या योग्य को उसकी योग्यता के सम्मान से होगा। योग्यता को अपमानित करने के दुष्परिणामों को समझना जरूरी है। अतः ऐसे अन्याय की भर्त्सना जरूरी है और ऐसे लोगों के चेहरों से नकाब उठाना भी जरूरी है और समाज को जागृत करना भी जरूरी है।"
गोयनकाजी जी की यह पीड़ा अकेले की नहीं है। इन्हीं के समानधर्मा भारत यायावर जो अपने को फणीश्वरनाथ रेणु साहित्य को समर्पित कर चुके हैं, कुछ अलग अंदाज में लहक से बातचीत में अपनी राय रखते हैं। भारत जी कहते हैं-- " साधना में रत अनुसंधानकर्ता को अपने काम से अधिक मतलब होता है। सुविधाएं जरूरी हैं लेकिन उन्हें पाने के लिए जो भीतरिया साजिशन प्रक्रिया है, वह सबके वश की बात नहीं है। बहुत माथापच्ची है। पदोन्नति सामान्य प्रक्रिया के साथ होती ही है, होनी भी चाहिए। क्यों नहीं होती है, इसके पीछे जो कारण हैं, उनकी खोजबीन मैंने कभी नहीं की। रेणु साहित्य में इस तरह रमा रहा कि सुविधाओं से वंचित होना भी स्वीकार करता रहा।"
कैंपस में यदि चयन प्रक्रिया सही होती तो कमल किशोर गोयनका रीडर की जगह प्रोफेसर पद से रिटायर होते। भारत यायावर भी लेक्चरर से आगे बढ़कर रीडर और फिर प्रोफेसरी तक पहुँचते? लेकिन यह योग्यता का कैसा सम्मान है कि अगले वर्ष 2021 में वह रिटायर होंगे लेक्चरर पद से। जबकि भारत जी 2004 से ही विश्वविद्यालय के पीजी के छात्रों को पढ़ा रहे हैं।
कैंपस के गलियारे की ही चर्चा है कि गिरोहबंदी कइयों की प्रतिभा पर भारी पड़ी है। जो गिरोह में थे बहुत आगे निकलते गए। गोयनका जी दिल्ली विश्वविद्यालय में एमए के छात्रों को पढ़ाते थे, जबकि सुधीश पचौरी बीए। आपको पता ही होगा कि सुधीश पचौरी कहाँ तक पहुँच गए! प्रोफेसरी से भी आगे। प्रतिभा और योग्यता रहते कमल किशोर गोयनका रीडर और भारत यायावर लेक्चरर तक ही!
कुमार पंकज अपनी पुस्तक 'रंजिश ही सही...' (राधाकृष्ण प्रकाशन) अध्याय 'तबियत इन दिनों बेगाना-ए-गम होती...' में लिखते हैं--- अपनी मान्यताओं में रामस्वरूप चतुर्वेदी अडिग थे। 'नामवर के निमित्त' आयोजन जब इलाहाबाद में हुआ तो ग्रोवर बंधुओ (दिनेश ग्रोवर/ रमेश ग्रोवर) के बहुत आग्रह करने पर वह दोपहर के भोजन में तो शामिल हो गए लेकिन किसी भी सम्मान गोष्ठी में शामिल नहीं हुए। इससे पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पद के लिए हुई चयन-समिति में, नामवर सिंह विशेषज्ञ थे, जो निर्णय हुए थे, उससे चतुर्वेदी जी इतने क्षुब्ध हुए थे कि तभी दशकों पुरानी चतुर्वेदी-नामवर मित्रता के टुकड़े-टुकड़े हो गए थे। यह विडंबना ही कही जाएगी कि जिस वरिष्ठता की आड़ लेकर चतुर्वेदी जी को माताबदल जायसवाल के मुकाबले प्रोफेसर पद से वंचित किया गया था। (योग्यता में चतुर्वेदी जी यदि राजा भोज थे तो माताबदल जायसवाल...), उसी वरिष्ठता को आधार बनाकर चतुर्वेदी जी ने एक साठोत्तरी लेखक/अध्यापक को, जो अभ्यर्थियों में सर्वाधिक योग्य था, प्रोफेसर पद से वंचित करने की कोशिश की। अंतर मात्र इतना ही है कि चतुर्वेदी जी को बाद में दोबारा मौका मिला लेकिन बेचारा लेखक तो सेवानिवृत्त ही हो गया। (पेज नं.33)...
कमल किशोर गोयनका और भारत यायावर बेचारा तो बिल्कुल ही नहीं हैं। ये दोनों उन सभी प्रोफेसरों पर बीस पड़ेंगे जो बहुत दूर तक कुचक्र से पहुँच गए! चिंता बस इतनी कि कैंपस की बेहयाई में योग्यता और प्रतिभा कब तक कुचली-मसली जाती रहेगी? क्या इस साजिश को हम संतोष का नाम दे सकते हैं?
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