* निर्भय देवयांश
हिंदी साहित्य में पाठकों के पास क्या यह संस्कार विकसित हुआ है कि उनकी भाषा के बड़े या छोटे लेखक असमय मर जाएं तो उनकी रचनाएं धन संग्रह कर ऐसे रचनाकारों की कृतियाँ प्रकाशित करा सकें। अगर गुट के लेखक हुए, संगठन के लेखक हुए, विचारधारा के लेखक हुए, रसरंजन भरी महफ़िल के लेखक हुए तो संभव है कि कुछ सफल हुए हों। भविष्य भी उनके लिए इंतजार कर रहा है। वर्तमान में उन पर कुछ काम हो रहा होगा।
विजयदेव नारायण साही आपको याद होंगे। अरे वे नहीं जो आप समझ रहे हैं कि समय-समय अज्ञेय और अशोक वाजपेयी ने मौके-बेमौके मार्क्सवादियों के विरोध के लिए उनका इस्तेमाल किया और साही जी होते भी रहे। आप उन्हें इस रूप में बेहतर ढंग से याद करें तो ज्यादा उनके लिए और आपके लिए बेहतर होगा कि साही जी ने " लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस" जैसा दमदार लेख लिखा था, जिसकी गूंज आज भी अपनी जगह कायम है। आपको नहीं लगता है कि जब भी हिंदी कविता में लघु मानव की बात होती है, विजयदेव नारायण साही वहां उपस्थित हो जाते हैं। अब सोचिए कि जो आलोचक हिंदी साहित्य में सीमा का रेखांकन कर रहा हो और वो अचानक दुनिया छोड़ जाए तो पाठक वर्ग का कोई दायित्व बनता है कि नहीं? अच्छा तो यह बात है कि हिंदी का पाठक वर्ग साहित्य को सिर्फ मनोरंजन के लिए पढ़ता है! अजी यह भी कम एहसान नहीं है रचनाकारों पर? तो फिर जो साही जी से मौके-बेमौके काम निकालते रहे, वही उनकी कुछ रचनाएं जो कि अभी तक अप्रकाशित हैं, छपवा देते? जब इसकी भी उम्मीद न रही होगी तब विजयदेव नारायण साही की पत्नी आगे आईं और जितना बन पड़ा, रचनाएं प्रकाशित हुईं। मगर आज भी बहुत कुछ अप्रकाशित हैं और साया होने के बेचैन! कितने तो हिंदी में आउंडेशन-फाउंडेशन हैं, आपकी पहुँच वहाँ तक हो तो लहक पत्रिका की इस चिंता को जरूर वहाँ तक पहुचाएं। जो ऐसा करेंगे और करते हैं, लहक थाली भर- भर कर दुआ और उनकी बेहतरी के लिए कामना करती है और करती रहेगी। साही जी 'तीसरा सप्तक' के कवि भी थे। इस नाते भी उनको उचित सम्मान मिलना चाहिए कि नहीं? आलोचना के अंक में उनके लेख की तब कितनी प्रशंसा हुई थी जिसका शीर्षक है-"प्रगतिवादी आलोचना की मार्क्सवादी परिणति"। अभी आगे भी देखिए-इलाहाबाद की विवेचना गोष्ठी में पढ़े उनके निबंध"शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट"। ""यह तो हिंदुस्तानी एकेडमी का शुक्र है कि जायसी पर साही जी के व्याख्यानों का संग्रह 'जायसी' नाम से उनके मरणोपरांत प्रकाशित कराकर बड़ा काम किया। साही जी का यह काम इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि रामचंद्र शुक्ल से अलग राय और विचार के तहत जायसी को कवि के रूप में पहचान दिलाते हैं, जबकि शुक्ल जी सूफी। इतना ही नहीं साही जी के निबंध साहित्य क्यों? और छठा दशक आज भी बेजोड़ हैं और पठनीय हैं।
देवीशंकर अवस्थी भी असमय दुनिया छोड़ गये और उनकी पत्नी ने उनकी रचनाओं को पाठकों तक पहुंचाने के लिए जो मेहनत - तपस्या कीं, उसके लिए सलाम तो बनता ही है। अब प्रकाशचंद्र गुप्त की बात करेंगे तो आप कहेंगे कि हिंदी में ऐसे भरे पड़े हैं, किन्हें- किन्हें साया करेंगे। अरे, जहां तक हो बंधु कीजिए। जरूरी तो है नहीं कि बहुत कुछ करें मगर कुछ तो कर ही सकते हैं तो कीजिए। काश! प्रकाशचन्द्र की पत्नी या परिवारवाले ही यह बीड़ा उठाते तो कुछ रचनाएं ही सही, प्रकाशित तो होतीं!
महत्वपूर्ण बात उठाई आपने। ऐसे भाग्यशाली नहीं के बराबर हैं जिन्हें भारत यायावर या कमलकिशोर गोयनका मिले हों। अधिकांश के परिवार के लोग ही उदासीन रहते हैं। शिवप्रसाद सिंह की बात आपने हाल में उठायी थी।
ReplyDeleteDear sir,You have raised a very important question.
DeleteYes I totally agree with you.You are hundred percent right .Hindi readers should seriously think about this.
ReplyDeleteजी सही
ReplyDeleteजी सही
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