Friday, 14 August 2020

प्रेमचंद का हिंदी फिल्म उद्योग के खिलाफ (तंजीम) संगठन बनाकर विरोध करने का सपना 85 वर्ष बाद पूरा हुआ... फिल्म 'सड़क 2' का बहिष्कार शुरू...


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सिनेमा के जरिये मगरिब की सारी बेहूदगियां हमारे अंदर दाखिल की जा रही हैं : प्रेमचंद 
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* निर्भय देवयांश 
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प्रेमचंद ने "प्रगतिशीलता" को निरर्थक शब्द कहा था, क्योंकि वे जानते थे इसकी आड़ में कला-संस्कृति के नाम पर लोग 'गोरखधंधा' करेंगे। अब जिसका अर्थ गलतधंधा हो गया है। प्रेमचंद साहित्य के विशेषज्ञ कमल किशोर गोयनका इसे बार-बार दोहराते हैं कि गिरोहबंदी से जुड़े लोगों ने अपने फायदे के लिए इस शब्द का घनघोर दुरुपयोग किया है। 

प्रेमचंद अपने जीवन की बेहतरी के लिए फिल्म लाइन में काम करने के लिए मुंबई गए थे। लगभग दस माह वहाँ रहे लेकिन बरहना रक्स यानी नंगे नाच देखकर उनका मन उचट गया। वे कहते भी हैं कि बोसा बाजी और औरतों पर मर्दों का हमला के सिवा क्या है? यह सब फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों को जायज लगता है।

दिशा सालियन और सुशांत सिंह राजपूत की हत्या-आत्महत्या हत्याकांड के बाद प्रेमचंद की बात शत-प्रतिशत साबित हो रही है। इन दोनों के पहले दिव्या भारती और जिया खान की संदिग्ध हत्या-आत्महत्या की गुत्थी अभी तक सुलझी नहीं है। यानी प्रेमचंद की बात-"मर्दों का औरतों पर हमला" , सच होती दिख रही है। यह लेखक की मानवतावादी दृष्टिकोण है। प्रेमचंद इस सच  को महज दस माह में ही समझ गए थे। सुशांत सिंह हत्याकांड में जिस तरह सत्ता और बॉलीवुड की गलबहियां दिख रही हैं, उससे जनता में नाराजगी स्वाभाविक है। जब फिल्म के इतने बड़े कलाकार की संदिग्ध हत्या हो सकती है, तो फिर छोटे कलाकारों की क्या बिसात है? ये लोग कैसे अपनी लड़ाई उस फिल्म उद्योग में लड़ेंगे, जहाँ प्रेमचंद का मोहभंग हो गया था!

प्रेमचंद,  निगम जी को 19 मार्च, 1935 को लिखे पत्र में कहते हैं-- "सिनेमा में किसी इस्लाह की तवक्को करना बेकार है। यह सनत भी उसी तरह सरमायादारों के हाथ में है जैसे शराब फरोशी। इन्हें इससे बहस नहीं कि पब्लिक के मज़ाक पर क्या असर पड़ता है। इन्हें तो अपने पैसे से मतलब। बरहना रक्स यानी नंगे नाच, बोसाबाजी और मर्दों का औरतों पर हमला। यह सब उनकी नजरों में जायज है। पब्लिक का मज़ाक इतना गिर गया है कि जब तक ये मुखरिब यानी घातक और हयासोज यानी निर्लज्ज नजारे न हों, उसे तस्वीर में मजा नहीं आता। मज़ाक की इस इस्लाह का बीड़ा कौन उठाए? सिनेमा के जरिये मगरिब की सारी बेहूदगियां हमारे अंदर दाखिल की जा रही हैं, और हम बेबस हैं। पब्लिक में तंजीम यानी संगठन नहीं, न नेक-ओ- बद का इम्तियाज यानी पहचान है।"

मुकेश भट्ट निर्मित और महेश भट्ट निर्देशित फिल्म 'सड़क 2' की ट्रेलर लाखों लोगों द्वारा नापसंद की गयी। तो क्या प्रेमचंद की आत्मा लोगों में अचानक जाग गयी? सुशांत की मौत का बहाना लेकर। आलिया भट्ट और संजय दत्त अभिनीत इस फिल्म का भविष्य अभी से अंधेरे में है। सुशांत सिंह राजपूत हत्याकांड में जगह-जगह अभियान चलाए जा रहे हैं ताकि संदिग्ध मौत के शिकार कलाकार को न्याय मिल सके। दूसरी तरफ सत्ता अपनी सनक-हनक में अब सुशांत के पीड़ित परिवार को ही निशाना बना रही है ताकि वे कुछ बोल न सकें। मकसद है अपराधी को सफेदपोश हाथों से बचा लिया जाए? खाकी सफेदपोश की सेवा में रहने के लिए बाध्य है, शायद यह लोकतांत्रिक बाध्यता है। इस पर ताली बजाने की मनाही है। 

प्रेमचंद की भविष्यवाणियां आने वाले दिनों में प्रायः अक्षरशः साबित होंगी। अभी शुरुआत भर है। प्रेमचंद की सलाह थी कि जिन्हें साहित्य का रस लेना हो, उन्हें सिनेमा को दूर से सलाम करना चाहिए। अब आमजन की बारी है। 

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