Saturday, 30 May 2020

सौदे की जिंदगी के सवाल

* निर्भय देवयांश की कविता 

तय जिंदगी किसे धरती पर मिलती है
एकाध भी हो तो उसकी बात होती है
ऐसा होने से उसे अपराध माना जाएगा

कबूल करने में दिक्कत यह है 
अपराध को जिंदगी नहीं मानते 
उसमें पवित्रता ढूंढ़ते हैं
हत्यारे के लिए चुंबन का क्या मतलब है 
जब उसके हाथ से खून की तैयारी हो चुकी है 

हमारे हाथ से बेहतर दुनिया का विकल्प निकल गया है
समय काटने के लिए हम यहाँ है
अच्छे प्यार हो चुके हैं 
अब जो बचे हैं तिरस्कृत और बुरे हैं 

हम अपने जन्म के बारे में सोचते हुए बूढ़े हो गए
जब न रहेंगे धरती पर 
विदा हो जाएंगे सदा के लिए 
किसी को याद नहीं आएंगे

सौदे में बचता है प्रेम 
आदमी की चाहत।
  फकीर




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