Sunday, 16 August 2020

बिहारियों को गाली देने वाला "दिल्ली का दोगला मीडिया" जिसे अब सत्ता के बलात्कारी और हत्यारे के कारनामे सुहा रहे हैं? लुटियंस दोगले...


 * निर्भय देवयांश
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बात सिर्फ इतनी ही तो थी कि दिशा सालियन और उससे संबंधित सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमय मौत पर सत्ता समर्थित बलात्कारियों और हत्यारों की संलिप्तता पर कुछ कहें, कुछ लिखें। मीडिया का प्रथम और आखिरी काम बस इतना ही तो है कि कायदे से सवाल उठाते रहे ताकि सत्ता से बहुत रहने वाले लोगों में न्याय की आशा जगी रहे। दिल्ली के दोगले मीडियाबाजों को यह काम भी नागवार लगा। उलटे उसने सुशांत सिंह राजपूत के बहाने पूरे बिहारी समाज को ही "toxic Bihari families" करार दे दिया। न्याय का मामला बिहारियों को गाली देने पर शिफ्ट कर दिया गया। इतना ही नहीं, यह मामला " Cow Belt " तक पहुँच गया? सवाल है कि इतनी उग्रता की जरूरत क्या थी? क्यों है? क्यों अचनाक इतनी बेहयाई? क्यों इतनी अश्लील दोगलई? सुशांत सिंह राजपूत की हत्या-आत्महत्या और फिर उसकी लीपापोती में सत्ता के साथ दोगले मीडियाबाजों की मजाखोरी की भी संलिप्तता तो नहीं है? आखिर प्रतिदिन की पार्टी-साटी का मामला है। पीने-खाने, चूमने-झूमने का मौका मिलता है। यही से मनोरंजन की खबरें निकलती हैं। जीने के लिए और क्या चाहिए! दुःखद कि इनके आकाओं के हाथ से पहले बलात्कार और फिर साजिशन सबूत मिटाने के लिए हत्या-आत्महत्या हो गयी? अब बचाव में न उतरे तो भविष्य में पीना-पिलाना, चूमना-झूमना कैसे चलेगा?

यह तो सत्ताखोरों की भाषा थी कि सुशांत सिंह राजपूत की सीबीआई जांच जरूरी नहीं है। अब इस मामले को बंद कर देना चाहिए। दूसरे ने कहा कि मरने के बाद उसका ज्यादा नाम हो गया। तीसरे ने कहा कि वह अवसादग्रस्त था। चौथे ने कहा कि उसकी मौत पर बहस "सड़क छाप" राजनीति है? दिल्ली का दोगला मीडिया आखिर सत्ताखोरों के साथ  "हनी ट्रैपर" क्योंकर बन गया?

क्या उसे अब सत्ता से जुड़े लोगों द्वारा आमजन की बहू-बेटियों के साथ बलात्कार पसंद है? क्या उसे भी वही मजा उसकी वकालत करने से मिल रहा है, जो बलात्कारियों को किसी की इज्ज़त रौंदने से मिला था? क्या अब सत्ता के हत्यारे भी उसके रिश्तेदार हो गए हैं? क्या यह सांठगांठ पहले से है या मजाखोरी के विकासी स्वभाव के चलते हाल के दिनों में विकसित हुआ है? आखिर यह सब कुछ पता तो चलना ही चाहिए?

आखिर दिल्ली के दोगले मीडियाबाजों की क्रांतिकारी पत्रकारिता यही है न- कि तुम सत्ता की आँख में आँख डालकर बात करते हो,  सत्ता समर्थित सेंगर और स्वामी चिन्मय की बलात्कार में संलिप्तता पर सवाल दागते हो, फिर सबूत के तौर पर परिवार की नृशंस हत्या पर कोहराम मचाते हो? फिर ऐसे ही दूसरे मामले में तुम्हारी क्रांतिकारिता कहाँ घुस जाती है? दिशा सालियन और सुशांत की हत्या-आत्महत्या कैसे भिन्न है? आखिर यह कैसी दोगली क्रांतिकारिता है? 

अपनी क्रांतिकारिता में ये "दिल्ली के दोगले मीडियाबाजों " ने पूरे बिहारी समाज को toxic यानी जहरीला-विषैला बता दिया। क्या कभी यह बताने की कोशिश, छोटी कोशिश कि Cow Belt के होते हुए भी, toxic Bihari families का देश भर में बिहारी का "सुसाइड रेट 0.5" यानी सबसे कम क्यों है? कभी बताए हो toxic दिल्ली के दोगले मिडियाबाजो? कभी ये भी बता देते कि तुम लोग कितने अवसादग्रस्त हो और तुम्हारा सुसाइड रेट बिहार के बनिस्पत इतना अधिक क्यों है? पहले बिहारी की तरह पसीना बहाना सीखो, तब तुम्हें पता चलेगा कि मनुष्य होना किसे कहते हैं। श्रमिक होना किसे कहते हैं? बिना पसीना की प्रतिभा तो सत्ता के बलात्कारी और हत्यारे की प्रशंसक बना ही देगी! इसमें कोई शक हो कभी तो अपने कुकृत्य और कारनामे पर नजर डाल लिया करो। लुटियंस के दोगले!

दिल्ली के दोगले मीडियाबाजों ने कभी यह भी बताया कि बिहार जैसे Cow Belt और toxic Bihari families से मुंबई पहुँचा सुशांत सिंह राजपूत को राजकुमार हिरानी जैसे निर्देशक और विधु विनोद जैसे निर्माता अपनी फिल्म 'पीके' में क्यों चयन करता है? क्यों सारा खान के साथ उसे 'केदारनाथ' में लिया जाता है? क्यों 'छिछोरे' में उसे लीड रोल मिलता है? क्यों हनी-मनी ट्रैप गैंग के सरगना करण जौहर अपनी फिल्म 'ड्राइव' में मुख्य रोल में लेता है? मीडिया के नाम पर पेशे की इतनी ईमानदारी तो बनती है कि नहीं? महज एक दशक में इतनी महत्वपूर्ण फिल्में? यदि इतना बड़ा स्टार नहीं था तो फिर लेने की क्या जरूरत थी? सुशांत की 34 वर्ष की सफलता तुम्हारे पके सफेद बालों से बहुत आगे निकल चुकी थी।

सत्ता के बलात्कारी और हत्यारे दिल्ली के दोगले मीडियाबाजों को  सुहा रहा है, तो उसे यह भी बताना होगा कि जिस्मफरोशी में तुम भी हिस्सेदार तो नहीं? क्या तुम्हें आमजन के न्याय से अधिक खास लोगों की जिस्मफरोशी पसंद आ गयी है? इन जिस्मखोरों के साथ उठने-बैठने की बिगड़ी लत से मुक्ति अच्छी नहीं लग रही है?

गिनो -गिनो अपने पापों को, बापों को भी। कब-कब किसका साथ दिए? 'जो तटस्थ है समय लिखेगा उसका भी इतिहास', बस इतना याद रखना है। 

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