* निर्भय देवयांश
------------------
प्रेरणा लेने-देने के चक्कर में सामान्य जिंदगी भी कभी-कभी असामान्य हो जाती है। चमक न हो तो आकर्षक का भी पता कम ही चलता है। वे लोग जो चमक-दमक के झांसे में आ जाते हैं, शायद सबसे अधिक गुनाह खुद पर करते हैं। आखिर उनके जीवन को इतना वक्त ही कैसे मिलता है कि वे प्रेरणा-प्रेरणा के खेल में उलझ कर रह जाएं?
जाने-माने निर्माता-निर्देशक व लगभग दर्जनों फिल्मों के पटकथा लेखक बिग ब्रो इकबाल दुर्रानी जब कहते हैं कि आमजन की निजी जिंदगी बॉलीवुड वालों से लाख गुनी अच्छी है, तो वह उस हकीकत पर से पर्दा उठा रहे हैं, जिसे हम अब तक प्रेरणाश्रोत मानते आ रहे हैं। उनके अनुसार-सच यह है कि फिल्मवालों की निजी जिंदगी गर दर्शक सामने से देख लें तो घृणा हो जाएगी। यह कितनी बड़ी सच्चाई है! तो क्या कला के नाम पर दिखावा कर ये बॉलीवुड वाले-दोहरे जीवन जीते हैं और उसी को कारोबार और करोड़ी क्लब का नाम दे बैठे हैं?
इकबाल दुर्रानी कहते हैं कि बस दो घन्टे की फिल्म देखिए और अच्छा लगे तो तारीफ कीजिए और भूल जाइए। फिल्म की कहानी को आप जिस घर में रहते हैं और जो जिंदगी जीते हैं वहाँ तक मत ले जाएं। आप अपने घर और निजी जिंदगी में फिल्म वालों से लाख गुने बेहतर हैं।
अभी लॉक डाउन के माह-दो माह पहले बिग ब्रो के कोलकाता प्रवास के दौरान शाम में घण्टों उनके साथ बैठकर हम फिल्मों पर चर्चा करते थे। मेरे अलावा शायर रामगोपाल पारीख, पत्रकार हरेराम कात्यायन, कहानीकार विमलेश्वर द्विवेदी सब मिलकर दुर्रानी साब से अनचाहे सवाल भी करते थे। बिग ब्रो शांति से जवाब देते और कहते कि संजीदगी यही है कि आप जो जीते हैं और उसमें जो सरोकार है वही आपकी पहचान है। उदाहरण के लिए अमिताभ बच्चन अच्छे कलाकार हैं, हो सकते हैं। उसके बाद उनमें कोई दिलचस्पी नहीं होनी चाहिए। फिल्म के बाद यदि बॉलीवुड में दिलचस्पी है तो फिर आपकी अपने में दिलचस्पी कम है। इस बात को मानकर चलिए। दूसरे उदाहरण को लेते हैं-मैंने पूछा कि आपकी लिखी कहानी 'फूल और कांटे' पर कुकू कोहली के निर्देशन में बनी फिल्म का यह गाना---तुम्हीं ही हो जिस पर दिल मरता है, कि तुमसे मिलने को दिल करता है रे बाबा...। अब इस गाना की व्याख्या भी बिग ब्रो अपने ढंग से करते हैं। उनके अनुसार-जब फिल्म निर्माण होता है तब हर निर्माता-निर्देशक यही चाहता है कि चमकदार इतना बनाओ कि आकर्षण में लोग खिंचे चले आएं। यह कमाई का जरिया है। लेकिन गाना का दर्शन इसके ठीक विपरीत भी हो सकता है--सिर्फ तुम्हीं क्यों ऐसा क्यों हो कि तुमसे मिलने को दिल करता है। इसी फिल्म का दूसरा गाना है--धीरे-धीरे प्यार को बढ़ाना है। अब यहाँ धीरे-धीरे यानी समझिए-बूझिए आगे बढ़िए। बेहतर समझ में पहले कदम पर लिए जाने वाले फैसले कभी-कभार हमारी आँख खोलने में भी सक्षम हैं।
दुर्रानी साहब भी जब मुंबई गए थे तो अविभाजित बिहार के ही थे। अभी गोड्डा झारखंड में है। उन्होंने अपनी प्रतिभा की बॉलीवुड में धूम मचा दी थी। सुशांत सिंह राजपूत भी दस-पंद्रह साल में अच्छे-अच्छे निर्देशकों के साथ फिल्म कर रहे थे। कइयों से आगे निकल रहे थे। भाई-भतीजावाद वाले उनके दुश्मन बन गए थे। नहीं तो भला इतनी निर्मम मौत होती भी क्या ?
अब सोचिए कि जो बॉलीवुड पथ-प्रदर्शक होने का दावा करता है। करीने से किसी की हत्या भी कर सकता है, करवा सकता है? पर्दे से यह प्रेरणा लेने पर फिर विकास दुबे उर्फ 'पंडित बोल रहा है' का भयानक सच समाज में राज करेगा। दुर्रानी साब ने लहक से अंतिम बात यह कही कि --आमलोगों के खून-पसीने और संघर्ष की जिंदगी के सामने बॉलीवुड वाले की निजी जिंदगी से बहुत दूर रहने की जरूरत है। मामला कुछ-कुछ ऐसा ही है-'दीवाने हुए न कि दर्द लिए'।
***
No comments:
Post a Comment