* निर्भय देवयांश
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प्रेमचंद की यह सलाह कि तंजीम (संगठन) बनाकर फिल्म उद्योग का विरोध करें। क्यों विरोध करें? इसलिए कि सिनेमा के जरिये मगरिब की सारी बेहूदगियां हमारे अंदर दाखिल की जा रही हैं, और हम बेबस हैं। प्रेमचंद की बात प्रगतिशीलों को अच्छी नहीं लगती है शायद। क्या इसीलिए प्रेमचंद ने प्रगतिशीलता को एक निरर्थक शब्द कहा था!
प्रेमचंद आगे कहते हैं-यह फिल्म उद्योग है क्या? यह है-बरहना यानी नग्न, और नीम बरहना तस्वीरें यानी नंगी तस्वीरें, कत्ल-ओ-खून और जब्र की वारदातें, मारपीट, गुस्सा, और ग़ज़ब और नफसानियत यानी वासना ही इस इंड्रस्टी के औजार हैं और इसी से वह इंसानियत का खून कर रही है। (निगम जी 13 नवंबर,1934, 19 मार्च 1935 को लिखे पत्र में यह सब विचार और नाराजगी व्यक्त करते हैं।) शब्द तो देखिए- बरहना- रक्स यानी नंगे नाच, बोसा-बाजी, और मर्दों का औरतों पर हमला। यह सब उनकी नजरों में जायज है। क्यों यह सब है, क्योंकि हयासोज यानी ये निर्लज्ज लोग हैं।
प्रेमचंद की बात यानी मर्दों का औरतों पर हमला--दिशा सालियान पर हमला हुआ। सामूहिक बलात्कार हुआ। बहुमंजिली इमारत से दिशा सालियान की लाश को नग्न अवस्था में फेंक कर हत्या-आत्महत्या की गयी! प्रेमचंद कहते हैं- वह इंसानियत का खून कर रही है। तो यह बात भी सही साबित हुई। इंसान, मेहनत-मजदूरी कर मुकाम बनाने वाले सुशांत सिंह राजपूत की निर्मम हत्या-आत्महत्या की गयी? क्या है कला का संसार है--निर्लज्जता की दुनिया है। हयासोजों की। प्रेमचंद यह भी कहते हैं- नाअहलां यानी अयोग्य लोगों के हाथ पड़कर लानत हो रहा है। यह कला संसार कैसे सूअर संसार से अलग है? सूअरों के पास थोड़ी-सी नैतिकता होती है! सुअर ही सभ्यता के अंत तक जीवित रहे तो बेहतर...
स्पेन के विख्यात लेखक सर्वेंटीज अपने उपन्यास 'डॉन क्विकजोट' में दिखाते हैं कि अपने समाज में हीरो ऐसे लोग हैं जो अपने वाक-चमत्कार के सहारे लोगों की आँखों में धूल झोंक कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। यह भोगवादी रवैया, बलात्कार, हत्या, सत्ता सब एक साथ मिलकर एक ऐसी दुनिया रचते हैं, जहाँ इनके हमदर्द भी इनके गुणगान करते हैं। सच को पटक-पटक कर मार दिया जाता है। कौन जानता है सुशांत को भी पटक कर मारा गया होगा?
जब सत्ता, सौंदर्य, वर्चस्व, भोगवाद, वाक-चमत्कार, कानून के पहरेदार एक साथ मिल जाएंगे तो आमजन की आँख में सिर्फ और सिर्फ धूल ही धूल और ये सबूत को मिटाकर अपनी वासना की पूर्ति करते रहेंगे। प्रेमचंद कहते हैं-वल्गैरिटी को यह लोग एंटरटेनमेंट वैल्यू कहते हैं।
एक कलाकार को न्याय दिलाने के लिए लाखों, करोड़ों लोग अभियान से जुड़े। कुछ मीडिया से जुड़े लोगों ने इसे मिशन बनाया तो अधिकांश रिया चरित्तर के झाँसे में गलबहियां ही करते नजर आए। तुम्हारी सत्ता बुरी और हमारी सत्ता द्वारा बलात्कार और हत्या भली की चोंचबाजी करते रहे। यह उनका अधिकार है कि एक सत्ता के समर्थक द्वारा बलात्कार अच्छा न लगे। हत्या भी अच्छी न लगे। दूसरी सत्ता द्वारा सब गलत काम अच्छा लगने लगे। कहाँ किसकी अंगुली दबी है, यह कौन जाने? कहाँ से कौन जीवन में मजा जुटा रहा है, यह सिर्फ लूटने वाला ही जान सकता है।
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